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देऊर मंदिर मल्हार, जिला बिलासपुर

छत्तीसगढ़ के कलचुरीकालीन अभिलेखों के परिप्रेक्ष्य में स्थापत्य एवं मूर्तिकला

इतिहास का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि अभिलेख उत्कीर्ण कराने के उद्येश्यों में प्रमुख स्थान धार्मिक निर्माण एवं दान तथा अनुदान का रहा है और संपूर्ण भारतवर्ष से अब तक प्राप्त लगभग पचास प्रतिशत से अधिक अभिलेख जो विभिन्न शासकों, व्यक्तियों एवं संस्थाओं द्वारा जारी किये गये है, वे किसी न किसी धार्मिक अनुष्ठानों एवं दान तथा निर्माण से संबंधित है। इनमें मंदिर, देवालय, देवस्थान, देवगृह का निर्माण तथा उसका संरक्षण एवं रखरखाव और पुर्ननिर्माण के उपलक्ष्य में अभिलेख जारी करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।

अभिलेखों में यह भी उल्लेख किया गया है कि भविष्य में आने वाले शासक भी इसका अनुपालन करे, उन्हें भी उतना ही पुण्य लाभ होगा जितना की निर्माणकर्ता को था। इसी धारणा के कारण मंदिरों का निर्माण एवं संरक्षण का कार्य अबाधित हुआ और कालक्रमानुसार विभिन्न धर्मो के अनुयायियों द्वारा मंदिर निर्माण का अनवरत क्रम चलता रहा। जिसके साक्ष्य ये पुरावशेष है।

भांड देवल मंदिर, आरंग, जिला रायपुर (फ़ोटो-ललित शर्मा)

भारतवर्ष के अन्य क्षेत्रों के समान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में भी वास्तुकला एवं कला के विकास में भारतीय दर्शन का प्रभाव परिलक्षित होता है। जैसा कि पुराणों1 से ज्ञात होता है कि वापी, कुंआ, तालाब और मंदिर का निर्माण एवं बाग-बगीचा लगवाने को परोपकार एवं लोकहित कार्यो के अंतर्गत माना गया है। शिल्प शास्त्र में पारंगत वास्तुकारों द्वारा मूर्तियों के साथ ही भव्य एवं विशाल मंदिरों का निर्माण किया गया था, जिसकी जानकारी अभिलेखों से प्राप्त होती है।

जिस प्रकार मानव शरीर में आत्मा का वास होता है उसी प्रकार मंदिर में प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। ईश्वर अथवा देवता की उपासना के लिए मंदिरों का निर्माण उनकी प्रतिमाओं के आवास के रूप में ही हुआ होगा। इस प्रकार कला के अनेक रूपों में मूर्तिकला मानव सौन्दर्य बोध के अभिव्यक्तिकरण के लिए एक शसक्त माध्यम होने के कारण ही उसके सांस्कृतिक विचारों तथा भावनाओं के अर्थ को समझाने में भी सहयोगी रही हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में छत्तीसगढ़ की स्थापत्य एवं मूर्तिकला की जानकारी का संज्ञान हमें कलचुरी कालीन अभिलेखों के माध्यम से प्राप्त होता है।
छत्तीसगढ़ क्षेत्र के प्राचीन ऐतिहासिक अनुक्रम में दसवीं शताब्दी ई. में उदय होने वाले कलचुरी राजवंश का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस वंश के शासकों के प्रत्यक्ष अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत इस क्षेत्र का बहुत बड़ा भू-भाग लगभग पांच सौ वर्षों तक रहा तथा इनके लंबे एवं गौरवशाली इतिहास के साक्ष्य इस वंश के विभिन्न शासकों द्वारा दान एवं निर्माण के उपलक्ष्य में जारी किये गये विविध शिलालेख एवं ताम्रपत्र है।

शिवालय भोरमदेव – कवर्धा (फ़ोटो-ललित शर्मा)

इन अभिलेखिय साक्ष्यों में मिलने वाले विवरणों का अध्ययन एवं अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि कलचुरी शासकों का राजत्व काल राजनितिक इतिहास की दृष्टि से ही नही अपितु स्थापत्य एवं शिल्प के दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध रहा है तथा इनके शासकों, राजपरिवार के सदस्यों, अधिकारियों एवं प्रजा द्वारा भी कला को उदार संरक्षण प्राप्त हुआ।

