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छत्तीसगढ़ी लोक में रचा बसा रथदूज का त्यौहार

प्रकृति ने बड़ी उदारता के साथ छत्तीसगढ़ की धरती को अपना प्राकृतिक सौन्दर्य प्रदान कर इसे अग्रगण्य बनाया है। हरितिमा के गीत गाते जंगल, उन्नत शिखर लिए पहाड़, लहरों के स्वर में लोरी गाती नदियॉं श्लोक और ऋचाएँ गुनगुनाती चिड़ियाँ, स्वर्णिम आभा लिए लहराते धान के खेत, क्या कुछ नहीं है, इस धरती में। वन संपदा, खनिज संपदा, जैव संपदा सब कुछ है। और इन सबसे बढ़कर है, यहाँ की लोक संपदा, जिसमें लोक आस्था, लोक विश्वास और लोक संस्कृति की त्रिवेणी सतत प्रवाहमान है। हमारी लोक आस्था हमारे तीज-त्योहारों, धार्मिक पर्वों और अनुष्ठानों में अभिव्यक्त होती है।

समन्वय की संस्कृति : छत्तीसगढ़ की धरती प्रेम, सद्भाव, समता और समरता की धरती है। इसलिए यहाँ की लोक संस्कृति में समन्वय का गुण हैं। दूसरों की संस्कृति को सहज स्वीकार कर अपने हृदय से लगा लेना और उसे अपने रहन-सहन में उतार लेना, छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा गुण है। कोई उसकी संस्कृति को आत्मघात करे या न करें, इसे उसकी चिंता नही रहती। यह सबको बिना किसी भेदभाव के आत्मसात कर लेता है। किसी को आत्मसात कर लेने का यह गुण इसके संस्कार में प्राचीन काल से समाया हुआ है। तभी तो यहाँ की लोक संस्कृति आज भी अक्षुण्य है। वैसे भी समन्वय की संस्कृति ही चिरजीवी रहती है।

सभ्यता का विकास : मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे ही हुआ। नदियों के आसपास ही उसकी संस्कृति भी पुष्पित और पल्लवित हुई। इसलिए भारतीय संस्कृति में नदी को माँ की संज्ञा दी गई है। तब छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा महानदी का वात्सल्य से परिपूर्ण ममतामयी स्वरूप हमारी आँखों के सम्मुख साकार हो उठता है। महानदी उड़ीसा राज्य की भी जीवनदायिनी है। महानदी छत्तीसगढ़ के सिहावा से उद्गमित होकर छत्तीसगढ़ की धरती और उड़ीसा की धरती की धरती को सींचती हुई समुद्र में जो मिलता है। उसके दोनों किनारे दो हाथ हैं। जिनके स्नेहिल स्पर्श पाकर दोनों राज्यों की धरती सुख-समृद्धि के गीत गा रही है। दोनों राज्य की संस्कृतियाँ गलबईहाँ डाले लोक आस्था को प्रदीप्त रखी हुई हैं। लोक आस्था का वह अलौकिक दीप है रथयात्रा का, जिसे छत्तीसगढ़ में ‘रथ’ दूज’ व ‘रथ दूतिया’ के नाम से जाना जाता है।

पुरी की रथयात्रा : भगवान जगन्नाथ जी पुरी में सदियों से विराजमान हैं। और उनकी कीर्ति से हम सभी परिचित हैं। सारे देवी-देवता तो अपने मंदिरों में ही विराजमान रहते हैं। कभी भी वे दर्शन के लिए आतुर भक्तों का न दर्शन करते हैं और न ही उनसे मिलने को आतुर रहते हैं। पर जगन्नाथ जी सबसे अलग हैं। बालपन से लेकर अंतिम अवस्था तक इनका चरित्र सबसे निराला है। इसीलिए वे अपने भक्तों से मिलने, उनके सुख-दुख में सहभागी बनने मंदिर छोड़कर बाहर आते हैं। ऐसे प्रजावत्सल प्रभु जगन्नाथ के स्वागत-सत्कार के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भक्त बिना किसी विज्ञापन के पुरी की पावन धरती पर जुट जाते हैं। यह अवसर होता है रथ यात्रा का। रथ यात्रा का यह पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को मनाया जाता है।

