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छत्तीसगढ़ में सूर्योपासना परम्परा : कलात्मक अभिव्यक्ति

मानव धर्म के माध्यम से अपनी मानसिक अभिव्यक्ति करता है। इसके अंतर्गत मानव ऐसी उच्चतर अदृश्य शक्ति के प्रति अपना विश्वास प्रकट करता है, जो उसके समस्त मानवीय जीवन को प्रभावित करती है। इसमें आज्ञाकारिता, शील, सम्मान तथा अराधना की भावना अंर्तनिहित होती है।

अपने प्रारम्भिक अवस्था में मानव ने अपने आराध्य देवी-देवताओं को तीन लोकों में निवासरत होने की धारणा के आधार पर उनका स्थान सुनिश्चित किया। इन्हीं तीनो लोकों में भूलोक एवं द्युलोक के बीच अंतरिक्ष में सूर्यदेव अवस्थित है। जहाँ नक्षत्र एवं तारों के मध्य विराजमान रहकर वे तीनों लोकों को प्रकाशित करते है, इसी कारण सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया।

सूर्य मानव जीवन के स्रोत, प्रकाश और शक्ति का प्रतीक माने जाते हैं, जिनकी कल्पना जगत के प्रकाश के स्वामी के रूप में की गई है। यह प्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करने के कारण विश्व की अनेक प्राचीन संस्कृतियों में आराध्य देव के रूप में पूजे जाते हैं।

सम्पूर्ण ग्रहों के स्वामी माने जाने के कारण सूर्योपासना का भारतीय धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। इसी कारण ब्राह्मण धर्म में व्याप्त पंच देवों में सूर्य की गणना की गई है। व्याकरण के दृष्टिकोंण से सूर्य शब्द ‘सृ’ धातु से बना है। इसका अर्थ है ‘गतौ यस्मात् परो नास्ति’ अथार्त् जिसके प्रकाश के समान अन्यतम प्रकाश इस भूतल पर नहीं है, उसे सूर्य कहते हैं।

अपने प्रारम्भिक अवस्था में मानव प्राकृतिक शक्ति पूजक था। प्रत्यक्ष रूप में प्रकट होने के कारण, सूर्य के प्रति आदर एवं जिज्ञासा थी। इसी कारण मानव ने उसे सर्वप्रथम देव रूप में स्थापित कर पूजा करना प्रारम्भ किया। सूर्य पूजा की प्राचीनता को लेकर विद्वानों ने अनेक मत दिये है।

कलाविद् वी. सी. श्रीवास्तव ने प्रागैतिहासिक संस्कृतियों से प्राप्त विभिन्न प्रतीकों का संबंध, सूर्य प्रतीकों से स्थापित करने का प्रयत्न किया है। उनका मानना है कि सूर्योपासना की अविराम श्रृंखला पाषाण काल से प्रारम्भ होकर आद्य ऐतिहासिक काल तक जाती है।

सैंधव सभ्यता के विभिन्न पुरातात्त्विक स्थलो के उत्खनन के पश्चात् सूर्योपासना का कोई स्पष्ट प्रमाण ज्ञात नहीं होता है, परन्तु उत्खनन से प्राप्त कुछ ठिकरों पर चक्र, स्वास्तिक, किरण मंडल और मयूर के प्रतीक का अंकन प्राप्त हुआ हैं, जिसके आधार पर कुछ विद्वानों द्वारा इसे सूर्य पूजा से संबद्ध करने का प्रयत्न किया गया है।

भारतीय संदर्भो में प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथ ऋग्वेद में सूर्य की कल्पना एक शक्तिशाली देवता के रूप में की गयी है। ऋग्वेद के चौदह सूक्त सूर्य को समर्पित है, जिनमें से ग्यारह पूर्णतः सूर्य की उपवर्णना, स्तुति या महत्त्व प्रतिपादक हैं। इस ग्रंथ में सूर्य से संबंधित अनेक देवताओं की कल्पना की गई है, जिनकी कालान्तर में संख्या बढ़ती गयी, जैसे – सविता, मित्र, अर्यमन, पूषन, त्वष्टा, उरूकम, विष्णु, सावित्री, धाता, विवस्वान्, भग, शक्र इत्यादि।

