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उत्सवप्रिय छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार

सावन का महीना अपनी हरितिमा और पावनता के कारण सबका मन मोह लेता है। सर्वत्र व्याप्त हरियाली और शिवमय वातावरण अत्यंत अलौकिक एवं दिव्य प्रतीत होता है। लोकजीवन भी इससे अछूता नहीं रहता। छत्तीसगढ़ में चौमासा श्रमशील किसानों के लिए अत्यंत व्यस्तता का समय होता है।

खेती किसानी का कार्य इन चार महीनों में अपने चरम पर होता है, बावजूद इसके उत्सवप्रिय छत्तीसगढ़ तीज त्योहारों के लिए समय निकाल ही लेता है। प्रकृति और ग्रामीण देवी देवताओं को आराध्य मानकर पूजने वाले छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में हरेली पर्व का विशिष्ट महत्व है।यह पर्व प्रकृति पूजन का पर्व है। कृषि औजारों और गौवंश से आत्मीयता दर्शाने का पर्व है।

लोकजीवन में हरेली
हरेली पर्व श्रावण मास के अमावस्या तिथि को समूचे छत्तीसगढ़ में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी रौनक देखते ही बनती है। हरेली पर्व से तीज त्योहारों की शुरुआत होती है। इस दिन किसान, चरवाहे और पशुपालकों के साथ गांव के बइगा गुनिया की व्यस्तता दिन भर बनी रहती है।

खेत में डारा खोंचाई
इस दिन सभी किसान अपने खेतों में जाकर भेलवा नामक पेड़ की डंगाली (शाख) लाकर अपने खेतों में गाड़ते है। मान्यता है कि इससे खेतों में लगी फसल की किट पतंगों और बुरी नजर से रक्षा होती है। इस बीज को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग अलग नाम से जाना जाता है। इसे भिल्लावा या बिम्बा भी कहा जाता है।

भेलवा के बीज को अनिष्ट रक्षक मानकर ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं और छोटे बच्चों को इसकी माला पहनाने का भी चलन देखने में आता है। इस वृक्ष का फल और बीज औषधीय गुणों से भरपूर रहता है। इसके फल काजू के सदृश्य रहता है। जिसमें बीज को निकालकर भूनकर खाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसके बीज को गर्म कर तेल निकालकर इसे औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।

घर घर नीम डार खोंचना
हरेली के दिन गांव का बइगा घर घर जाकर घर के मुख्य द्वार पर नीम डार खोंसते है।माना जाता है कि इससे अनिष्ट निवारण होता है रोगादि से बचाव होता है।विज्ञान भी नीम के रोगनाशक होने की पुष्टि करता है।इस दिन गांव का लोहार घर घर जाकर मुख्य द्वार पर लोहे की कील ठोंकता है और किसानों से भेंट प्राप्त करता है।केंवट जाति के लोग अपने सौंखी(जाल)से छोटे छोटे बच्चों को ढांककर उनके अनिष्ट निवारण और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता है।इस दिन नारियल और चीले का प्रसाद बांटा जाता है।

पशुओं को गेहूं आटे की लोंदी और नमक खिलाना
किसान इस दिन गौठान में जाकर अपने पशुधन को गेहूं के छोटे छोटे पिंड बनाकर खिलाते हैं। साथ ही खम्हार नामक पेड़ के पत्तों में नमक लपेटकर खिलाया जाता है। चरवाहों को सम्मान स्वरूप सेर सीधा और चोंगी माखुर भी किसानों के द्वारा भेंट किया जाता है। चरवाहे इस दिन बड़े बड़े मिट्टी के हंडियों में दसमूल और जंगली प्याज को उबालते हैं और सांहडा़ देव (नंदी) के पूजन पश्चात प्रसाद स्वरूप वितरण करते हैं।

कृषि औजारों की पूजा
हरेली कृषकों का पर्व है। पहले जब मौसम सामान्य हुआ करता था तब श्रावण महीने में बियासी का कार्य पूर्ण हो जाता था। इसके बाद खेतों से हल और कोप्पर को लाकर उसे धोया जाता था। यह एक प्रकार के विराम का प्रतीक था। साथ ही घर में किसानी संबंधित अन्य औजार खांडा़, गैंती, फावड़ा, हंसिया आदि को धोकर उसकी पूजा की जाती है। बच्चों के लिए बांस की गेंड़ी बनाई जाती है। जिसपर चढ़कर बच्चे संतुलन साधना सीखते हैं। पूजा में विशेष रुप से चावल आटे का बना चीला चढ़ाया जाता है। इसके अलावा अन्य स्थानीय पकवान यथा बरा, सोंहारी आदि का भी भोग लगाया जाता है।

तंत्र-मंत्र साधन का पर्व
हरेली अमावस्या को तंत्र साधना के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन मांत्रिक, तांत्रिक और चुड़ैल अपनी शक्तियों को सिद्ध करती है। इसलिए पहले इस त्योहार में थोड़ा दहशत का भी माहौल होता था। लोग रात को निकलने से बचते थे।

घरों में सवनाही चित्रण किया जाता था। रात को महिलाएं घर के मुख्य द्वार के आजू-बाजू गोबर से एक प्रकार की मानव आकृति बनाती है और चावल आटे से तीन लकीर खींचकर चौंक पूरा जाता है। मान्यता है कि इससे अनिष्ट नहीं होता। इस दिन गांव के ओझा बइगा के द्वारा गांव के जिज्ञासु साधकों को तंत्र-मंत्र के शिक्षा देने की शुरुआत होती है। लोक जीवन में प्रचलित कुछ ज्ञान का अगली पीढ़ी में हस्तांतरण आवश्यक है।

टोनही का भय
पहले हरेली पर्व और टोनही का भय एक दूसरे का पर्याय माना जाता था। लेकिन शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के कारण अब ये गुजरे दौर की बात हो गई है। वस्तुत: पहले श्रावण के महीने में दूषित जल और हानिकारक जीवाणुओं के कारण हैजा जैसी महामारी गांव के गांव को लील जाती थी। जिसे लोग टोनही का प्रकोप समझ लेते थे। वर्तमान में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ने के कारण ऐसी घटनाएं यदा कदा ही सुनने को मिलती है। इन घटनाओं के कारण महिलाओं को बहुत अधिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती थी।

इस प्रकार से हरेली हमारे छत्तीसगढ का महत्वपूर्ण त्योहार है। वर्तमान समय में कृषि कार्यों में मशीनों के अत्यधिक प्रयोग और गौवंश पालन में अरुचि के कारण भविष्य में इस पर्व के स्वरूप में बदलाव आने की संभावना दिख रही है।हमें कृषि कार्यों में परंपरागत कृषि औजारों का भी उपयोग करना होगा और गौवंश संवर्धन की दिशा में प्रयास करना होगा तभी हमारा ये लोकपर्व विलुप्तप्राय होने से बच पायेगा।

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