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मन की शक्ति जुटाने का पावन पर्व नवरात्र

चैत्र नवरात्र वसंत के समय आता है, ऐसे में जहां प्राकृतिक परिवर्तन पुराने आवरण को त्यागकर नएपन को वरण करने का संदेश देता है, वहीं मा शक्तिस्वरूपा की पूजा-अर्चना से मन में व्याप्त दुर्बलता को मिटाने, नवशक्ति – नवऊर्जा के आह्वान की कामना का शुभ अवसर भी प्राप्त होता है। इसीलिए स्त्रियां इस पावन अवसर पर पूरी आस्था से मां भगवती की आराधना करती हैं, अपने और अपनों के जीवन में नवचेतना का संचार करती हैं।

मन की शक्ति जुटाने का पावन पर्व
प्रकृति के नएपन और उल्लास के बीच चैत्र नवरात्र, मन में नव ऊर्जा जगाने का माध्यम बनते हैं। नव उल्लास लिए आस्था के ये नौ दिन मां शक्ति को साधने का अवसर तो हैं ही, स्वयं अपने मनोबल को जुटाने के दिन भी हैं। ईश्वरीय आस्था की ओ और मन का बल पाने के इन उत्सवीय दिनों को स्त्रियां बेहद प्रेम और उत्साह के साथ मनाती हैं।

उपवास, अनुष्ठान, अपनों की कुशलता की कामना और मां आदिशक्ति की उपासना । सब कुछ मन से जुड़ा सा । अपनेपन को पोसता सा । कठिनाइयों पर जीत और सुख के दौर में संयमित रहने की चाह लिए। नवरात्र में स्त्रियां, मां भगवती से हर जद्दोजहद, हर परिस्थिति में विजयी होने का आशीष मांगती हैं।

मन का सकारात्मक रुख
नवरात्र में मां दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना करने से सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है, यह मान्यता भर नहीं है। इन नौ दिनों में मन सचमुच सकारात्मक रुख अपना लेता है। उपासना के नियम जीवन में अनुशासन ले आते हैं। घर में सकारात्मक ऊर्जा दस्तक देती है। सब कुछ अच्छा होने का विश्वास प्रबल होता है।

खिले- खिले प्राकृतिक परिवेश में यह महापर्व आस्था और विश्वास के जरिए मन की असीम शक्तियों से मिलवाता है। महिलाएं, नव पल्लवों से सज रहे कुदरत के पोर पोर और इठलाती धरा के इस मौसम में उल्लासमयी ऊर्जा और सकारात्मक सोच पाने का आह्वान करती हैं। आस-पड़ोस की स्त्रियां मिलकर भी कई साझे अनुष्ठान करती हैं। घर-परिवार के साथ-साथ परिवेश और समाज खुशहाली की भी कामना करती हैं।

स्त्रीमन में मौजूद यह साझा भाव मां शक्ति के और करीब ले जाता है। महादेवी की उपासना के इस पर्व को मनाते हुए उनका मन प्रफुल्लता, स्फूर्ति और तेजस्विता से भर उठता है। असल में जीवन के हर पक्ष पर मौजूद परिस्थितियां महिलाओं को गहराई से प्रभावित करती हैं। यही वजह है कि उनकी आस्था भी साझे सरोकार से जुड़ी होती है।

नई शुरुआत का अवसर
चैत्र नवरात्र से ही हिंदू नव वर्ष, नवसंवत्सर की शुरुआत होती है। नव वर्ष की शुरुआत का यह दिन सृष्टि के आरंभ का भी दिन माना जाता है। इस समय प्रकृति भी मन जीवन की नई चेतना जगाने का संदेश देती नजर आती है।

पेड़ों पर फूटती कोपलें समझाती हैं कि पतझड़ के बाद नयापन भी दस्तक देता है। जीवन के इन बदलते रंगों को स्त्रियां बखूबी समझती हैं। कभी मन का हरापन तो कभी हालात का रूखापन । कभी रिश्तों की बदलती परिभाषा तो कभी समाज के सख्त बंधन।

माता-पिता का घर छोड़ अपनी गृहस्थी बसाने से लेकर प्रसव पीड़ा झेलकर नया जीवन पाने तक, महिलाएं जीवन में कई बार नई शुरुआत करती हैं। नएपन के प्रति मन में सहज स्वीकार्यता रखती हैं। मौसम की बदलती करवट के साथ आने वाला माता भगवती के पूजन का यह उत्सव भी मन- जीवन को नएपन से जोड़ता है।

