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छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के स्मृतिशेष नवगीतकार : विशेष आलेख

नवगीत गीत-परंपरा के विकास का वर्तमान स्वरूप है जिसमें समकालीन परिप्रेक्ष्य का समग्र मूल्यांकन दिखाई देता है । दरअसल नवगीत गीत ही है , वह गीत के अन्तर्गत नवाचार है, कोई अलग विधा नहीं है। अक्सर प्रश्न उठता कि जब गीत की जानकारी के बिना नवगीत नहीं लिखा जा सकता तो नवगीत नामकरण की क्या विवशता थी ?

इस संदर्भ में यदि कहा जाए तो नामकरण कोई नया रिवाज़ नहीं है। समकालीन कविता एवं ग़जल के साथ भी एक दर्जन से अधिक नाम जुड़ चुके हैं। आज़ादी के बाद जीवन की जटिल समस्याओं को जब गीतों में अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जाने लगा तब उसे अलग पहचान देने की आवश्यकता महसूस की गई और कई नामों के बीच नवगीत नाम को उपयुक्त माना गया। गीतों की शैली में आए परिवर्तन को तत्वों के आधार नवगीत का नाम दिया जाने लगा और मूलरूप से जो गीतकार थे वो भी पृथक नवगीत संग्रह प्रकाशित न होने के बावजूद नवगीतकारों की सूची में शामिल किए गए।

आज बहुत से गीतकार नवगीत के शिल्प एवं तत्वों को ध्यान में रखकर लय को प्राथमिकता देते हुए नवगीत की रचना कर रहे हैं। नवगीत को विद्वानों द्वारा अपने अपने ढंग से परिभाषित करने का सिलसिला ज़ारी है क्योंकि नवगीत की रचनात्मकता का विस्तार, समकालीन चिंताओं का फ़लक असीमित होने के कारण समकालीन कविता की तरह हो रहा है और उसमें बुनियादी तत्वों के अलावा समकालीन विसंगतिओं एवं विडंबनाओं को भी दर्शाया जाने लगा है।

नवगीत का मूलस्वर आधुनिकतावादी होता है , इसके कथ्य और शिल्प दोनों में आधुनिक भावबोध और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति की जाती है । इसमें निहित आधुनिकता को स्वतंत्रता के बाद उपजी नयी दृष्टि माना जाता है। जबकि समकालीन कविता में पूंजीवादी व्यवस्था एवं शोषक वर्ग का आतंक अधिक दिखाई देता है। समकालीन कविताएं क्रांति एवं मुक्ति के साथ परिवर्तन की बातें भी करती हैं। सहीं मायने में संश्लिष्ट एवं जटिल भावों तथा आधुनिक विचारों को संवेदना में घोलकर तज्जनित शब्दों में तौलकर नये अर्थ एवं मुहावरे गढ़ने की प्रवृत्ति को नवगीत का दर्जा दिया जाता है।

आज अधिकांश नवगीतों में केवल निराशावादी एवं नकारात्मक दृष्टिकोण को ही अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जा रहा है जबकि उसमें समस्या के समाधान का पुट भी होना चाहिए तभी युगबोध की संकल्पना साकार है पाएगी। ये अच्छी बात है कि 21 वीं सदी में लिखे जा रहे नवगीतों में अधिकतर कथ्य जीवन से जुड़े तत्वों से लिए जा रहे हैं।

जहाँ तक नवगीत के उद्भव का सवाल है तो इसकी झलक निराला की रचनकाओं में दृष्टिगत होती है। सामाजिक यथार्थ एवं मानव मूल्यों से उनकी रचनाएँ प्रभावित थीं। अज्ञेय द्वारा 1949 में संपादित ‘प्रतीक’ द्विमासिक, शरद अंक एवं रूपांबरा में सम्मिलित रचनाओं में भी नवगीत के तत्व विद्यमान थे । 1957 तक पारंपरिक गीतों में बदलाव साफ़ दिखाई देने लगा था। राजेन्द्र प्रसाद सिंह के संपादन में सन 1958 में ‘गीतांगिनी’ का प्रकाशन हुआ। इसमें नवगीत के नामकरण के साथ आवश्यक तत्वों का निर्धारण भी किया किया।

सन 1959 से अबतक नवगीतों पर अनेक संकलन आ चुके हैं। विमर्श का सिलसिला अभी भी ज़ारी है। नवगीत परम्परा को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय निश्चित रूप से 1958 में प्रकाशित गीतांगिनी संकलन में रचनाकार एवं संपादक राजेन्द्र प्रसाद सिंह को ही जाता है। महिला साहित्यकारों में शुरू से नवगीत के शिल्प एवं कथ्य को लेकर भ्रांतियां रहीं । इसीलिए नयी / समकालीन कविता की तरह नवगीत लेखन में उनकी भागीदार अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। नवगीत में दलित, स्त्री, आदिवासी आदि विमर्श भी बहुत कम हो पाया है।