ऋग्वेद में सूर्य को श्वेत चमकते हुए घोड़े के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसे ऊषा द्वारा लाया गया था। इस वेद में सूर्य के द्वारा रथ पर बैठकर भ्रमण करने की कल्पना भी की गई है। जिसमें रथ को खींचने के लिए घोड़े की संख्या चार या सात बताई गई है। इस वेद के अनुसार सूर्य ‘सम्पूर्ण धर-अधर का रक्षक तथा मनुष्य के समस्त सत्-असत् कर्मो का दृष्टा है।

यजुर्वेद में ‘चक्षो सूर्यो जायत्’ संबोधित करते हुए सूर्य को ईश्वर का नेत्र माना गया है। अथर्ववेद में अथर्वा ऋषि प्रार्थना करते है कि जैसे अग्नि- वनस्पतियों, सोम-लताओं, वायु-अन्तरिक्ष तथा वरूण जल के अधिपति हैं, उसी प्रकार सूर्य नेत्रों के अधिपति है, अतः वे मेरी रक्षा करें। उत्तर वैदिक काल में सूर्योपासना का विधान कुछ परिवर्तित दिखाई देता है।

सूर्योपासना का आध्यात्मिक तत्वों के साथ-साथ कर्मकाण्डों तथा धार्मिक विधि – विधानों में व्यापक रूप से पूजन तथा ग्रंथों में वर्णन होने लगा है। सूर्योपासना की पुष्टि संहिताओं ब्राह्मण ग्रंथों उपनिषदो गृहसूत्रो तथा धर्मसूत्रों से भी होती है।

तैत्तिरीय आरण्यक में वर्णन है कि सूर्य देव समस्त जगत के जीवों में प्राणों का संचार करते है। ऐतेरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि यदि सूर्य उदित न हो तो सभी आँख वाले चक्षुविहीन हो जाए। शतपथ ब्राह्मण में भी एक स्थल पर आठ तथा दूसरे स्थल पर द्वादश आदित्यों का उल्लेख हुआ है। छान्दोग्योपनिषद में सूर्य को प्रणव (परमेश्वर) निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का वर्णन मिलता है।

मुण्डकोउपनिषद में पृथ्वी पर सूर्य को जीवन का आधार मानकर उनकी महत्त्ता स्थापित की गई है। प्रश्नोपनिषद में सूर्य को प्राण कहकर संबोधित किया गया है। वृहादारण्यकोपनिषद में कहा गया है कि सूर्य के वर्णन के अभाव में तैंतीस प्रकार के देवता का विवरण अधुरा है। रामायण में वर्णित है कि संसार के सृष्टि में सर्वप्रथम शासक मनु विवस्वान (सूर्य) के पुत्र थे।

महाभारत में सूर्य को ब्रह्म, चराचर का धाता, ग्रहपति, ज्योतिषकपिण्ड और मोक्षद्वार के रूप में विहित (निर्धारित) किया गया है। महाभारत में सूर्योपासना के संबंध में वर्णन है कि युधिष्ठिर ने अपने वनवास के समय सूर्य की स्तुति कर उनसे अपने परिवार तथा अनुयायीयों के भोजन पकाने हेतु पात्र प्राप्त किया था। मनुस्मृति के एक मंत्र में सूर्य की पूजा बुद्धि के देवता के रूप में कि गई है।

मार्कण्डेयपुराण में सूर्य उत्पत्ति, उनकी दोनों पत्नी संज्ञा एवं छाया और छः संतानों का विस्तार से विवरण मिलता है। विष्णुपुराण में वर्णित है कि नारायण ही तेजरूप में सूर्य बनकर प्रकाशित होते है। कुर्मपुराण में भगवान सूर्यनारायण की अमृतमयी रश्मियों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

सूर्योपासना का विधान उत्तर एवं दक्षिण भारत में व्यापक रूप से प्रसारित था। ‘आनन्द गिरि’ ने सौर सम्प्रदाय के छः वर्गो का उल्लेख किया है, उनके अनुसार सूर्य उपासक लाल चन्दन का तिलक लगाते थे, लाल पुष्पों की माला पहनते थे तथा सूर्य और गायत्री मंत्र का जप करते थे।

सूर्योपासना के दो प्रतीक रूप हैं – 1. मण्डल तथा 2. मूर्ति। इन दोनों का संयुक्त रूप, मण्डल मूर्ति के रूप में निर्माण परवर्ती कालों में प्रारम्भ हुआ, जिसके दो उपभेद माने गये हैं। 1. मण्डल के साथ सम्पूर्ण प्रतिमा का चित्रण, तथा 2. सम्पूर्ण चित्र के साथ केवल मानव मुख का चित्रण।

