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गज लक्ष्मी एवं लक्ष्मी पूजन की परम्परा

‘महालक्ष्‍मी नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि।
हरि प्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे।।’

प्राचीन काल से श्री लक्ष्मी का संबंध धन-एश्वर्य, श्री कीर्ति से माना जाता है। पौराणिक शास्त्रों में लक्ष्मी के अष्ट रुप माने गए हैं, जो आदि लक्ष्मी या महालक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धन्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, सनातना लक्ष्मी, विजया लक्ष्मी या जाया लक्ष्मी तथा विद्या लक्ष्मी हैं। इनमें गज लक्ष्मी सर्वाधिक प्रचलित स्वरुप हैं।

गजलक्ष्मी ने मंदिर देवालयों से लेकर राजा महाराजाओं की मुद्रा में भी प्रमुख स्थान प्राप्त किया है। हिन्दू, जैन एवं बौद्ध आदि धर्मों में गजलक्ष्मी समान रुप से पूजित है। देवी लक्ष्मी का प्रभामंडल इतना विस्तृत है कि मोहम्मद गोरी को भी अपने सिक्के में लक्ष्मी को स्थान देना पड़ा।

गज लक्ष्मी महेशपुर (सरगुजा) छत्तीसगढ़

गजलक्ष्मी यह लक्ष्मी का चार भुजाधारी स्वरूप है। नाम के मुताबिक ही यह गज यानी हाथी पर आठ कमल की पत्तियों के समान आकार वाले सिंहासन पर विराजित होती है। इनके दोनों ओर भी हाथी खड़े होते हैं। चार हाथों में कमल का फूल, अमृत कलश, बेल और शंख होता हैं। इनकी उपासना “संपत्ति और संतान” देने वाली मानी गई है।

गज को वर्षा करने वाले मेघों तथा उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है। गज की सवारी करने के कारण यह उर्वरता तथा समृद्धि की देवी भी हैं। गज लक्ष्मी देवी को राजलक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इन्हीं की कृपा से राजाओं को धन वैभव और समृद्घि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

कई चित्रों, मूर्तियों आदि में लक्ष्मी के स्वरूप पर जल वर्षा करते दो हाथी (नर, मादा) दिखाई देते हैं। ये हाथी ‘दिग्गज’ के आठ जोड़ों में से एक होते हैं, जो कि ब्रह्मांड के आठ कोनों पर स्थित रहकर आकाश को संभाले हुए हैं। ये लक्ष्मी के कृपापात्र हैं। गज अर्थात हाथी को शक्ति, श्री तथा राजसी वैभव से युक्त प्राणी माना गया है।

गज को वर्षा करने वाले मेघों तथा उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है। इस तरह ये उर्वरता तथा समृद्धि की देवी लक्ष्मी के सहचर हैं। इनके साथ लक्ष्मी का स्वरूप गज लक्ष्मी नाम से जाना जाता है।

हमारे शास्त्रों, खासकर वैदिक साहित्य में लक्ष्मी को ‘श्री’ भी कहा गया है। कहते हैं भद्र स्त्री व पुरुषों के आगे श्री लगाने का प्रचलन इसी शब्द से शुरू हुआ। पर लक्ष्मी सिर्फ धन की देवी नहीं हैं। पुराणों में कहा गया है कि जहां सत्व यानी आंतरिक शक्ति है, वहीं लक्ष्मी हैं।

इलाहाबाद के राष्ट्रीय संग्रहालय में लक्ष्मी की ढेर सारी टेराकोटा की मूर्तियां रखी हैं। कहा जाता है कि इलाहाबाद का संग्रहालय दुनिया का अकेला ऐसा म्यूजियम है, जहां लक्ष्मीजी की टेराकोटा की इतनी सारी मूर्तियां हैं। और ये सभी मूर्तियां इलाहाबाद से अलग कर बनाए गए नए जिले कौशांबी से मिली थीं।

चौथी शती ई.पू. से ईसा की सातवीं शती की कालावधि में देशी नरेशों ने ही नहीं अपितु विदेशी नरेशों ने भी अपनी मुद्राओं पर लक्ष्मी का ससम्मान अंकन करवाया था। वह भी कई रूपों में जैसे— ‘गजाभिषेकलक्ष्मी’, ‘पदमहस्ता’, ‘कमलधारिणी’ आदि। देवी लक्ष्मी के राजलक्ष्मी स्वरूप का प्रथम निरूपण प्राचीन भारत की कौशाम्बी नगरी की ढलुआ मुद्राओं पर देखने में आता है, जो दूसरी शती ई.पू. की है।

छत्तीसगढ़ में भी कलचुरियों की स्वर्ण रजत एवं ताम्र मुद्राएं प्राप्त होती हैं, इन शासकों में गांगेयदेव, पृथ्वीदेव, जाजल्यदेव, रत्नदेव प्रमुख हुए हैं। कलचुरियों के सिक्कों में भी देवी लक्ष्मी ने प्रमुखता से स्थान पाया है। इनके द्वारा चलाये गए सिक्कों में एक तरह शासक का नाम एवं दूसरी तरफ़ लक्ष्मी का अंकन होता था।

गजाभिषिक्त लक्ष्मी महेशपुर (सरगुजा) छत्तीसगढ़

ईसा पूर्व की चौथी से ईसा की 7वीं शती तक की कालावधि में भारत में कई देशी-विदेशी राजवंशों ने अपनी श्रीवृद्धि के लिए जो मुद्राएं प्रचलित कीं उनमें उनकी अधिष्ठात्री महादेवी लक्ष्मी का सर्वाधिक अंकन हुआ। इस तरह देवी लक्ष्मी अपने विभिन्न रुपों में लोक में सर्वपूजित रही हैं।

इस लक्ष्मी पूजन एवं दीप पर्व पर हम कामना करें कि हमारा भारत देश युगों-युगों तक अखंड बना रहे। नन्हे-से दीप की कोमल-सी बाती का गहरा-सा संदेश ‍है कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है। लक्ष्मी सूक्त का पाठ करें और मां लक्ष्मी से दिव्यता का आशीष प्राप्त करें।

आलेख एवं छायाचित्र

ललित शर्मा इंडोलॉजिस्ट

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