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भारतीय सांस्कृतिक एकता का प्रतीक रथ दूज पर्व

छत्तीसगढ़ अंचल में रथदूज या रथयात्रा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है, जगह-जगह भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है तथा इस दिन मांगलिक कार्य करना भी शुभ माना जाता है। वैसे तो मुख्य रथयात्रा का पर्व उड़ीसा के पुरी में मनाया जाता है, परन्तु छत्तीसगढ़ की सीमा साथ उड़ीसा के साथ लगे होने एवं सांस्कृतिक संबंध होने के कारण वहाँ के तीज त्यौहारों का असर छत्तीसगढी जनमानस पर भी दिखाई देता है। यह पर्व छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा के बीच सांस्कृतिक सेतू का कार्य भी करता है तथा राष्ट्र को एकता के सूत्र में भी बांधता है।

समुद्र तट से लेकर हिमालय की तराई क्षेत्र में भी रथ यात्रा निकाली जाती है तथा भगवान जगन्नाथ की आराधना की जाती है, प्राचीन काल से जगन्नाथ पुरी स्थल इतना विख्यात है कि आदि शंकराचार्य से लेकर श्री रामानुजाचार्य, गुरु नानक देव तथा जनश्रुतियों में भगवान बुद्ध के भी जगन्नाथ पुरी पहुंचने का उल्लेख होता है। इस स्थल का इतना महत्व है कि महाराजा रणजीत सिंह ने अपने अंतिम दिनों में की गई वसीयत में अपना प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा जगन्नाथ भगवान को भेंट करने की बात कही थी।

छत्तीसगढ़ी लोक में रचा बसा रथदूज का त्यौहार

छत्तीसगढ़ में भगवान जगन्नाथ का प्रभाव सदियों से रहा है, यह प्रभाव इतना है कि छत्तीसगढ़ के प्रयाग एवं त्रिवेणी तीर्थ राजिम की दर्शन यात्रा बिना जगन्नाथ पुरी तीर्थ की यात्रा अधूरी मानी जाती है। मान्यतानुसार जगन्नाथ पुरी की यात्रा के पश्चात राजिम तीर्थ की यात्रा करना आवश्यक समझा जाता है। राजिम को पद्म क्षेत्र कहा जाता है यहाँ भगवान राजीव लोचन विराजते हैं।

फ़ोटो – जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा- प्रकाश बिसवाल दिनांक 12 जुलाई 2021

छत्तीसगढ़ में मुख्य रुप से रायगढ़, सारंगढ़, चन्द्रपुर, शक्ति, अड़भार, सारागांव, लवसरा, चांपा, जांजगीर, शिवरीनारायण, रजगा, बिलासपुर, रतनपुर, रायपुर, राजिम, बस्तर, राजनांदगांव, पांडादाह, खैरागढ़, छुईखदान, गंडई, पटेलपाली, सक्ती आदि स्थानों पर रथ यात्रा निकाली जाती है, जहाँ आस पास के गांवों के श्रद्धालु आकर भगवान जगन्नाथ की पूजा कर गजा मूंग का प्रसाद अवश्य ग्रहण करते हैं।

यहाँ के राजा महाराजाओं एवं जमीदारों की भगवान जगन्नाथ पर अटूट आस्था दिखाई देती है। अब यह यात्रा लोक से राजा महाराजाओं तक पहुंची या राजा महाराजओं से लोक तक विस्तारित हुई, शोध का विषय है। क्योंकि जो राजधर्म होता है वही प्रजा का धर्म माना जाता था। राजा महाराजाओं ने अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ के मंदिरों का निर्माण कर उनके विग्रह स्थापित किए एवं रथदूज पर यात्रा निकालना चलन में आया।

छत्तीसगढ़ का लोकमानस रथ दूज के त्यौहार को अत्यंत शुभ मानता है इसलिए इस तिथि को बहू लाने, बेटी विदा करने तथा गृह प्रवेश के साथ अन्य मांगलिक कार्य सम्पन्न किए जाते हैं। इसका एक कारण लोक में भगवान जगन्नाथ के प्रति अगाध आस्था होना दिखाई देता है।

फ़ोटो – जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा- प्रकाश बिसवाल दिनांक 12 जुलाई 2021

गरियाबंद जिले के देवभोग स्थित जगन्नाथ मंदिर का इतिहास 150 साल से भी ज्यादा पुराना है। इलाके के 84 गांव के जनसहयोग से जगन्नाथ मंदिर को बनाने में 47 वर्ष लग गए। यह एक मात्र ऐसा मंदिर है, जहां भक्त अपने भगवान को लगान पटाते हैं। लगान के रूप में प्राप्त होने वाले सुगंधि‍त चावल और मूंग का एक भाग पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भोग के लिए जाता है। कहते हैं कि देवता के लिए यहाँ से भोग भेजे जाने के कारण ही इस स्थान का नाम देवभोग पड़ा।

