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दक्षिण कोसल की स्थापत्य कला में लक्ष्मी का प्रतिमांकन

प्राचीन काल में भारत में शक्ति उपासना सर्वत्र व्याप्त थी, जिसके प्रमाण हमें अनेक अभिलेखों, मुहरों, मुद्राओं, मंदिर स्थापत्य एवं मूर्तियों में दिखाई देते हैं। शैव धर्म में पार्वती या दुर्गा तथा वैष्णव धर्म में लक्ष्मी के रूप में देवी उपासना का पर्याप्त प्रचार-प्रसार हुआ। लक्ष्मी जी को समृद्धि सौभाग्य और सौन्दर्य का प्रतीक माना जाता है तथा श्री, पद्मा, कमला आदि नामों से उन्हें संबोधित किया जाता है।

महाकाव्यों में श्री, लक्ष्मी से संबंधित विचारधारा का अधिक विकास हुआ जहाँ उन्हें विष्णु की पत्नि माना गया। महाभारत में लक्ष्मी की उत्पत्ति पद्म से बताई गई है, इसी कारण उन्हें पद्मा, पद्मालिनी, पद्माल्या और पद्हस्ता भी कहा गया। शिल्पशास्त्रों में लक्ष्मी को सामान्यतः दिव्यस्वरूपा, सुयोवना और सर्वाभरणभूषिता बताया गया है, साथ ही लक्ष्मी को कभी द्विभुजी, कभी चतुर्भुजी और कभी उससे भी अधिक भुजाओं वाली उल्लेखित किया गया है। उनके हाथों में पद्म, श्रीफल, अमृतघट, बीजपूरक, खेटक, शंख और कौमुदकी के प्रदर्शन का विधान है।

सामान्यतः लक्ष्मी को दो हाथों में पद्म लिए और पद्म पर आसीन और खड़ी निरूपित किया गया है। वाहन के रूप में परिवर्तित ग्रंथों में कहीं-कहीं उलूक का भी उल्लेख है। विष्णुधर्मेत्तरपुराण में अष्टफल कमल से युक्त सिंहासन पर विराजमान लक्ष्मी को चार हाथों में सनालपदम्, अमृतघट, बिल्वफल और शंख लिए हुए वर्णित किया गया है तथा हरि के साथ निरूपित होने पर लक्ष्मी के द्विभुज होने और दोनों करों में पद्म के प्रदर्शन का उल्लेख है।

मत्स्यपुराण में दो गजों द्वारा अभिषिक्त लक्ष्मी के करों में श्रीफल और पद्म का उल्लेख है। रूपमण्डन में लक्ष्मी का अलग-अलग उल्लेख किया गया है। लक्ष्मी के दो उध्र्व करों में पद्म तथा अधकरों में अमृतघट तथा मातुलुंग का उल्लेख है। महालक्ष्मी के ऊपरी हाथों में कौमुदकी, गदा और खेटक तथा नीचे में पात्र और श्रीफल का उल्लेख किया गया. है।        

भारतवर्ष में कुषाणकालीन मथुराकला में, लक्ष्मी मूर्तियों का निर्माण गजलक्ष्मी के रूप में विशेष लोकप्रिय था। गुप्तकाल में लक्ष्मी को राष्ट्रीय देवी के रूप में मान्यता मिली, जो गुप्त शासकों की मुद्राओं और मुहरों पर अनेकशः अंकन से स्पष्ट है। मध्यकाल में गजलक्ष्मी मूर्तियां अधिक व्यापक स्तर पर बनीं जिनमें गजलक्ष्मी स्वरूप के साथ लक्ष्मी-नारायण तथा शेषशायी विष्णु स्वरूपों में भी लक्ष्मी का अंकन किया गया है।

प्रतिमाशास्त्रीय ग्रंथों में गजलक्ष्मी के साथ गणेश और कुबेर की उपस्थिति का संदर्भ प्राप्त नहीं होता है किन्तु महाभारत में गणेश और कुबेर का संबंध लक्ष्मी से स्पष्ट है। इसी कारण लक्ष्मी – गणेश पूजन की परम्परा मान्य है। प्रतिमाओं में देवी सौम्य स्वरूपा और बहुदल कमल पर आसीन, सुन्दर केशसज्जा, मुकुट, कुण्डल, हार, केयूर, मेखला, नुपूर, उत्तरीय तथा धोती से सुसज्जित होती है।

