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कौन थे वे जिन्होंने मूर्तिपूजा प्रारंभ की एवं पूजा पद्धति का विकास कब हुआ?

विश्व में विभिन्न धर्मावलम्बी निवास करते हैं, सब निज धर्म का पालन करते हैं। ये धर्मावलम्बी दो भागों में बंटे हैं साकार और निराकार। साकार माने मूर्ति पूजक एवं निराकार माने प्रकृति पूजक। हमेशा विवाद इन दोनों में ही होते रहता है। लोगों में मन में जिज्ञासा यह रहती है कि मूर्ति पूजा कब से प्रारंभ हुई? आज इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ते हैं।

मूर्तियां तीन तरह के लोगों ने बनाईं- एक वे जो वास्तु और खगोल विज्ञान के जानकार थे, तो उन्होंने तारों और नक्षत्रों के मंदिर बनाए। दूसरे वे, जो अपने पूर्वजों या प्रॉफेट के मरने के बाद उनकी याद में मूर्ति बनाते थे। तीसरे वे, जिन्होंने अपने-अपने देवता गढ़ लिए थे। हर कबीले का एक देवता होता था। कुलदेवता और कुलदेवी भी होती थी।

शोधकर्ताओं के अनुसार अरब के मक्का में पहले मूर्तियां ही रखी होती थीं। वहां उस काल में बृहस्पति, मंगल, अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह और महाराजा बलि सहित लगभग 360 मूर्तियां रखी हुई थीं। ऐसा माना जाता है हालांकि इसमें कितनी सचाई है यह हम नहीं जानते कि जाट और गुर्जर इतिहास अनुसार तुर्किस्तान पहले नागवंशियों का गढ़ था। यहां नागपूजा का प्रचलन था।

भगवान कृष्ण के काल में नाग, यक्ष, इन्द्र आदि की पूजा की जाती थी। वैदिक काल के पतन और अनीश्वरवादी धर्म के उत्थान के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ गया।

वेद काल में न तो मंदिर थे और न ही मूर्ति, क्योंकि इसका इतिहास में कोई साक्ष्य नहीं मिलता। इन्द्र और वरुण आदि देवताओं की चर्चा जरूर होती है, लेकिन उनकी मूर्तियां थीं इसके भी साक्ष्य नहीं मिलते हैं।

भगवान कृष्ण के काल में लोग इन्द्र नामक देवता से जरूर डरते थे। भगवान कृष्ण ने ही उक्त देवी-देवताओं के डर को लोगों के मन से निकाला था। इसके अलावा हड़प्पा काल में मूर्ति का साक्ष्य मिला है, लेकिन निश्चित ही यह पूजा का मामला नहीं रहा होगा।

प्राचीन अवैदिक मानव पहले आकाश, समुद्र, पहाड़, बादल, बारिश, तूफान, जल, अग्नि, वायु, नाग, सिंह आदि प्राकृतिक शक्तियों की शक्ति से परिचित था और वह जानता था कि यह मानव शक्ति से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है इसलिए वह इनकी प्रार्थना करता था।

बाद में धीरे-धीरे इसमें बदलाव आने लगा। वह मानने लगा कि कोई एक ऐसी शक्ति है, जो इन सभी को संचालित करती है। वेदों में सभी तरह की प्राकृतिक शक्तियों का खुलासा कर उनके महत्व का गुणागान किया गया है। हालांकि वेदों का केंद्रीय दर्शन ‘ब्रह्म’ ही है।

पूर्व वैदिक काल में वैदिक समाज जन इकट्ठा होकर एक ही वेदी पर खड़े रहकर ब्रह्म (ईश्वर) के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करते थे। वे यज्ञ द्वारा भी ईश्वर और प्रकृति तत्वों का आह्वान और प्रार्थना करते थे। बाद में धीरे-धीरे लोग वेदों का गलत अर्थ निकालने लगे।

मूर्ति पूजा के प्रारंभ के विषय में विद्वानों स्व-स्व मत हैं, परन्तु किसी एक मत पर तो पहुंचा जा सकता है, यह स्व विवेक पर निर्भर करता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने मूर्ति पूजा का खंडन किया तथा उससे होने वाली हानि से समाज को अवगत एवं जागृत कराने में ही प्राण गंवाए।

सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी जी लिखते हैं कि वेदों में मूर्ति पूजा का विधान नहीं है। यजुर्वेद घोषणापूर्वक कहता है कि न तस्य प्रतिमास्ति यस्य नाम महद्यश:। (यजुर्वेद 32-3) अर्थात जिसका नाम महान यशवाला है उस परमात्मा की कोई तुलना, मूर्ति, प्रतिकृति, प्रतिनिधि नही है।