लोकहितकारी कार्यो के रूप में कुआं, कूप-वापी, तड़ाग, मठ, मंदिर एवं दुर्ग आदि का निर्माण किया गया था, इसके साथ ही पुष्पोद्ययान एवं आम्रवाटिका लगाकर के नगरों एवं ग्रामों को सुसज्जित करने का वर्णन इनके अभिलेखिय साक्ष्यों से ज्ञात होता है। इस वंश के विभिन्न शासको द्वारा जारी अब तक प्राप्त अधिकांश लेखों की प्रकृति धार्मिक या धर्म संबंधि निर्माण या दान से संबंधित होने के कारण, स्थापत्य एवं कला के संबंध में महत्वपूर्ण सूचनाएं प्रदान करती है। जिनका तत्कालीन कला परंपरा के साथ विश्लेषणात्मक अध्ययन करने पर इस क्षेत्र के शिल्प एवं स्थापत्य के आंतरिक एवं बाह्य स्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है।

कलचुरीकालीन अभिलेखों से जानकारी प्राप्त होती है कि इस वंश के अधिकांश शासक शैव धर्मानुयायी रहे है किन्तु उनके संरक्षण में वैष्णव, शाक्त, एवं बौद्ध तथा जैन धर्मों को भी उदार संरंक्षण प्राप्त हुआ है। इसके ही परिणामस्वरूप तुम्माण, रत्नपुर, जाजल्लपुर, खल्लवाटिका, राजिम, रायपुर, डीपाडीह, चंद्रखुरी, मल्हार, घटीयारी, सिरपुर, नारायणपुर, भोरमदेव, देवरबीजा, गंडई, खरौद, देवबालौद जैसे अनेक स्थानों में देवालय कूप, वापी, मठ, मंदिर आदि निर्माण कराये गये। जिनमें कलचुरीकालीन कला के उन्नत स्वरूप का संरचनात्मक विविधता एवं कलात्मक विशेषता ज्ञात होती है।

कंठी देवल मंदिर, रतनपुर जिला बिलासपुर (फ़ोटो-ललित शर्मा)

इस काल के स्थापत्य संरचना संबंधि विवरणों का उल्लेख करते हुए अभिलेखिय साक्ष्यों में कहा गया है, कि मंदिर निर्माण के लिए प्रस्तर के साथ-साथ ईष्टिका, स्वर्ण एवं काष्ठ आदि का प्रयोग किया जाता था। इसी प्रकार आकृति के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है कि उस काल में अनेक पंचायतन एवं उत्तुंग देवालय बनाये गये है।

कलचुरि काल के पूर्व ही भारत में मंदिर एवं मूर्ति निर्माण की एक लंबी परम्परा रही है अतः कलचुरि काल भी स्थापत्य एवं शिल्प की दृष्टि से समृद्ध था। तात्कालीन अभिलेखां में मंदिरों एवं मूर्तियों के निर्माण की अनेक स्थानों पर चर्चा प्राप्त होती है। जिससे उनके निर्माणकर्ताओं के साथ ही उन विशेष देवताओं की भी जानकारी प्राप्त होती है, जिनके सम्मान एवं भक्ति के फलस्वरूप ही अनेक मंदिरों एवं मूर्तियों का निर्माण किया गया।

जाजल्लदेव प्रथम के रतनपुर प्रस्तर अभिलेख (कलचुरि संवत् 866)2 में रत्नराज (रत्नदेव प्रथम) द्वारा श्रीवंकेशसुरालयप्रभृतयोररत्नेश्वराद्यास्तदा यत्रोद्यानमसंख्यपुष्पसुफलं चारूच्चमामंरवनम् अर्थात् तुम्माण में वंकेश और रत्नेश आदि मंदिरों का निर्माण कराये जाने, मंदिर, उद्यान, आम्रवन एवं अन्य विशाल इमारतों से नगर की शोभा बढ़ाई जाने का उल्लेख किया गया है। साथ ही अपने नाम से रतनपुर नामक नगर की स्थापना कर बहुत से मंदिरों का निर्माण कर उसे अलंकृत किये जाने का वर्णन प्राप्त होता है।

शिवालय पाली, जिला कोरबा (फ़ोटो-ललित शर्मा)