छत्तीसगढ़ में स्थानीय शासकों के राजतव्य काल में अनेक मंदिरों और प्रतिमाओं का निर्माण कराया गया। जिसमें वैष्णव धर्म के अंतर्गत गजलक्ष्मी, लक्ष्मी, श्रुति लक्ष्मी आदि प्रतिमाओं का अंकन छत्तीसगढ़ के शिल्पकला में दृष्टिगोचर होता है। ताला नामक पुरातात्विक स्थल में देवरानी मंदिर के द्वार शाखा के सिरदल में गजलक्ष्मी का अंकन हुआ है। जिसमें लक्ष्मी पद्मासन मुद्रा में बैठी हुई है। जिनके दाएं-बाएं दो गजों के द्वारा लक्ष्मी जी का अभिषेक करते हुए अंकन हैं।

डॉ. कृष्णदेव राय ने इस मंदिर का निर्माण 575 से 600 ईस्वीं के मध्य निर्मित बताया है। सिद्धेश्वर मंदिर पलारी में ईंट निर्मित मंदिर के जंघा भाग में उत्तरी भित्ति के भद्र रथ में गज लक्ष्मी का अंकन हुआ है। लक्ष्मी पद्मासन अवस्था में विराजमान है तथा दोनो ओर से गज अभिषेक करते हुए प्रदर्शित है। यह मंदिर 675 से 700 ईस्वीं के मध्य निर्मित माना गया है। इसी तरह गरियाबंद जिले के अंतर्गत स्थित राजीव लोचन मंदिर के महामण्डप पर स्थित एक स्तंभ पर गजलक्ष्मी का अंकन हुआ है।

यहां स्थित नृसिंह मंदिर के प्रवेश द्वार के ललाट बिंब पर आसनस्थ पद्मासन में बैठी हुई गजलक्ष्मी अंकित है। यह प्रतिमा चतुर्भुजी है, जिसमें दो गजों के द्वारा लक्ष्मी जी का अभिषेक किया जा रहा है। इस शाख के द्वितीय सिरदल के ललाट बिम्ब पर अनंतशायी विष्णु की अत्यंत कलात्मक प्रतिमा का अंकन हुआ है। चतुर्भुजी विष्णु अनंतशैय्या पर योगनिद्रा में लीन बताए गए है जिसमें उनके चरण दबाते हुए लक्ष्मी का मनोरम अंकन हुआ है। इस मंदिर का निर्माण सातवीं – आठवीं शताब्दी ईस्वीं माना गया है।

जिला बलौदाबाजार के अंतर्गत ग्राम तरेंगा में स्थित एक प्राचीन मंदिर की भित्ति में गजलक्ष्मी की प्रतिमा जड़ी हुई है। यह द्विभुजी प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में स्थित है। जिसमें देवी का दायां हाथ पालती पर रखा है तथा बाएं हाथ से घट धारण किए हुए हैं। सिरो भाग में प्रभामण्डल, कर्ण कुण्डल, स्तनहार, बाजूबंद तथा हाथों में कंगन पहने हुए दृष्टव्य है। लक्ष्मी के सिरो भाग में दो गज आमने-सामने खड़े होकर घट से जलाभिषेक करते हुए प्रदर्शित है।

गजों के दोनो तरफ चवर्ण धारिणी खड़ी प्रदर्शित है। इस प्रतिमा का काल विद्वानों ने आठवी-नवमी शताब्दी ई्स्वीं माना है। सरगुजा जिले के डीपाडीह स्थित सामतसरना मंदिर  समूह में शिव मंदिर की द्वार शाखा के सिरदल के ललाटबिम्ब पर पद्मासन में बैठी हुई द्विभुजी गजलक्ष्मी प्रदर्शित है। जिसके दोनों हाथों में सनाल, कमल पुष्प स्थित है। इसके दोनो ओर कमल पर खड़े हुए दोनों गज लक्ष्मी का अभिषेक करते हुए प्रदर्शित है। गजलक्ष्मी के दोनो ओर मालाधारी विद्याधर युगलों का अंकन है। डॉ. विवेक दत्त झा ने गजलक्ष्मी की इस प्रतिमा को चतुर्भुजी माना है। यह प्रतिमा नवमी सदी ईस्वीं में निर्मित है।

महेशपुर में कुरियाझुरकी मंदिर समूह से नवमी-दसवी शताब्दी ईस्वीं की श्रुति लक्ष्मी की प्रतिमा प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा द्विभुजी है जो कि पद्मपीठ पर पद्मासन अवस्था में स्थित है। इनके सिरो भाग पर दो गज अपने सूंड़ो से कुम्भ पकड़े देवी का जलाभिषेक कर रहे हैं। आसनस्थ अवस्था में विराजमान देवी के बाएं हाथ में सनाल पद्म स्थित है तथा दायां हाथ पुस्तक सहित वरद मुद्रा में अंकित है। नीचे दाएं ओर एक मानव का स्थानक रूप में अंकन हुआ है तथा बाईं ओर वानरमुखी आकृति अंकित है।