भगवान जगन्नाथ का रथ निर्माण – फ़ोटो – प्रकाश बिसवाल पुरी

रथ का निर्माण : रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण पुरी के कुशल कारीगरों द्वारा काफी पहले प्रांरभ कर दिया जाता है। तीन विशाल रथों का निर्माण उड़ीसा के वनों से लाई गयी लकड़ियों से किया जाता है। भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भईया बलराम तीनों अलग-अलग रथ पर आरूढ़ होते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष कहलाता है जो 65 फुट लंबा, 65 फुट चौड़ा और 45 फुट ऊँचा होता है। इसमें 7 फुट व्यास के 17 पहिए लगे होते हैं। इसी प्रकार बलभद्र जी का रथ ‘तालध्वज’ और सुभद्रा जी का रथ ‘देवलन’ कहलाता है। ये दोनों रथ नंदी घोष के आकार में कुछ छोटे-छोटे होते हैं। इन रथों की खीचने के लिए लाखों श्रद्धालु आते हैं। डोर की सहायता से रथ को खीचकर पुण्य के भागी बनते हैं। कैसी विचित्र बात है, जिनके हाथों में हमारी सांसों की डोर है, वही हमारे प्रेमी रूपी डोर से खींच चले आते हैं। इसीलिए तो भगवान जगन्नाथ सबसे निराले हैं। उनके इस निरालेपन के ही कारण उड़ीसा के लोग प्रेमवश उन्हें कड़िया अर्थात करिया (काला) कहकर अपने हृदय में बसाते हैं।

लोकशक्ति की महत्ता : भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की प्रथम पूजा और रथ खींचने का अधिकार परंपरानुसार आज भी वहाँ के तत्कालीन नरेश के वंशज को है। वे पथ को बुहारते चलते हैं और लोग गगनभेदी जयघोष के साथ रथ को खींचते हैं। यह लोक आस्था की शक्ति का उत्कर्ष है जिससे भगवान जगन्नाथ का रथ गतिमान होता है। जब कि सारी सृष्टि उनके ही इशारे पर गतिमान रहती है। इसीलिए भक्त को भगवान से बड़ा कहा गया है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण लोक आस्था का पर्व, रथ यात्रा है। तीनों रूक जाते हैं। यहॉं भगवान आठ दिन रूक कर अपने मंदिर लौट आते हैं। जनकपूर में भगवान जगन्नाथ का उनके उसों अवतार के रूप में श्रृंगार किया जाता है। जगन्नाथ भगवान का रथ यात्रा में जो मुख्य बात उभर कर आती है वह है लोकशक्ति। सृष्टिकर्ता को भी चलने और चलाने के लिए लोकशक्ति की जरूरत पड़ती है। यही लाकशक्ति लोक की आस्था है।

मूर्तियाँ ऐसी क्यों? : भगवान जगन्नाथ श्री कृष्ण है। श्रीकृष्ण की लीला और उनके चरित्र में ही केवल निरालापन नहीं है बल्कि यह निरालापन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों में दिखाई पड़ता है। कोई इन्हें सगुण व निर्गुण का समन्वित मूर्ति कहते हैं तो कोई स्पष्टता में अस्पष्टता का प्रतिबोधक मानते हैं। चाहे जो भी हो लेकिन ये श्री विग्रह अनोखे हैं। अनोखा है इनका रूप और अनोखी है इनकी लीला। पर मन में एक प्रश्न तो उठता ही है कि ये मूर्तियाँ ऐसी क्यों? एक जिज्ञासा तो सहज रूप में जागृत होती ही है। जिज्ञासा की संतुष्टि के लिए हमें अपने बड़े-बूढ़ों के कथनों पर भले ही ये किवंदती या लोकमान्यता हो, विश्वास करना पड़ेगा। संभव है यह शास्त्रों में वर्णित हो, लेकिन लोक शास्त्र पर कम अपने पर ज्यादा विश्वास करता है। वह इसलिए कि लोक पहले हैं और वेद या शास्त्र बाद में।

