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सरगुजा के जनजातीय समाज पर रामायण का प्रभाव : वेबीनार रिपोर्ट

सरगुजा के जनजातीय समाज पर रामायण का प्रभाव विषय पर अंतरराष्ट्रीय वेबीनार का आयोजन इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रामायण उत्तर प्रदेश एवं सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑन होलिस्टिक डेवलपमेंट छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वाधान में 12 जुलाई 2020 रविवार को सायं 6:30 से 8:30 बजे तक किया गया।

इस वेबीनार का उद्घाटन उद्बोधन अयोध्या रिसर्च इंस्टिट्यूट अयोध्या के संचालक डॉक्टर योगेंद्र प्रताप सिंह जी ने दिया। मुख्य अतिथि महंत राजे श्री रामसुंदर दास जी, भूतपूर्व विधायक जैजैपुर विधानसभा, एवं दूधाधारी मठ प्रमुख रायपुर छत्तीसगढ़, मुख्य वक्ता डॉक्टर पुनीत राय, सहायक प्राध्यापक हिंदी, शासकीय महाविद्यालय, शंकरगढ़, जिला -बलरामपुर, अतिथि वक्ता डॉक्टर संयुक्ता भुवन राम सराह जी, सेवा निवृत्त एसोसिएट प्रोफ़ेसर महात्मा गांधी संस्थान, मारीशस के हिंदी अध्ययन विभाग के विभाग प्रमुख, अतिथि वक्ता लखनऊ उत्तर प्रदेश से लोक गायिका श्रीमती कुसुम वर्मा जी, अतिथि वक्ता नगर पंचायत मल्हार के सेवानिवृत्त प्रधान पाठक, चित्रकार, गायक, वादक, लेखक, कवि आदि बहुमुखी प्रतिभा के धनी एवं लुप्त कुंडलिया छंदों में सुंदरकांड एवं अन्य खंडकाव्यों के रचयिता श्री हरि प्रसाद पाण्डेय जी थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर जी० ए० घनश्याम जी ओएसडी उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ ने की। वेबीनार के होस्ट डॉक्टर नितेश मिश्रा जी, प्राध्यापक पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर थे।

वेबिनार की शुरुआत वेबीनार के संयोजक श्री ललित शर्मा जी ने आज के होस्ट श्री नितेश मिश्रा जी को संबोधन करते हुए कहा कि आप कार्यक्रम प्रारंभ करें। नितेश जी ने सर्वप्रथम सब का परिचय देते हुए सर्वप्रथम उद्घाटन उद्बोधन के लिए योगेंद्र प्रताप सिंह को आमंत्रित किया। उन्होंने मूर्त और अमूर्त परंपरा में जनजातीय परंपरा में खास करके आदिवासी अंचल सरगुजा के सीता बेंगरा आदि के चित्र के अवधारणा के आधार पर कई अनुभव बताकर, वेबीनार का पत्रिका के प्रकाशक रूप में प्रकाशन के लिए सलाह दिया। उन्होंने कहा कि मैं सरगुजा के उदयपुर समीप रामगढ़ के सीता बेंगरा के पास स्थित जोगीमारा का चित्र पहले ही देख चुका हूं परंतु अभी हाल ही में नये चित्र देखे तो उस स्थान में काफ़ी परिवर्तन आ चुका है। वहाँ एक व्यक्ति सरगुजिहा में रामायण सुनाते थे। मैंने यहाँ पर साढे 4 साल तक रहकर काम किया है। हम इन रचनाओं का संकलन करें। निश्चित रूप से हमारे पास अच्छा संकलन हो जाएगा। जिसे हम पत्रिका के रूप में प्रकाशित कर सकते हैं।

होस्ट ने महंत जी को आमंत्रित किया जिन्होंने यहाँ के संस्कृति में राम की उपलब्धता खासकर सरगुजा अंचल संस्कृति पर ध्यान केंद्रित किया । छत्तीसगढिया, राम को अपना भांजा मानते हैं। भांजा चाहे जितना छोटा क्यों न हो मामा उनके चरण स्पर्श करते हैं। छत्तीसगढ़ की संपूर्ण संस्कृति राममय है। हम विशेष रूप से राघवेंद्र सरकार के काम को लेकर जुड़े हुए हैं। हम निश्चित रूप से ही सफल होंगे। आदि बातें महंत जी ने कही ।

