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व्यक्ति स्वतंत्रता एवं व्यक्ति विकास के पक्षधर दलितों के मसीहा : डॉ बाबा साहेब आम्बेडकर

स्वतंत्रता पूर्व के कालखंड में महात्मा गांधी एवं डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर का प्रभावशाली व्यक्तित्व राजनीतिक शक्तियों तथा समाज सुधार का प्रतिबिंब था। दोनों ही नेतृत्व उच्च शिक्षित एवं अपनी राजनैतिक सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ समाज के दलितो एवं वंचितों के सर्वांगीण विकास एवं उन्नति के लिए जीवनपर्यंत संघर्षरत रहे।

डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर ने व्यक्ति स्वतंत्रता एवं व्यक्ति विकास को अपने जीवन कार्य का केन्द्र बिंदू माना। भारतीय सामाजिक व्यवस्था के कारण वंचित हुआ दलित वर्ग की मुक्ति का संघर्ष उनके मानवतावादी दृष्टिकोण का परिचायक था। वास्तव में डॉ अम्बेडकर समाज व्यवस्था में समानता, न्याय एवं विकास के अवसरों के पक्षधर थे। उनका पूरा जीवन समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, कुरीतियों, असमानता, जाति व्यवस्था का लोकतांत्रिक रुप में विरोध के रुप में दिखाई देता है।

डॉ भीमराव आम्बेडकर का भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय संविधान निर्माता कहे जाने वाले डॉ भीमराव आम्बेडकर को दलितों का मसीहा एवं ब्राह्मणवाद का आलोचक माना जाता है। लेकिन ये कम लोग ही जानते हैं कि बाबा साहेब का उपनाम आम्बेडकर ब्राह्मण सरनेम है। बाबा साहेब का असली सरनेम आंबावडेकर था। उनका परिवार मूलत: रत्नागिरि जिले के आंबावडे गाँव का रहने वाला था।

बाबा साहेब स्कूली जीवन से मेघावी छात्र थे, इसलिए उनके स्कूल के शिक्षक महादेव आम्बेडकर उन्हें बहुत मानते थे। महादेव आम्बेडकर ने ही स्नेहवश उनके नाम के साथ आम्बेडकर जोड़ दिया। महादेव बाबा साहब की कुशाग्र बुद्धि से प्रभावित थे। पुत्र की भांति प्यार करते थे। बाबा साहेब ने कभी इस सरनेम को नहीं बदला। उनका जन्म मध्यप्रदेश के महू में 14 अप्रेल 1891 को हुआ एवं उनका निधन 6 दिसम्बर 1956 को हुआ।

डॉ आम्बेडकर माता भीमा बाई एवं पिता राम जी की चौदहवीं संतान थे। बाबा साहब को कक्षा 6 में एक दिन वे पानी से भींग गये थे। ब्राह्मण शिक्षक ने अपने बेटे के साथ उन्हें घर भेजा, स्नान का प्रबंध कराया और घर में बिठाकर भोजन कराया। ऐसी अन्य हृदय को छूने वाली तमाम बातें बाबा साहब ने खुद अपने संस्मरणों में लिखी हैं।

उनके जीवन की यात्रा निम्न प्रकार से वर्षवार वर्गीकृत की जा सकती है।

1- साप्ताहिक मूकनायक का प्रकाशन -1920
2-महाड़ का जन आंदोलन -1927
3- चवदार तालाब सत्याग्रह -1927
4- काला राम मंदिर सत्याग्रह -1930
5- स्वतंत्र मजदूर पार्टी का गठन -1936
6- संवैधानिक संघर्ष आंदोलन -1939
7- शेड्यूल कास्ट फ़ेडरेशन का गठन -1942

जब भीमराम लगभग 15 वर्ष की आयु के थे तब अप्रैल 1906 में नौ साल की लड़की रमाबाई से उनकी शादी कराई गई थी। तब वे पांचवी अंग्रेजी कक्षा पढ रहे थे। उन दिनों भारत में बाल-विवाह का प्रचलन था। इस तरह उनका विवाह बचपन में ही हो गया था। इसके पश्चात भीमराव शिक्षा प्राप्त करते रहे एवं उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की। लंबी बीमारी के बाद रमाबाई का 1935 में निधन हो गया।

1913 में, आम्बेडकर 22 साल की आयु में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए जहां उन्हें सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय (बड़ौदा के गायकवाड़) द्वारा स्थापित एक योजना के तहत न्यू यॉर्क शहर स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा के अवसर प्रदान करने के लिए तीन साल के लिए 11.50 पौंड प्रति माह बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति प्रदान की गई थी।

इसके पश्चात डॉ भीमराव अम्बेडकर ने 13 साल अविवाहित रहने के बाद डॉ सविता नामक चितपावन ब्राह्मण चिकित्सक से विवाह किया। कहा जाता है कि डॉक्टर सविता बेहद समर्पित तरीके से उनका इलाज कर रही थीं लिहाजा वो उनके करीब भी आ गए थे. नजदीकियां कुछ इस तरह बढ़ीं कि उन्होंने सविता के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा. वो जब मान गईं तो 1948 को दिल्ली स्थित आंबेडकर के आवास पर दोनों की शादी हुई।

डॉक्टर सविता माई (बाद में उन्हें माई ही कहा जाने लगा था) ने पूरी निष्ठा से मरते दम तक आंबेडकर का खयाल रखा. वह उनकी सेवा में जुटी रहीं. यहां तक की आंबेडकर खुद उनके समर्पण और सेवा की तारीफ करते थे. जब उन्होंने अपनी किताब ”द बुद्धा एंड हिज धर्मा” लिखी तो पहली बार में ये बगैर भूमिका के प्रकाशित हुई. 15 मार्च 1956 को बाबा साहेब ने इसकी भूमिका फिर लिखी.