शिल्पशास्त्री लक्षणों के अनुसार इस प्रतिमा को गजाभिषेकित लक्ष्मी कहा गया है परन्तु श्री जी.एल. रायकवाड़ ने इस प्रतिमा को श्रुति लक्ष्मी के रूप में वर्णित किया है। उनके अनुसार दायां हाथ जो कि पुस्तक सहित वरदमुद्रा में स्थित है और वानरमुखी पुरूषाकृति के संदर्भ में श्रीमद् भागवद् के द्वादश स्कंध, अध्याय -3 के विवरणों के अनुसार इस प्रतिमा का वास्तविक अभिज्ञान श्रुति लक्ष्मी के रूप में प्राप्त होता है।

कुरियाझुरकी मंदिर समूह में नवमी-दसवी शताब्दी ईस्वी की स्थानक विष्णु की एक प्रतिमा प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा चतुर्भुजी है। इस प्रतिमा के चारों ओर दशावतार का अंकन हुआ है। विष्णु के पादपीठ के मध्य में लक्ष्मी का अंकन दिखाई देता है तथा उसके दोनो किनारों पर तीन-तीन उपासिकाएं अंजली में पद्म धारण किए हुए प्रदर्शित है। 

सिरपुर उत्खनन में हरिहर मंदिर के परिषर में उत्खनन के दौरान् एक गजलक्ष्मी युक्त सिरदल प्राप्त हुआ है। जिसमें गजलक्ष्मी की क्षरित प्रतिमा उत्कीर्ण है। रायपुर जिले के अंतर्गत चन्दखुरी नामक पुरास्थल पर भी निर्मित मंदिर में ललाट बिम्ब में सोमवंशी कालीन निर्मित गजलक्ष्मी का अंकन हुआ है। इसमें लक्ष्मी पद्मासनस्थ है तथा दोंनो तरफ से एक-एक गज सूड़ से जलाभिषेक करते हुए प्रदर्शित है। साथ ही गज के पीछे तरफ भी एक-एक गज पीछे की ओर मुड़ कर घट पकड़े हुए प्रदर्शित है। इस मंदिर का निर्माण दसवीं – ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वीं में हुआ था। खरोद स्थित लक्ष्मणेश्वर मंदिर में त्रिविक्रम अवतार (वामन) प्रतिमा में ऊपर की ओर लक्ष्मी जी हाथ जोड़े हुए अंकित है।

इसी तरह महेशपुर में उत्खनन के दौरान् कुरियाझुरकी नामक टीले से गजलक्ष्मी की एक पृथक प्रतिमा प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा द्विभुजी है। देवी का दाहिना हाथ वरद मुद्रा में है और बाएं हाथ में सनाल पद्म स्थित है, देवी कमलासन पर पद्मासन अवस्था में बैठी हुई प्रदर्शित है। उनके सिर के उभय पाश्र्व में दो गज खड़े हुए अपने सूंड़ से घट को पकड़े हुए, घट का जल देवी के सिर पर उड़ेलते हुए जलाभिषेक कर रहे हैं। इस प्रतिमा का काल दसवी-ग्यारहवी शताब्दी ईस्वीं माना गया है।

बस्तर ग्राम में स्थित देवी मंदिर के ललाट बिम्ब पर दोहरे पद्म पर चतुर्भुजी लक्ष्मी जी पद्मासन अवस्था में अयवस्थित है। जिसमें गज कमल पुष्पों पर खड़े हुए, देवी का अभिषेक करते दिखाई दे रहे है। देवी लक्ष्मी के ऊपरी हाथों में सनाल कमल तथा निचला बायां हाथ अभय मुद्रा में तथा चैथा हाथ खण्डित है। यह प्रतिमा ग्यारहवी सदी ईस्वीं में निर्मित बताई गई है। इसी तरह की एक प्रतिमा महेशपुर के ताराकृति शिव मंदिर परिसर में रखे प्रस्तर स्तंभ पर भी उत्कीर्ण है जिसमें गजलक्ष्मी के नीचे वानर का अंकन हुआ है। गज अपने पिछले दो पैरों से खड़े हुए प्रदर्शित है। इसी स्तंभ के दूसरी सतह पर कुबेर तथा उसके नीचे मूषक का अंकन है। इस प्रतिमा का काल ग्यारहवीं – बारहवीं शताब्दी ईस्वीं माना गया है।

