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ब्रज होरी आई रस भरी

होली का त्यौहार हो और ब्रज का ध्यान न आये, ऐसा हो ही नहीं सकता। होली का ब्रज में विशेष महत्व है। इसीलिए होली और ब्रज एक दूसरे का पर्याय बन गये हैं। श्रीकृष्ण होली के नायक हैं और नायिका राधारानी हैं। राधा -कृष्ण की दिव्य होली प्रति वर्ष ब्रज के देवालयों में जीवन्त हो उठती है, जिसे देखने के लिए हर वर्ष हज़ारों तीर्थयात्री ,भक्त एवं पर्यटक ब्रजभूमि में आते हैं।

ब्रज में होली का प्रारम्भ लगभग सवा माह पूर्व वसंत पंचमी के दिन से ही हो जाता है। वैष्णव देवालयों में वसंत पंचमी से ठाकुरजी के सन्मुख चाँदी के बटेरों में विभिन्न प्रकार के गुलाल रखे जाते हैं, जिन्हें दर्शनार्थियों पर छिड़का जाता है।

फाल्गुन शुक्ला एकादशी से ब्रज के देवालयों में सर्वत्र गीले रंगों का डालना प्रारम्भ हो जाता है। फाल्गुन शुक्ला नवमी के दिन बरसाने में विश्व प्रसिद्ध लट्ठामार होली होती है जिसके बाद मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर होली का आयोजन होता है।

वृन्दावन में फाल्गुन शुक्ला एकादशी से धुलेण्डी तक होली होती है। इस के दूसरे दिन दाऊजी (बलदेव) का प्रसिद्ध हुरंगा होता है। ब्रज में होली का समापन वृन्दावन के रंगजी मन्दिर में होने वाले ब्रह्मोत्सव की होली सवारी निकलने के उपरान्त ही होता है।

होली मूलतः रंगों का त्यौहार है। ब्रज के देवालयों में विशुद्ध प्राकृतिक रंगों के प्रयोग की परम्परा रही है। ब्रज के प्रमुख देवालयों में ठाकुरजी की सेवा में कैमिकल से बने कृत्रिम रंगों का प्रयोग अब तक नहीं होता है। होली से पूर्व देवालयों में पारम्परिक विधि से रंग तैयार किये जाते हैं।

पारम्परिक और प्राकृतिक रंगों के नाम होली विषयक ब्रजभाषा की मध्यकालीन पद-पदावलियों में भी प्राप्त होते हैंI वृन्दावन के श्रीधाम गोदा विहार मन्दिर स्थित ब्रज संस्कृति शोध संस्थान में कई ऐसी दुर्लभ पाण्डुलिपि भी संग्रहीत हैं जिन में होली के अवसर पर गाये जाने वाले विभिन्न ब्रजभाषा पद संकलित हैं।

सखी खेलत मोहन लाल हो, ब्रज होरी आई रस भरी।
चोबा, चंदन, अरगजा वीथिन में रच्यौ है गुलाल ।।
संग सखा अति सोहने मधि नायक मोहन छैल।
टोकत रोकत वधुन कौं गोकुल में चलत न गैल ।।
कर पिचकारी कनक की और फेंटन सुरंग अबीर।
चहुँ ओर रंग बहि चले चरचत रंग केसर नीर।।

परन्तु आज अधिकांश लोगों को इन प्राकृतिक रंगों के विषय में जानकारी नहीं है। इन रंगों को बनाने में उत्तम कोटि के सुगन्धित द्रव्यों और पुष्पों का उपयोग होता था। यह रंग शरीर व त्वचा के लिए हानिरहित होते हैं। देवालयों की होली में प्रयोग होने वाले निम्नलिखित प्रमुख रंग हैं –टेसू के फूलों का रंगपलाश को ब्रज में ‘टेसू’ या ‘ढ़ाक’ कहा जाता है।

फाल्गुन-चैत्र मास में होली के समय इस के वृक्ष पर फूल खिलते हैं, इन फूलों को पानी में उबाल कर पीला रंग तैयार किया जाता है। फूलों को पानी में उबालते समय थोड़ा चूना और डाल देते हैं जिससे यह रंग चटख बसंती हो जाता है।

रंग के ठण्डा होने पर इसे छान कर बड़े-बड़े कलशों में भर लिया जाता है। होली के अवसर पर चाँदी और सोने की पिचकारियों और कमोरी में भरकर इस रंग को दर्शनार्थियों के ऊपर छिड़का जाता है। कमोरी एक प्रकार का पात्र होता है जिसका प्रयोग होली में रंग भरकर डालने के लिए किया जाता है।