साम्बउपपुराण से ज्ञात होता है कि पहले सूर्य की प्रतिमा नहीं बनाई जाती थी, अपितु मण्डल के रूप में ही उनकी पूजा की जाती थी, जिस प्रकार आकाश में सूर्य मण्डल विद्यमान रहता है, उसी रूप में भक्तगण मण्डल का निर्माण किया करते थे।

बाद के कालों में विश्वकर्मा जी ने लोगों के हितों को देखते हुए पुरूषाकृति सूर्य का निर्माण किया और तभी से घरों तथा मंदिरों में इनकी प्रतिमाओं की स्थापना कर पूजन की पद्धति प्रारम्भ हुई। वृहत्संहिता के अनुसार मग नाम से प्रसिद्ध पुरोहितों के द्वारा ही मंदिरों में सूर्य की प्रतिमा स्थापित की जाती थी। यह अधिकार मगों के अलावा और किसी को भी नहीं था।

गया जिले के गोविन्दपुर से शकाब्द 1059 (1137-38 ई.) का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है, जिसके प्रारंभिक श्लोक से जानकारी मिलती है कि मगों की उत्पत्ति सूर्य से हुई है और उन्हें इस देश में शाम्बों के द्वारा लाया गया था। इस प्रकार इन साहित्यिक साक्ष्यों की पुष्टि जनपदिय पांचाल, मित्र शासकों के प्राप्त मुद्राओं के अंकन से भी होता है।

‘सूर्यमित्र’ तथा ‘भानुमित्र’ की मुद्राओं पर सूर्य मण्डल का स्पष्ट अंकन दृष्टव्य होता है। सूर्य के दूसरे प्रतीक के रूप में कमल को इंगित किया गया है, विकसित कमल की तुलना, किरणावली से युक्त सूर्य बिम्ब से की गई है, यही कारण होगा कि देव मूर्तियों में भी प्रभा मण्डलों को कमलाकृतियों द्वारा अंकित किया जाता है। सूर्य प्रतिमाओं में प्रारंभ से ही सूर्य के हाथों में कमल धारण किए जाने का विधान है।

कुषाण काल में सौर्य धर्म परिलक्षित हो गया था, कनिष्क की मुद्राओं पर ‘मिईरो’ (ईरानी मिहिर – सूर्य) नाम खुदा हुआ है जो कि एक सूर्य पूजक सम्प्रदाय था। सौर धर्म के विकास क्रम में हम आगे देखते है कि गुप्त शासक कुमारगुप्त कालीन मंदसौर अभिलेख से ज्ञात होता है कि दशपुर के रेशम वस्त्र बनाने वाले बुनकरों ने शिल्प से प्राप्त धन से सूर्य का एक मंदिर निर्मित करवाया था और उसके क्षतिग्रस्त हो जाने पर पुनः जीर्णोद्धार करवाया गया था।

इस लेख का प्रारंभ सूर्य स्तुति से हुआ है। इसी काल का स्कन्दगुप्त कालीन इन्दौर ताम्रपत्र में भी लेख का प्रारंभ सूर्य वंदना से किया गया है। इससे जानकारी प्राप्त होती है कि क्षत्रिय अचल वर्मा तथा भृकुंठ सिंह ने इन्द्रपुर (इन्दौर) में सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था।

हूण वंशीय शासक मिहिरकुल के शिलालेख में भी उल्लेखित है कि ग्वालियर के गोपाद्री पहाड़ी में मातृचेट द्वारा सूर्य मंदिर निर्मित करवाया गया था। मगध के राजा जीवितगुप्त द्वितीय के देवबर्नक शिलालेख द्वारा बिहार के शहाबाद जिले में सूर्य मंदिर होने की पुष्टि होती है।

सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के दरबार में कवि मयूर ने कुष्ठ रोगों से मुक्ति पाने के लिए सूर्य शतक की रचना की थी। थानेश्वर के राज्यवर्धन, आदित्यवर्धन तथा प्रभाकर वर्धन सभी आदित्य (सूर्य) के परम भक्त थे। चीनी विदेशी यात्री ह्वेनसांग द्वारा भी अपने ग्रंथ में मुल्तान एवं कन्नौज क्षेत्र में सूर्य मंदिर होने की चर्चा की गयी है। इसी तरह मध्यकाल में अन्य सूर्य मंदिरों का निर्माण हुआ।