मध्यप्रदेश की भूमि शुरू से गीतकारों के लिए उर्वरक रही है। रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, शिवमंगल सिंह, सुभद्रा कुमारी चौहान, भवानी प्रसाद मिश्र, माखन लाल चतुर्वेदी, बालकुष्ण शर्मा नवीन, नम्रदा प्रसाद खरे, तोरण देवी शुक्ल ‘लली’, हीरा देवी चतुर्वेदी जैसे गीत कवियों एवं कवयित्रियों ने इस प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। छायावाद के प्रवर्तक मुकुटधर पाण्डेय का जन्म भी अविभाजित मध्यप्रदेश के रायगढ़, गाँव बालपुर में हुआ था। आज प्रायः उन्हीं लोगों पर लिखा जा रहा है जो इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में सक्रिय रहे या उपलब्ध हैं। एकला चलो प्रवृत्ति एवं प्रचार तंत्र से दूर रहे सृजनकर्ताओं का उल्लेख कई बार छूट जाता है या हो नहीं पाता। इस लेख में मैंने सभी स्मृति- शेष नवगीतकारों को शामिल करने का प्रयास किया है फिर भी यदि भूलवश किन्हीं का नाम छूट गया हो तो मित्रगण अवश्य सूचित करें मैं उन्हें जोड़ लूंगा। मध्यप्रदेश के लब्ध प्रतिष्ठ दिवंगत नवगीतकारों का संक्षेप विवरण निम्नानुसार है –

मुकुट बिहारी सरोज ( 26.7.1926 – 18.9.2002 ) को यथार्थ की शिनाख्त करने में महारत हासिल था। निर्भिकता से अपनी बात रखा करते थे यथा- • इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं / दंत-कथाओं के उद्गम का पानी रखते हैं / पूंजीवादी तन में मन भूदानी रखते हैं / इनके जितने भी घर थे सभी आज दुकान हैं / इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं । • हो गया है हर इकाई का विभाजन / राम जाने गिनतियाँ कैसे बढ़ेंगी ? / अंक अपने आप में पूरा नहीं है / इसलिए कैसे दहाई को पुकारे / मान, अवमूल्यित हुआ है सैकड़ों का /कौन इस गिरती व्यवस्था को सुधारे / जोड़-बाकी एक से दिखने लगते हैं / राम जाने पीढियां कैसे पढ़ेंगी ? • मेरी, कुछ आदत, ख़राब है / कोई दूरी, मुझसे नहीं सही जाती है,/ मुँह देखे की मुझसे नहीं कही जाती है / मैं कैसे उनसे, प्रणाम के रिश्ते जोडूँ / जिनकी नाव पराए घाट बही जाती है / मैं तो ख़ूब खुलासा रहने का आदी हूँ / उनकी बात अलग, जिनके मुँह पर नकाब है ।

प्रो.विद्यानन्दन’राजीव’ (4 जुलाई 1931-4अप्रैल 2020) अपने नवगीतों में यथार्थ के बदलते रूपों को बड़े ही कौशल से बिंबित करते थे। मनुष्य का संघर्ष हो या जीवनशैली का खोखलापन सभी के प्रति उनका स्वर मुखरित हुआ है – उन्होंने लिखा है कि – • बस्ती बस्ती / आ पहुँची है / जंगल की खूँख्वार हवाएँ ! उत्पीड़न / अपराध बोध से / कोई दिशा नहीं है खाली / रखवाले / पथ से भटके हैं / जन की कौन करे रखवाली / चल पड़ने की / मजबूरी में /पग पग उगती हैं शंकाएँ ! कोलाहल / गलियों –गलियारे / जगह -जगह जैसे हो मेला / संकट के क्षण / हर कोई पाता / अपने को ज्यों निपट अकेला/ अपराधों के / हाथ लगी हैं / रथ के अश्वों की वल्गाएँ ! • पंख कतरने में / बहेलिये ने जल्‍दी की है/ शंका व्‍यापी मन में-पंछी उड़ न कहीं जाए/ रहे चाकरी मेंहाजि र/ रूखा-सूखा खाए / मन को मार/ समय आने पर/ हम जैसा बोले / परदे के पीछे का, हर्गिज/ भेद नहीं खोले / आदिम होने की मुराद/ यों, पूरी कर ली है/ यह जंगल है, आज्ञा / चलती यहाँ शिकारी की / नीलामी हर रोज/ परिन्‍दों की लाचारी की / वन के इन बाशिन्‍दों की भी/ क्‍या अपनी मर्जी /कूड़ेदान पहुँच जाती/ अक्‍सर इनकी अर्जी/ यहाँ न कोई नियम/ बाहुबल की ही चलती है। • टूटा छप्पर औसारे का / छत में पड़ी दरार/ फैंक गई गठरी भर चिन्ता / बारिश की बौछार /पहले पहले काले बादल / लाये नहीं उमंग / काम काज के बिना / बहुत पहले से/ मुट्ठी तंग/किस्मत का छाजन रिसता है/क्या इसका उपचार /कब से पड़ा कठौता खाली/दाना हुआ मुहाल/आँखों के आगे/मकड़ी का/घना घना सा जाल/नहीं मयस्सर थकी देह को/कोदों और सिवार/ खुशियाँ लिखी गई हैं/अब तक भरे पेट के नाम/ सपने देखे गए/मजूरी के/अब तक नाकाम/ कैसे खो जाए ऋतु स्वर में/अंतर्मन लाचार

