Home / विविध (page 10)

विविध

मनुष्य की पहचान उसके अच्छे गुणों से : गुरु नानक देव

कार्तिक पूर्णिमा गुरु नानक जयंती विशेष सिक्ख धर्म के संस्थापक आदि गुरु नानक देव जी मानवीय कल्याण के प्रबल पक्षधर थे। जिन्होंने समकालीन सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक परिस्थितियों की विसंगतियों, विडम्बनाओं, विषमताओं धार्मिक आडम्बरों , कर्मकांडों, अंधविश्वासों तथा जातीय अहंकार के विरुद्ध लोक चेतना जागृत की तथा इसके साथ ही …

Read More »

बागबाहरा कलां की तीन देवियाँ

हमारे देश भारत एवं विदेशों में भी आदि शक्ति जगतजननी मां जगदंबा शक्तिपीठों में विराजमान हैं। जहाँ उन्हें कई नाम एवं कई रूपों में बारहों महीने पूजा जाता हैं और चैत कुंवार के नवरात्रि में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। जहां श्रद्धालु जन भारी संख्या में मनोकामना पूर्ति हेतु …

Read More »

कवर्धा राज का दशहरा उत्सव

हमारा देश सनातन काल से सौर, गाणपत्य, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि पंच धार्मिक परम्पराओं का वाहक रहा है। यहाँ पर्वों एवं त्यौहारों की कोई कमी नहीं है, सप्ताह के प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होते हैं। विक्रम संवत की प्रत्येक तिथियाँ भी अपनी विशिष्टता लिए हुए हैं। …

Read More »

नागरिक निर्माण में शिक्षकों की अकल्पनीय भूमिका

नागरिक निर्माणकर्ताओं को नमन, ‘अध्यापक और अध्यापन’ दोनों में कोई खास असमानता नहीं होती, एक समान ही होते हैं। क्योंकि ये दोनों हर किसी के जीवन का हिस्सा रहे होते हैं। इंसान के जीवन में शुरू से तरक्की-समृद्धि के वास्तविक पथ धारक टीचर ही रहे हैं जिनके जरिए इंसान खुद …

Read More »

विराट भारत का महा संकल्प दिवस : श्रावणी पर्व

भारत की कृषिप्रधान और ऋषि परम्परा की संस्कृति में त्योहारों और पर्व उत्सवों का विशेष महत्वपूर्ण स्थान प्राचीन काल से ही रह है। यहां बाराहोमास ऋतु, तिथि, कर्म, धर्मानुसार पर्व और उपासना का विशेष महत्व रहा है ताकि जीवन मे रंग और उत्स बना रहे यद्यपि कुछ पर्वों के मनाने …

Read More »

नारी पर केन्द्रित बस्तर की महागाथा लछमी जगार

बस्तर अंचल अपनी सांस्कृतिक सम्पन्नता के लिए देश ही नहीं, अपितु विदेशों में भी चर्चित है। क्षेत्र चाहे रुपंकर कला का हो या कि प्रदर्शनकारी कलाओं या फिर मौखिक परम्परा का। प्रकृति के अवदान को कभी न भुलाने वाला बस्तर का जन मूलत: प्रकृति का उपासक है। उसके सभी पर्वों …

Read More »

कहै कबीर मैं पूरा पाया भय राम परसाद : संत कबीर

संत परम्परा के अद्भुत संत सद्गुरू कबीर के जन्म के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं, परन्तु एक चर्चा सर्वमान्य कही जाती है कि काशी में लहरतारा- तालाब पर नीरू तथा नीमा नामक जुलाहा दम्पति को एक नवजात शिशु अनाथ रूप में प्राप्त हो गया। इन दोनों ने ही इस …

Read More »

भोंगापाल के बुद्ध एवं मोहनी माया

लोक मान्यताएं प्रधान होती हैं, लोक ने जिसे जिस रुप में मान लिया, पीढियों तक वही मान्यता चलते रहती है। जिस तरह राजिम के राजिम लोचन मंदिर के मंडप में स्थापित बुद्ध को राजा जगतपाल माना जाता है, तुरतुरिया में केशी वध एवं वृत्तासुर वध के शिल्पांकन को लव और …

Read More »

प्राचीन मंदिरों के मूर्ति शिल्प में उत्कीर्ण आभूषण

स्त्री एवं पुरुष दोनों प्राचीन काल से ही सौंदर्य के प्रति सजग रहे हैं। स्त्री सौंदर्य अभिवृद्धि के लिए सोलह शृंगार की मान्यता संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक चली आ रही है। कवियों ने अपनी कविताओं में नायिका के सोलह शृंगार का प्रमुखता से वर्णन किया है तो शिल्पकार …

Read More »

चैतुरगढ़ की महामाया माई

कलचुरी राजवंश की माता महिषासुरमर्दिनी चैतुरगढ़ में आज महामाया देवी के नाम से पूजनीय है। परंपरागत परिधान से मंदिर में माता अपने परंपरागत परिधान से सुसज्जित हैं, जो 12 भुजी हैं, जो सदैव वस्त्रों से ढके रहते हैं। पूर्वाभिमुख विराजी माता को सूरज की पहली किरण उनके चरण पखारने को …

Read More »