किरारी गोढ़ी में स्थित शिव मंदिर के अधीष्ठान भाग में पांचवे थर के मध्य में अगल-बगल दो-दो गजों के मध्य पद्मासनस्थ लक्ष्मी का स्पष्ट अंकन हुआ है। जिसमें लक्ष्मी के दोनो ओर गज सूड़ से घट पकड़कर अभिषेक कर रहे हैं। सीतादेवी मंदिर, देवरबीजा जिला दुर्ग के मंदिर के जंघा भाग के आलिंद में भी गजलक्ष्मी का अंकन है। उपर्युक्त सभी मंदिर लगभग ग्यारहवी-बारहवी सदी ई्स्वीं में निर्मित प्रतीत होते है। बस्तर जिला के नारायणपाल मे स्थित नारायण मंदिर के गर्भगृह की द्वारशाखा के सिरदल में बाएं कोने में द्विभुजी गजलक्ष्मी का अंकन हुआ है जो बारहवीं शदी ईसवी में निर्मित प्रतीत होती है। दन्तेवाड़ा में स्थित दन्तेश्वरी मंदिर के गर्भगृह में ललाटबिम्ब पर गजलक्ष्मी की आकृति उकेरी गई है। लक्ष्मी पद्मासन अवस्था में विराजमान है तथा दोनो तरफ से गज जलाभिषेक करते हुए प्रदर्शित हैं।

जांजगीर-चांपा जिले में जांजगीर स्थित विष्णु मंदिर की द्वार शाखा के सिरदल के मध्य में भी चतुर्भुजी गजलक्ष्मी का अंकन हुआ है जो बारहवी शताब्दी ईस्वी में निर्मित है। इसी प्रकार बिलासपुर जिले में स्थित गनियारी नामक पुरातात्विक स्थल पर शिव मंदिर स्थित है। इस मंदिर के सिरदल मे भी गजलक्ष्मी का अंकन हुआ है। यह लक्ष्मी पद्मासन अवस्था में विराजमान है तथा दोनो ऊपरी हाथ में गज को ऊपर उठाए हुए है एवं निचले दोनो हाथ पालथी में रखे हुए हैं। गण्डई स्थित शिव मंदिर के सिरदल के मध्य में चतुर्भुजी लक्ष्मी का अंकन हुआ हैं इसका काल तेरहवी शताब्दी ईस्वीं माना गया है।

कबीरधाम जिला के ग्राम चैरा में ईंट निर्मित मंदिर छेरकी महल की द्वार शाखा के सिरदल के मध्य में चतुर्भुजी आसनस्थ लक्ष्मी का अंकन हुआ है। सिरदल के बाएं कोने पर चतुर्भुजी गणेश बैठे हुए प्रदर्शित है। यह मंदिर चैदहवी सदी ईस्वीं के उत्तरार्द्ध में फणी नागवंशी शासकों के द्वारा निर्मित कराया गया संभावित है। इसी तरह सोहलहवी शदी ईस्वीं में निर्मित रायपुर जिला के दुधाधारी मठ परिसर में स्थापित रघुनाथ मंदिर के द्वार शाखा के ललाट बिम्ब में गजलक्ष्मी का अंकन हुआ है। इसी के समतुल्य राजिम स्थित मराठा कालीन, लक्ष्मीनारायण मंदिर के सिरदल में गजलक्ष्मी का अंकन हुआ है।

चूंकि लक्ष्मी धन और ऐश्वर्य की देवी मानी गई है। भारतीय संस्कृति के अंतर्गत आने वाले अनेक पर्व में लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व रहा है। मानव जीवन में प्रत्येक व्यक्ति की सर्वदा यही अभिलाषा रहती है कि उसका घर मां लक्ष्मी की कृपा से हमेशा धन-धान्य से परिपूर्ण रहे।

वैष्णव और शाक्त धर्म के अंतर्गत देवी लक्ष्मी सदैव पूज्यनीय रही है यही कारण रहा है कि भारतीय स्थापत्य कला में लक्ष्मी प्रतिमा का अनवरत् विकासक्रम दिखाई देता है। जिसका प्रभाव छत्तीसगढ़ पर भी परिलक्षित हुआ है। पांचवी शताब्दी ईस्वीं से लेकर सोलहवीं शताब्दी ईस्वीं तक लक्ष्मी का प्रतिमांकन यहां के राजत्व काल में लक्ष्मी देवी की लोकप्रियता का परिचय कराता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी छत्तीसगढ़ के धार्मिक मान्यताओं के अंतर्गत लक्ष्मी पूजा का विशेष विधान है।

आलेख

कु0 शुभ्रा रजक (शोध छात्रा) पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

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