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अवघट म मिलय राम : मातर विशेष

प्रकाशपर्व दीपावली की प्रतीक्षा हर वर्ग करता है। विशेषकर गौचारण और गौ-पालन करने वाले यदुवंशियों को इस पर्व की विशेष प्रतीक्षा होती है। क्योंकि ये पर्व उनको गौधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर प्रदान करता है। दीपावली के दूसरे दिन अर्थात गोवर्धन पूजा के दिन से अहीर समुदाय का दोहा और राउत नृत्य आरंभ हो जाता है।

अहीर समुदाय एवं किसानों के द्वारा नये चावल के भात, खीर, उड़द दाल, कुम्हड़े-अरबी की सब्जी, बड़ा और चौसेला को मिलाकर खिचड़ी बनाई जाती है फिर उसे खाट बिछाकर केले के पत्तों पर पशुधन को परोसा जाता है। पौराणिक कथानुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर धारण कर इंद्र कोप से मथुरा वासियों को बचाया था।

छत्तीसगढ़ में इस दिन गोबर का गोवर्धन बनाकर गोवर्धन खुंदाई की रस्म पूरी की जाती है। इसी दिन से गौ माता को सोहाई बांधने की शुरुआत होती है जो कार्तिक पूर्णिमा तक चलते रहती है। किसी परिवार विशेष में चली आ रही परंपरा के आधार पर गोवर्धन पूजा, अन्नकूट (मातर), देवउठनी एकादशी और सबसे आखिर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन तक सोहाई बांधने का क्रम चलते रहता है।

सोहाई एक प्रकार का हार

सोहाई एक प्रकार का हार होता है जो अहीर समाज द्वारा पशुओं के गले में पहनाया जाता है। इसके निर्माण और सजावट की प्रक्रिया बहुत ही श्रमसाध्य कार्य है।

गांवों में अहीर समुदाय बाजे गाजे के संग सोहाई बांधने पशु मालिकों के घर जाते हैं और पशु मालिक उनको भेंट स्वरुप राशि, कपड़े या धान देते हैं। सोहाई बांधते समय अहीर समुदाय दफड़ा, निसान और मोहरी के संग दोहा वाचन करते हैं। जो सामान्यतः किसी संत कवि द्वारा रचित दोहे, पारंपरिक दोहे या स्वरचित दोहे भी होते हैं।जैसे-

गाय चराये गहिरा भइया, भंइस चराये ठेठवार हो।
चारों कोती अबड़ बोहाथे, दही दूध के धार हो।।

गऊ माता के महिमा, नइ कर सकन बखान।
नाच कूद के जेला, चराय कृष्ण भगवान।।

गौमाता को सुहाई बंधन

दोहा में प्रायः धार्मिक घटनाओं का वर्णन किया जाता है या सुमिरन किया जाता है।

सदा भवानी दाहिनी, सनमुख रहे गनेश।
पांच देव रक्छा करे, ब्रम्हा विष्णु महेश।।

सरस्वती ने स्वर दिया, गुरु ने दिया ज्ञान।
माता-पिता ने जन्म दिया, रुप दिए भगवान।।

गौरी के गनपति भये, अंजनी के हनुमान रे।
कालिका के भैरव भये, कौसिल्या के लछमन राम रे।

जै जै सीता राम के भैया, जै जै लछमन बलवान हो।
जै कपि सुग्रीव के भईया, कहत चलै हनुमान हो।।

गंगा बड़े गोदावरी, के तीरथ बड़े प्रयाग।
सबसे बड़े अयोध्या, जहाँ राम लिए अवतार।।

घाट-घाट म लछमन मिलय, अवघट म मिलय राम।
अशोक वाटिका म सीता मिलय, लंका म मिलय हनुमान।।

वर्तमान की परिस्थितियों पर भी कुछ लोग तुरंत दोहा गढ़ देते हैं। ऐसे लोग आशुकवि प्रवृत्ति के होते हैं। जैसे नारी की महत्ता का वर्णन करता ये दोहा-

नारी निंदा झन करौ, नारी नर के खान रे।
नारी नर उपजात हे, ध्रुव प्रहलाद समान रे।।

कुछ कुछ दोहे जीवन की नश्वरता की ओर मनुष्य का ध्यान खींचते है।जैसे-

दू दिन के दुनिया मा संगी, झन कर बहुते आस रे।
नदी तीर के रूखवा भैय्या, जब तब होय विनाश रे।।

कौड़ी कौड़ी माया जोरे, जोरे लाख करोड़।
आही बुलऊव्वा राम के, ले जाही निगोटी छोड़।।

राम-राम के बेरा संगी, राम के गुन ल गाए हो।
जग के तारन हारी भईया, भौं सागर पार लगाए हो।।

अहीर नर्तक – चित्र घनाराम साहू जी

गौचारण करने वाले ग्वाले को अपनी लाठी बहुत प्रिय होता है। वह आपतकाल में शस्त्र का भी काम करता है। उस लाठी के सम्मान में उनके मुख से दोहा का स्वर फूट पड़ता है-