वैसे भी पुरातत्व के अनुसार मंदिरों का निर्माण गुप्तकाल में हुआ। उसके पूर्व के मंदिर नहीं मिलते तथा पूजनीय देव प्रतिमाएँ भी। अब प्रश्न उठता है कि जब वेदों में मूर्तिपूजा का विधान नहीं है तो यह प्रारंभ कहाँ से हुई, किसने चलाई? इसका उत्तर महर्षि दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में प्रश्नोत्तर के रुप में देते हैं।

प्र – मूर्तिपूजा कहाँ से चली ?
उ – जैनियों से।
प्र – जैनियों ने कहाँ से चलाई ?
उ – अपनी मूर्खता से।

पण्डित जवाहरलाल नेहरु के अनुसार , मूर्तिपूजा बौद्धकाल से प्रचलित हुई। वे लिखते है — “यह एक मनोरंजक विचार है कि मूर्तिपूजा भारत में यूनान से आई। वैदिक धर्म हर प्रकार की मूर्ति तथा प्रतिमा-पूजन का विरोधी था। उस काल ( वैदिकयुग ) में देवमूर्तियों के किसी प्रकार के मंदिर नहीं थे। प्रारम्भिक बौद्ध धर्म इसका घोर विरोधी था बाद में स्वयं बुद्ध की मूर्तियाँ बनने लगी। फ़ारसी तथा उर्दू भाषा में प्रतिमा अथवा मूर्ति के लिए अब भी बुत शब्द प्रयुक्त होता है जो बुद्ध का रूपांतर है | ” ( हिन्दुस्तान की कहानी -पृ १७२ )

एक अन्य स्थल पर वे लिखते है -“ग्रीस और यूनान आदि देशों में देवताओं की मूर्तियाँ पूजती थीं। वहाँ से भारत में मूर्तिपूजा आई। बौद्धों ने मूर्तिपूजा आरम्भ की, फिर अन्य जगह फ़ैल गई।” ( विश्व इतिहास की झलक – पृ ६९४ )

इन उद्धरणों से इतना निश्चित है कि मूर्तिपूजा हमारे देश में जैन-बौद्धकाल से आरम्भ हुई। जिस समय भारत में मूर्तिपूजा आरम्भ हुई और लोग मन्दिरों में जाने लगे तो भारतीय विद्वानों ने इसका घोर खण्डन किया। मूर्तिपूजा खण्डन में उन्होंने यहाँ तक कहा – गजैरापीड्यमानोsपि न गच्छेज्जैनमन्दिरम् ( भविष्य पु . प्रतिसर्गपर्व ३-२८-५३ )
अर्थात यदि हाथी मारने लिए दौड़ा आता हो और जैनियों के मन्दिर में जाने से प्राणरक्षा होती हो तो भी जैनियों के मन्दिर में नहीं जाना चाहिए।

लेकिन ब्राह्मणों , उपदेशकों और विद्वानों के कथन का साधारण जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन लोगों ने भी मन्दिरों का निर्माण किया। जैनियों के मन्दिरों में नग्न मूर्तियाँ होती थी, इन मन्दिरों में भव्यवेश में भूषित हार-श्रृंगारयुक्त मूर्तियों की स्थापना और पूजा होने लगी।

भारत में पुराणों की मान्यता है लेकिन पुराणों में भी मूर्तिपूजा का घोर खण्डन किया गया है।
यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके। स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः॥
यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कहिर्चिज्। जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखारः। ( श्रीमद भागवत १०-८४-१३ )
अर्थात , जो वात , पित और कफ -तीन मलों से बने हुए शरीर में आत्मबुद्धि रखता है , जो स्त्री आदि में स्वबुद्धि रखता है , जो पृथ्वी से बनी हुई पाषाण -मूर्तियों में पूज्य बुद्धि रखता है , ऐसा व्यक्ति गोखर-गौओं का चारा उठाने वाला गधा है।

न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः।
ते पुनन्त्यापि कालेन विष्णुभक्ताः क्षणादहो॥ ( देवी भागवत ९-७-४२ )
अर्थात , पानी के तीर्थ नहीं होते तथा मिटटी और पत्थर के देवता नहीं होते। विष्णुभक्त तो क्षण मात्र में पवित्र कर देते हैं। परन्तु वे किसी काल में भी मनुष्य को पवित्र नहीं कर सकते।

