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कोसल के कलचुरियों से बस्तर के सम्बन्ध

बस्तर रियासत पर रतनपुर के कलचुरि शासन के प्रभाव से सम्बन्धित कई तरह की कहानियाँ चलन में है; अत: थोडी बात कलचुरियों की। लगभग दसवी शताब्दी में त्रिपुरी से आ कर कलचुरियों की एक शाखा नें दक्षिण कोसल पर विजय हासिल की तथा कलिंगराज (1000-1020 ई.) नें अपनी सत्ता स्थापित की।

तुम्माण को कोसल पर शासन करने वाले प्रारम्भिक कलचुरियों नें अपनी राजधानी बनाया। राजा रतनदेव प्रथम (1045-1065 ई.) नें राजधानी को रतनपुर में स्थानांतरित किया। धीरे-धीरे रतनपुर अपने समय से सबसे सुन्दर, व्यवस्थित तथा शक्तिशाली राजधानियों में गिना जाने लगा।

रतनपुर दुर्ग का मुख्य द्वार

मुगल शहनशाह जहाँगीर के शासनकाल में रतनपुर मुगलों के आधीन हो गया था। पुरुषोत्तम देव के समय तक कलचुरियों का रतनपुर राजवंश दो हिस्सों में विभाजित हो चुका था। वरिष्ठ शाखा तो रतनपुर में ही शासन कर रही थी किंतु कनिष्ठ शाखा नें रायपुर को चुना।

बस्तर के चालुक्य/काकतीयों तथा कलचुरियों के बीच सम्बन्धों पर ठोस बात नहीं की जा सकती। यदि इस सम्बन्ध की पहली कडी देखी जाये तो वह राजा पुरुषोत्तमदेव (1468-1534) का समय था जब उन्होंने अपने पूर्ववर्ती शासकों की शांतिपूर्ण शासन की नीति को त्याग कर सीधे ही कलचुरियों पर आक्रमण कर दिया था।

रतनपुर महल के भग्नावशेष

इधर बस्तर सेना ने रायपुर पर आक्रमण किया, उधर कलचुरी राजा ब्रम्हदेव ने रतनपुर रियासत से सहायता माँगी। संयुक्त सेनाओं के चौतरफा आक्रमण से विवश हो कर पुरुषोत्तमदेव बस्तर की ओर वापस पलायन करना पडा। यहाँ विद्वानों में विचारैक्य नहीं है। डॉ. हीरालाल शुक्ल मानते हैं कि राजा पुरुषोत्तमदेव नें रायपुर के कलचुरियों से युद्ध के दौरान कल्याणसाय के पिता वाहरसाय का वध कर दिया तथा प्रतिवाद में कल्याणसाय नें पुरुषोत्तमदेव का वध कर दिया होगा।

इस विवरण से मेरी असहमति इसलिये भी है कि डॉ. शुक्ल बस्तर में रथयात्रा के दौरान एक व्यक्ति के लगातार दूसरे हाँथ से वस्त्र लपेटने की क्रिया को पुरुषोत्तमदेव की इसी वीरगति प्राप्ति से जोडते हैं (बस्तर के चालुक्य और गिरिजन; पृ 122)। बस्तर शासन अबने सबसे समृद्ध और गौरवशाली कहे जाने वाले दशहरा उत्सव में शासक की पराजय के कारण मिली मौत की यादगार को जीवित रखने का यत्न करेगा एसा उचित नहीं लगता।

रतनपुर दुर्ग के भीतर प्राचीन मंदिर

इस सम्बन्ध में इतिहासकार डॉ. के के झा का मत अधिक उचित प्रतीत होता है कि जब कलचुरियों नें संयुक्त हो कर राजा पुरुषोत्तमदेव पर आक्रमण कर दिया तो वे अपने हाथी पर चढे युद्धभूमि से पलायन करने लगे। इसी समय उनके सेनापति नें सुरक्षा की दृष्टि से राजा को अपने वस्त्र तथा घोडा प्रदान कर दिया।

राजा बस्तर लौट आये तथा कृतज्ञता स्वरूप वस्त्र समेटने व छोडने की प्रथा उन्होंने प्रारंभ की है। यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि रथयात्रा की प्रथा का बस्तर में प्रारम्भ करने वाले भी पुरुषोत्तमदेव ही थे। डॉ. के के झा लिखते हैं कि यद्यपि कलचुरि विजयी रहे किंतु उन्होंने आगे बढ कर बस्तर पर अधिकार करने का प्रयास नहीं किया जो यह सिद्ध करता है कि पुरुषोत्तमदेव शक्तिहीन नृपति नहीं थे।

दुर्ग के भीतर बावड़ी

कलचुरियों नें यदि बस्तर विजय किया होता तो यह उनकी असाधारण उपलब्धि होती तथा ताम्रपत्रों-शिलालेखों में इसका प्रमुखता से उल्लेख मिला होता। बस्तर की सीमा के भीतर न तो किसी निर्माण कार्य में, न ही उपलब्ध साहित्यिक स्त्रोतों में एसा कोई उल्लेख मिलता है।

यह प्रतीत होता है कि केशकाल से इस ओर आने में लगने वाली सैन्य ताकत, क्षमता व धन का अनुमान कर बस्तर की परिधि में घुस कर युद्ध करना कलचुरियों के लिये कदाचित सहज नहीं रहा होगा।

भग्नावशेष रतनपुर

राजा पुरुषोत्तमदेव की मृत्यु के बाद जयसिंहदेव (1534-1558 ई.) ने चौबीस वर्ष और फिर नरसिंह देव (1558-1602 ई.) ने शासन किया। उनकी मृत्यु के बाद जयसिंहदेव (1534-1558 ई.) ने चौबीस वर्ष और फिर नरसिंह देव (1558-1602 ई.) ने शासन किया।

इन दोनों ही राजाओं के शासन आम तौर पर शांतिपूर्ण थे; अत: एसा प्रमाण नहीं मिलता कि कलचुरियों नें चालुक्यों की स्वायत्तता का हनन किया हो। यह अवश्य है कि कलिंग के गजपति तथा रतनपुर के अश्वपति पडोसी होने के कारण बस्तर के रथपतियों की ओर सदा अधिकार करने की चेष्टा से देखते रहे। कुछ तो यहाँ के भूगोल नें अवसर नहीं दिया होगा तथा कुछ इस क्षेत्र की रहस्यमयता से साहस नहीं दिया होगा।

आलेख

श्री राजीव रंजन प्रसाद
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार बचेली बस्तर
हाल मुकाम दिल्ली

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