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भारतीय संस्कृति के परम आदर्श एवं युग पुरुष श्रीराम

महर्षि अरविन्द कहते हैं कि श्रीराम का अवतार किसी आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना के लिए नहीं हुआ था। राम परमात्मा थे, जिन्होंने मानवीय मानसिकता के आधार को स्वीकार किया और उसे शोभामय सम्मान दिया। माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर कहते हैं कि संपूर्ण भारतीय समाज के लिए समान आदर्श के रूप में भगवान् रामचन्द्र को उत्तर से लेकर दक्षिण तक सब लोगों ने स्वीकार किया है। मनुष्य के जीवन में आने वाले सभी संबंधों को पूर्ण एवं उत्तम रूप से निभाने की शिक्षा देने वाला प्रभु रामचन्द्र के चरित्र के समान दूसरा कोई चरित्र नहीं है। आदिकवि ने कहा है कि वे ‘गांभीर्य में समुद्र के समान और धैर्य में हिमाचल के समान‘ हैं।

वीर विनायक दामोदर सावरकर ने कहा है कि श्रीराम हिंदू स्वाभिमान के सबसे बड़े प्रतीक हैं। इसीलिए मैंने इंग्लैंड में आयोजित श्रीराम जन्मोत्सव समारोह में कहा था -‘अगर मैं इस देश का अंग्रेज डिक्टेटर होता तो सबसे पहले महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण को जब्त करने के आदेश जारी करता। क्यों? इसलिए कि जब तक यह महान् क्रांतिकारी ग्रंथ भारतवासी हिंदुओं के हाथों में रहेगा, तब तक हिंदू न किसी दूसरे ईश्वर या सम्राट के आगे सिर झुका सकते हैं और न ही उनकी नस्ल का कभी अंत हो सकता है।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि कहते हैं कि पूर्ण परात्पर ब्रह्म मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान् श्रीराम भारतीय संस्कृति के उच्चतम प्रतिमान हैं। राम जैसा शील-सौंदर्य, औदार्य एवं मर्यादा अन्यत्र कहीं नहीं दिखती। प्रभु श्रीराम भारत के प्रभात के प्रथम स्वर हैं। इस दृष्टि से भगवान श्रीराम के चरित्र के श्रवण, मनन और लेखन का अर्थ अंतःकरण में रामत्व के अवतरण से है। जीवन में रामत्व को संप्राप्ति अर्थात सद्प्रवृत्तियों का आरोहण। भारत चरित्र का उपासक देश है, जहाँ धनबल, बाहुबल के आधार पर कभी कोई बड़ा नहीं बन सकता। संभवतः इसीलिए उच्चकुल में जनमे रावण को हम राक्षस और मांसभक्षी जटायु को महात्मा कहकर संबोधित करते हैं। जो सत्कर्म परायण है अथवा जिसके पास चरित्रबल है, वही श्रेष्ठ है।

स्वामी विवेकानन्द कैलिफोर्निया के पंसाडेना नामक स्थान में ‘शेक्सपीयर-क्लब‘ में 31 जनवरी 1900 को दिये गए भाषण में रामकथा सुनाते हुए कहते हैं कि भारतवर्ष में अयोध्या नाम की एक प्राचीन नगरी थी, जो आज भी विद्यमान है। भारत के मानचित्र में तुमने देखा होगा, जिस प्रान्त में इस नगरी का स्थान निर्देश किया गया है, उसे आज भी अवध ही कहते हैं। यही प्राचीन अयोध्या थी। वहाँ पुरातन काल में राजा दशरथ राज्य करते थे। उन दिनों आर्याें को यह ज्ञात नहीं था कि इन सघन वन-कान्तारों में कौन निवास करते थे। वे इन वन्य जातियों को ‘वानर‘ कहते थे, और इन तथाकथित ‘वानरों‘ में या असभ्य वन जातियों में जो अत्यन्त दृढ़ और असाधारण बलसम्पन्न क्रूर प्रवृति के थे उन्हें वे दैत्य या राक्षस कहते थे।

