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कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ का एक गढ़ : मोंहदीगढ़

विद्वानों का मत है कि मध्यकाल में कलचुरीकालीन छत्तीसगढ़ों को लेकर छत्तीसगढ़ का नामकरण हुआ। ये गढ़ कलचुरी शासन काल में प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाई थे। कालांतर में कलचुरी दो शाखाओं में विभक्त हुए, शिवनाथ नदी के उत्तर में रतनपुर शाखा एवं दक्षिण में रायपुर शाखा का निर्माण हुआ।

मोंहदीगढ़ से विहंगम दृश्य

ये गढ़ इस प्रकार हैं – रतनपुर के १८ गढ़ : रतनपुर, उपरोड़ा, मारो, विजयपुर, खरौद, कोटगढ़, नवागढ़, सोढ़ी, ओखर, पडरभट्ठा, सेमरिया, मदनपुर, कोसगई, करकट्टी, लाफा, केंदा, मातीन, पेण्ड्रा एवं रायपुर के १८ गढ़ : रायपुर, पाटन, सिमगा, सिंगारपुर, लवन, अमेरा, दुर्ग, सारधा, सिरसा, मोंहदी, खल्लारी, सिरपुर, फिंगेश्वर, सुवरमाल, राजिम, सिंगारगढ़, टेंगनागढ़, अकलवाड़ा।

समय ने करवट ली और कलचुरी राज का पतन हो गया। मराठों ने रायपुर शाखा के अंतिम शासक अमरसिंह की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र शिवराज सिंह को पांच गाँव (बड़गांव, मुढेना, भलेसर, गोईंदा, नांदगाँव) माफ़ी के देकर एवं पुर्वजों के प्रत्येक गांव से एक रुपया खर्च देकर इनका अधिकार समाप्त कर दिया।

मोंहदीगढ़ की सुरंग

वर्तमान में इन कलचुरियों के वंशज महासमुंद जिले के इन पांच गांवों में निवास करते हैं। इनके विषय में वैसे तो मुझे पूर्व में भी जानकारी थी। परन्तु कलचुरी वंशजों से मिलना तीन वर्ष पूर्व हुआ। इन कलचुरियों के वंशजों में से लाल विजय सिंहदेव एक अरसे से मेरे फ़ेसबुक मित्र थे, परन्तु इनसे कभी मिलना, भेंटना नहीं हुआ था। तीन वर्ष पूर्व महासमुंद से इनसे मुलाकात हुई। सरल स्वभाव के उर्जावान युवक हैं और अपने इतिहास एवं धरोहरों के प्रति भी जागरुक दिखाई दिए।

सुबह इनके साथ रायपुर शाखा के अठारह गढ़ों में से एक मोंहदीगढ़ जाना हुआ। यह महासमुंद से खल्लारी मार्ग पर 12 किमी की दूरी पर मोंहदी नामक ग्राम की डुंगरी पर है। यहाँ गढीन माई (चम्पई माता) का स्थान है। जिन्हें आस पास के ग्रामीण अपनी आराध्या मानते हैं और पूजन करते हैं। मोंहदी ग्राम के सरपंच खेमराज दीवान हैं, जो गौंटिया परिवार से ही हैं। इनके साथ हमने गढीन दाई के दर्शन एवं गढ के अवशेषों की खोज में डुंगरी पर चढाई की।

मोंहदीगढ़ में विराजित चम्पई माता

डुंगरी के शीर्ष पर पठार है, इससे जुड़ा हुआ अमली पठार भी है और उपर से बेलर गांव की तरफ़ जाने का रास्ता भी है। वर्तमान में हुए निर्माणों के अलावा अन्य प्राचीन निर्माण के अवशेष यहाँ दिखाई नहीं देते। परन्तु डुंगरी में सुरंग एवं गुफ़ाएं होने की कथा सुनाई देती है। ऐसी एक सुरंग नुमा खोह में चम्पई माता विराजित हैं। अनगढ़ पाषाण की यहाँ दो प्रतिमाएँ हैं, जिनमें आँखे जड़ी हुई हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ ज्योति जलाई जाती है और मेला भी भरता है।

यहाँ से पठार पर चलकर बेलर गांव के रास्ते में एक मानव निर्मित प्रस्तर भित्ति जैसी संरचना दिखाई देती है। जहाँ स्थानीय देवता विराजमान हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ दिखाई नहीं देता। अधिक जानकारी एवं शोध के लिए डुंगरी का चप्पा चप्पा छानना होगा। हो सकता है कि प्राचीन मानव बसाहट के चिन्ह मिल जाएं।

मोंहदीगढ़ के मदिर एवं पुष्करी

समय कम होने के कारण मैं यह कार्य नहीं कर सका। डुंगरी से नीचे उतरने पर एक फ़र्लांग की दूरी पर दस पन्द्रह घरों की प्रस्तर नींव दिखाई देती है, जिससे लगता है कि कभी यहाँ मानव की बसाहट रही होगी। सरपंच खेमराज ने बताया कि यहाँ पर एक प्राचीन कुंआ भी है।

चम्पई माता मोंहदीगढ़

वैसे छत्तीसगढ़ में मोंहदी नामक कई गांव मिलते हैं, परन्तु भौगौलिक परिस्थितियों को देखने पर प्रतीत होता है कि यही स्थान मोंहदीगढ़ रहा होगा। क्योंकि खल्लारी, सुअरमाल, फ़िंगेश्वर, सिरपुर आदि गढ़ इसके आस पास ही हैं। इस यात्रा के लिए लाल विजय सिंहदेव का आभार। फ़िर कभी समय एवं अवसर मिला तो इस क्षेत्र की तपास की जाएगी।

आलेख एवं चित्र

ललित शर्मा इंडोलॉजिस्ट

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