केसर एक प्रकार का सुगन्धित व महंगा द्रव्य है, जो फूलों में से निकाला जाता है और काश्मीर में पैदा होता है। इसे पानी या दूध में घोल कर सोने जैसा पीला रंग तैयार किया जाता है। यह रंग कुछ लालिमा लिए हुए होता है।

होली के दिनों में केसर का रंग चाँदी के कटोरों में भरकर ठाकुरजी के समक्ष रखा जाता है। केसर का प्रयोग रंग बनाने के अलावा ठाकुरजी के पंचामृत, तिलक, अंगराग, मिष्ठान आदि में भी होता है।चन्दनचन्दन पेड़ की लकड़ी से प्राप्त होता है। यह लाल, सफेद तथा पीले रंग का होता है।

चन्दन के पेड़ दक्षिण भारत में कर्नाटक तथा नीलगिरी पर अधिक होते हैं। मलयगिरी का चन्दन विशेष रूप से प्रसिद्ध है। चन्दन अपनी अत्यधिक सुगन्ध और शीतलता के कारण पानी में घिसकर शरीर पर लगाने के काम आता है।

होली के अलावा चन्दन ठाकुरजी के तिलक, अंगराग में भी प्रयुक्त होता है। चोवा एक काले रंग का सुगंधित तेल होता है। यह चंदन और अगर के तेल व गोंद तथा मरसे के फूलों को मिलाकर और गरम करके बनता है।

होली के अवसर पर इसे छिड़का जाता है। इस से कपड़ों पर काले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। होली के अलावा चोवा का प्रयोग चन्दन शृंगार (अक्षय तीज ) के समय देव विग्रहों पर लेपन के लिए होता है। चोवा के लेपन के बाद ही देव विग्रहों पर चन्दन की पर्त चढ़ाई जाती है।

रोली या कुंकुम गहरे लाल रंग का बारीक चूर्ण होता है। जो चूना और हल्दी के सम्मिश्रण से तैयार होता है। होली खेलने के अलावा इसका प्रयोग तिलक आदि में भी होता है। अबीर अबरक के चूर्ण से बनता है। जिसे ब्रज में ‘भुड़भुड’ भी कहते हैं। यह अत्यन्त चमकीला पदार्थ होता है, जिसे गुलाल में भी मिलाया जाता है।

गुलालहोली में सूखे रंग के रूप में गुलाल का प्रयोग सर्वाधिक होता है। गुलाल अरारोट में गुलाबी, लाल, पीला, हरा आदि रंग मिला कर तैयार किया जाता है। इस में सुगन्ध के लिए इत्र भी डाल दिए जाते हैं। यह बारीक चिकना चूर्ण होता है, जिसे होली में दूसरों के ऊपर फेंका जाता है।

कुमकुमा गुलाल व रंगों से भरी हुई लाख की गेंद होती थी जिसे किसी व्यक्ति विशेष की ओर फेंक कर मारते थे। शरीर से टकरा कर इसके रंग बिखर जाते थे। अरगजा अगर वृक्ष की लकड़ी का तेल, गेहला, बनफशा, गुलाब, चन्दन तथा कपूर आदि के मिश्रण से बना सुगन्धित पीले रंग का शीतलता प्रदान करने वाला तेल है। जिसका प्रयोग देवालयों में होली खेलने के लिए किया जाता है।ये प्राकृतिक रंग देवालयों की होली को दिव्यता प्रदान करते हैं।

देश-विदेश से आने वाले हज़ारों तीर्थयात्री व पर्यटक ब्रजवासियों के संग इन रंगों में भीगकर अपने आप को बड़भागी मानते हैं। भक्तजनों को इन रंगों में भीगकर भी तृप्ति में अतृप्ति की अनुभूति बनी रहती है।

होली के अवसर पर ब्रज के देवालयों में रस उमड़ पड़ता है। ब्रजराज श्री कृष्ण और राधिका रानी के साथ होली खेलने का यही अवसर होता है, इसे कौन छोड़ना चाहेगा। भक्त और भगवान् होली के रंगों में भीगकर एकरंग हो जाते हैं। तन – मन की सारी ग्रंथियाँ खुल जाती हैं। धन्य हैं ब्रज के ठाकुर, दिव्य है उनकी होली और अद्भुत हैं उनके ये रंग।

आलेख

लक्ष्मीनारायण तिवारी
ब्रज संस्कृति शोध संस्थान
वृंदावन, मथुरा

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