दर्शन शास्त्रों में भी मूर्तिपूजा का निषेध है
न प्रतीके न ही सः ( वेदान्त दर्शन ४-१-४ )
प्रतीक में , मूर्ति आदि में परमात्मा की उपासना नहीं हो सकती , क्योंकि प्रतीक परमात्मा नहीं है।

संसार के सभी महापुरुषों और सुधारकों ने भी मूर्तिपूजा का खण्डन किया है।|
श्री शंकराचार्य जी परपूजा में लिखते हैं —
पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम्।
स्वच्छस्य पाद्यमघर्यं च शुद्धस्याचमनं कुतः।
निर्लेपस्य कुतो गन्धं पुष्पं निर्वसनस्य च।
निर्गन्धस्य कुतो धूपं स्वप्रकाशस्य दीपकम्।
अर्थात , ईश्वर सर्वत्र परिपूर्ण है फिर उसका आह्वान कैसा? जो सर्वाधार है उसके लिए आसन कैसा? जो सर्वथा स्वच्छ एवं पवित्र है उसके लिए पाद्य और अघर्य कैसा? जो शुद्ध है उसके लिए आचमन की क्या आवश्यकता?
निर्लेप ईश्वर को चन्दन लगाने से क्या? जो सुगंध की इच्छा से रहित है उसे पुष्प क्यों चढाते हो? निर्गंध को धूप क्यों जलाते हो? जो स्वयं प्रकाशमान है उसके समक्ष दीपक क्यों जलाते हो?

चाणक्य लिखते —
अग्निहोत्र करना द्विजमात्र का कर्तव्य है। मुनि लोग हृदय में परमात्मा की उपासना करते हैं। अल्प बुद्धि वाले लोग मूर्तिपूजा करते है। बुद्धिमानों के लिए तो सर्वत्र देवता है। ( चाणक्य नीति ४-१९ )
इसके पश्चात भक्तिकाल के संतों ने भी मूर्तिपूजा का विरोध किया, इससे ज्ञात होता है कि इस काल में मूर्तिपूजा प्रारंभ थी और मंदिर देवालय भी थे।

कबीरदास कहते है —
पाहन पूजे हरि मिले तो हम पूजे पहार।
ताते तो चाकी भली पीस खाए संसार॥

दादु कहते है —
मूर्त गढ़ी पाषण की किया सृजन हार।
दादू साँच सूझे नहीं यूँ डूबा संसार॥

गुरुनानकदेव का उपदेश है —
पात्थर ले पूजहि मुगध गंवार।
ओहिजा आपि डूबो तुम कहा तारनहार।

महर्षि दयानन्द जी का कथन —
“मूर्ति जड़ है , उसे ईश्वर मानोगे तो ईश्वर भी जड़ सिद्ध होगा। अथवा ईश्वर के समान एक और ईश्वर मानो तो परमात्मा का परमात्मापन नहीं रहेगा। यदि कहो कि प्रतिमा में ईश्वर आ जाता है तो ठीक नहीं। इससे ईश्वर अखण्ड सिद्ध नहीं हो सकता। भावना में भगवान् है यह कहो तो मैं कहता हूँ कि काष्ठ खण्ड में इक्षु दण्ड की और लोष्ठ में मिश्री की भावना करने से क्या मुख मीठा हो सकता है? मृगतृष्णा में मृग जल की बहुतेरी भावना करता है परन्तु उसकी प्यास नहीं बुझती है। वि्श्वास , भावना और कल्पना के साथ सत्य का होना भी आवश्यक है।” ( दयानन्दप्रकाश – पृ २६४ )

यह एक निर्विवाद सत्य है कि भारत में सबसे अधिक मूर्तियां हैं, मंदिर हैं, किंतु प्राचीन भारत मूर्तिपूजक नहीं थे तथा भारत में मूर्तिपूजा जैनियों एवं बौद्धों की देन माना जाता है। इस काल में ही मूर्तिपूजा प्रचलित हुई एवं मंदिरों का निर्माण हुआ। जिसके प्रमाण हमें गुप्तकाल से धरती पर दिखाई देते हैं।

वैदिक काल की संध्योपासना समाज में विभिन्न देवी-देवताओं के षोडशोपचार पूजा पद्धति में कब और कैसे परिवर्तित हो गई, यह शोध का विषय है। खैर मेरा मानना है कि पूजा (प्रार्थना) पद्धति प्रतिमा तथा मंदिर देवालय निर्माण से पहले मौजूद रही है क्योंकि ईश्वर की अवधारण मूर्ति मंदिरों के पूर्व की है, जब लोग निराकार की उपासना किया करते थे और उपासना का विधि-विधान भी था।

 

आलेख

ललित शर्मा
इंडोलॉजिस्ट

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