जाजल्लदेव प्रथम के द्वारा ही पाली के शिव मंदिर का जीर्णाद्धार करवाया गया था। कलचुरि युग में सूर्य पुत्र रेवन्त की भी पूजा की जाती थी। इसी क्रम में द्वितीय रत्नदेव के अकलतरा प्रस्तर अभिलेख3 में रेवन्तमन्दिरमिषान्नयनोपभोग्यं भक्त्योपचारचतुरेण यशोधनेन वाक्य से रेवन्त के मंदिर निर्माण का वर्णन मिलता है, एवं पृथ्वीदेव द्वितीय के रतनपुर प्रस्तर अभिलेख4 में उल्लेखित है कि उनके एक सामंत वल्लभराज द्वारा विपुल जलपूर्ण्ण सरोवरं सप्राकारानेकप्रासादमठोपेतमारामोद्यानं च तथा रेवन्तमूर्ति देवकुलं तथा …………….. अर्थात् इस श्लोक के अनुसार विकर्णपुर में देवमंदिरों, मठों, उद्यानों और सरोवरों के निर्माण के साथ ही रेवन्त के मंदिर एवं उनकी मूर्ति की स्थापना करवायी गयी थी, इसके साथ ही जनहित में आम्रवाटिका एवं सोपान युक्त कुंआ खुदवाया गया था।

पृथ्वीदेव द्वितीय कालीन कोनी प्रस्तर लेख5 के अनुसार उनके सर्वाधिकारिन पुरूषोत्तम द्वारा रत्नपुर में गम्भीरं बहुसत्त्त्वं निर्म्मलमति शोभनं जनैः सेत्यम्, हृदयमिव स्वकमकरोद् रत्नपुरे सागरं यश्च। इदमपि पंचायतनं कमलादपि तस्य कारितं तेन, यच्चक्रे निजरू पैरवनितले द्वारकाद्वैतम शब्दों का उल्लेख मिलता है जिसके अनुसार गहरा और निर्मल जल वाला तालाब तथा पंचायतन शैली में शिव का सुंदर मंदिर का निर्माण करवाया गया था। संभवतः चारों ओर से जल से घिरे होने के कारण यह शिव मंदिर द्वारिकापुरी की तरह सुशोभित होता था।

इस प्रकार कलचुरि कालीन पंचायतन शैली के निर्माण से संबंधित मंदिर के अभी तक केवल दो ही अभिलेखीय साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इस अभिलेख में शिव के ताण्डव नृत्य की भी चर्चा की गई है। गोपालदेव के पुजरीपाली प्रस्तर अभिलेख6 से ज्ञात होता है कि स्थाने स्थाने हयारूढो रेवन्तइव दृश्यते अर्थात् छत्तीसगढ़ (प्राचीन दक्षिण कोसल) में अनेक स्थानों पर अश्वारूढ़ रेवन्त की मूर्तियां स्थापित थी।

राजीव लोचन मंदिर, राजिम, जिला गरियाबंद (फ़ोटो-ललित शर्मा)

पृथ्वीदेव द्वितीय के रतनपुर प्रस्तर अभिलेख (कलचुरी संवत् 915)7 से पता चलता है कि चक्रे देवगणोधाम बिल्वपाणि पिनाकिनः, सांबाग्रामे तुषाराद्रिशिखराभोगभासुरम् जिसके अनुसार ग्राम साम्बा में हिमालय की भांति ऊँचा और सुंदर बिल्वपाणि नामक शिव मंदिर का निर्माण हुआ था।

रतनपुर प्रस्तर अभिलेख में अनेक मंदिरों एवं विभिन्न सुंदर एवं कमल युक्त सरोवरों के निर्माण का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार पृथ्वीदेव द्वितीय ने मल्लालेऽस्मिन् लवलधवलं धूर्जटेर्ध्दाम चक्रे अर्थात् मल्हार में धूर्जटि शिव का मंदिर बनवाया था8। इसमें पुनः दशभवनवराणि त्रयम्बकस्येंदुरोचिर्विकचकुमुदकुन्दस्फाटिकाद्रि अर्थात् कैलाश की भांति विशाल एवं सुंदर त्रैयम्बक् भगवान शिव के 10 मंदिरों के निर्माण का उल्लेख मिलता है।9 इसके पश्चात् सुधांशु धवलं तत्र धूर्जटेर्धाम निर्म्मितम्, नारायणपुरे तेन पताकोल्लिखिताम्बरम् का उल्लेख है जिसमें बरेलापुर में चंद्रमा की भांति धवल (सफेद एवं सुंदर) श्रीकंठ भगवान शिव के मंदिर निर्माण की जानकारी प्राप्त होती है एवं नारायणपुर में धूर्जटि शिव मंदिर के निर्माण करवाने का वर्णन है10 तथा निर्मितं मन्दिरं रम्यं कुमराकोटपत्तने, तेनैवान्यं यशोराशि प्रकाशं पार्व्वतीपतेः अर्थात् कुमराकोटपत्तन में पार्वतीपति शिव के मंदिर के निर्माण तथा इसके साथ ही जनकल्याण के उद्देश्य से आम्रवाटिका एवं सोपानयुक्त कुआं का निर्माण कराये जाने कि जानकारी भी इस अभिलेख से ज्ञात होती है।11

