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About Dakshin Kosal Today

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की चराचर सृष्टि में मनुष्य विशिष्ट है। मनुष्य अन्य जीवों से कई मायनों में अलग है, इतिहास के प्रति लगाव भी उनमें से एक है। मनुष्य इतिहास को देखता है, विश्लेषण करता है, उससे बहुत कुछ सीखता है। इतिहास चिंतन मनुष्य को उत्साह और ऊर्जा देता है, जीवन की दिशा देता है, संघर्षो की प्रेरणा देता है, त्याग का रास्ता दिखाता है, सद्भावना और प्रेम के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है, पुरूषार्थ का मंत्र देता है।
बहुत और बहुत कुछ देने की क्षमता है इतिहास में, बहुत कुछ ही क्यों सब कुछ तो है इतिहास में- प्रेम, घृणा, संवाद, कुसंवाद, असंवाद, संघर्ष और समन्वय, अर्थ और अनर्थ, रचना और विनाश। नदियों के पथ बदले है, शहर समुद्र में समाए हैं और सृष्टि को प्रलय ने लीला है, तो मनुष्य चांद पर भी पहुंचा है।
इतिहास में राजा भी हैं, दरबारी भी। कवि भी हैं, कलाकार भी। संत भी हैं, दुष्ट भी। ईश्वर भी है, भक्षक भी, भोगी भी, त्यागी भी। क्या-क्या गिनाएं, सब कुछ तो है इतिहास में, इसलिये इतिहास में अद़भुत क्षमता है, वर्तमान और भविष्य को बदलने की। इतिहास की इस क्षमता को उपकरण/हथियार बनाते हुये मानव जीवन के वर्तमान और भविष्य बदलने के प्रयास भी हुए हैं/हो रहे हैं।
मूलतः इतिहास तथ्यों का समुच्चय है और इन तथ्यों में हेरफेर कर हथियारों को धारदार भी किया गया है। खैर यह तो दुनियादारी है। हमें लगता है कि इतिहास में जितना पीछे जाते हैं, भेदों से अभेद की ओर अनेकता से एकता की ओर और विविधता से एकात्मता की ओर चल पड़ते हैं।
दक्षिण कोसल टुडे का उद़देश्य भी यही है, इतिहास में झांक कर सुनहरे भविष्य के सपने बुनें, इतिहास के तथ्यों-जानकारी के आधार पर सकारात्मक परिवर्तन के प्रयास करें।

दक्षिण कोसल वेब पोर्टल के माध्यम से हमारे दस सूत्रीय लक्ष्य।

1- इतिहास संबंधी तथ्यों को संकलित करना।
2- वाचिक परम्पराओं, किवदंतियों का अभिलेखन-प्रलेखन।
3- प्रकाशित संदर्भों के अतिरिक्त प्रत्यक्ष अवलोकन, स्थानीय विशेषज्ञों की लोक चर्चा के माध्यम से पूरक तथ्य संकलित करना।
4- विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर तथ्यपरक परिचर्चा
5- वर्तमान-भावी पीढ़ी में ‘इतिहास बोध’ जागृत करना।
6- इतिहास लेखन में रूचि रखने वाली युवा पीढ़ी को एक मंच प्रदान करना तथा शोधपरक अध्ययन के लिए प्रेरित करना।
7- विभिन्न वैचारिक मत भिन्नताओं को पुष्ट, अकाट्य, निर्विवाद बहुआयामी तथ्यों के आधार पर वैचारिक सहमति की ओर बढ़ना ।
8- वर्तमान को संजोकर इतिहास को समृद्ध करना।
9- संस्कृति, साहित्य, इतिहास, लोक जीवन को अभिलेखीकरण के माध्यम से संरक्षित एवं सर्वसुलभ बनाना।
10- वर्तमान डिजिटल युग में सूचनाओं-जानकारियों की बाढ़ में से ‘पुष्ट तथ्यों’ की पहचान करने की प्रवृत्ति को विकसित करना और बढ़ावा देना।