भारतीयों के मतानुसार वे भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं। भागवत के अनुसार अवतारों की संख्या असंख्य है, इनमें से राम और कृष्ण ही भारत में विशेष भाव से पूजे जाते हैं। प्राचीन वीर, युगों के आदर्शस्वरूप, सत्यपरायणता और समग्र नैतिकता की साकार मूर्तिस्वरूप, आदर्श तनय, आदर्श पति, आदर्श पिता, सर्वापरि आदर्श राजा राम का चरित्र हमारे सम्मुख महान ऋषि वाल्मीकि के द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

महाभारत और रामायण में ऋषि वाल्मीकि रचित महाकाव्य रामायण प्राचीनतर है। रामायण भारत का महान आदि काव्य है। राम और सीता भारतीय राष्ट्र के आदर्श हैं। भारतीय राष्ट्र और समाज के लिए सीता सहिष्णुता के उच्चतम आदर्श के रूप में हैं। पश्चिम कहता है ‘कर्म करो-कर्म द्वारा अपनी शक्ति दिखाओ‘, भारत कहता है ‘सहिष्णुता द्वारा अपनी शक्ति दिखाओं।‘

मनुष्य कितने अधिक भौतिक पदार्थाें का स्वामी बन सकता है, इस समस्या की पूर्ति पश्चिम ने की है, किन्तु मनुष्य कितना कम रखकर जीवन श्रेष्ठ बना सकता है, इसका उत्तर भारत ने दिया है। भारत में जो कुछ पवित्र है, विशुद्ध है, जो कुछ पावन है, उस सबका बोध एकमात्र ‘सीता‘ शब्द से हो जाता है।

श्रीराम के अस्तित्व और रामकथा की प्राचीनता के स्रोत पर विचार रखते हुए प्रसिद्ध साहित्यसेवी रामधारी सिंह दिनकर ‘संस्कृति के चार अध्याय‘ पुस्तक में लिखते हैं कि वेद में रामकथा के अनेक पात्रों का उल्लेख मिलता है। इक्ष्वाकु, दशरथ, राम, अश्वपति, कैकेयी, जनक और सीता इनके नाम वेद और वैदिक साहित्य में अनेक बार आए हैं।

रामकथा के जिन पात्रों के नाम वेद में मिलते हैं, वे निश्चित रूप से रामकथा के पात्र हैं या नहीं, इस विषय में सन्देह रखते हुए भी यह मानने में कोई बड़ी बाधा नहीं दीखती है कि रामकथा ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। अयोध्या, चित्रकूट, पंचवटी, रामेश्वरम्, ये सभी स्थान अनन्त काल से रामकथा से सम्पृक्त माने जाते रहे हैं।

क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि दाशरथि राम सचमुच जनमे थे और उनके चरित्र पर ही वाल्मीकि ने आदि रामायण की रचना की? इस संभावना का खंडन यह कहने से भी नहीं होता कि वाल्मीकि ने आदि रामायण में केवल अयोध्या कांड से युद्ध कांड तक की कथा लिखी थी, बाल कांड और उत्तर कांड बाद में अन्य कवियों ने मिलाए।

भारतीय परम्परा एक स्वर से वाल्मीकि को आदिकवि मानती आई है और यहाँ के लोगों का विश्वास है कि रामावतार त्रेता युग में हुआ था। इस मान्यता की पुष्टि इस बात से होती है कि महाभारत में रामायण की कथा आती है, किन्तु रामायण में महाभारत के किसी भी पात्र का उल्लेख नहीं है।

इसी प्रकार, बौद्ध ग्रंथ तो रामकथा का उल्लेख करते हैं, किन्तु रामायण में बुद्ध का उल्लेख नहीं है।
भारत में संस्कृति समन्वय की जो प्रक्रिया चल रही थी, ये दोनों काव्य (रामायण और महाभारत) उसकी अभिव्यक्ति करते हैं।