प्रतिहारों द्वारा मढ़खेरा (जिला- टिकमगढ़) तथा चन्देलों द्वारा खजुराहों में (चित्रगुप्त) सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया गया। चाहमान शासक चण्डमहासेन सूर्य का भक्त था। सेनवंशी शासक विश्वरूप एवं केशवसेन सूर्य के परम भक्त थे, उनकी उपाधि ‘परमसोर’ मिलती है। राजतंरगणी में काश्मीर के शासक ललितादित्य का सौरधर्म के उपासक के रूप में वर्णन किया गया है और उनकों प्रख्यात मार्तण्ड (सूर्य) मंदिर बनवाने का श्रेय दिया जाता है।

प्रतिहारों द्वारा मन्खेरा (जिला- टिकमगढ़) तथा चन्देलों द्वारा खजुराहों में (चित्रगुप्त) सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया गया। चाहमान शासक चण्डमहासेन सूर्य का भक्त था। सेनवंशी शासक विश्वरूप एवं केशवसेन सूर्य के परम भक्त थे, उनकी उपाधि ‘परमसोर’ मिलती है। राजतंरगणी में काश्मीर के शासक ललितादित्य का सौरधर्म के उपासक के रूप में वर्णन किया गया है और उनकों प्रख्यात मार्तण्ड (सूर्य) मंदिर बनवाने का श्रेय दिया जाता है।

इसी संदर्भ में जब हम छत्तीसगढ़ की बात करते हैं तो ज्ञात होता है कि प्राचीन भारत की सूर्यापासना संबंधित यह परम्परा छत्तीसगढ़ में भी प्रचलित थी। यहाँ के स्थानीय राजवंश जैसे नलवंश, शरभपुरीयवंश, पाण्डुवंश, सोमवंश तथा कलचुरिवंशीय शासकों द्वारा जारी किये गये अभिलेखों में कही भी स्वतंत्र रूप से सूर्य वंदना का उल्लेख नहीं मिलता है परन्तु प्रसंगवस अथवा विशेषण के रूप में सूर्य तथा चन्द्रमा का उल्लेख अवश्य किया गया है।

अधिकांश अभिलेखों में सूर्य को जगत का अंधकार नष्ट करने वाला कहा गया है। छत्तीसगढ़ में सूर्य ग्रहण तथा चन्द्र ग्रहण के अवसर पर राजाओं द्वारा दान देने की परम्परा ज्ञात होती है, जिससे इस बात की भी पुष्टि होती है कि इस क्षेत्र में सूर्य का महत्व था तथा उनसे जुडी़ मान्यता एवं परम्पराएं प्रचलन में थी।

प्रायः सभी नलवंशीय शासकों द्वारा उत्कीर्ण कराए गए अभिलेखों में सूर्य का किसी न किसी रूप में उल्लेख किया गया है। इस वंश के शासक विलासतुंग के राजिम शिलालेख में सूर्य की स्तुति ‘जयति प्रथित महीभृतुंग शिरोनिहित निज पादः नित्योदितः प्रतापः पूर्णादित्यों’ के रूप में की गई है। इसी अभिलेख में (सविता) ‘बालार्क्क’ का भी उल्लेख हुआ है।

इससे यह जानकारी प्राप्त होती है कि पाँचवी शताब्दी ईसवी में छत्तीसगढ़ के स्थानीय प्रथम राजवंश के काल में सूर्य को देवता के रूप में पूजा जाता था।शरभपुरीय शासक जयराज के आरंग ताम्रपत्र लेख में गायों को सूर्य की पुत्री कहा गया है। पाण्डुवंशी शासक भवदेवरणकेशरी के भान्दक अभिलेख में सूर्य के एक चक्र वाले रथ का उल्लेख हुआ है, जो पौराणिक मान्यता के अनुकुल विदित होता है।

इस क्षेत्र में कलचुरि राजवंश कालीन धार्मिक स्थिति के अंतर्गत सौरधर्म के व्यापक प्रभाव परिलक्षित होते हैं। इस काल में सूर्य को एक लोकप्रिय देवता के रूप में पूजा जाता था। इस काल के अभिलेखों तथा शिल्पकृतियों में सौर उपासना के अनेक साक्ष्य दृष्टिगोचर होते है।