श्रीकृष्ण शर्मा (17.10.33 – 15.12.2010) ने अपने गीतों में समाज के कटु यथार्थ को सशक्त अभिव्यक्ति दी है। रायसेन जिले के ग्राम सिलपुरी में शिक्षक रहते हुए उन्होंने आसपास के गाँवों के अभावग्रस्त जीवन को गीतों के माध्यम उज़ागर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उदाहरण स्वरूप कुछ पंक्तियाँ – • इन कच्चे पत्तों की पीठ थपथपाने / हवा सब विकल्पों को लात मार आयी/ सठियाया पतझर कर चुका आत्महत्या / फागुन के हस्ताक्षर, पिकी की गवाही। बदलते परिवेश में प्रतिभा के अवमूल्यन को भी उन्होंने ख़ूबसूरती से चित्रित किया है । इस विसंगति को उन्होंने ‘उत्तर रामचरित के पन्ने’ नामक गीत मेंकुछ प्रकार अभिव्यक्त किया है – • धुँआ-धुँआ अम्बर का चेहरा / मंच हुआ तारों से खाली / जो कि तिमिर में जले उम्र भर / वही सभा से गये उठाये। आम आदमी की पीड़ा हो या समय की मार उन्होंने अद्भुत बिंबों के माध्यम से उकेरने का सदैव प्रयास किया । बानगी के तौर पर -• कोहरे के मोटे परदे के / पार नहीं जाती हैं आँखें/ किन्तु टँगी रह गयीं दृष्टि की / चौखट पर पेड़ों की शाखें /समय साँप के काटे जैसा / कैसे कटे रात की दूरी ?’ • गीत तुम्हें गा-गा कर हार गये/ अनजाने भ्रम की इन लहरों ने / आ-आकर मुझको भरमाया है/पेड़ों की बाँसुरियों ने बजकर / बरबस ही मन को भटकाया है।

हुकुम पाल सिंह ‘विकल’ (1 जनवरी 1935- 27दिसंबर2014) ने नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक विसंगतियों पर गहरा प्रहार किया है। उनके नवगीतों में भाव सौंदर्य एवं नाद सौंदर्य का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है । यथार्थ के धरातर पर लिखे सारे गीत-नवगीत बोधगम्य हैं। बानगी के तौर पर – • नानी – दादी के किस्से / जाने कब हवा हुए / सब संवेदन आपस के / तिथि बीती दवा हुए / पगडण्डी का राजपथों से / मिलना नहीं फला। • यह मन बिलकुल ऊब चुका है / नये-नये आकाश से/ भय-सा लगने लगा शहर के / बढ़ते हुए विकास से । • रोटी एक खड़े आँगन में / भूखे चार जने / खाते नहीं बने/ दिन-दिन बहा पसीना माथे / कति रात सपनों में / संवेदन की एक झलक भी / नहीं दिखी अपनों में/ आशा के अंबर में कितने / बादल घिरे घने। • कितने जतन किए फिर भी / अँधियारे नहीं छंटे /सूरज की तानाशाही ने / ऐसे रंग बिखेरे /राजपथों पर दल दिए / ओछी किरणों ने डेरे/ दर्प सुनहरी कड़ी धूप के/ बिलकुल घाटे नहीं।

नईम (1.4.1935-9.4.2009) प्रतिभा के अवमूल्यन एवं अक्षम लोगों की बोलती तूती पर नईम ने पहले ही चिंता व्यक्त की थी । आज उनका विकराल रूप सामने दिखाई पड़ता है – • लिखने जैसा लिख न सका मैं / सिकता रहा भाड़ में लेकिन, / ठीक तरह से सिक न सका मैं / अपने बदरँग आईनों में / यदा-कदा ही रहा झाँकता / थी औक़ात, हैसियत / लेकिन अपने को कम रहा आँकता / ऊँची लगी बोलियाँ लेकिन,/ हाट-बाज़ारों बिक न सका मैं । • उनकी / टेढ़ी या सीधी हों,/ लेकिन हैं पांचों ही घी में / रहे छीजते अपने ही ग्रह / और नखत ये धीमें धीमें / जिसको जो भी मिला ले उड़े, / खुरपी टेढ़े बेंट आ जुड़े / होना था जिनको आधा / वो एक रात में हुए डेवढ़े / होने को-क्या शेष रह गया / कर लो जो भी आये जी में। • भुगत रहे हैं सजा न जाने / कैसे -कैसे अपराधों के / माँ का दूध पिता की छाया/ उनकी ही माटी ये काया/ यूँ कृतज्ञ होने के बदले/ मूल सूद के साथ दबाया / समझे थे ख़ुद को वजीर हम / किन्तु हुई गिनती प्यादों में / कैसे गाऊँ भीम पलासी / भून रही रातें वैसाखी / कोस रही अपनी ही निर्मिति / जी चाहे करने को काशी / एक बूँद जल जिसे कहे हम / बचा नहीं फूटे बाँधों में।