होस्ट नितेश जी ने मारीशस से जुड़ी हुई हिंदी अध्ययन विभाग के विभाग प्रमुख संयुक्त डॉक्टर संयुक्ता भुवन जी को आमंत्रित किया। वे मारीशस के विश्व विद्यालय में हिंदी अध्ययन विभाग के प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने मॉरीशस की संस्कृति में राम और रामायण की महत्ता पर व्याख्यान दिया और खासकर उन्होंने बताया कि यहाँ मारीशश में 2001 में ही रामायण की एक केंद्र स्थापित हो चुका है। यहाँ नेता, शासन -प्रशासन सब राम से जुड़े हुए तथ्यों को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हाईस्कूल में 12वीं में तथा विश्वविद्यालय में भी रामायण की पढ़ाई कराई जाती है। यहाँ तक पीएचडी स्तर में भी रामचरित मानस पर विशेषपाठ्यक्रम यहाँ पर होता है। यहाँ सभी मंदिरों को शिवालय कहा जाता है। जो भी यहाँ पूजा पाठ करते हैं वह अभूतपूर्व है। यहाँ तक राजनीतिक स्तर पर राजनेता रामायण का उदाहरण देने से नहीं चूकते। साथ ही सनातन धर्म के विभिन्न ग्रंथों से भी उद्धरण देकर वे अपनी बातें कहते हैं। मॉरीशस को रामायण और सनातन धर्म के लिए स्वर्ग तुल्य कहा जा सकता है। रामायण का यहाँ के अध्यात्मिक और सामाजिक जीवन में गहरा प्रभाव है। विशेषकर महात्मा गांधी ने भी रामराज्य की कल्पना की थी। वे मर्यादा को मानते थे। राम राज्य में यथा राजा तथा प्रजा पर विचार किया जाता है। ऐसा चरित्र जो मर्यादित है, अनुकरणीय है, रावण के लिए जरूर अशोक वाटिका, अशोक वाटिका रही होगी पर सीता के लिए अशोक वाटिका तो निश्चय ही शोकवाटिका थी। समय अधिक हो रहा था फिर उन्होंने ललित शर्मा जी को कार्यक्रम में आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद देकर अपने उद्बोधन को समाप्त किया।

वेबीनार के प्रमुख वक्ता प्रोफ़ेसर पुनीत राय जी ने शिष्टाचार के बाद अपना उद्बोधन प्रारंभ किया उन्होंने कहा की राम की गाथा भारतीयता का अमृत तत्व है। मूल्य बोध, सौंदर्य बोध, जीवन बोध का यह असाधारण आख्यान हमारे लिए इतिहास से बढ़कर है। इतिहास से कहीं ज्यादा प्राणवान और प्रेरक। रामायण शील की प्रतिष्ठा का काव्य है और यह शील ही जीवन में, समाज में मंगल का विधान करता है। सचमुच राम कथा कलीमल हरनी, मंगल करनी है। विमल, विवेक प्रदायनी है। जीवन के कठीनतम क्षणों को संघर्षों में यह हमें सांत्वना देती और साहस भरती हैं। इसी कारण यह गाथा वाल्मीकि, कालिदास से लेकर गांधी लोहिया तक को मंत्रमुग्ध करती रही है। भारतवर्ष का प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक वर्ग, समुदाय ,प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी तरह इसी गाथा से अवश्य संबंध रहा है। कहना न होगा कि यह राम कथा वह रसायन है जो इस राष्ट्र को एक सूत्र में, समरसता का विधान करती है। कहीं आर्य हो या अनार्य लोक हो या सर्वत्र राम मौजूद है। दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया, तिब्बत, कोरिया तक यह गाथा प्रचलित है। अत्यंत प्राचीन होकर भी यह गाथा अविरल प्रवाहित होती रही है। इस गाथा की व्यापकता एवं व्याप्ति निरंतरता एवं नव्यता सचमुच विस्मित करती है। विश्व में कदाचित ही कोई किसी कथा का इतना अविच्छिन्न परंपरा इतना विस्तार रहा हो

प्राचीन काल में महाकांतार, दंडकारण्य, दक्षिणापथ, दक्षिण कोसल के रूप में विख्यात छत्तीसगढ़ रामकथा के संदर्भों से भरा पड़ा है। इतिहास, पुरातत्त्व, लोक विश्वास, किवदंती या जनश्रुति के अनुसार यह माता कौशल्या की जन्म भूमि है। शबरी, वाल्मीकि ऋषि, श्रृंगी ऋषि, मतंग ऋषि, खरदूषण की नगरी खरौद, राम वनवास की संबद्धता क्षेत्र से रही है। यह भूमि धन्य है। जहाँ प्रभु के पावन पग यहाँ पड़े।