श्री कृष्ण का अंतिम संस्कार : यदुवंशियों के विनाश की कथा को सभी जानते हैं। श्री कृष्ण यदुवंशियों के समाप्त होने के बाद अपने अंतिम समय में व्याध के हाथों मारे गए। श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन से अपनी अंतिम क्रिया कुंवार धरती पर करने के लिए कहा था। किंतु कुंवारी धरती कहीं नहीं मिली। तब अर्जुन ने अपनी हथेली पर श्रीकृष्ण का अंतिम संस्कार किया। किंतु शरीर पूरी तरह नहीं जला, पिंड बच गया। चिंतित अर्जुन ने अबकी बार गंगा की धार को अपने बागो से सूखाकर गंगा नदी की रेत पर चंदन की चिता रची और अग्नि दी। तब भी श्रीकृष्ण का पिंड बचा रहा। ऐसी स्थिति में अर्जुन ने उस पिंड को गंगा जी में प्रवाहित कर दिया। बलभद्र और सुभद्रा के साथ भी यही हुआ। इस प्रकार श्रीकृष्ण, बालभद्र व सुभद्रा के अधजले पिंड गंगा जी से होते हुए समुद्र में आ गए और समुद्र की लहरों में हिचकोले खाते-खाते किनारे लग गए। कई सदी बीत गयी।

पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के विग्रह – फ़ोटो प्रकाश बिसवाल पुरी

मूर्तियों का निर्माण : समय पाकर श्रीकृष्ण ने पुरी के राजा गजपति को स्वप्न दिया, पिंडों की स्थिति के बारे में बताया और उन्हें मंदिर बनाकर स्थापित करने के लिए कहा। राजा ने ऐसा ही किया। उन्होंने कलात्मक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया। नीम लकड़ी की अनगढ़ मूर्तियाँ बनवाकर तीन मूर्तियों में तीनों पिंडों को समाहित कर श्रीकृष्ण (जगन्नाथ,) बलभद्र और सुभद्रा की मंजूल मूर्तियाँ मंदिर में स्थापित कर राजा यश का भागी बना। कहा जाता है कि प्रत्येक बारह वर्ष में इन विग्रहों का कलेवर बदला जाता है। नीम लकड़ी से मूर्ति गढ़ने की यह परंपरा आज भी कायम है। चूंकि नीम की लकड़ी पवित्र मानी जाती है और वैज्ञानिक दृष्टि से यह कीटरोधक है, इसमें घुन नहीं लगता। भगवान जगन्नाथ की ये मूर्तियाँ मन को मंत्रमुग्ध कर श्रद्धा और भक्ति के भाव जगाती हैं। रथयात्रा में तीनों भाई-बहन की ये मनोहारी मूर्तियाँ पारिवारिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता को प्रतिबिम्बित करती है।

छत्तीसगढ़ में रथ दूज : जगन्नाथपुरी की रथयात्रा का पूरा प्रभाव छत्तीसगढ़ में दिखाई पड़ता है। स्थानीय राजा-महाराजा जमींदार व मालगुजारों ने भी अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार अपने-आपने स्थानों पर मंदिर का निर्माण कराया, मूर्तियाँ स्थापित की और रथयात्रा क आयोजन भी धूमधाम से प्रारंभ कराया। इसलिए छत्तीसगढ़ का लोकमानस भगवान जगन्नाथ के प्रति आस्थावान रहा है। इसी आस्था के वशीभूत होकर यहॉं के लोग रथयात्रा के प्रति पवित्र भाव रखते हैं। इस तिथि को बहू लाने या बेटी विदा करने व गृह प्रवेश के लिए उत्तम माना जाता है। आषाढ़ आगमन के पूर्व ही छत्तीसगढ़ में कृषि कार्यों की प्रारंभिक तैयारी प्रारंभ हो जाती है। इसलिए रथयात्रा अर्थात रथ दूज के दिन आबाल वृद्ध, महला-पुरूष रथ-यात्रा में शामिल होकर अपनी आस्था की अभिव्यक्ति करते हैं।

