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महादेव ने जहाँ पत्थर पर डमरु दे मारा : सावन विशेष

बस्तर भूषण को बस्तर का प्रथम प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। इस गंथ के लेखक ने अपने मित्र तहसीलदार द्वारा साझा किया गया एक संस्मरण का उल्लेख करते हुए लिखते हैं- “एक मित्र जो कोण्डागाँव में तहसीलदार थे, मुझसे कहते थे कि बड़ाडोंगर (बस्तर रियासत में दो डोंगर है, अर्थात छोटा डोंगर वो बड़ाडोंगर) में जो बस्तर की पुरानी राजधानी थी, में कई योगी हैं । लोगों को कभी – कभी जंगल में दिखते हैं,परन्तु पहचानना कठिन होता है ।

सन् 1902 में एक मील डोंगर के पश्चिम के पहाड़ जहाँ पर एक उत्तम कुण्ड है, जिसके आसपास बेल के वृक्ष एवं फूल के वृक्ष हैं, और जहां पर शिव जी की मूर्ति है । कार्यवश पहाड के ऊपर गया वहाँ एक मनुष्य को पहाड़ के ऊपर 20-25 हाथ ऊंचे आकाश पर अधर बैठे हुए देखा, वह मनुष्य डर में भरा हुआ आया और यह हाल लोगों से कहने लगा। कई लोग अब भी वर्तमान में है जो ऐसे – ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं । (प .केदार नाथठाकुर, बस्तर भूषण पृ 23)

महादेव डोंगरी जाने की बीहड़ राह

बड़ेडोंगर के पश्चिम दिशा में एक मील दूरी पर कथित पहाडी को महादेव डोंगरी के नाम से जाना जाता है । अंचल में प्रचलित जनश्रुतियों और किंवदंतियों से आज भी पं. केदार नाथ ठाकुर के उक्त कथन की पुष्टि होती है।

जनश्रुति के अनुसार पहले महादेव डोंगरी में ऋषि मुनि निवास करते थे । इस निर्जन और एकांत स्थल पर तपस्या कर अनेक सिद्धियां प्राप्त करते थे, पहाड़ी में एक गड्ढा है, जिसे हवन कुण्ड बताया जाता है । गहराई लिए हुए एक तालाबनुमा स्थान है, कहते हैं कि पूर्व में यहाँ निर्मल जल से भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर था। इसी सरोवर में ऋषि- मुनि स्नान करते थे, बेल वृक्ष पूरी पहाड़ी में आज भी विद्यमान है ।

महादेव डोंगरी के नंदी

पहाडी की चोटी पर शिव जी का विग्रह, शिवलिंग के रूप में विराजमान है। शिवलिंग पहाड़ी के शीर्ष पर एक परतदार चट्टान के मध्य गुफानुमा स्थान में बना हुआ है। यह आकार में बहुत छोटा है तथा प्रकृति निर्मित स्वयं-भू शिवलिंग प्रतीत होता है। किन्तु शिवलिंग के पास ही नंदी की आकर्षक प्रस्तर प्रतिमा है । नन्दी को तराश कर स्थपित किया गया है, इसलिए अनुमान यह भी लगाया जाता है कि शिवलिंग स्वयंभू नहीं होगा बल्कि पत्थर को तरास कर शिवलिंग की आकृति दी गई होगी । तत्पश्चात नन्दी को तराश कर स्थपित किया गया होगा।

पुरातात्विक महत्व के इस शिवलिंग और नंदी की स्थापना कब और किसने की थी ग्रामीणों को इसकी जानकारी नहीं है । आस-पास रियासत कालीन ईट आदि अन्य कोई पुरातात्विक अवशेष नही है । ग्रामीणों का मानना है कि यहां तपस्यारत ऋषि मुनियों के द्वारा ही शिवलिग व नन्दी की स्थापना की गई होगी ।

कुछ वर्ष पहले तक झाड़ियों को हाथों से हटाते हुए पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता था । किन्तु अब शिवलिंग तक पहुँचने के लिए स्थानीय ग्रामीणों एवं पुजारियों द्वारा पहाड़ी में बनाने के लिए झाड़ियों को काट कर रास्ता बनाया गया है । किन्तु यह स्थल अभी भी दुर्गम बना हुआ है। निःशक्त जन चाह कर भी यहाँ तक नहीं पहुंच पाते हैं ।

महादेव डोंगरी के महादेव

कुछ वर्षों से श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को यहाँ पूजा – अर्चना होने लगी है। आस-पास के श्रद्धालु महादेव के दरबार में पहुँचते हैं तथा रामायण पाठ भी करते हैं। निःसन्तान दम्पत्ति सन्तान प्राप्ति के लिए मनौती मानते हैं । भगवान भोलेनाथ उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करते है । पूजा करके चढ़ाया गया फूल और चावल तत्क्षण फिसलकर नीचे गिर जाये तो मनोकामना शीघ्र पूर्ण होगी. ऐसा माना जाता है ।

अनावृष्टि के कारण जब अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो बड़े डोंगर सहित पूरे क्षेत्र भर के लोग गुहार लेकर महादेव के पास जाते हैं और पूजा-अर्चना के साथ अखण्ड रामायण पाठ का आयोजन करते हैं । ग्रामीणों के अनुसार जब भी ऐसा आयोजन हुआ है. पानी अवश्य गिरा है तथा भरपूर फसल हुई है।

किंवदन्ति में इसी स्थान पर महादेव ने अपना डमरू पटका था

पहाड़ी के ऊपर चट्टान पर एक प्राकृतिक जल कुण्ड है । पत्थर में स्थित होने के बावजूद वाष्पीकरण से यहाँ के पानी का न सूखना आश्चर्यजनक है । मई – जून के महीने में भी इस जल कुण्ड में पानी भरा रहता है । जबकि पहाड़ी के नीचे गांव के अनेक तालाब गर्मियों के दिन में सूख जाते हैं ।

किंवदन्ति में बताया जाता है कि देवों के देव महादेव इस पहाड़ी पर विचरण करते हैं इसलिए इस पहाडी को महादेव ड़ोंगरी कहते है। एक बार भगवान महादेव किसी बात से नाराज हो गये थे । क्रोध में आकर उन्होंने डमरू को जोर से पत्थर पर दे मारा, जिससे पत्थर पर गड्ढा बन गया । शिव जी के डमरू पटकने से निर्मित होने के कारण यह गड्ढा अक्षय जल कुण्ड में परिवर्तित हो गया ।

आलेख

घनश्याम सिंह नाग
ग्राम पोस्ट-बहीगाँव जिला कोण्डागाँव छ.ग.

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