रतनपुर के कलचुरि शासक पृथ्वीदेव प्रथम के अमोदा ताम्रपत्र में सूर्य का गुणगान करते हुए उसे आकाश में बढ़ती हुई ज्योति के रूप में आदि पुरूष कहा गया है। इसी तरह रत्नदेव द्वितीय के अकलतरा प्रस्तर अभिलेख एवं पृथ्वीदेव द्वितीय के रतनपुर प्रस्तर अभिलेख में उल्लेखित है कि उनके सामन्त वल्लभराज ने विकन्नपुर (वर्तमान कोटगढ़) में सूर्य के पुत्र रेवन्त का एक मन्दिर बनवाया था।

सूर्य का अनेक जगहों पर विशेषण के रूप में वर्णन किया गया है। इन उद्धरणों से यह ज्ञात होता है कि कलचुरि युगीन छत्तीसगढ़ में सूर्य के साथ-साथ उनके पुत्र रेवन्त की पूजा भी प्रचलन में थी। पुराणों में रेवन्त को सूर्य और उनकी पत्नी संज्ञा के गर्भ से उत्पन्न बताया गया है।

सूर्य के सभी चार पुत्र रेवन्त, यम, मनु एवं द्वितय में रेवन्त का स्थान प्रमुख रहा है, तथा कला के क्षेत्र में सूर्य पुत्रों में रेवन्त की प्रतिमा ही ज्यादा उत्कीर्ण की गई है। वृहत्संहिता में अश्वारूढ़ रेवन्त को साथियों के साथ मृगयाक्रीडा में रत बताया गया है।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में इनका स्वरूप सूर्य के समान ही बनाने का निर्देश दिया गया है तथा उसे द्विभुजीय और अश्वारूढ़ बताया गया है। रेवन्त के प्रतिमा निर्माण की परम्परा प्रायः गुप्त काल से दृष्टव्य होती है। सूर्य तथा उनके पुत्र रेवन्त की कला में उपस्थिति, समाज में सूर्य पूजन की लोकप्रियता को प्रमाणित करती है।

पृथ्वीदेव द्वितीय के डेकोनी , बिलाईगढ़ तथा घोटिया से प्राप्त ताम्रपत्रों में सूर्य का गुणगान किया गया है तथा इन लेखों में सूर्य को ज्योर्तिमय, आदिपुरूष तथा मनु के पिता के रूप में उल्लेखित किया गया है। इसके साथ ही कीर्तवीर्य को सूर्य का वंशज बताया गया है।

द्वितीय जाजल्यदेव के अमोदा ताम्रपत्र लेख तथा प्रतापमल्ल के ताम्रपत्र लेख में सूर्य का वर्णन किया गया है। गोपालदेव के पुजारीपाली अभिलेख में एक स्थान पर गोपालदेव की तुलना अश्वारूढ़ रेवन्त से करते हुए कहा गया है कि अश्वारूढ़ गोपालदेव जगह-जगह रेवन्त के समान दिखाई देते हैं।

रत्नदेव तृतीय के खरोद शिलालेख से ज्ञात होता है कि इनके महामंत्री गंगाधर ने पहपक नामक स्थान पर सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसमें मुख्य देवता के रूप में सूर्य की प्रतिमा स्थापित रही होगी।

कुछ कलचुरि अभिलेखों में सूर्य के लिए रवि तथा सप्ताश्व नाम भी उल्लेखित किए गए है। अधिकांश कलचुरि अभिलेखों में सूर्य का नाम राजाओं के प्रताप तथा शौर्य के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त किए गए हैं, जिससे उस काल में सूर्य की लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है।

शिल्पकला के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के अनेक स्थलों से सूर्य प्रतिमाओं की प्राप्ति हुई है, जो सूर्य उपासना के द्योतक हैं। इस क्षेत्र में बिलासपुर जिला के अंतर्गत आने वाले पुरातात्विक स्थल ताला (पांचवीं – छठी शताब्दी ईसवीं) में सूर्य का अंकन नवग्रह पट्टों में दिखाई देता है। यह नवग्रह पट्ट देवरानी मंदिर के गर्भगृह में स्थित है।

