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कनकां दी मुक गई राखी, ओ जट्टा आई बैसाखी

बैशाखी उत्तर भारत में पंजाब एवं हरियाणा में जोर शोर से मनाई जाती है। इस दिन गंगा जी का धरती पर अवतरण हुआ था तथा गुरु गोविंद सिंह जी ने 1699 ईस्वीं में खालसा पंथ सजाया था। यानि खालसा पंथ की स्थापना इसी दिन हुई थी। इसके साथ ही यह पर्व कृषि के साथ भी जुड़ा हुआ है, इस महीने में रबी की फसल पककर पूरी तरह से तैयार हो जाती है और उनकी कटाई भी शुरू हो जाती है। इसलिए फ़सल घर में आने का उत्साह भी होता है, जिसे धूम धाम से मनाया जाता है।

हम यह मानते हैं कि यह सांस्कृतिक पर्व है, जो मनुष्य मन में उत्साह का संचार करता है। बैसाखी के दिन गुरुद्वारों को सजाया जाता है। सिख समुदाय के लोग गुरुवाणी सुनते हैं. घरों में भी लोग इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। खीर, शरबत आदि पकवान बनाए जाते हैं। इस दिन शाम के समय घर के बाहर लकड़ियां जलाई जाती हैं। जलती हुई लकड़ियों का घेरा बनाकर गिद्दा और भांगड़ा कर अपनी प्रसन्नता जाहिर करते हैं।

बैसाखी का अर्थ वैशाख माह का त्यौहार है। यह वैशाख सौर मास का प्रथम दिन होता है। बैसाखी वैशाखी का ही अपभ्रंश है। इस दिन गंगा नदी में स्नान का बहुत महत्व है। हरिद्वार और ऋषिकेश में बैसाखी पर्व पर भारी मेला लगता है। बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है । इस कारण इस दिन को मेष संक्रान्ति भी कहते है।

इसी पर्व को विषुवत संक्रान्ति भी कहा जाता है। बैसाखी पारम्परिक रूप से प्रत्येक वर्ष 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। यह त्योहार हिन्दुओं, बौद्ध और सिखों के लिए महत्वपूर्ण है। वैशाख के पहले दिन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक क्षेत्रों में बहुत से नव वर्ष के त्यौहार जैसे जुड़ शीतल, पोहेला बोशाख, बोहाग बिहू, विशु, पुथण्डु मनाये जाते हैं।

आज ही के रोज 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पर्व पर पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी ने गोलियां चलाकर बूढ़ों, महिलाओं, पुरुषों और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को मार डाला था। इस गोलीकांड में कई लोग घायल भी हो गए थे।जलियांवाला बाग हत्याकांड ब्रिटिश इतिहास का वो बदनुमा पन्ना है जो अंग्रेजों के अत्याचारों को दर्शाता है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

इस दिन गुरु गोविंद सिंह ने खालसा सजाया था, याने खालसा पंथ की स्थापना की थी। ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार साल 1699 में सिक्‍खों के अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंहजी ने एक द‍िन अपनी सभी सिक्‍खों को आंमत्रित किया और उनकी परीक्षा लेनी चाहिए।

उन्‍होंने अपनी तलवार बाहर निकाली और अपने शिष्‍यों से कहा कि उन्‍हें एक स‍िर चाहिए। उनकी यह बात सुनकर सभी स्‍तब्‍ध रह गए। तभी एक शिष्‍य ने हामी भरी। गुरु गोविंद सिंह उसे अपने साथ लेकर अंदर गए। उसके कक्ष में जाते ही बाहर बैठे श‍िष्‍यों को अंदर से रक्‍त की धारा निकलती हुई दिखाई दी।

सारे श‍िष्‍य हैरान ही रह गए। गुरु का यह व्‍यवहार उनकी समझ से परे था। वह जब तक कुछ समझने का प्रयास करते कि गुरु फिर से बाहर आए। सब एकटक उनकी ओर देखने लगे कि तभी उन्‍होंने फिर से कहा कि मुझे एक सिर चाहिए। फिर से सारे श‍िष्‍य चुप लेकिन एक ने हामी भरी।

गुरु गोविंद सिंहजी उसे भी अंदर लेकर गए। इसके बाद सबने फिर से वही दृश्‍य देखा। इसी तरह से गुरु गोविंद सिंह का सिर लेने का यह क्रम पांच शिष्‍यों तक चला। उसके बाद वह अंदर गए और अपने पांचों शिष्‍यों के साथ वापस निकले। यह देखकर सभी हैरान रह गए।

कमरे से न‍िकलते रक्‍त को देखकर सभी शिष्‍यों ने इसका राज जानना चाहा तो गुरु गोविंद सिंह ने बताया कि अंदर उन्‍होंने पशुओं की बलि दी है। वह तो बस अपने शिष्‍यों की परीक्षा लेना चाहते थे और इस परीक्षा में वह सभी पास हुए। इसके बाद उन्‍होंने उन पांचों शिष्‍यों को अमृत का रसपान कराया और कहा कि अब वे सिंह कहलाएंगे। यही खालसा कहलाएं।

साथ ही उन्‍हें कुछ निर्देशों का पालन करने के लिए भी कहा। इनमें बाल और दाढ़ी बड़ी रखने, बालों को संवारने के लिए साथ में कंघा रखने, कृपाण, कच्‍छा पहनने और हाथों में कड़ा पहनने की बात शामिल थी। इसके बाद गुरु गोविंद सिंह ने उन्‍हें कभी भी निर्बलों पर हाथ न उठाने का निर्देश दिया। तब से इस दिन को खुशी के पर्व यानी कि बैसाखी के रूप में मनाया जाने लगा।

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