भगवान जगन्नाथ मंदिर और भव्य रथयात्रा

छत्तीसगढ़ के शिवरीनारायण तीर्थ में रथयात्रा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। प्रो अश्विनी केशरवानी अपने लेख में कहते हैं कि स्कंद पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को ”श्रीसिंदूरगिरिक्षेत्र”कहा गया है।प्राचीन काल में यहां शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अंतिम चरण में श्रापवश जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन उनका मृत शरीर नहीं जलता। तब उस मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया जाता है।

आज भी बहुत जगह मृत शरीर के मुख को औपचारिक रूप से जलाकर समुद्र अथवा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इधर जरा को बहुत पश्चाताप होता है और जब उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित किये जाने का समाचार मिलता है। तब वह तत्काल उस मृत शरीर को ले आता है और इसी श्रीसिंदूरगिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बांस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगा। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को आगे चलकर “नीलमाधव” कहा गया। इसी नीलमाधव को 14 वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने पुरी में ले जाकर स्थापित करने की बात कही है।

फ़ोटो – जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा- प्रकाश बिसवाल दिनांक 12 जुलाई 2021

डॉ. जे. पी. सिंहदेव और डॉ. एल. पी. साहू ने “कल्ट ऑफ जगन्नाथ”और “कल्चरल प्रोफाइल ऑफ साउथ कोसला” में लिखते हैं-“भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शबरीनारायण से पुरी लाने वाला पुरी के राजपुरोहित विद्यापति नहीं थे बल्कि उन्हें तांत्रिक इंद्रभूति ने संभल पहाड़ी की एक गुफा में ले जाकर उसके सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना किया करता था। यहीं उन्होंने वज्रयान बुद्धिज्म की स्थापना की। उन्होंने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की भी स्थापना की थी।”

बंगाल की राजकुमारी लक्ष्मींकरा जो बाद में पटना के राजा जैलेन्द्रनाथ से विवाह की, वह इंद्रभूति की बहन थी। इंद्रभूति के वंशज तीन पीढ़ी तक नीलमाधव के सम्मुख बैठकर तंत्र मंत्र की साधना करते रहे बाद में उस मूर्ति को पुरी में ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मंदिर में तांत्रिकों का कब्जा था जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ करके उनके प्रभाव से मुक्त कराया।

इधर जरा शबर अपने नीलमाधव को न पाकर खूब विलाप करने लगा और अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करने के लिए उद्यत हो गया तभी भगवान नीलमाधव अपने नारायणी रूप का उन्हें दर्शन कराया और यहां गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिये। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा को जो कोई मेरा दर्शन करेगा वह मोक्ष को प्राप्त कर सीधे बैकुंठधाम को जाएगा। तब से यह गुप्तधाम कहलाया। आज भी यहां भगवान नारायण का मोक्षदायी स्वरूप विद्यमान है और उनके चरण को स्पर्श करता ”रोहिणी कुंड” विद्यमान है।

फ़ोटो – जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा- प्रकाश बिसवाल दिनांक 12 जुलाई 2021

बस्तर में मनाया जाने वाला रथ यात्रा का पर्व ‘गोंचा परब’ कहलाता है। यह जिला मुख्यालय जगदलपुर में आदिवासी परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। गोंचा परब मनाये जाने के संबंध में प्रचलित जनश्रुति के मुताबिक सन 1431-32 में बस्तर के राजा पुरूषोत्तम देव ने राजगद्दी प्राप्त करने के बाद जगन्नाथ पुरी यात्रा की। उनकी अनन्य भक्ति को देखकर भगवान जगन्नाथ प्रसन्न हुए और पुजारी को स्वप्न देकर कहा कि राजा को चक्र देकर उन्हें रथपति घोषित करें।

बस्तर का गोंचा महापर्व : रथ दूज विशेष

भगवान के निर्देशानुसार पुजारी ने राजा को चक्र प्रदान कर रथपति घोषित किया। उसके पश्चात बस्तर लौटकर राजा ने अपनी कुलदेवी माँ दंतेश्वरी के सम्मान में रथ यात्रा का आयोजन प्रारंभ किया। पुरी से साथ आए ब्राम्हणों ने राजा को मंदिर बनवाकर जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की मूर्तियाँ स्थापित करने की सलाह दी। राजा ने प्रसन्नतापूर्वक ब्राम्हणों की सलाह मानकर ऐसा ही किया। इस प्रकार बस्तर में पुरी की तरह रथयात्रा प्रारंभ हुई जो, गोंचा परब कहलाया।

इस तरह रथदूज का पर्व उड़ीसा के साथ छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक संबंधों को स्थापित करता है, इस पर्व को मनाने का चलन सदियों से रहा है और वर्तमान में भी जारी है। यह पर्व किसी जाति विशेष का न होकर लोक का पर्व है। यह भारत की संस्कृति ही है जो सभी भेदों को दूर कर राज्यों एवं राष्ट्रों की सीमाओं को पार एकात्मता का पाठ पढ़ाती है। सांस्कृतिक रुप से जुड़े होने के कारण अनेकता में एकता दिखाई देती है, संस्कृति ही वह बंधन है जिसने सहस्त्राब्दियों से हम भारतीय जनमानस को जोड़ रखा है।

आलेख

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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