Home / Tag Archives: डॉ पी सी लाल यादव

Tag Archives: डॉ पी सी लाल यादव

छत्तीसगढ़ का पर्यटन स्थल : बैताल रानी घाट

प्रकृति जीवन है, हमारा प्राण है। प्राण के बिना हम अपने होने की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो प्रकृति के निकट हैं, प्रकृति से जुड़े हुए हैं। वे सुरक्षित हैं। जो प्रकृति से कट गए हैं, या जो दूर हो रहे है, उनका जीवन खतरे में है। इसका प्रत्यक्ष …

Read More »

चोड़रापाट के डोंगेश्वर महादेव : सावन विशेष

वर्तमान समय आपाधापी का समय है। मनुष्य इस आपाधापी के कारण मानसिक शांति से कोसों दूर हैं। सुख-सुविधा की चाहत में मनुष्य इतना उलझ गया है कि भौतिक संपदाओं की उपलब्धि के बावजूद भी न तो उसकी आंखों में नींद है, और न ही मन में चैन। ऐसी स्थिति में …

Read More »

छत्तीसगढ़ का हरेली त्यौहार एवं लोक प्रचलित खेलों की परम्परा

लोक संस्कृति का वैभव लोक जीवन के क्रिया-व्यवहार में परिलक्षित होता है। यदि समग्र रूप से समूचे भारतीय लोक जीवन को देखें तो आँचलिकता व स्थानीयता के आधार पर, चाहे व पंजाब हो, या असम हो, कश्मीर हो या केरल, महाराष्ट्र हो या पश्चिम बंगाल, गुजरात हो या राजस्थान, उत्तरप्रदेश …

Read More »

जानो गाँव के प्रस्तर शिल्पकार

बचपन की यादें जब स्मृतियों में आकार लेती हैं, तो मन कौतूहल और प्रसन्नता से भर जाता हैं। बचपन यादों का पिटारा है, जिनमें रंग-बिरंगी और मजेदार यादें समाहित रहती हैं। अवसर पाकर ये यादे हमारी आँखों के सामने नाचने लगती हैं। जब हम छोटे थे तो सभी बच्चे परस्पर …

Read More »

छत्तीसगढ़ी लोक में रचा बसा रथदूज का त्यौहार

प्रकृति ने बड़ी उदारता के साथ छत्तीसगढ़ की धरती को अपना प्राकृतिक सौन्दर्य प्रदान कर इसे अग्रगण्य बनाया है। हरितिमा के गीत गाते जंगल, उन्नत शिखर लिए पहाड़, लहरों के स्वर में लोरी गाती नदियॉं श्लोक और ऋचाएँ गुनगुनाती चिड़ियाँ, स्वर्णिम आभा लिए लहराते धान के खेत, क्या कुछ नहीं …

Read More »

लोक जीवन की शक्ति, लोक पर्व अक्ति

हमारा भारत का देश गाँवों का देश है। गाँव की गौरव गरिमा लोक परम्पराएं तीज त्यौहार, आचार विचार आज भी लोक जीवन के लिए उर्जा के स्रोत हैं। गाँव की संस्कृति लोक संस्कृति कहलाती है। जनपदों लोकांचलों में विभक्त ये गाँव अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को सांसों में बसाए हुए हैं। …

Read More »

पंडवानी के सूत्रधार श्रीकृष्ण

भारतीय लोक जीवन सदैव से ईश्वर और धर्म के प्रति आस्थावान रहा है। निराभिमान और निश्च्छल जीवन लोक की विशेषता है। फलस्वरूप उसका जीवन स्तर सीधा-सादा और निस्पृह होता है। उसकी निस्पृता और उसकी सादगी लोक धर्म की विशिष्टता है। धर्म और ईश्वर के प्रति अनुरक्ति और उसकी भक्ति लोक …

Read More »

कुँवर अछरिया की लोक गाथा एवं पुरातात्विक महत्व

लोक साहित्य वाचिका परम्परा के माध्यम से एक कंठ से दूसरे कंठ में रच-बस कर अपने स्वरूप को विस्तार देता है। फिर व्यापकरूप में लोक को प्रभावित कर लोक का हो जाता है। यही लोक साहित्य कहलाता है। लोक साहित्य में लोक कथा, लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य, लोकोक्तियाँ और लोक पहेलियाँ, …

Read More »

छत्तीसगढ़ी बालमन की मनोरंजक तुकबंदियाँ

बालमन बड़ा स्वतंत्र होता है। उसे बंधन जरा भी स्वीकार नहीं। बंधन में रहकर बालमन कुम्हलाने लगता है। जैसे कलियों को खिलने के लिए सूरज का प्रकाश चाहिए, उसी प्रकार बालमन को खिलने के लिए बंधन मुक्त होना चाहिए। बालकपन खेल प्रिय होता है। खेल-खेल में वह नए सृजन भी …

Read More »

छत्तीसगढ़ के लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ

लोक गीत लोक जीवन के अन्तर्मन की अतल गहराइयों से उपजी भावानुभूति है। इसलिए लोकगीतों में लोक समाज का क्रिया-व्यापार, जय-पराजय, हर्ष-विषाद उत्थान-पतन, सुख-दुख सब समाहित रहता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि “ये गीत प्रकृति के उद्गम और आर्येत्तर के वेद है।” उक्त कथन लोक गीत की …

Read More »