कलचुरि काल में पृथ्वीदेव द्वितीय का यह रतनपुर प्रस्तर अभिलेख तात्कालीन वास्तुशास्त्र की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जिसमें दो धूर्जटी शिव मंदिर, दस त्र्यंबक शिव मंदिर, एक श्रीकंठ मंदिर, तथा पार्वती के नौ मंदिरों के निर्माण की चर्चा की गई है, साथ ही एक आम्रवाटिका, एक कुंआ तथा सात सरोवरों के निर्माण की जानकारी प्राप्त होती है।

पृथ्वीदेव द्वितीय कालीन राजिम प्रस्तर अभिलेख12 में ईदृशः च भवेत्पुंसो जगपालोपि सुन्दरं। रामशोभाप्रकाशाय प्रासादं कारितवानिमम् का उल्लेख मिलता है जिसमें जगपाल द्वारा राम-मंदिर के बनाये जाने का वर्णन है। जगपाल द्वारा वैष्णव मंदिर के जीर्णोद्धार की जानकारी भी इस अभिलेख से ज्ञात होती है।

महामाया मंदिर रतनपुर, जिला बिलासपुर (फ़ोटो-ललित शर्मा)

कलचुरि काल में हमें रामायण एवं पौराणिक कथाओं का दृश्यांकन पत्थरों पर देखने को मिलता है, जिसमें जांजगीर एवं खरौद के मंदिरों में उत्कीर्ण सीता, राम और लक्ष्मण का वनगमन, बालिवध, रावण द्वारा सीता-हरण, राम द्वारा ताल वृक्षों का भेदन, सेतुबंध, तथा राम-रावण युद्ध आदि उल्लेखनीय हैं।

इसी तरह कलचुरीकालीन अभिलेखीय क्रम में जाजल्लदेव द्वितीय के शिवरीनारायण अभिलेख13 में छीतूकेनेयमुत्कीर्णा शिल्पविज्ञान शालिना अर्थात् छीतूक को शिल्पशास्त्र का ज्ञाता बताया गया है। इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि अकारि सोठिठवपुरे शम्भोरभृंकषं सदः, सरोपि स्फारमारामः सर्व्वदेवेन सुन्दरः इसका तात्पर्य यह है कि सर्वदेव ने सोण्ठिवपुर में बादलों को छूने वाला भगवान शम्भु का मंदिर तथा सरोवर बनवाया था।14

इस अभिलेख में चन्द्रचूड़ भगवान शिव के मंदिर का भी वर्णन किया गया है, जो संभवतः जाजल्लदेव द्वितीय के काल में अथवा पूर्ववर्ती शासकों के समय निर्मित हुआ होगा। विकन्नदेव द्वारा देवस्याग्रे समुत्तुग्ड़ं दुर्गाप्रासादमुज्जवलम्, विकन्नदेवेनाकारि मनोवा´छत सिद्धये अर्थात् चंद्रचूड़ मंदिर के सामने दुर्गा मंदिर बनवाये जाने की जानकारी भी इस अभिलेख से प्राप्त होती है।15

रत्नदेव तृतीय के खरोद प्रस्तर अभिलेख16 से पता चलता है कि गंगाधर ने मण्डपं वानवऽदे पुरारातेर्विनिर्मितम्। हरहेरम्बयोश्चक्रे तत्रैव विशदालयौ का उल्लेख किया है जिसके अनुसार वड़देपुर के वन में शिव के मण्डप का निर्माण करवाया था तथा इस अभिलेख में शिव एवं गणपति के दो विशाल मंदिर के निर्माण की चर्चा की गई है। आगे इसी अभिलेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार गंगाधर ने पोरथे भवनं शम्भोरभ्रंकषमचीकरत् अर्थात् पोरथ में भी भगवान शम्भु का बादलों को छूने वाला मंदिर का निर्माण करवाया था। जिसका तात्पर्य बहुत ऊंचे मंदिर के निर्माण करवाये जाने से था।17

रत्नपुरस्योदीच्यां दिशि ट्रंटागणपतेरसौ चक्रे। मण्डपमषेष वांच्छितफलदातुंर्विघ्नहन्तुश्च अर्थात् रतनपुर के उत्तर दिशा में वांछित फल देने वाले एवं विघ्न को दूर करने वाले टूंटागणपति का मण्डप बनवाने का वर्णन प्राप्त होता है18 तथा निश्चित ही इन गणेश मंदिरों में मुख्य देव के रूप में गणेश की प्रतिमा स्थापित रही होगी जिसकी जानकारी इस अभिलेख के माध्यम से होती है।

