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स्वतंत्रता का सन्देश देता श्रीकृष्ण का जीवन : जनमाष्टमी विशेष

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। पर स्वतंत्र होने तथा अपनों को दुःख की बेड़ियों से मुक्त करने की चाह देखिए, जन्म लेते ही माता देवकी तथा पिता वसुदेव को बेड़ियों से मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं तो नवजात शिशु कृष्ण की इच्छा से कारागार के द्वार स्वतः खुल गए। बेड़ी मुक्त होते ही कारागार से बाहर जाने का मार्ग सुलभ हो गया। पिता वसुदेव बालक कृष्ण को लेकर मथुरा से गोकुल की ओर निकल पड़े।

स्थिति देखिये, कारागार से मुक्त हुए पर यमुना नदी बालक कृष्ण के चरण छूने को लालायित है, पिता ने अपने पुत्र बालक कृष्ण को टोकरी में उठाकर अपने सिर पर रख लिया है। कृष्ण के चरण छूने को लालायित यमुना का जलस्तर बढ़ गया है। ऐसी स्थिति में पिता वसुदेव के लिए आगे बढ़ना कठिन हो गया। ऐसी विकट स्थिति में बालक कृष्ण ने टोकरी के बाहर अपने चरण रख दिए।

दर्शन को लालायित यमुना ने कृष्ण के चरणों को छुआ और जलस्तर कम हो गया। इस समय भी कृष्ण ने यमुना को दर्शन की व्याकुलता के बंधन से और अपने पिता को यमुना के भयंकर जलस्तर के विकट परिस्थिति से मुक्त किया। वहां गोकुल पहुंचे तो अत्याचारी शासक कंस के आतंक से त्रस्त गोकुलवासियों को अपने मनोहारी अलौकिक छवि से आनंद विभोर कर दिया। कुपोषित गोधन को अपने दिव्य स्पर्श और प्रेम से पोषित कर उन्हें पुष्ट बनाया।

गोकुलवासियों को गोमाता का सारा दूध कंस के पास भेजना पड़ता था और उनके अपने बच्चे दूध से वंचित रहते। ऐसे में बालक कृष्ण ने मित्रों की टोलियां बनाईं, दूध,माखन से भरी मटकियां फोड़ीं और एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जिससे कि गोकुल का दूध तथा दुग्धजन्य पदार्थ मथुरा न जा सके। इससे गोकुल के बालकों को दूध मिलने लगा, गोकुलवासी पुष्ट होने लगे। अत्याचारी शासन के लगान से ग्रामवासियों को मुक्त करने का ऐसा था कृष्ण का अभियान।

आगे श्रीकृष्ण ने कंस के भेजे गए राक्षसों को समाप्त कर उन्हें यमपुर भेज दिया। वहीं गोकुल में जातिगत भेदभाव को मिटाने का प्रखर अभियान चलाया। सभी जातियों के बालकों को अपना मित्र बनाया, उनके साथ गइया चराने गए, सामूहिक भोजन किया। यमुना नदी को विषैला करनेवाले कालिया नाग से युद्ध कर उसे यमुना छोड़ने के लिए बाध्य किया।

श्रीकृष्ण ने गोपियों के विरह को दूर करने के लिए उनके साथ महारास किया। हजारों गोपियों के बीच रहकर भी वे वासनामुक्त रहे, इसलिए वे योगेश्वर श्रीकृष्ण कहलाए। बाद में जब अत्याचारी कंस को समाप्त करने का निश्चय किया तो गोकुल, यशोदा मैया, पिता नन्द, मित्र-सखा ग्वाले, गोपियां सबको छोड़ा।

श्रीकृष्ण ने किसी के प्रति आसक्ति नहीं रखी, कर्तव्य पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार से मोह का बंधन कृष्ण को न बांध सका। कंस का वध किया, माता देवकी, पिता वसुदेव और महाराज उग्रसेन सहित कंस के कैद में रहे जन सामान्य को कारागार से मुक्त किया। कंस को मारकर भी उन्होंने मथुरा पर राज नहीं किया, मथुरा का राज उन्होंने महाराज उग्रसेन को सौंप दिया।

उन्होंने वैभवशाली द्वारिका बसायी। दर-दर वनवास के बंधन में जकड़े पांडवों का मार्ग प्रशस्त किया। धर्मयुद्ध के दौरान पार्थ-अर्जुन को मोहपाश ने जकड़ लिया और वह अपने कर्मक्षेत्र से पलायन करना चाहता था। इस अनावश्यक विरक्ति से श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बाहर निकाला। अर्जुन के मन में उठे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया और दोनों के संवाद से श्रीमद्भगवद्गीता जैसा अलौकिक ज्ञान प्रकट हुआ।

श्रीकृष्ण के उपदेश ने अर्जुन को कर्तव्यवान बनाया और इसके बाद पांडवों को विजय प्राप्त हुआ। हस्तिनापुर नरेश युद्धिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट बनें, वहीं गीता का ज्ञान आज संसार के लिए कर्तव्य पथ दर्शानेवाला, विकार मुक्त करने वाला तथा ईश्वर तक पहुंचने का महान ग्रन्थ है।

जन्म से लेकर अपने प्राण त्यागने तक जिन्होंने स्वतंत्रता से जीवन जिया ऐसे श्रीकृष्ण ने केवल धर्म के बंधन को ही स्वीकार किया। धर्म को प्राथमिकता दी, उसी को आदर्श माना। श्रीकृष्ण ने वचन दिया था कि महाभारत युद्ध में वे शस्त्र नहीं उठाएंगे, पर धर्मरक्षा के लिए उन्होंने अपने ही वचन को तोड़ा तथा शस्त्र उठाकर संसार को बता दिया कि धर्म ही सर्वोपरि है।

धर्म की रक्षा के लिए व्यक्तिगत प्रण या वचन बाधक बने तो उसे तोड़ देना ही उचित है। श्रीकृष्ण जीवनभर धर्म को जिया और उन्होंने अपने महान जीवन तथा उपदेश से संसार को बताया है कि धर्म के आचरण से युक्त व्यक्ति हो स्वतंत्र हो सकता है।

आलेख

लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’, वरिष्ठ पत्रकार एवं अध्येता नागपुर

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