छत्तीसगढ़ का जनजाति बहुल है । अनुपम श्री शोभा से संपन्न सरगुजा अंचल, रामकथा के अनेक अध्यायो, अवशेषों, स्मृतियों को अपने में समेटे हुए हैं। सरगुजा वह भूमि है, जहाँ देवतागण भ्रमण किया करते हैं। सुरगुजा देवताओं और हाथियों वाली धरती के रूप में ख्यात सरगुजा में कँवर, उरांव, कोरवा, कोल, पंडो, गोंड़, कोडा़कू, पनिका, बिंझवार इत्यादि जन जातियाँ निवास करती हैं। अध्ययनों एवं लोक विश्वास के अनुसार यहाँ राम ने वनवास काल में निवास किया था। कोरिया जिले के जनकपुर से लगभग 26 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सीतामढ़ी हरचौका नामक स्थान से श्री राम ने छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया था। इसी तरह कोरिया जिले में सीतामढ़ी ,घागरा, कोटा डोल, सीतामढ़ी छतौडा़ सिद्ध बाबा आश्रम, देवसील, रामगढ़, सोनहत, अमृतधारा, सरगुजा जिले में रामगढ़, सीता बेंगरा, लक्ष्मण बेंगरा, वशिष्ट गुफा, देवगढ़, महेशपुर, बंदरकोट, बिलद्वार गुफा, सारासोर, रक्सागंडा का संबंध राम कथा से रहा है।

सरगुजा के कई स्थानों का नाम राम कथा के पात्रों स्थानों के आधार पर हैं । जैसे- सीतापुर, रामपुर, रामनगर, राम गांव, लक्ष्मणपुर, लखनपुर, लखन टोली, सीतारामपुर, भरतपुर, हनुमानगढ़, जनकपुर, जामवंतपुर, लवकुशनगर, परशुरामपुर, इत्यादि जनजाति समाज में ठाकुर देवता, बड़का देव, दूल्हा देव, धमसान देव, रन बगिया, खेरवाड़ा देव, सिंगबोगा, मारंगबोगा, धरती माता, महामाया देवी, खुरिया रानी, झूलना देवी इत्यादि देवी-देवताओं के साथ यहाँ यहाँ सीता-राम भी पूजित हैं।

पारंपरिक त्योहार छेरता, कर्मा के साथ, देवारी -दशहरा भी धूमधाम से मनाया जाता है। यहाँ अभिवादन में भी पायलागंव, गोड़लागंव, जय जोहार के साथ राम राम, सीताराम जय जय राम प्रचलित है। यहां के व्यक्तियों के नाम में भी प्रायः राम-राम, सीताराम, जय जय राम प्रचलित है । यहाँ के व्यक्तियों के नाम में भी प्रायः राम नाम आता है। जैसे -रामदेव, राम गोपाल, गोपाल राम, विपुल राम, रामबाबू , नानूराम इत्यादि। कर्मा, डोमकच, सैला , गीत, नृत्य में रामकथा संबंधी गीत गाए जाते हैं। यहाँ के लोकगीतों में राम विवाह, सुग्रीव बाली युद्ध, लंका दहन, श्रवण कुमार प्रसंग, सती द्वारा राम की परीक्षा इत्यादि प्रसंग आए हैं ।

सरगुजा अंचल में रामायण के प्रचार प्रसार में गहिरा गुरु की बहुत बड़ी भूमिका रही है। राम कथा के श्रवण कीर्तन द्वारा उन्होंने इस क्षेत्र में लोक शिक्षण, लोक संस्कार का महत्तर कार्य किया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस अंचल में रामायण का बहुत गहरा प्रभाव रहा है। लोग स्मृतियों में,लोककंठों में, यहाँ राम रचे बसे हैं। आज भी यहाँ राम की उपस्थिति बहुत कुछ अलक्षित और प्रकाशित है। यहाँ के घाट, पाठ, पाथर,पहाड़,लोकजीवन आज भी प्रतीक्षा कर रहा है, अध्येयताओं का, पुरातत्त्वविदों का, इतिहासकारों का, मानवशास्त्रियों का, कि वह आएं और यहाँ के अतीत और जीवन में व्याप्त राम का अन्वेषण उद्घाटन करें।