फल नहीं फूल के पाँख सही : वैसे तो छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी प्रमुख नगरों व कस्बों में रथ दूज मनाया जाता है फिर भी रायगढ़, सारंगढ़, चन्द्रपुर, शक्ति, अड़भार, सारागांव, लवसरा, चांपा, जांजगीर, शिवरीनारायण, रजगा, बिलासपुर, रतनपुर, रायपुर, राजिम, बस्तर, राजनांदगांव, पांडादाह, खैरागढ़, छुईखदान, गंडई, पटेलपाली, सक्ती आदि स्थानों की रथयात्रा की बड़ी प्रसिद्धि है। यहाँ रथ यात्रा के लिए प्रयुक्त रथ जगन्नाथ पुरी की तरह उतने भव्य और विशाल नहीं होते किंतु फूल नहीं फूल के पाँख सही, इस भाव से प्रेरित होकर यहाँ रथ का निर्माण किया जाता है। जिसमें सामान्यतः बैलगाड़ी के चार चक्कों का प्रयोग कर रथ बनाया जाता है। एक ही रथ बनाया जाता है। एक ही रथ में तीनों मूर्तियाँ आरूढ़ रहती है। आस्था की अभिव्यक्ति के लिए सहजता और स्थानीय सुलभता के बड़े मायने हैं। यहॉं लोक आस्था प्रमुख है। संपन्नता नहीं।

बस्तर का ‘गोंचा परब’ : बस्तर में मनाया जाने वाला रथ यात्रा का पर्व ‘गोंचा परब’ कहलाता है। यह जिला मुख्यालय जगदलपुर में आदिवासी परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। गोंचा परब मनाये जाने के संबंध में प्रचलित जनश्रुति के मुताबिक सन 1431-32 में बस्तर के राजा पुरूषोत्तम देव ने राजगद्दी प्राप्त करने के बाद जगन्नाथ पुरी यात्रा की। उनकी अनन्य भक्ति को देखकर भगवान जगन्नाथ प्रसन्न हुए और पुजारी को स्वप्न देकर कहा कि राजा को चक्र देकर उन्हें रथपति घोषित करें। भगवान के निर्देशनुसार पुजारी ने राजा को चक्र प्रदान कर रथपति घोषित किया। उसके पश्चात बस्तर लौटकर राजा ने अपनी कुलदेवी माँ दंतेश्वरी के सम्मान में रथ यात्रा का आयोजन प्रारंभ किया।

तुपकी – साभार शकील रिजवी

पुरी से साथ आए ब्राम्हणों ने राजा को मंदिर बनवाकर जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की मूर्तियाँ स्थापित करने की सलाह दी। राजा ने प्रसन्नतापूर्वक ब्राम्हणों की सलाह मानकर ऐसा ही किया। इस प्रकार बस्तर में पुरी की तरह रथयात्रा प्रारंभ हुई जो, गोंचा परब कहलाया। राजा की पत्नी का नाम गुंडिचा था। उनकी जगन्नाथ रथ यात्रा के समय नौ दिनों तक विश्राम करते हैं। यहाँ का गोंचा परब बड़ा प्रसिद्ध है। गोंचा परब में आदिवासी बंदूकनुमा बाँस की नली में जंगली फल फंसाकर एक दूसरे पर फेंकते हैं। जिसे तुपकी कहा जाता है। इसमें किसी प्रकार का वर्गभेद नहीं होता, बल्कि यह परस्पर हँसी-ठिठोली व प्यार बाँटने की लोक परंपरा है। यहाँ पुरी की तरह तीन रथ निकाले जाते हैं। ‘गोंचा परब’ अर्थात बस्तर की इस रथयात्रा में दूर-दूर से आदिवासी अपनी लोक परंपरा के साथ हजारों की संख्या में शामिल होकर अपनी लोक आस्था को मुखर करते हैं।