प्राचीन मंदिर देवरबीजा – (फ़ोटो-ललित शर्मा)

रत्नदेव द्वितीय के मंत्री गंगाधर द्वारा देवीदुर्ग्गागृहं दुर्ग्गे रवेः पहपकेपुर अर्थात् दुर्ग में दुर्गा मंदिर का निर्माण करवाया गया था, जिसकी जानकारी इस अभिलेख में दी गई है।19 रत्नदेव तृतीय के खरौद ताम्रपत्र20 लेख में भी उल्लेख है कि कारितं विस्तृतं सौरीमण्डपं पुण्यकारिणा। गंगाधरेण धरणेर्ल्ललामेवाति सुन्दरम् अर्थात् गंगाधर द्वारा विष्णु के अति सुंदर और विस्तृत मण्डप बनवाये जाने का वर्णन है, इससे पता चलता है कि वहा पूर्व में विष्णु मंदिर रहा होगा, जिसके साथ गंगाधर ने अलग से मण्डप का निर्माण कराकर विष्णु मंदिर का विस्तार किया होगा।

इस अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि गंगाधर ने पहपक नामक स्थान में सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। जिसमें मुख्य देवता के रूप में सूर्य की मूर्ति स्थापित रही होगी। रत्नदेव के खरौद प्रस्तर अभिलेख के अनुसार शिवमंदिर के दक्षिण भाग में तपस्वियों के निवास के लिए काष्ठ-भवन निर्मित किया गया था। वाहर के रतनपुर प्रस्तर अभिलेख में सूत्रधार छीतकू को काष्ठ, पाषाण, स्वर्ण, यन्त्रविद्या, महाविद्या, वंक, त्रिवंक, वादन, लता-वल्लरी, त्रिताल और सप्तताल आदि कलाओं में पारंगत बताया गया है,21 अर्थात् इस युग में लोग काष्ठ, पाषाण, एवं स्वर्ण के शिल्प निर्माण में निपुण थे।

हरिब्रह्मदेव का खल्लारी प्रस्तर अभिलेख (विक्रम संवंत् 1470)22 में मंदिर को ’’आयतन‘‘ कहा गया है। इस प्रस्तर अभिलेख से ज्ञात होता है कि नारायणस्यायतनं स्वश्क्त्या भक्त्या महत्या सह मंडपेन। निर्म्मापितं तेन परत्र चात्र तस्मै हरिर्यच्छतु वांछितार्थम् अर्थात् मोची देवपाल ने खल्लवाटिका ग्राम में, मण्डप के साथ नारायण के मंदिर का निर्माण कराया था, जिससे ज्ञात होता है कि कलचुरि काल में लक्ष्मीनारायण की मूर्तियाँ निर्मित हो रही थी।

शिव मंदिर सहसपुर, (फ़ोटो – ललित शर्मा)

इसी क्रम में शैव स्थापत्य के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि ब्रह्मदेव कालीन रायपुर प्रस्तर अभिलेख (विक्रम संवंत् 1458)23 के अनुसार हाजिराजस्य कीर्त्यर्थं हटकेश्वरस्य कीर्तनम्। अद्भूतो न श्रुतं केन प्रसादं जलपंत्यवौ अर्थात् हरिराज ने रायपुर में अद्भूत हाटकेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया था। जो मंदिर निर्माण शैली और अपनी विशालता के कारण भव्य एवं अतुलनीय रहा होगा।

इस प्रकार पूर्व मध्यकाल में छत्तीसगढ़ से प्राप्त कलचुरीकालीन अभिलेखों में वर्णित स्थापत्य एवं मूर्तिकला, कला के विविध आयामों को प्रदर्शित करती है। यद्यपि कला के अधिकांश विषयों का प्रयोजन धार्मिक रहा है। परंतु ये कलाकृतियां कलचुरीकालीन समृद्ध अर्थव्यवस्था एवं सुदृढ़ राजनीतिक स्थिति तथा उन्नत सामाजिक सद्भाव का परिचायक है। स्थापत्य एवं कला की ये संरचना प्राचीन छत्तीसगढ़ के इतिहास की अनुपम निधि है।

संदर्भ ग्रंथ –

मार्कण्डेय पुराण,(16.124), नाग पब्लिशर्स, दिल्ली.
जैन, बालचन्द्र, उत्कीर्ण लेख, पृ. क्र, पृ. 145.

आलेख

कु. शुभ्रा रजक (शोधछात्रा)
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)




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