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परम्परागत घानी

ऐसा प्राचीन यंत्र जिसका प्रयोग वर्तमान में भी हो रहा है

सभ्यता के विकास के क्रम में मनुष्य ने आवश्यतानुसार जीवन एवं दैनिक कार्यों को सरल एवं सहज बनाने के लिए यंत्रों एवं उपस्करों का निर्माण किया। जैसे-जैसे आवश्यकता हुई एवं समझ विकसित हुई यंत्रों का अविष्कार हुआ। पुराविद कहते हैं कि गाड़ी के पहिये से पहले कुम्हार के चाक के अविष्कार हुआ, परन्तु कुम्हार के चाक को गाड़ी का पहिया बनने में चार सौ वर्ष लग गये।

आदि मानव ने जीवन में तेल का महत्व समझा और तिलहन की पहचान कर उससे तेल निकालने के लिए मशीन का अविष्कार किया। बिना मशीन के तेल निकालना दुष्कर एवं कठिन कार्य था। वर्तमान में तो तेल निकालने का कार्य बिजली से चलने वाला मशीनी कोल्हू “स्पेलर” कर देता है, जिससे तेल अलग एवं खली अलग हो जाती है।

तिल, सरसों, अलसी, नारियल, मुंगफ़ली, बादाम आदि एवं “राईस ब्रान” (धान के कोड़हे) से तेल मशीनों द्वारा निकाला जाता है जो भोजन में काम आता है। दैनिक जीवन में तेल का स्थान महत्वपूर्ण है, अगर तेल न होता तो पकवानों के साथ मशीनों का परिचालन भी नहीं हो पाता।

प्राचीन काल में जब आदि मानव ने तेल का महत्व समझा तो उसे निकालने का जुगाड़ भी बनाया। जिसे तेलही या तिरही कहा जाता है। इसका निर्माण लकड़ी के दो मोटे लट्ठों से होता है, जिसके मध्यम में एक प्रणालिका लगा दी जाती है। प्रणालिका के ऊपर तिलहन को “मोहलाईन” वृक्ष की छाल में गठरी बनाकर उपरी लट्ठे से दबा दिया जाता है।

तिरही, तेलपेरनी प्राचीन यंत्र एवं हरि सिंह क्षत्रिय

उपरी लट्ठे के मुहाने पर पत्थर रखकर तिलहन पर दबाव बनाया जाता है। जिससे प्रणालिका से तेल निचुड़कर नीचे रखे बर्तन में टपकने लगता है, तेल निकालने की यह समय खाऊ प्रक्रिया है, जो दाब बल से चलती है। एक अन्य पद्धति में खड़े पेड़ में खांचे बनाकर दो मजबूत लकड़ी फ़िट कर दी जाती थी, फ़िर उसके बीचे में तिलहन रख कर पत्थर से दबाव बना कर तेल निकाला जाता था।

तिरही से तेल निकालने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है, समय अधिक लगता है, इसका समाधन निकालने लिए कोल्हू का अविष्कार हुआ, जिसे चलाने के लिए पूर्व में तो मानव बल का उपयोग किया जाता था, फ़िर पशुबल का उपयोग कर अधिक मात्रा में तेल उत्पादन किया जाने लगा।

आदिवासी संस्कृति के जानकार श्री शिवकुमार पाण्डेय कहते हैं कि बस्तर में इसे तेल पेरनी कहा जाता था। अब कहीं नहीं दिखता, लकड़ी के दो मयाल के बीच में बाँस की ढुटी में तिलहन रखा जाता था तथा दबाने के लिये पत्थऱ, तेल छेद से होकर नीचे बर्तन ने जमा होता था। केवल महुआ फल टोरा व पेंग का तेल निकालते थे, टोरा तेल खाने व लगाने में तथा पेंग तेल दवाई के लिये प्रयोग होता था।

दो चार कोल्हू लगाकर तेल निकालने का कार्य होने लगा तो वह कारखाना कहलाया और तेल निकालने वाला तेली। वर्तमान में तेल निकालने कोल्हू गायब हो चुके हैं, तेली परम्परागत व्यवसाय को छोड़ खेती किसानी करने लगे या अन्य कार्यों में लग गए।

कोल्हू बंद हो गया। अब कहीं कहीं कोल्हू का उपयोग गन्ने से रस निकालने में होता, जिससे गुड़ बनाया जाता है। वरना वहां भी रस पेराई के लिए मशीनों से काम लिया जा रहा है।

आदि मानव से लेकर वर्तमान तक वनवासी इस पद्धति से तिलहन से तेल निकाल रहे हैं। कोरबा क्षेत्र में निवासरत पहाड़ी कोरवाओं के गांव “केरा” में यह यंत्र दिखाई दिया।

परम्परागत भारतीय गन्ना पेरने का कोल्हू

कोरवाओं के निवास स्थाई नहीं होते, पर भी (एक गुफ़ा जिसके मुहाने के पर केले के पेड़ होने के कारण) केरा गुफ़ा के निकट कुछ वर्षों से टिके होने के कारण केरा गाँव नाम प्रचलन में गया। इस केरा गाँव में यह तेल निकालने का प्राचीन यंत्र तिरही दिखाई दे गया। उपरोक्त चित्र हरि सिंह क्षत्रिय से साभार लिया है।

 

आलेख

ललित शर्मा
इंडोलॉजिस्ट

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One comment

  1. हरि सिंह क्षत्री, कोरबा, मल्हारवाले

    धन्यवाद भैया सादर प्रणाम

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