इस प्रकार उन्होंने सरगुजा अंचल में आदिवासी खासकर जनजाति समाज पर रामायण के प्रभाव पर विस्तार से उद्बोधन दिया। उनके बाद मल्हार से जुड़े हुए गुप्त कुंडलिया छंद रामायण से जुड़े हुए कई प्रसंगों के रचनाकार सेवा निर्वित प्रधान पाठक ने भी अपने अपनी रचनाएँ गुप्त कुंडलिया छंदो में रचित रामायण के विभिन्न अध्यायों को पाठ कर संबोधन किया। उन्होंने धनुष यज्ञ, राम केवट संवाद, सुंदरकांड, अंगद रावण संवाद ,सीता हरण और हनुमान महिमा पर आधारित प्रसंगों को युक्त कुंडलिया छंद में स्वरचित रचनाओं का सस्वर वाचन किया।

नितेश जी ने कुसुम वर्मा जी को अवध के लोकगीतो में राम एवं रामायण के प्रभाव पर व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया। कुसुम जी ने अवध की लोक संस्कृति पर अपनी बाते कहते हुए, सोहर गीत, विवाह गीत आदि का सस्वर गान कर सबका मन मोह लिया।

वेबीनार के अध्यक्षत प्रो जी० ए ०घनश्याम जी कहा कि आप सभी को सर्वप्रथम राम राम। सभी को सुना यह राम की ही असीम कृपा है कि सारे लोग एक साथ जुड़ पाए । ललित शर्मा जी बहुत अच्छा काम कर रहें हैं। उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक कहीं भी जाएँ, एक ही नाम चलता है ‘राम’। राम में ही आराम है । राम का जहाँ भी नाम आता है, एक संयुक्त परिवार के रूप में आता है। मैंने पुनीत जी को सुना मैं साढे़ 4 वर्ष सरगुजा में रहा। मैं रामगढ़ भी गया था । यूट्यूब में रामगढ़ पर आधारित मेरा एक एपिसोड भी है। राम सबका काम करते हैं, राम सबको साथ लेकर चलते हैं। वह अद्भुत हैं जहाँ तक सरगुजा संभाग की बात है, सरगुजा के कण-कण में राम है। स्थान आदि में राम नाम है। हर तरह से सरगुजा राम राममय है।

छत्तीसगढ़ के कण-कण में राम है। जहाँ तक छत्तीसगढ़ की बात है पूरे भारत में सबसे समृद्ध अगर कोई स्थान है तो वह छत्तीसगढ़ ही है। भरथरी में भी राम कथा विद्यमान हैं जैसे- घोड़ा रोवे घोड़े सारे म——- राम यहां की समाज की आत्मा है। वन्दना, जोहार, तिहार, विद्या में भी राम नाम है। राम हमारी ऑक्सीजन है। राम हमारे जीवन में ऑक्सीजन है और राक्षसी प्रवृत्ति कार्बन डाइऑक्साइड है। यहाँ फल भी राम और सीता के नाम से हैं। रामफल और सीताफल। राह के नाम से है सरगुजा में अनेक चीजें राम से जुड़ी है। वैश्विक स्तर पर हम राम से जुड़े हैं। पुनीत जी ने अपनी बात अच्छे से रखी है। ललित जी ने सबको माला की तरह पिरो कर रखा है। आपने जो मुझे अवसर दिया है उनके लिए आपको धन्यवाद ।

अध्यक्षीय उद्बोधन के पश्चात इंडोलॉजिस्ट ललित शर्मा जी ने सबका धन्यवाद दे कर के छत्तीसगढ़ी भाषा में दो लाइन का पाठ भी किया। अंत में उन्होंने अगले सप्ताह 7:00 बजे अशोक तिवारी जी को प्रमुख वक्ता के रूप में नामांकित किया और साथ ही यह भी बताया कि अगले सप्ताह उत्तर प्रदेश के माननीय संस्कृति मंत्री श्री नीलकंठ जी भी जुड़ेंगे। इस प्रकार से आज की वेबिनार का समापन हुआ। वेबीनार जूम एप पर हुआ इसके अलावा दक्षिण कोसल टुडे के यूट्यूब चैनल पर एवं फ़ेसबुक पेज पर लाइव किया गया जिसमें हजारों की संख्या में लोग जुड़े थे और उन्होंने इस वेबीनार का लाभ उठाया।

वेबीनार रिपोर्ट

हरिसिंह क्षत्री
मार्गदर्शक – जिला पुरातत्व संग्रहालय कोरबा, छत्तीसगढ़ मो. नं.-9407920525, 9827189845

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