रामायण की रचना तीन कथाओं को लेकर पूर्ण हुई। पहली कथा जो अयोध्या के राजमहल की है, जो पूर्वी भारत में प्रचलित रही होगी। दूसरी रावण की जो दक्षिण में और तीसरी किष्किन्धा के वानरों की जो वन्य जातियों मे प्रचलित रही होगी।

आदिकवि ने तीनों को जोड़कर रामायण की रचना की। किन्तु, उससे भी अधिक संभव यह है कि राम सचमुच ही ऐतिहासिक पुरूष थे और सचमुच ही उन्होंने किसी वानर जाति की सहायता से लंका पर विजय पाई थी। हाल में यह अनुमान भी चलने लगा है कि हनुमान नाम एक द्रविड़ शब्द ‘आणमन्दि‘ से निकला है, जिसका अर्थ ‘नर-कपि‘ है।

यहाँ फिर यह बात उल्लेखनीय हो जाती है कि ऋग्वेद में भी ‘वृषाकपि‘ का नाम आया है। वानरों और राक्षसों के विषय में भी अब यह अनुमान प्रायः ग्राह्य हो चला है कि ये लोग प्राचीन विन्ध्य प्रदेश और दक्षिण भारत की आदिवासी आर्येतर जातियों के सदस्य थे, या तो उनके मुख वानरों के समान थे अथवा उनकी ध्वजाओं पर वानरों और भालुओं के निशान रहे होंगे।

राम-मत के विषय में यह बात भी है कि रामकथा का विकास और प्रसार पहले हुआ, राम विष्णु के अवतार बाद में माने गए। रामकथा के विकास पर रेवरेंड फादर कामिल बुल्के ने जो विद्वतापूर्ण ग्रंथ प्रकाशित किया है, उसके अनुसार वेद में रामकथा विषयक पात्रों के सारे उल्लेख स्फुट और स्वतन्त्र हैं। रामकथा संबंधी आख्यान-काव्यों की वास्तविक रचना वैदिक काल के बाद इक्ष्वाकुवंश के राजाओं के सूतों ने आरंभ की। इन्हीं आख्यान-काव्यों के आधार पर वाल्मीकि ने आदि रामायण की रचना की।

भारत में संस्कृतियों का जो विराट् समन्वय हुआ है, रामकथा उसका अत्यन्त उज्जवल प्रतीक है। सर्वप्रथम तो यह कि इस कथा से भारत की भौगोलिक एकता ध्वनित होती है। एक ही कथासूत्र में अयोध्या, किष्किन्धा और लंका, तीनों के बंध जाने के कारण सारा देश एक दीखता है।

दूसरे, इस कथा पर भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में रामायणों की रचना हुई, जिनमें से प्रत्येक अपने-अपने क्षेत्र में अत्यन्त लोकप्रिय रही हैं तथा जिनके प्रचार के कारण भारतीय संस्कृति की एकरूपता में बहुत वृद्धि हुई है।

इससे यह बात सरलता से सिद्ध हो जाती है कि रामकथा ने इस देश की संस्कृति की कितनी गंभीर सेवा की है और कैसे इस कथा को लेकर लगभग सारा देश एक आदर्श की ओर उन्मुख रहा है। रामकथा की दूसरी विशेषता यह है कि इसके माध्यम से शैव और वैष्णव मतों का विभेद दूर किया गया।

यह संभव है कि आदि रामायण पर शैव मत का कोई प्रभाव नहीं रहा हो, किन्तु आगे चलकर रामकथा शिव की भक्ति से एकाकार होती गई। युद्धारंभ से पूर्व राम का रामेश्वरम में शिव की प्रतिष्ठा करना तथा हनुमान को एकादश रूद्र अवतार माना जाना यह बतलाता है कि वैष्णव व शैव मतों की दूरी को आदिकवि कम करना चाहते थे और यह उचित भी था।

आलेख

श्री उमेश कुमार चौरसिया साहित्यकार एवं संस्कृति चिंतक, अजमेर (राजस्थान)


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