पाली और जाँजगीर के मंदिरों में सूर्य की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण की गई है। सूर्य की एक प्रतिमा बस्तर से भी प्राप्त हुई है। बलौदाबाजार जिला के अंतर्गत नारायणपुर पुरातात्त्विक स्थल से भी शिव मंदिर के उत्तर दिशा की जंघाभाग की भित्ति में नीचे के देव कोष्ठ में उदीच्य वेशधारी सूर्य की प्रतिमा उत्कीर्ण है।

कोटगढ़ मंदिर के द्वार शाखा में भी सूर्य की एक प्रतिमा अंकित की गई है। संभवतः इसके गर्भगृह में वल्लभराज द्वारा निर्मित रेवन्त की प्रतिमा रही होगी। इसी तरह रेवन्त की एक प्रतिमा खैरागढ़ के निकट खपरी नामक पुरास्थल से भी मिली है। मल्हार से सूर्य की दो प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। पहले प्रतिमा में सूर्य उदीच्य वेश में दोनों हाथों में सनाल कमल लिए हुए, स्थानक मुद्रा में प्रदर्शित किए गए है। यह प्रतिमा दसवीं शताब्दी ईसवी की मानी गई है।

इसी तरह यहाँ से प्राप्त हरिहर हिरण्यगर्भ की प्रतिमा के चरण चौकी पर रेवन्त को सप्ताश्व रथ में प्रदर्शित किया गया है, जिसका सारथी अरूण दृष्टव्य है। अश्वारूढ रेवन्त अपने बाएं हाथ में सूर्य का प्रतीक चक्रध्वज धारण किए है तथा ऊपर की ओर माला लिए हुए विद्याधर युगल की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण है। यह प्रतिमा ग्यारहवी शती ईसवी की ज्ञात होती है।

भोरमदेव मंदिर के चबूतरे पर भी सूर्य की एक द्विभुजीय प्रतिमा स्थानक मुद्रा में प्रदर्शित है, जिसके मस्तक पर किरीट मुकुट, कानों में कुण्डल, गले मे मुक्तामाला एवं हार सुशोभित है। उनके कटि प्रदेश में मेखला तथा पैरों में कड़े जैसे आभूषण दृष्टव्य हैं। ये कटिप्रदेश के नीचे अधोवस्त्र तथा पैरों में पदत्राण पहने हुए हैं। इनके दोनों पार्श्वों में एक – एक स्त्री खड़ी दिखाई दे रही हैं, जो संभवतः उनकी पत्नि छाया एवं सूवर्चसा है। चरण चौकी पर दाहिनी ओर चार तथा बायीं ओर तीन अश्व है, जो रथ को खीचते हुए प्रदर्शित हैं। यह प्रतिमा ग्यारहवी शती ईसवी की मानी गई है।

महासमुन्द जिला के अतंर्गत आने वाले पुरातात्विक स्थल सिरपुर के गन्धेश्वर मंदिर (आठवीं शताब्दी ईसवी) परिसर में सूर्य सहित नवग्रहों का अंकन मिलता है। इस स्थल के उत्खनन से भी सूर्य प्रतिमा की प्राप्ति हुई है, ऊंचे सफेद रंग के बलुआ पत्थर के ऊपर निर्मित चौकी पर सूर्य सम्मुख खड़े हुए हैं। इनके शरीर पर विभिन्न प्रकार के आभूषण सुशोभित है। ये पैरों में कड़े तथा ऊंचे जूते पहने दिखाई दे रहे हैं। इनकी टोपी ऊंची है। इनके दोनों हाथों में कमल है जो गदा की तरह दिखाई दे रहे हैं। सूर्य के परिचारक हाथ में चँवर लिए हुए अंकित है। यह सूर्य की उदीच्य प्रतिमा है, इसमें ईरानी प्रभाव परिलक्षित हो रहा है। इसे राजसी प्रतिमा भी कहा जाता है।

महेशपुर से प्राप्त सरदल के मध्य में सूर्य का अंकन हुआ है, तथा सूर्य की अन्य प्रतिमाएं भी प्रकाश में आई है। जिससे ज्ञात होता है कि इस स्थल पर भी सूर्य का मंदिर रहा होगा। बिलासपुर जिला में गनियारी नामक पुरास्थल में स्थित शिव मंदिर के जंघा भाग में चतुर्भुजी सूर्य की स्थानक प्रतिमा प्रदर्शित है। प्रतिमा के दोनों हाथ क्षरित है। यज्ञोपवित धारण किए हुए, सिर में किरीट मुकुट, कर्ण कुण्डल, वक्षमाला, कटि मेखला पहने हुए यह प्रतिमा अलंकृत है। नीचे सात अश्वों का समूह संभवतः रहा होगा परंतु वर्तमान में केवल दो अश्व ही दिखाई देते है। प्रतिमा के दोंनो तरफ एक – एक क्षरित प्रतिमायें प्रदर्शित है, जो संभवतः दण्डी तथा पिंगल है।