दक्षिण कोसल

देश और काल, एक-दूसरे के सापेक्ष व्यापक और सार्थक होते हैं। किसी अंचल, उसके निवासी लोगों और उसकी संस्कृति के समग्र दर्शन के लिए यही दृष्टिकोण अपनाया जाना आवश्यक है।
महाजनपदों का निर्माण शासन की दृष्टि से किया गया, इस समय को हम महाजनपद काल कहते हैं। वैदिक काल में कुछ जनपदों का उल्लेख मिलता है इसके पश्चात बौद्ध, जैन ग्रंथों में जनपदों का जिक्र आता है। ये सभी महाजनपद वर्तमान के उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान से बिहार तक और हिन्दुकुश से गोदावरी नदी तक फ़ैले हुए थे।
दक्षिण कोसल, वृहत कोसल का दक्षिणी भू-भाग। उत्तर और दक्षिण की संधि रेखा, विन्ध्य पादतल पर अवस्थित क्षेत्र- दकन, दक्षिणापथ का मुहाना।
वैदिक काल में कुछ जनपदों का उल्लेख मिलता है इसके पश्चात बौद्ध, जैन ग्रंथों में जनपदों का जिक्र आता है। ये सभी महाजनपद वर्तमान के उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान से बिहार तक और हिन्दुकुश से गोदावरी नदी तक फ़ैले हुए थे।
बौद्ध निकायों में भारत को पाँच भागों में वर्णित किया गया है – उत्तरापथ (पश्चिमोत्तर भाग), मध्यदेश, प्राची (पूर्वी भाग) दक्षिणापथ तथा अपरांत (पश्चिमी भाग) का उल्लेख मिलता है।
इसके अतिरिक्त जैन ग्रंथ भगवती सूत्र और सूत्र कृतांग, पाणिनी की अष्टाध्यायी, बौधायन धर्मसूत्र (ईसापूर्व सातवीं सदी में रचित) और महाभारत में उपलब्ध जनपद सूची पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि उत्तर में हिमालय से कन्याकुमारी तक तथा पश्चिम में गांधार प्रदेश से लेकर पूर्व में असम तक का प्रदेश इन जनपदों से आच्छादित था।
ईसा पूर्व छठी सदी में व्याकरणाचार्य पाणिनि ने 22 महाजनपदों का उल्लेख किया है। इनमें से तीन – मगध, कोसल तथा वत्स को महत्वपूर्ण बताया गया है।
हमारा वर्तमान छत्तीसगढ़ अपनी विशिष्ट भौगोलिक-सांस्कृतिक-ऐतिहासिक पहचान के साथ उस वृहत्तर और चिन्मय भारत के सभी प्रमुख घटकों को अपने रंग में रंगा हुआ है, जिसमें अविच्छिन्न सनातन भाव के स्पंदन मानव सभ्यता की जीवंतता के सभी लक्षण विद्यमान है।
चेदि, डाहल, महाकान्तार, महाकोसल, दंडकारण्य, त्रिकलिंग जैसे भौगोलिक नामों के साथ इसकी पहचान जुड़ी रही। मध्यप्रांत और बरार से मध्यप्रदेश होते यह अब छत्तीसगढ़ है।
दक्षिण कोसल, वस्तुतः वह वृहत्तर छत्तीसगढ़ है, जिसकी जड़ें आरंभिक ऐतिहासिक महाजनपद काल तक गहरी हैं। 2500 वर्ष से भी अधिक पुराने काल, महाजनपद युग के 16 जनपदों में से प्रमुख काशी, मगध और अवंति के साथ कोसल भी था। इसी कोसल का दक्षिणी भाग दक्षिण कोसल अर्थात वर्तमान छत्तीसगढ़ है। इस प्रकार पूरे भारतवर्ष के लगभग मध्य में स्थित यह अंचल अन्य महाजनपदों से अन्योन्याश्रित रहा है।
भौगोलिक विस्तार वर्तमान ओडिशा, झारखंड, उत्तर प्रदेश मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र हैं। यहाँ इन संलग्न राज्यों की भाषा-बोली, रहन-सहन, आचार-विचार के विनिमय से वृहत राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का सांस्कृतिक सामंजस्य विकसित होता है।
इसी कोसल जनपद का दो भागों में उत्तर कोसल एवं दक्षिण कोसल नामक विभाजन हुआ तथा वर्तमान छत्तीसगढ़, दक्षिण कोसल की ही सीमा में माना गया। हमारा प्रकल्प इसी दक्षिण कोसल पर आधारित है।

 

ललित शर्मा

सम्पादक

दक्षिण कोसल टुडे