शिवरीनारायण का रथ दूज : छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण की रथ यात्रा का विशेष महत्व है। महानदी के पावन तट पर स्थित शिवरीनारायण प्राचीन काल से धार्मिक, पुरातात्विक व ऐतिहासिक दृष्टि से प्रसिद्ध रहा है। यहाँ की रथयात्रा विशेष दर्शनीय होती है। शिवरीनारायण में दो जगन्नाथ मंदिर हैं। पहले दोनों स्थानों से रथयात्रा निकलती थी। किंतु अब मठ में स्थित जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों को रथ में आरूढ़ कर रथयात्रा संपन्न की जाती है। इस क्षेत्र में रथयात्रा एक प्रमुख त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान आस-पास के गाँवों से हजारों की संख्या में उपस्थित होकर श्रद्धालु अपनी धार्मिक भावना को व्यक्त करते हैं। कहा जाता है कि यह जगन्नाथ जी रायपुर की रथयात्रा मूल स्थान है। इसे गुप्त धाम व नारायण क्षेत्र भी कहा जाता है। रायपुर की रथ यात्रा की भी विशिष्ट महत्ता है। यहां दूधाधारी मठ, टूरी हटरी और सदर बाजार से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा परंपरानुसार निकल कर नगर भ्रमण करती है। तब श्रद्धालु भक्तों की आस्था हिलोंरें लेने लगती हैं। राजधानी हो जाने के बाद तो इसका स्वरूप और अधिक बढत्र गया है। घड़ी घंटों और शंख ध्वनियों के बीच भगवान जगन्नाथ की जय के उद्घोष के साथ सारा वातावरण आस्था से आलोकित हो जाता है। गजामूंग प्रसाद के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं। भीड़ के कारण दूर से ही रथ तक लोग जब रूमाल फेंक कर अपनी चढ़ोतरी चढ़ाते हैं, तब उसी रूमाल के माध्यम से पुजारी गजामूंग देते हैं। कई बार दूसरे लोग ही रूमाल लपक लेते हैं। शहरी सभ्यता में रहने के बाद भी लोग भगवान जगन्नाथ के प्रति आज भी आस्थावान हैं। रायपुर की रथयात्रा का आनंद ही अनोखा है।

गजामूंग का गौरव : रथयात्रा में जो प्रसाद वितरित किया जाता है, वह गजामूंग कहलाता है। गजामूंग के प्रति लोगों की आस्था केवल इसलिए नहीं है कि यह जगन्नाथ जी का प्रसाद है, बल्कि यह तो प्रेम, समता, सद्भाव और मित्रता के पवित्र भाव का प्रतीक है। रथयात्रा के दिन लोग परंपरानुसार जिससे विचार और भाव मेंल खाते हैं। उसे गजामूंग खिलाकर जन्म-जन्म के लिए मित्रता के बंधन में बंध जाते हैं। जिसे मितान बदना कहा जाता है। गजामूंग बदने वाले लोग परस्पर एक दूसरे का नाम नहीं लोते, बल्कि सीताराम गजामूंग कहकर अभिवादन करते हैं और जरूरत पड़ने पर गजामूंग कहकर ही संबोधित करते है। एक दूसरे के बाप को फूलददा तथा माँ को फूलदाई कहकर मान देते हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ में मितान परंपरा बड़ा ही माननीय है। यह लहू के संबंधो से भी अधिक प्रगाढ़ और आत्मीय होता है। गजामूंग इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। आज के इस स्वार्थ भरे माहौल तथा लड़ाई-झगड़े के दौर में मित्रता का पतीक गजामूंग आपसी सौहाद्र, सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ाने में कारगर साबित होगा। ग्रामिण क्षेत्रों में यह परंपरा विद्यमान है। शहरी सभ्यता में रहने वाले लोग इस परंपरा का पालन कर जीवन की आपाधपी से उबरकर सुख-शांति और सामाजिक सौहार्द प्राप्त कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ में इसी तरह गंगाजल, गंगा बारू, भोजली, जंवारा, सोनपतली, पना व महाप्रसाद के माध्यम से आज भी मितान बदने की लोक परंपरा कायम है।

महाप्रसाद का महत्व : महाप्रसाद जगन्नाथ जी के मंदिर में मिलने वाला प्रसाद है जो चावल से बना होता है। जब लोग जगन्नाथ पुरी की यात्रा करते हैं तो अपने साथ महाप्रसाद जरूर लाते हैं तथा किसी न किसी के साथ महाप्रसाद जरूर बदते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि अन्य देवी-देवताओं व मंदिरों में चढ़ने वाली भोग सामग्री को प्रसाद कहा जाता है। जबकि जगन्नाथ जी का प्रसाद ही महाप्रसाद कहलाता है। यहाँ भी जगन्नाथ जी की लीला, रूप और रथयात्रा में अनोखापन होने की तरह महाप्रसाद में भी अनोखा पल दृष्टिगोचर होता है। महाप्रसाद जो छत्तीसगढ़ी लोकजीवन का सांस्कृति आधार है, जिसमें परस्पर प्रेम और आत्मीय मित्रता की दैवीय् महिमा लोगो को नेह और अनुराग के सूत्र में बांधती है। इस दृष्टि से भी रथ दूज का अपना सांस्कृतिक महत्व है।