राम अधीर (12.4.1935 -9 .2.2021)मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले राम अधीर ने मध्यप्रदेश के भोपाल को अपनी कर्मभूमि बनाया। उनका जन्म आर्वी, महाराष्ट्र में हुआ था। अंतिम समय तक वे गीतों पर केन्द्रित पत्रिका संकल्प रथ का संपादन करते रहे। कोरोना प्रकोप से जूझते हुए अंततः उन्हें अपना प्राण त्यागना पड़ा। उनके द्वारा रचित कुछ नवगीत बेहद प्रभावशाली हैं । यथा –• आग डूबी रात को क्या हो गया है राम जाने / आइए हम चाँदनी के नाम से पाती लिखें / यह सफ़र लम्हा बहुत है / जानती है यह सदी / सीढ़ियों का खुरदरापन / और यह सूखी नदी / रौशनी का धर्म क्या है हम नहीं कुछ जानते / क्या बुरा है दीप से ही पूछकर बाती लिखें । • जब मुझे संदेश की कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ी थीं / तब लगा मुझको तुम्हारे द्वार /पर पहरा लगा है/ इस हथेली का खुलापन देख लो/ याचक नहीं हूँ/ मैं किसी चौपाल या मठ का /कथा वाचक नहीं हूँ /कौन सुनता है यहाँ पर गीत की अंतर व्यथा को/इस सभाओं का मुझे हर आदमीं बहरा लगा है।

दलित कवि श्यामलाल ‘शमी’ (15 जून 1935-12 फरवरी 2019) के गीतों में नवगीत की उपस्थिति समग्रता के साथ दिखाई देती है। जो सहा सो कहा काव्य संग्रह में उन्होंने मुख्य रूप से आदिवासियों , पिछड़े एवं सर्वहारा वर्ग तथा नारी की वेदनाओं कै चित्रित किया है। श्यामलाल ‘शमी’ अक्सर कहते थे कि – गीत के विकासक्रम की यही नाविन्यता है कि गीतकार समयापेक्ष होते हुए युगधर्मी बने , तत्कालीन जनमानस की संवेदनाओं और उनके संघर्ष को तटस्थ रूप से गीत के माध्यम से जीवंतता प्रदान करे तथा उसमें नवशक्ति एवं नवचेतना का संचार करे । उनका मानना था कि – कविता में विद्रुपताओं को विचार माध्यम से लिपिबद्ध करने से बेहतर है कि गीत – नवगीत को गुनगुनाया जाए । जहाँ नव्यता है एवं जीवंतता है वही नवगीत है। कुछ पंक्तियां दृष्टव्य है – • दंभ से / परिपूर्ण जो था गाँव / वह हम छोड़ आए / थी जहाँ / इंसानियत की मौत / नाता तोड़ आए । • झींग रहा भोला वर्षों से / पर प्रभु नहीं मिले / जिनके थे उनको भी कब / वह आसान छोड़ मिले / गंगादीन गड़रिया लो मिला एक दिन भइया / बोला खोली पंडित जी ने पाली-पलाई गइया / दान – कथा ने सारे अपने अंटी डैम छले। • मंचों पर भाषण – अभिभाषण / है विकास डुगडुगी बजी / करें किसान आत्महत्या /ले कर्ज़ , महाजन लूटे / ऊंच –नीच औ धर्मयुद्ध है / गड़े विकृति के खूँटे/ पर उनको क्या लेना देना / जिन महफिल अपराध सजी ।

प्रेमशंकर रघुवंशी (8.1.1936 – 21.2.2016) के नवगीतों से गुजरना जीवन के यथार्थ से रूबरू होना जैसा लगता है। उन्होंने सहीं कहा है – • बोलो भाई बोलो गम / चोर बड़ा या नंगा ऊँचा / है न किसी से कोई कम / उन्हें सिर्फ ख़ुद की चिंता है/ चाहे जग हो नरम गरम / रहबर तो दाखिल दफ्तर हैं / रखे जहाँ एटम बम / सबके लिए सोचते हर दिन / इसीलिए हैं आँखें नम ! • रुँ -रुँ बाजा रुँगताड़ा / लगे लबारी ढोल पीटने / नाच रहे गलियों में नंगे / भिन्न -भिन्न फिरकों में बँट कर / भड़काते रहते दंगे / ऐसे ऐसे काम करे ये / ज्यों यमराजों के पाड़ा ।

चन्द्रसेन विराट (3.12.1936-15.11.2018) से मेरा संपर्क आठवें दशक से निरंतर बना रहा। मंचों पर भी साथ रहे। हिन्दी ग़ज़लकार एवं गीत कवि के रूप में उनकी पुख़्ता पहचान थी। उनके कई गीतों को नवगीत की श्रेणी में रखा जा सकता है। यथा – • दिया गया संदर्भ सही पर / अवसर और प्रसंग ग़लत है /भाव, अमूर्त और अशरीरी/वह अनुभव की वस्तु रहा है / चित्र न कर पाया रूपायित/शब्दों ने ही उसे कहा है / उसका कल्पित रूप सही पर / दृश्यमान हर रंग ग़लत है / जब विश्वास सघन होता तब/संबंधो का मन बनता है/ गगन तभी भूतल बनता है/भूतल तभी गगन बनता है/ सही, प्रेम में प्रण करना पर/करके प्रण, प्रण-भंग ग़लत है / संस्तुति, अर्थ, कपट से पायी /जो भी हो उपलब्धि हीन है/ ऐसा, तन से उजला हो पर /मन से वह बिलकुल मलीन है/ शिखर लक्ष्य हो, सही बात पर/ उसमें चोर-सुरंग ग़लत है  • संभव विडंबना भी है साथ नव-सृजन के / उल्लास तो बढ़ेंगे, परिहास कम न होंगे/ अलगाव की विवशता / हरदम निकट रही है/इतना प्रयत्न फिर भी / दूरी न घट रही है/होगा विकास फिर भी संभाव्य है विपर्यय / आवास तो बढ़ेंगे, वनवास कम न होंगे / परिणाम पक्ष में हो / परितोष पर न होगा / हो प्राप्त सफलताएं / संतोष पर न होगा / हर प्राप्ति में विफलता का बोध शेष होगा / हों भोज अधिक फिर भी उपवास कम न होंगे / भौतिक पदार्थवादी / उपलब्धियां बढ़ेंगी / रक्तों रंगी वसीयत क्या पीढ़ियां पढ़ेंगी? / उपभोग्य वस्तुओं में है वस्तु आदमी भी/ सपन्नता बढ़ेगी, संत्रास कम न होंगे।