नई भूमिका के साथ किताब को फिर प्रकाशित किया जाना था. भावुक अंदाज में इसमें लिखा कि किस तरह उन्हें पत्नी से मदद मिली. आंबेडकर के निधन के बाद नाराज करीबियों और अनुयायियों ने प्रकाशक पर दबाव डाला कि ये भूमिका हटाई जाए. इस तरह वो फीलिंग्स लोगों के सामने नहीं आ सकी, जो उन्होंने पत्नी के बारे में लिखी थी. ये बात 1980 में सामने आई, जब पंजाबी बौद्धिस्ट लेखक भगवान दास ने उनकी उस भूमिका को दुलर्भ भूमिका के रूप में प्रकाशित किया।

बाबा साहब अंबेडकर हिंदुस्तान के उन विरले व्यक्तियों में से हैं जिन्होंने मनुष्य के बीच भेद खत्म करके एक समरस समाज की स्थापना के लिये संघर्ष किया। एकात्मता की जो बात ऋग्वेद में है, या गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाई उसी बात को बाबा साहब अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद के नाम से कही।

सतही तौर पर देखने में लगता है कि शायद उनका अभियान ब्राह्मणों के विरुद्ध था लेकिन अंबेडकर के विचार और जीवन जानने के बाद यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उनका विरोध या उनका गुस्सा उन तथाकथित ब्राह्मणों के प्रति था जो मनुष्य और मनुष्य के बीच में भेद करते हैं, उन्हें अछूत बनाते हैं तथा एक प्रकार से कुछ खास समृद्धों के साम्राज्यवाद को मजबूत बनाने के लिये एक मंत्र के रूप में काम करते हैं।

बाबा साहब अंबेडकर का जीवन चरित्र और जीवन यात्रा पढ़ऩे के बाद ही कोई व्यक्ति समझ पाएगा कि उनके व्यक्तित्व के निर्माण में ब्राह्मणों का कितना योगदान था। यह ठीक है कि तब ब्राह्मणों का एक समूह ऐसा था जिसने बाबा साहब के समरसता अभियान की खिलाफत की लेकिन यह खिलाफत सहयोग से बहुत छोटी थी जो कुछ ब्राह्मणों की ओर से उन्हें मिला। संभवत: इसीलिये उन्होंने महाड परिषद् में कहा कि यह दृष्टिकोण प्रमादपूर्ण है कि सारे ब्राह्मण अस्पृश्यों के शत्रु हैं।

एक अन्य अवसर 12 फरवरी 1938 को मनमाड़ में दलित रेल्वे कामगारों के बीच उन्होंने कहा था कि जब मैं कहता हूं कि ब्राह्मणवाद शत्रु से सामना करना है तब उसका अर्थ गलत नहीं लेना चाहिये। मैंने ब्राह्मणवाद शब्द का प्रयोग ब्राह्मण जाति की सत्ता, अधिकार व हित संबंध के अर्थ में नहीं किया है। मेरे ब्राह्मणवाद शब्द का अर्थ स्वतंत्रता, समता व बंधुत्व भव का विरोध करने वाली मानसिकता से है।

आज की राजनीति और सामाजिक स्पर्धाओं की आपाधापी जिस दिशा में चल पड़ी है और व्यक्ति अपने छोटे से स्वार्थ के लिये किसी भी षडय़ंत्र का हिस्सा बन जाता है ऐसे में यदि समरसता के व्यवहारिक धरातल पर कोई विचार सार्थक है तो महापुरुषों के वाक्य ही व्यवहारिक हैं, जिनका हम प्रतिदिन नाम तो लेते हैं किंतु न उनके कथनों का आशय समझते हैं और न अपने व्यवहार में लाते हैं।

उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया और उनका अभियान एक वर्ग के उत्थान का तो था लेकिन किसी के विरुद्ध नहीं था। वे समाज में विद्वेष नहीं समरसता और बराबरी के लिये प्रयत्नशील थे। उनका विरोध व्यक्ति से नहीं अपितु मानसिकता से था। वे किसी जातिके विरोधी नहीं बल्कि जाति के नाम पर शोषण करने और सहने के विरुद्ध था। वे हिंदू समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार, समान सम्मान और प्रगति के समान अवसर देने के हिमायती थे। हमें डॉ बाबा साहेब के आदर्शों पर चलकर समाज में समरसता स्थापित करना चाहिए।

भारतीय राजनैतिक आकाश में उनका दलित नेतृत्व देश के स्वाधीनता आंदोलन, समाज सुधारवादी दृष्टिकोण, समानतामूलक समाज व्यवस्था तथा संविधान सभा के निर्वाचित सभापति के दायित्वों का निर्वहन भारतीय जनमानस एवं राजनैतिक-सामाजिक परिदृश्य को युगों युगों तक प्रभावित करता रहेगा।

आलेख

श्री एम एल नत्थानी

वाणिज्य कर अधिकारी (सेवानिवृत्त)

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