बस्तर की रथयात्रा – गोंचा पर्व

करमा माता की खिचड़ी : छत्तीसगढ़ी लोगो में जगन्नाथ जी के प्रति अगाध आस्था है, इसके अतिरिक्त भगवान जगन्नाथ लोगों के जीवन के सांस्कृतिक आधार स्तंभ भी हैं। वैसे भी ये प्रजावत्सल हैं। सबके प्रति इनका कृपाभाव बना रहता है। यहाँ घटने वाली कुछ घटनाओं ने तो जगन्नाथ जी को और अधिक प्रतिष्ठा दी है और यह सिद्ध किया है कि भगवान से अधिक उसके भक्त का महत्व होता है। इसलिए यह विश्वास बना है कि भगवान से बड़ा भक्त होता है। अनेक संत-महात्माओं की जगन्नाथ जी के मंदिर प्रांगण में बैठकर सभी लोग बिना भेदभाव के एकसाथ ग्रहण करते हैं। समता और सद्भाव का उज्जवल पक्ष है। भक्त माता करमा जब खिचड़ी लेकर जगन्नाथ जी के मंदिर में प्रवेश करने लगी तब पंडा-पुजारियों ने उसे रोक दिया। माता करमा सीढ़ी पर आकुल भाव से बैठी रहीं। उन्हें अपनी भक्ति पर विश्वास था कि भगवान जरूर उनका भोग स्वीकार करेगे, हुआ भी यही। जगन्नाथ जी मंदिर से बाहर निकलकर अपने बालरूप में माता की खिचड़ी खा रहें हैं। जब पंडा-पुजारियों ने माता करमा की भक्ति और भगवान की यह लीला देखी तो आश्चर्यचकित रह गए और उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ।

सालबेग की सद्भावना : एक दूसरी घटला सालबेग की। सालबेग मुसलमान थे। वे विजेता और राजा थे, किंतु कालांतर में साधु बन गए और महाप्रभु वल्लभाचार्य के साथ जगन्नाथ की शरण में पहुंचे। कहा जाता है कि मुसलमान होने के कारण सालबेग को मंदिर प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। यहाँ भी भगवान जगन्नाथ सालबेग की भावना से प्रभावित हुए। कहते हैं न कि भगवान जाति-पांति नहीं देखते, वह तो भाव के भूखे होते हैं। उस वर्ष सालबेग के अनादर के कारण रथयात्रा के दौरान रथ ही नहीं चला। तब आकाशवाणी हुई कि सालबेग को बुलाओं। जब सालबेग ने रथ की रस्सी को छुआ तो भगवान का रथ गतिमान हो आगे बढ़ा। तो यह है भक्त की महत्ता और उसका प्रभाव। भगवान के दरबार में न कोई छोटा होता है न कोई बड़ा। वह तो भाव की परख करते हैं। इसलिए आज भी भगवान जगन्नाथ का रथ सालबेग के मजार के पास कुछ समय के लिए रूकता है और भगवान अपने भक्त का मान बढ़ाते हैं।

कबीर की कुबरी : छत्तीसगढ़ में कबीर जी का अच्छा खासा प्रभाव है। उनके अनुयायी कबीरपंथी कहलाते हैं। कबीरदास जी के शिष्य धनी धरमदास जी ने छत्तीसगढ़ में कबीर पंथ की स्थापना की और प्रचार-प्रसार किया। धरमदास जी की समाधि पुरी में है। धरमदास जी कबीरदास जी के साथ जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। इस यात्रा में भी भक्त का प्रभाव दिखाई पड़ता है। कहा जाता है कि सागर की उत्ताल तरंगें पुरी नगर और जगन्नाथ मंदिर को डुबाने लगतीं तब कबीरदास जी ने अपनी कुबरी को गाड़ कर समुद्र की लहरें को सीमा न लांघने की चेतावनी दी। तब से समुद्र की लहरे अपनी सीमा में रहकर अपनी घोर गर्जना से भगवान जगन्नाथ जी का जयघोष करती है। तो ऐसी प्रभावशीलता रही है भगवान के भक्तों की। तभी तो समदर्शी और भक्तवत्सल कहलाते हैं भगवान जगन्नाथ। भगवान जगन्नाथ लोक आस्था के प्रेरणापुंज हैं। पुरी यात्रा के लिए पैदल यात्रा व लहरा लेने का बड़ा महत्व है। आज भी लोग समुद्र में लहरा लेकर स्नान करते हैं, आनंद लेते हैं और पुण्य के भागी बनते हैं।