ओम प्रभाकर ( 5.8.1941 – 22.2.2021) के नवगीत बिंम्ब सघनता एवं प्रतीक बाहुल्यता के कारण हृदय में गहरी छाप छोड़ते हैं उनमें शिल्प एवं संवेदना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने लिखा है – • इस क्षण यहाँ शान्त है जल / पेड़ गड़े हैं / घास जड़ी / हवा सामने के खँडहर में / मरी पड़ी / नहीं कहीं कोई हलचल / याद तुम्हारी / अपना बोध / कहीं अतल में जा डूबे हैं / सारे शोध / जमकर पत्थर है हर पल । • रातें विमुख दिवस बेगाने / समय हमारा,/ हमें न माने  / लिखें अगर बारिश में पानी / पढ़ें बाढ़ की करूण कहानी / पहले जैसे नहीं रहे अब / ऋतुओं के रंग-रूप सुहाने/ दिन में सूरज, रात चन्‍द्रमा / दिख जाता है, याद आने पर / हम गुलाब की चर्चा करते हैं / गुलाब के झर जाने पर / हमने, युग ने या चीज़ों ने / बदल दिए हैं / ठौर-ठिकाने ।

दिवाकर वर्मा ( 25 .10.1941 – 1 .5. 2014) के नवगीतों में अनूठे शब्द विन्यास, ध्वन्यात्मकता, इंन्द्रीयबोध एवं सामयिक परिवेश का सटीक चित्रण दिखाई देता है – • पल- पल जाल / बुन रही मकड़ी / युग के/ छल छंदों में फँसकर /हुआ बर्फ / संवेदन बंजर/ सहमी चिड़िया -भय ने जकड़ी / तार-तार / अभिशापित जीवन / चुभी फाँस / घायल अन्तर्मन/ पका घाव/ सींवन भी उघड़ी/ खिन्न देहरी / चौखट उन्मन / आँगन से भौजी की अनबन / सुलगे ज्यों / भौजी की लकड़ी। • यह नकटों का गाँव / स्वर्ग का हर अधिकारी है/नाक कटाकर स्वर्ग मिले /यह किस्सा है जूना / सुख अपनी से/ उनकी कटनी का है कुछ दूना / सूर्पनखा की कटी-कि लंका स्वर्ग सिधारी है/ दृष्टिहीन धृतराष्ट्र बँध गया/ परिणय में गांधारे / भीष्म- बाण का भय/ नासिका शकुनि कहा सँभारे/ कौरव दल को स्वर्ग/ जमानत में गांधारी है।

डॉ. इशाक अश्क ((1.1.45 – 26.2.2016 ) ने सामाजिक विसंगतियों , विद्रूपताओं एवं विडंबनाओं पर खूबसूरती से कलम चलाया है। उदाहरण दृष्टव्य है – • रंग गिरगिट की तरह / अभिमत बदलते हैं / अवसरों की /हुंडियां बढ़कर /भुनाने की / जानते हैं हम / कला झुकने / झुकाने की / यस /मिले इसके लिए हर / चाल चलते हैं । • सूखी गुलदस्ते सी / प्यार की नदी / व्यक्ति / संवेग सब / मशीन हो गए/ जीवन /के सूत्र /सरेआम खो गए / और कुछ न कर पायी/ यह नई सदी । • धूप जहरीली / कँटीले पल हुए / ताल -झीलों के तरल अनुबंध टूटे / प्यास के सौ तीर तन की ओर छूटे / मछलियां घायल नदी के तल हुए / स्वप्नदृष्टा टहनियों के पात सूखे / हो उठे व्यवहार किरणों के बड़े रूखे/ ख़ुशबुओं के साथ हर क्षण छल हुए। • आ गईं नदियाँ घरों तक खून की / मुँह चिढ़ाती भूख बच्चों की तरह / हो रही जिसपर ज़माने की जिरह / मुश्किल जुटाना रोटियाँ दो जून की / न्याय ख़ुद अन्याय ढोने के लिए/ अभिशप्त है दिनरात रोने के लिए/ हाँकते हैं यहाँ बस सब दून की।