इसी जिले में किरारी गोढ़ी के प्राचीन शिव मंदिर के पूर्वी भित्ति के मध्यरथ में निचली भित्ति के आलिंद में सूर्य प्रतिमा दृष्टव्य है। यह द्विभुजी प्रतिमा, समपाद स्थानक मुद्रा में स्थित है। प्रतिमा के दोनों हाथों में एक समान पद्मदल है। यह प्रतिमा सिर में किरीट मुकुट, कानों में कुण्डल, वक्ष माला, वक्ष में कौस्तुभ मणि, कटि मेखला पहने हुए दिखाई दे रही है। प्रतिमा के निचले भाग में दो पुरूष प्रतिमा दंडी और पिंगल का अंकन है। जिनका दायां हाथ अभय मुद्रा में तथा निचले हाथ में खप्पर जैसी वस्तु पकड़े दिखाई दे रहे हैं। प्रतिमा के दोेंनों तरफ चंवरधारिणी खड़ी हुई प्रदर्शित है।

डिपाडीह में सामत सरना मंदिर परिसर में जो कि बलरामपुर जिले के अंतर्गत आता है, वहाँ भी नवीं शताब्दी ईसवी के प्राप्त नवग्रह पट में सूर्य का अंकन दृष्टिगोचर होता है। बलोदाबाजार जिला में डमरू से भी सूर्य की प्रतिमा प्राप्त हुई है।

इस तरह भारतीय संस्कृति में सूर्य महिमा अतिशय रही है जो कि भारतीय जीवन का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करती है। सूर्यपूजन परम्परा का साहित्यक एवं पुरातात्त्विक स्रोतो में जो वर्णन मिलता है, उसका प्रभाव छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान समय तक सूर्यपूजन परम्परा के रूप में दिखाई देता है।

यहाँ से प्राप्त एवं दर्शित प्रतिमाएँ सूर्य उपासना की व्यापकता और महत्ता की बोधगम्य व्याख्याएँ प्रस्तुत करती है। सांस्कृतिक स्थापत्य के दृष्टिकोंण से भी इनका अपना विशिष्ट स्थान है। इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही हिन्दू धर्म को मानने वाले स्थानीय निवासियों के अपने आराध्य देवी-देवता होने के बावजूद आरोग्यता, संतान प्राप्ति एवं उनके दीर्घायु होने के लिए सूर्य पूजन की परंपरा रही है, जिसका निर्वहन आज के आधुनिक युग में भी किया जा रहा है। सूर्य से ही जीवन है, यह आज के वैज्ञानिक युग के अन्वेषण में परखा जा चुका हैं।

संदर्भ ग्रंथ –

  1. शतपथ ब्राह्मण,6,1,2,8; 11,6,3,8 अच्युतग्रंथ माला, काशी.
  2. वर्मा, कामता प्रसाद (2014) : छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला, संचालनालय, संस्कृति एवं पुरातत्व छत्तीसगढ, रायपुर.
  3. मध्यभारती (शोध पत्रिका) अंक-3, वर्ष-3, जबलपुर, पृ. 15.
  4. शर्मा, राजकुमार (1974) : मध्य-प्रदेश के पुरातत्व का संदर्भ ग्रंथ, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल.
  5. नेमा, एस. आर., रेवन्त मूर्ति, प्राच्य – प्रतिभा, (शोध-पत्रिका) भाग – 5, अंक-2
  6. शर्मा, सीताराम (1989) : भोरमदेव, मध्य-प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल.
  7. शुक्लअभिनंदन ग्रंथ, पृ. 379.
  8. वर्मा, कामता प्रसाद (2012): कोसल, अंक – 5, डायरेक्टोरेट ऑफ कल्चर एंड ऑर्कियोलॉजी गवर्नमेंट ऑफ छत्तीसगढ़, एम. जी. एम. म्यूज़ीयम, रायपुर

शोध आलेख

कु0 शुभ्रा रजक (शोध छात्रा)
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

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