जगन्नाथ के पांड़े : छत्तीसगढ़ में एक हाना (लोकोक्ति) प्रचलित है जगन्नाथ के पॉंड़े, यह ऐसे लोगों के लिए प्रयुक्त होता है जो अपने जीविकोपार्जन के कार्य में ही व्यस्त रहते हैं और किसी पुण्य अवसर में शामिल नही हो पाते हैं। इस लोकोक्ति के प्रचलित होने की एक क्रथा है जो भगवान जगन्नाथ से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि पुरी में एक पांड़े (कुम्हार) था, जो भगवान जी की खिचड़ी पकाने के लिए मिट्टी के बर्तन तैयार करता था। वह अपने कार्य में इतना व्यस्त रहता था कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए समय ही नहीं निकाल पाता था। रथयात्रा जैसे महत्वपूर्ण अवसर से भी वह वंचित रह जाता था। लोग कहते तो आज जाऊँगा, कल जाऊँगा कहकर अपने काम में व्यस्त हो जाता। इसी प्रकार उसका सारा जीवन बीत गया। भगवान का दर्शन लाभ प्राप्त कर न सका। लेकिन कहते हैं कि मरणोपरांत उसे मुक्ति मिली, स्वर्ग का सुख मिला। वह इसलिए कि उक्त पाँड़े अपने कर्म के प्रति समर्पित था। इसके लिए कर्म ही पूजा थी। इस लोकोक्ति का दूसरा अर्थ यह भी ध्वनित होता है कि काम की लाख व्यवस्तता और जीविकोपार्जन के लिए जुटे रहने के बावजूद भी सतसंगत और प्रभु दर्शन के लिए समय निकालना चाहिए। सतसंगत का तो जीवन में बड़ा महत्व है। इसीलिए तो कहा गया है संग भल तो रंग भल अर्थात संगत से ही व्यक्ति का जीवन प्रभावित होता है। अच्छी संगति से मनुष्य अच्छा और बुरी संगति से बुरा बनता है। अतः सतसंगत ही श्रेयस्कर है। सतसंगत साधु संतों के सानिध्य से प्राप्त होता हैं।
संगत से गुण आत है संगत से गुण जाय।
पाथर पानी तुमड़ी, संगे चले बोहाय।

जगन्नाथ मन्दिर पुरी – फ़ोटो प्रकाश बिसवाल

रथ दूज का सांस्कृतिक महत्व : भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा यानि रथ दूज का लोगों के जीवन में बड़ा व्यापक प्रभाव है। रथ दूज का यह महापर्व केवल लोगों की आस्था, श्रद्धा और भक्ति की अभिव्यक्ति नहीं है। यह हमारे जीवन का सांस्कृतिक स्रोत भी है। जिसमें मनुष्य जीवन के लिए प्रेम, शांति, सौहार्द और मैत्रीभाव की निर्मल निर्झरणी सतत प्रवाहमान होकर लोक की आस्था को सिचिंत कर रही है। छत्तीसगढ़ के लोगों में रथ दूज का उत्साह मैत्री भाव का प्रबोधक है। जगन्नथपुरी की रथयात्रा की भॉंति छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक गरिमा और उसकी अस्मिता का संपोषक है। रथ दूज लोक आस्था का संवाहक है इसलिए इसका सांस्कृतिक महत्व और इसकी पारंपारिकता आज भी लोकजीवन में अनुकरणीय व दर्शनीय है। यह आलोक आस्था का महापर्व है। आस्था के इस आलोग से सारा विश्व प्रकाशमान हो तथा परस्पर मैत्री भाव जागृत हो यह मंगलकामना है।

आलेख

डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.) मो. नं. 9424113122

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