महेश अनघ (14.9.47 – 4.12.2012) भ्रष्ट व्यवस्था और बाज़ारवाद पर चिंतन की एक बानगी देखें के नवगीत में – • कौन है ? सम्वेदना / कह दो अभी घर में नहीं हूँ / कारख़ाने में बदन है/ और मन बाज़ार में / साथ चलती ही नहीं/ अनुभूतियाँ व्यापार में/ क्यों जगाती चेतना / मैं आज बिस्तर में नहीं हूँ । • तन मालिक का / धन सरकारी / मेरे हिस्से परमेसुर / शहर धुएँ के नाम चढ़ाओ/ सड़कें दे दो झंडों को/ पर्वत कूटनीति को अर्पित/ तीरथ दे दो पंडों को / खीर-खांड ख़ैराती खाते / हमको गौमाता के खुर। • अहा बुद्धिमानों की बस्ती / या तो चुप्पी या तकरार -/ कोने-कोने भूत बियाने / सारा घर सन्नाटेदार । सूचीबद्ध हुई दिनचर्या-मज़बूरी रेखांकित है / चौके से चूल्हे की अनबन / हर भांडा आतंकित है-किसी ख़ास दिन ख़ास वजह से / काग़ज़ पर लिखते हैं प्यार / यों तो इस भुतहा बाखर में/ कोई आएगा ही क्यों / जिस धन से ख़ुशबू ग़ायब है / उसे चुराएगा ही क्यों/फिर भी ताला है, कुत्ता है/ और गोरखा चौकीदार / अपना क़द ऊँचा रखने में / झुक कर चलना छूट गया / विज्ञापन से जोड़ा रिश्ता / विज्ञापन से टूट गया / इतनी चीज़ें जुड़ीं कि हम भी / चीज़ों में हो गए शुमार ।

जहीर कुरेशी ( 5.8.1950- 20.4.2021) को मुख्यरूप से हिन्दी ग़ज़लकार के रूप में जाना जाता है लेकिन उनके लिखे नवगीतों का आकलन किया जाए तो वे किसी से कमतर दिखाई नहीं देते। बानगी के तौर पर – • बंजारों से चले / पीठ पर लादे अपना घर /  मीलों लम्बा सफ़र / योजनों लम्बा जीवन है / लेकिन, उसके साथ / भ्रमित पंछी जैसा मन है /  ग़लत पते के ख़त-से / भटक रहे हैं इधर-उधर । • भीतर से तो हम श्मशान हैं/ बाहर मेले हैं / कपड़े पहने हुए/ स्वयं को नंगे लगते हैं / दान दे रहे हैं / फिर भी भिखमंगे लगते हैं / ककड़ी के धोखे में/ बिकते हुए करेले हैं। • हम स्वयं से भी / अपरिचित हो गए हैं / रास्ते हैं / और उनकी दूरियाँ हैं / दूरियों की भी / अलग मजबूरियाँ हैं / हम भटकते रास्तों में / खो गए हैं / वासनाएँ /ज़िन्दगी से भी बड़ी हैं / प्यास बनक र/उम्र की छत पर खड़ी हैं /तृप्ति के पथ पर /मरुस्थल हो गए हैं ।

हरीश निगम ( 31.7.55 – 28.5.18 ) यदि विसंगतियों के साथ नवगीत से संदेश प्रतिध्वनित होता हो तो यह नवगीतकार की कुशल कारीगरी मानी जाती है। इस संदर्भ में हरीश निगम ( 31.7.55 – 28.5.18 ) की कुछ पंक्तियां – • मेहंदी-सुर्खी / काजल लिखना / महका-महका / आँचल लिखना / धूप-धूप / रिश्तों के / जंगल / ख़त्म नहीं / होते हैं / मरुथल / जलते मन पर / बादल लिखना । • धूप ने / ढाया कहर / फूल घायल / ताल सूखे / हैं हवा के बोल रूखे / बो रहा मौसम / ज़हर । • सूखे में / सूखे हम, बाढ़ में बहे ,/ जहाँ रहे हरदम मँझधार में रहे / धूप सदा / कच्ची ही कान की रही / खेत-बैल-फसलें / परधान की रहीं / अपने तो कर्ज़ों के / क्रूर अजदहे! /चाहे हो /जनवरी चाहे हो जून / एक जून / रोटियाँ, एक जून सून / बाज़ों की घातों से / रात-दिन सहे ! / मुट्ठी में / काग़ज़ से मुड़े-तुड़े हैं / टूट-टूट, / रोज़ कई बार जुड़े हैं / घुन खाई देहों में / लिए कहकहे। • इस नगर से। आ गए हम तंग। / भीड़ का/पीकर ज़हर हँसते रहो / रोज़ उजड़ो / और फिर बसते रहो/ किस तरह के / ये नियम, ये ढंग / इस नगर से / आ गए हम तंग। थी बहुत / अपनी नदी मीठा कुआँ / खो गए सब/ बच रहा काला धुआँ / लग गई है / ज़िंदगी में जंग / इस नगर से / आ गए हम तंग।

वैसे तो मूल रूप से शायरा डॉ वर्षा सिंह -( 29 अगस्त 1959 – 2मई 2021) के कुछ नवगीत भी प्रकाशित हुए थे जिसमें प्रकृति एवं प्रवृत्ति के माध्यम से जन जीवन की पीड़ा और संघर्ष – प्रतिरोध का सुंदर चित्रण दिखाई देता है- • वर्षा हूँ / बूंद के साथ मुझे रहने दो/छप्पर भी गीले हों /छाजन भी गीले हों/ सड़कें भी गीली हों / आँगन भी गीले हों / धनिया का चूल्हा पर/ आग आज दहने दो । • कुछ सपने भीगे हैं/ कुछ सपने सूखे हैं/ झाड़ी हैं ,बूटे हैं/ दादुर का शोर है/ उग आई घासोन का/ रस्ता हर ओर है/ छप्पर के नीचे भी / भीगते सलुखे हैं।