जड़ता और ठहराव को दूर करती ऊर्जा का संचार करते वासंतिक नवरात्र, चेतना और सजगता के साथ नई शुरुआत करने का संदेश देते हैं। स्त्रियां भी उम्र और परिस्थितियों के मुताबिक माता दुर्गा से नई शुरुआत की दिशा में आगे बढ़ने और जागृत सोच को व्यावहारिक धरातल पर उतारने का मानसिक बल और आशीष मांगती हैं।

हौसला जुटाने का अनुष्ठान
मां के रूप में स्वयं महिलाओं को भी अपने बच्चों को हिम्मत के साथ जीना सिखाना होता है। परिस्थितियों से जूझने का पाठ पढ़ाना होता है। ऐसे में इस महापर्व पर आस्था और विश्वास से भरे मन की असीम शक्तियों को साधते हुए महिलाएं जीवन रण में जीतने का आशीर्वाद भी मांगती हैं।

सब कुछ संभालते स्वयं को बचाए रखने का बल जुटाती हैं। नया रचने, सीखने और समझने के कामों से जुड़े रहने की चाह रखने वाली स्त्रियां जीवन के हर मोर्चे पर खुद को साबित करने का हौसला चाहती हैं। दायित्वों के निर्वहन की भाग-दौड़ में अधिकतर स्त्रियां अपनी शक्ति को भुला बैठती हैं। अपने ही गुणों की उपेक्षा करती हैं। संबंधों को सहेजने के लिए उनका संवेदनशील मन झुकना – सहना सीख जाता है।

दुखद है कि कई बार इन मानवीय गुणों का मोल नहीं समझा जाता। ऐसे में स्वयं के लिए लड़ने की दरकार होती है। नकारात्मकता का प्रतिकार आवश्यक हो जाता है। अपनी शक्ति को समझने का जतन जरूरी लगने लगता है।

महिलाएं, मां भगवती से अपने इसी सामर्थ्य को पहचानने का वर मांगती हैं। मान्यता है कि नवरात्र में मां शक्ति की पूजा कर प्रभु श्रीराम ने भी शक्ति जाग्रत की थी। यही कारण है कि मां गौरी की उपासना का यह उत्सव आध्यात्मिक और पारंपरिक पर्व तो है ही, अपने सामर्थ्य को पहचानने का पावन अनुष्ठान भी है।

मन-जीवन के धरातल से जुड़ा पक्ष
स्त्रियों की सोच और बर्ताव दोनों जीवन के व्यावहारिक पक्ष से जुड़े होते हैं। उनकी यह समझ समाज और परिवार की धुरी है। जीवन को वास्तविक धरातल पर पोसती है। समझना जरूरी है कि नवरात्र का पर्व सिर्फ धार्मिक आस्था से ही नहीं, जीवन के बहुत से व्यावहारिक पहलुओं से भी जुड़ा है।

नौ दिन के उत्सवीय अनुष्ठान के पीछे वैज्ञानिक चिंतन लिए तार्किक पक्ष भी शामिल है। ‘सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते’ यानी ‘हे मां आप सब कुछ शुभ करने वाली हैं, आप कल्याणकारी हैं, आप सबके मनोरथों को पूरा करने वाली हैं, आप शरण ग्रहण करने योग्य हैं। हे नारायणी आपको हमारा प्रणाम हैं।’ इस मंत्र के कल्याणकारी भाव का वास्तविक रूप जीवन में देखने को मिलता है।

हर साल ऋतु परिवर्तन के इस समय कई तरह के मौसमी रोग फैलते हैं। नवरात्र में खान-पान का अनुशासन और सबकी कुशल कामना से जुड़ा आस्था का भाव इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है। प्रार्थना, जप और ध्यान हर इंसान को भय, अवसाद, कटुता और नकारात्मक विचारों से दूर रखते हैं।

सात्विक आहार, उपवास और सधी दिनचर्या शरीर और मन को विषमुक्त करती है। विचार और व्यवहार का यह अनुशासन इस मौसमी बदलाव के दौर में भी स्वस्थ और सक्रिय रहने की ऊर्जा देता है। ऐसी स्थितियां हर मनोरथ को पूरा करने वाली परिस्थितियां बनाती हैं। सभी के लिए कल्याणकारी साबित होती हैं।

आलेख

डॉ. मोनिका शर्मा मुंबई

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