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Tag Archives: दक्षिण कोसल

दक्षिण कोसल की स्थापत्य कला में लक्ष्मी का प्रतिमांकन

प्राचीन काल में भारत में शक्ति उपासना सर्वत्र व्याप्त थी, जिसके प्रमाण हमें अनेक अभिलेखों, मुहरों, मुद्राओं, मंदिर स्थापत्य एवं मूर्तियों में दिखाई देते हैं। शैव धर्म में पार्वती या दुर्गा तथा वैष्णव धर्म में लक्ष्मी के रूप में देवी उपासना का पर्याप्त प्रचार-प्रसार हुआ। लक्ष्मी जी को समृद्धि सौभाग्य …

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दक्षिण कोसल की कुबेर प्रतिमाएं

सनातन धर्म में त्रिदेववाद और पंचायतन पूजा के साथ – साथ अष्टदिक्पालों की उपासना और पूजा पाठ का विशेष महत्व रहा है। दिकपालों को पृथ्वी का संरंक्षक कहा गया है। इन्हें लोकपाल भी कहा जाता है। साधारणतया भूतल और आकाश की दिशाओं को छोड़कर इस पृथ्वी पर आठ दिशाएं मानी …

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कुदरगढ़िन माता : छत्तीसगढ़ नवरात्रि विशेष

भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश के दक्षिणपूर्व भाग में ‘‘धान की कोठी‘‘ छत्तीसगढ़ राज्य स्थित है। छत्तीसगढ़ के उत्तरांचल में आदिवासी बहुल संभाग सरगुजा है। यहाँ की प्राकृतिक सौंदर्यता, हरियाली, ऐतिहासिक व पुरातात्विक स्थल, लोकजीवन की झांकी, सांस्कृतिक परंपराएं, रीति-रिवाज, पर्वत, पठार, नदियाँ कलात्मक आकर्षण बरबस ही मन को मोह …

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घटवारिन दाई अंगार मोती : छत्तीसगढ़ नवरात्रि विशेष

जनश्रुतियाँ भी इतिहास एवं संस्कृति जानने का सशक्त माध्यम हैं, ऐसी ही एक जनश्रुति लगभग चार सौ वर्ष पुरानी हैं। माता अंगार मोती बड़ी फुरमानुख देवी है। न जानें दिव्य देवी शक्तियाँ कब किस पर अपार स्नेह की बारिश कर दे, रोग, शोक, भय रहित कर दे, सुख शांति और …

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भैना राजाओं की कुलदेवी : खम्भेश्वरी माता

प्राचीन इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजे-रजवाड़ों एवं जमीदारियों में शक्ति की उपासना की जाती थी और वर्तमान में भी की जाती है। शक्ति की उपासना से राजा शत्रुओं पर विजय के लिए शक्ति प्राप्त करता था। वह शक्ति को चराचर जगत में एक ही है पर …

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बौद्ध धर्म एवं उसका विकास : छत्तीसगढ़

(अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर) भारतीय संस्कृति में धर्म का स्थान उसी प्रकार सुनिश्चित किया जा सकता है, जिस प्रकार शरीर में प्राण। धर्म को प्राचीनकाल से ही एक पवित्र प्रेरक के रूप में आत्मसात् किया गया है। भारत की यह धरा अनेक धर्मों के उत्थान एवं पतन की साक्षी …

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दक्षिण कोसल के शिल्प एवं शिल्पकार : विश्वकर्मा पूजा विशेष

शिल्पकारों ने कलचुरियों के यहाँ भी निर्माण कार्य किया, उनकी उपस्थिति तत्कालीन अभिलेखों में दिखाई देती है। द्वितीय पृथ्वीदेव के रतनपुर में प्राप्त शिलालेख संवत 915 में उत्कीर्ण है ” यह मनोज्ञा और खूब रस वाली प्रशस्ति रुचिर अक्षरों में धनपति नामक कृती और शिल्पज्ञ ईश्वर ने उत्कीर्ण की। उपरोक्त …

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दक्षिण कोसल की संस्कृति में पैली-काठा का महत्व

दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) प्रांत प्राचीनकाल से दो बातों के लिए प्रसिद्ध है, पहला धान की खेती और दूसरा माता कौसल्या की जन्मभूमि याने भगवान राम की ननिहाल। यहाँ का कृषक धान एवं राम, दोनों से जुड़ा हुआ है। यहाँ धान की खेती प्रचूर मात्रा में होती है, इसके साथ ही …

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रामचरित मानस में वर्णित ॠषि मुनि एवं उनके आश्रम

भारत सदैव से ऋषि मुनियों की तपो भूमि रहा, उनके द्वारा विभिन्न ग्रंथों की रचना की गई। उन्होंने ही हिमालय के प्रथम अक्षर से हि एवं इंदु को मिला कर भारत को हिंदुस्तान नाम दिया। हिन्दू धर्म ग्रंथों के दो भाग श्रुति और स्मृति हैं। श्रुति सबसे बड़ा ग्रन्थ है …

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दक्षिण कोसल के लोक साहित्य में राम

छत्तीसगढ़ी प्रहेलिकाओं में त्रेतायुगीन चरित्रों का भी संकेत मिलता है। राम यहां के जन जीवन में रमें हुए दिखाई देते हैं। विद्वानों का कथन है कि इस भू-भाग भगवान राम ने अपने वनवास का काफ़ी समय व्यतीत किया। छत्तीसगढ़ी की प्रहेलिकाओं में राम और सीता का स्थायीकरण हुआ है। राम …

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