अविभाजित मध्यप्रदेश में शामिल रहे छत्तीसगढ़ के नवगीतकारों की यदि मैं बात न करूँ तो कुछ अधूरा प्रतीत होगा। छ.ग.में लिखे गए या लिखे जा रहे नवगीतों का अपना अलग मिजाज रहा है । यहाँ के स्मृति शेष नवगीतकारों पर दृष्टि डालें तो –

नारायण लाल परमार (1.1.1927- 27.4.2003) के नवगीतों में अनुभूति एवं अभिव्यक्ति का बेजोड़ समन्वय दिखाई देता है । प्रकृति, मनुष्य एवं जीवन से उनका गहरा रिश्ता रहा।सटीक बिंबों का रचाव ,भाषिक सौंदर्य एवं शब्द विन्यास की कुशलता उनके नवगीतों की विशेषता है।मिसाल के रूप में – • माँगती हिसाब नहीं / रेत कभी पानी से/ जीने का अर्थ एक/ क्षण प्रतिक्षण जागता/ हर स्थिति को अपने/ अनुभव से पागता/ स्वाभिमान ऊँचा होता/ अक्सर धानी से।
• आदमीं सलीब पर / और बहस ज़ारी है /जासूसी से भरा/ लगता हर दृश्य है/ नोटिस हड़ताल की/ दे चुका भविष्य है/ वर्तमान बेखबर/ और बहस ज़ारी है।

त्रिभुवन पाण्डेय ( 21.11.1938 – 6.3.1921 ) अपने नवगीतों में आधुनिक जीवन शैली के खोखलेपन एवं नारकीय जीवन के यथार्थ को बख़ूबी रेखांकित करते हैं। कुछ महत्वपूर्ण पंक्तियां –
• आ गए शब्दों पर / पहरे के दिन/ उनके ही नारे हों /उनका ही ध्वज/ उनका इतिहास हो/ उनके पूर्वज/ उनकी ही आस्था पर / ठहरे से दिन। • बोझ लदे कंधों पर/ काँवर भर धूप/ खोज रहे लकड़हारे/ पेड़ों की छाँव/ हाँफ रही नदियों में/ थकी हुई नाव/ अलग अलग तृष्णा है/ एक ही स्वरूप/ सपनों में दिखते हैं / पोखर और ताल/ पूछ रही पुरवासिन/ पनघट का हाल/ पत्तों सा कुम्हलाया/ धनिया का रूप

अनिरुद्ध नीरव (1.7.1945 – 18.2.2016 ) की गणना देश के लब्ध प्रतिष्ठ नवगीतकारों में होती है। उनके नवगीतों में शिल्प एवं मानवीय संवेदना का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। उनके नवगीत संग्रह – उड़ने की मुद्रा में की सभी रचनाएँ सहज, संश्लिष्ट एवं दृष्टि संपन्न हैं। कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य है-
• चिड़िया / पत्थर हो जाए तो ? / ये चिमनी / सीमेंट मिलों की / ये विष के बादल / विकसित होने की / परिणति हैं / या पापों के फल / हल से / मक्खन होती मिट्टी /बंजर हो जाए तो ? • यह नदी / रोटी पकाती है / हमारे गाँव में /सूखती-सी / क्यारियों में /फूलगोभी बन हँसे /गंध / धनिए में सहेजे /मिर्च में ज्वाला कसे /यह कड़ाही / खुदबुदाती है /हमारे गाँव में ।

अशोक शर्मा (18.2.1943 -14.7.2014) का विज़न एवं कैनवास बहुत व्यापक था। जीवन की सच्चाइयों को वे हूबहू रूपायित करते थे। कुछ पंक्तियाँ इस दृष्टि से गौरतलब हैं –
• मेरे भी घर यही हादसा / आख़िरकार हुआ/ सूख गया है/ बहुत पुराना/घर में खुदा कुआँ/ आग चढ़ी हड़िया के दाने / अबतक कच्चे हैं/ पत्तल लिए हाथ में बैठे/ भूखे बच्चे हैं/ जलती लकड़ी से उठता है/ काला स्याह धुआँ
•.समीकरण चूल्हे चक्की का / खाता मेल नहीं/ आज नहीं है घर में आटा/ कल था तेल नहीं / माँ कहती है दाल पकाना मुँख में दाँत नहीं/ कई दिनों से पिता कह रहे/ खाया भात नहीं/ दाल भात का जोड़ बिठाना/ बस का खेल नहींं