तेंदू सार के लउठी भैय्या, सेर सेर घीव खाये।
उही लउठी के भरोसा मा भैय्या, गाय भंइस चराये।।

कबीर और तुलसी के दोहे का भी भरपूर प्रयोग सोहाई बांधने और गोवर्धन पूजा के समय अहीर समुदाय करता है। तुलसी और राम छत्तीसगढ़ में अतिशय प्रिय है।

राम राम रटते रहो, जब लग घट में प्राण।
कबहु तो दीनदयाल के, भनक पडे़गी कान।।

चित्रकूट के घाट में, भए संतन के भीर।
तुलसीदास चंदन घिसय, तिलक करे रघुवीर।।

इस प्रकार राऊत दोहों में संत, कवियों के वाणी के संग उनकी व्यक्तिगत रचनात्मकता भी समाहित होती है। हालांकि उनके द्वारा रचित दोहों में छंद विधान का पालन भले ही नहीं होता पर भावपक्ष प्रबल होता है।उनके दोहों में दृष्टांत भरपूर होते हैं।

तेल फूल मा लइका बाढे़, पानी मा बाढे़ धान रे।
बात बात मा झगरा बाढे़, खिनवा मा बाढे़ कान रे।।

पांव जान पनही मिले, घोड़ा जान असवार रे।
सजन जान समधी मिले, करम जान ससरार रे।।

पांच दिवस के दीपावली पर्व के अंतिम दिन ज्यादातर लोग जहां भाई दूज का पर्व मनाते हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन मातर का पर्व मनाते हैं। अहीर समुदाय बाहुल्य गांवों में मातर का आयोजन किया जाता है।

खोड़हर स्थापना

मातर के एक दिन पूर्व मतलब गोवर्धन पूजा के पश्चात रात्रि में बाजे गाजे के साथ यदुवंशियों के द्वारा खोड़हर को गौठान (खइरखा डांड़) में सांहडा़ (नंदी) देव के पास स्थापित किया जाता हैं। जहां रातभर मातर जागरण किया जाता है। मातर में गौमाता, धरती माता, ग्राम देवी एवं जन्मदात्री माता की आराधना की जाती है। रातभर गाजे-बाजे के साथ दोहा वाचन होता है। जैसे-

आ गे दिन देवारी मइया, में खइरखा में लाठी भांजव।
लान तेंदू सार के लउठी भैय्या, में पुरखा के मातर जागंव।

भाई दुलारे बहिनी, अउ बहिनी दुलारे भाई।
मोला दुलारे मोर दाई ददा, गोरस दूध पिलाई।।

मातर पर्व अगले दिन मनाया जाता है। जिसके लिए आसपास के ग्रामीणों को भी न्योता भिजवाया जाता है। सवेरे सभी यदुवंशियों के द्वारा ग्रामीण जन की उपस्थिति में गौधन को सोहाई बांधा जाता है। उस समय देवता चढ़ाई और काछन का दृश्य देखते ही बनता है।

एक कांछ कांछो रे भाई, दूसर दिये लगाई।
तीसर कांछ कांछो रे भाई, सब माता के दुहाई।।

मातर-मातर कहिथें भइया मातर जीव के काल रे।
कखरो फुटय माड़ी कोहनी, अउ कखरो फुटय कपार रे।।

इस दौरान दोहा वाचन रोमांचित कर देता है। लंबे समय तक भी जब कोई देवता शांत नहीं होता और धूप की खुशबू लेने (हूम लेने) नहीं जाता था। तब इस प्रकार के दोहे उच्चारित होते हैं-

पूजा करे पुजेरी भैय्या, सब देवता कुकरी चोरे।
पूजा होत इंकर बगधरा के, सब बंधना छोरे।।

पूजा करे पूजेरी भैय्या, धोवा धोवा चउंर चढा़ये।
पूजा होत इंकर मात-पिता के, जे हूम लेवन बर जाए।।

इस प्रकार से अनेक वीर रस से भरपूर दोहे का सतत वाचन चलते रहता है। सोहाई बंधन के पश्चात लक्ष्मी स्वरूपा गौमाता से कुम्हड़ा फोड़वाया जाता है और उस कुम्हड़े से बनी सब्जी का खिचड़ी बनाकर उपस्थित लोगों को प्रसाद बांटा जाता है। कहीं कहीं लाठी चालन और अखरा विद्या का भी प्रदर्शन किया जाता है, जिसमें एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज साहसिक कारनामों का प्रदर्शन किया जाता है।

गोवर्धन पूजा और मातर के ये दो दिन गौमाता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का दिन होता है, जिसे समस्त यदुवंशियों के साथ पूरा छत्तीसगढ़ धूमधाम से मनाता है। लोक में प्रचलित परम्पराएं हमें प्रकृति से जोड़ती हैं तथा सनातन संस्कृति की लोक परम्पराएं लोक द्वारा सदैव अक्षुण्ण रखी जाती हैं।

आलेख

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)
जिला, गरियाबंद

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