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छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज में गौरी-गौरा पूजा की प्राचीन परम्परा

गौरा पूजा विशुद्ध रुप से आदिम संस्कृति की पूजा है, इस पर्व को जनजातीय समाज के प्रत्येक जाति के लोग मनाते है और क्षेत्र अनुसार दिवाली से 5 दिन पूर्व से पूस पुन्नी तक मनाया जाता है। जैसे रायपुर राज मे दिवाली प्रमुख है, बिलासपुर राज मे देव उठनी, बनगवां, कोरबा, सरगुजा, पेण्डरा मे पूस पुन्नी तक पूजा पर्व मनाया जाता है।

यह पर्व एक यज्ञ के रुप मे मनाया जाता है जिसे देव सिरजाने के दिन से ग्यारह, सात या पांच दिन पूर्व प्रारंभ किया जाता है और गांव भर की महिलायें व पुरुष वाद्ययंत्रों से सुसज्जित होकर गौरा चौरा मे इकट्ठा होते है। बैगा द्वारा तुमानार के फ़ूल को बैगा लाठी मे बांधा जाता है और सात, नौ या ग्यारह कुंवारी कन्याये बैगा के सांथ उस लाठी को गौरा चौरा मे किये गये गड्ढे मे सात बार कुचती है, जिसे फ़ूल कुचना कहते है।

फ़िर दीपक जलाकर उसके अंदर रखते है और एक दीपक बाहर होम-धुप देकर फ़िर पूजा करते है, जिसमे सभी उपस्थित महिलाएं पतरी चढ़ाने का गाना गाती है और चावल को उसमे छिड़कते हैं यह क्रम सात पतरी तक चलता है। पुरुषगण वादन गायन करते है।

पतरी चढ़ाना पुरा होने के बाद स्त्रियाँ गौरा-गौरी और डंड़ईरा रानी का मांगलिक गान करती है और अंत सभी आमंत्रित देवी देंवता को सुलाकर गौरा-चौरा के गड़ढे को बड़ा पत्थर से ढंक देते ताकि कुकुर-माकर खोल न सके। यह क्रम पुरे सिरजनी के दिन तक चलता है। सांथ ही महिलाये फ़ूलकुचनी के दुसरे दिन से मिट्टी का सुवा बनाकर टुकनी मे रखकर गांव मे सभी के घर जा-जाकर सुवा नाचती है। उन्हे भेंट के रुप में गृहस्वामी/ गृहस्वामिनी द्वारा अनाज व पैसा दिया जाता।

अंतिम दिन सुबह भोर मे ही तीन नये बांस की आरूग टुकनी और एक हौला या घघरी ले कर गांव के तलाब मे माटी और पानी लेने जाते हैं। बैगा अपने बैगा लाठी के साथ सब्बल रखते है। वहां पर भुमि पूजा, जल देवी पूजा के बाद चुलमाटी जैसे मिट्टी खोदते है और तीन महिलाएं आंचल मे झोंकती है।

तदुपरांत घघरी मे पानी भर कर चारो को एक कोरवान आरुग साड़ी मे ढंक कर लाती हैं और उस माटी के दो टोकरी को गांव के गौटिया के यहां रखते है और एक टुकनी को बैगा के घर मे, गौटिया कोई भी समाज का हो सकता है, जनजातीय होना आवश्यक नही है। गौटिया के घर की मिट्टी से गौरी रानी, ड़डैयारानी का मंदिर सिरजाते हैं और बैगा के घर मे जो मिट्टी से ईसर महादेव गौरा-राजा को सिरजाते है।

रात्रि पुनः गांव के लोग गौरा-चौरा मे इकट्ठा होते हैं, विधि-विधान से पतरी चढ़ाते हैं फ़िर गौरा को लिवाने बैगा के यहां जाते हैं बैगा-बैगी ईसर राजा पूजा- पाठ कर विवाह मे जाने के लिए बिदाई देते हैं, मौर सौपा जाता है। फ़िर गाजेबाजे के सांथ गौरा को लेकर गौटिया के यहा जाते हैं, वहां पर भी गौटिया घर के लोग गौरा को परघाकर घर के अंदर आंगन मे लेजाते हैं।

घर वाले बैगा-बैगीन की मदद से गौरी डंडैया और गौरा की पूजा करते है, कच्चे गोरस से पांव पखारते हैं और विवाह का रस्म भांवर दे कर चढोत्री देकर बिदा करते हैं। पूरे हर्षोल्लास के सांथ गाते-बजाते, नाचते-कुदते अखरा करते गौरा-चौंरा पहुंचते हैं और पूरे गांव के लोग पुनः विवाह रस्म करते है।

दहेज स्वरुप द्रव्य आदि भेंट करते हैं और पूरी रात जागरण कर गौरा-गौरी और डंडैया रानी के विवाह के मंगल गीत गाये जाते हैं । जब गौरा-गौरी डंड़ैया रानी को लाते हैं गौरा-चौरा में पश्चिम दिशा की ओर मुख रखते हैं और जब भोर का सुकवा निकलता है तो पूरब दिशा में पीढ़ा बदलते हैं।

सुबह सभी गांव के लोग नहा धोकर पुनः इकट्ठा होते हैं और पूरे गांव गौरी गौरा को घूमाते हुए विसर्जन के लिये ले जाते हैं। रात्रि मे सभी फ़िर सभी इकट्ठा होकर प्रसाद तैयार करते हैं और पूरे गांव मे बांटते है। इस तरह गौरा पूजा पूर्ण होती है। गौरा पूजा सार्वजनिक होने के सांथ ही मनौती से भी होती है, जिसका खर्च मनौती रखने वाला करता है। बाकी गांव वाले उन्हे मदद करते हैं। मनौती कोई भी समाज ब्यक्ति रख सकता परंतु पूजा बैगा पद्धति से होती है।

आलेख

श्री राजाराम राजभानू

मल्हार बिलासपुर

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