गीतकार पुष्कर भारती (31.12.1948 -6.11.2008) मेरे घनिष्ठ रहे हैं। सन 1980 में हम दोनों बालको के अनुसंधान एवं नियंत्रण प्रयोगशाला के स्मेल्टर अनुविभाग में एक साथ काम करते थे। एक दूसरे के गीतों एवं ग़ज़लों के प्रथम श्रोता होने के कारण आज भी मेरी स्मृति में उनके वो गीत हैं जिन्हें नवगीत की श्रेणी में रखा जा सकता है। कुछ पंक्तियाँ – • नहीं मायने रखता कोई / नज़र हमारी ओर फेंकना/ जागी रात मसहरी काटे/नागफनी ने मिलजुल बांटे/ आँगन के चुभते सन्नाटे/ सहमा सहमा रात का माथा/ पीछे मुड़कर नहीं देखना। • दीपक बाती नेह अगन बिन/ खूब जला ये हिया रातभर / नहीं मिला रजनीगंधा से/ ख़ुशबू का काफ़िया रातभर।

परम्परागत छन्दों पर गीत लिखने वाले जिन गीत कवियों ने नवगीत की रचना की उनमें श्यामा सलिल ,भगवान स्वरूप ‘सरस’, डॉ. गोविन्द ‘अमृत’ , शंकर सक्सेना, वीरेन्द्र मिश्र एवं केशव पांडे का नाम उल्लेखनीय है। बहुत से गीतकार ऐसे हैं जिनके किसी न किसी गीत में नवगीत के तत्व दिखाई देते हैं। पढ़ने के बाद संशय की स्थिति निर्मित हो जाती है कि उन्हे किस श्रेणी में रखा जाए। साहित्य जगत में अपनी पुख्ता पहचान बनाने में कामयाब नवगीत की ओर आज सभी रचनाकारों का आकर्षण हिंदकी – हिन्दी ग़ज़लों की तरह निरंतर बढ़ रहा है। यह शाश्वत सच है कि पचास साठ साल के अंतराल में हर प्रचलित विधा को समय की मांग के अनुरूप परिवर्तन के दौर का सामना करना पड़ता है। नवगीत के साथ भी इनदिनों यही हो रहा है। इसलिए इसे समकालीन गीत भी कहा जाने लगा है। समय के साथ हो रहे परिवर्तन को खुले मष्तिष्क से स्वीकार करना होगा । यह नवगीत की सफल यात्रा के लिए बहुत ज़रूरी है वरना नवगीत एक सीमित, बौद्धिक समाज तक ही सिमट कर रह जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। मुझे विश्वास है नये आलोचक इस दिशा में अपनी महती भूमिका का निर्वहन पूरी ईमानदारी के साथ करेंगे । नवगीत आलोचना की दृष्टि से मैं कह सकता हूँ कि स्थिति आज बहुत अच्छी नहीं है। पूर्णकालिक आलोचकों की नगण्यता है। देश में मुख्य धारा के आलोचकों द्वारा नवगीत एवं नयी कविता की प्रकृति को समतुल्य एवं दोनों की वैचारिक अंतर्वस्तु को समान मानने के कारण नवगीत के मूल्यांकन पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया जबकि सच्चाई यह है कि वैचारिकता के आधार पर नवगीत एवं समकालीन कविता के बीच के अंतर को साफ़ देखा जा सकता है । किसी भी विधा को लोकप्रिय एवं समृद्ध बनाने में आलोचकों की तुलना में पाठकों का बहुत बड़ा योगदान होता है। आज भाषा के सरलीकरण की महती आवश्यकता है। शब्दकोशी नवगीतों की जगह ऐसे नवगीतों की रचना पर ज़ोर देने की आवश्यकता है जो जनमानस की समझ के अनुरूप हों ।

इधर कुछ पत्रिकाओं ने नवगीत विशेषांक निकालना आरंभ किया है । यह सराहनीय पहल है । पहले की तुलना में आज अच्छे नवगीत लिखे जा रहे हैं। नवगीत का भविष्य अच्छा है, बशर्ते वर्चस्व की लड़ाई एवं मुँह देखी समीक्षा / आलोचना को छोड़कर पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ इस दिशा में काम किया जाए। मैं आँकड़े एवं दस्तावेजों के एकत्रित करने को शोध नहीं मानता। शोध वो होता है जिससे अनुसंधान के नये द्वार खुलें, साहित्य को नयी दिशा मिले। ‘तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी’ की परंपरा के विकृत रूप के चलते कई बार प्रतिभाशाली लोग एवं सहीं बातें सामने नहीं आ पाती। यही वजह है कि आज पीएचडी करने वालों की कम और करवाने वालों की पूछ परख अधिक होने लगी है। नवगीतों पर कार्य कर रहे शोधार्थियों को आज सजग होने की आवश्यकता है क्योंकि शोध सत्य की बुनियाद पर आधारित होना चाहिए । मैंने बहुत से मार्गदर्शकों एवं जिनपर शोध किया जा रहा हो उन्हें शोधार्थियों के लिए थीसिस लिखते देखा है। इन दिनों स्वयं पर पीएचडी करवाने का चलन भी ज़ोरों पर है। शोधार्थियों को चाहिए कि वे ऐसे हथकंडों से बचकर रहें। अंत में एक बात और कि इस आलेख में मैंने श्रेष्ठता एवं वरिष्ठता को आधार न मानकर जन्मतिथि के आधार पर नवगीतकारों का उल्लेख किया है।

डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ क्वार्टर नं.एएस -14,पॉवरसिटी, अयोध्यापुरी ,जमनीपाली, जिला – कोरबा (छ.ग.)495450 मो.नं.9424141875 7974850694

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