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पितृ-पक्ष श्राद्ध का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक रहस्य

हमारी आर्ष संस्कृति ऋषि परंपराओं पर आधारित है और यह ऋषि परंपराएं सनातन होने के साथ-साथ केवल विश्वासों पर आधारित न हो कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर पल्लवित हुई है। हमारे सनातन ऋषियों ने इन परंपराओं को देश, काल, ऋतू के अनुरूप एवं सर्वजन हिताय ही विकसित किया है। इसमे कीड़ी से कुंजर तक की व्यवस्था की गई है।

इतना ही नही यहां तो मृत्यु के बाद की भी व्यवस्था है क्योंकि मृत्यु यहां पूर्ण विराम नहीं अपितु मात्र अल्प विराम है। यहां मृत्यु के बाद भी एक जीवन है। यही कारण है कि न केवल भारत में संस्कृति की आत्मा में गणेशोत्सव और नवरात्रि जैसे पर्व और उत्सव है जो हमारे जीवन को उत्साहित बनाए रखते है बल्कि पितृ पक्ष जैसे पखवाड़े भी है जो मृत्यु के बाद के निमित्त भी तर्पण, हवन, श्राद्ध जैसी नैमित्तिक परम्पराओ में ही सर्व कल्याण का मार्ग दिखाती है।

आखिर क्या है पितृ? उन्हें क्यो पूजा जाए? उनके निमित क्यों दान, हवन, तर्पण किये जाएं इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है। पितृ पक्ष एवं श्राद्ध पक्ष का सन्दर्भ और उनकी महिमा और विधि-विधान,कारण, परिणाम का विशद वर्णन ब्रह्म पुराण, गरूड़ पुराण, विष्णु, पुराण,वायु पुराण, वराह पुराण, मत्स्यपुराण आदि कई पुराणों एवं महाभारत, रामायण, मनुस्मृति, तैतरीय उपनिषद आदि हिन्दू ग्रंथो में किया गया है।

वैदिक संदर्भों में ऋग्वेद और यजुर्वेद में भी इनके संदर्भ मिलते है। ऋग्वेद के एक सूक्त में एक प्रार्थना की गई है-‘उदित होती हुई उषा, बहती हुई नदियां, सुस्थिर पर्वत और पितृगण सदैव हमारी रक्षा करें।’ यह प्रार्थना वैदिक संस्कृति में पितरों की भूमिका को रेखांकित करती है।

वैदिक ऋषि अपनी परंपरा में पितरों की उपस्थिति को अनुभव करते हैं, वे बार-बार उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वैदिक ऋषियों के अनुसार हमारे पितृगण उच्चतर चेतना में लीन होते हैं। वे हमारी चेतना में देवताओं की तरह ही अवस्थित होते हैं। वे हमारी पुकार सुनते हुए हमारी रक्षा भी करते हैं।

पितरों के बारे में वैदिक मान्यता यह है कि वे निरंतर हमारी प्राणिक चेतना का प्रक्षालन करते हुए उसे दिव्य प्रकाश की तरंगों से जोड़ने का उपक्रम करते रहते हैं। उनकी सूक्ष्म सत्ता हमारा पथ-प्रदर्शन करती है और हमें देव-सोपानों पर आरोहण के लिए तैयार भी करती है। इसलिए हमें उनके प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए।

वास्तव में उच्चतर चेतनाओं के सम्पर्क से हमें भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा हम चेतना के उच्च स्तर तक सुगमता पूर्वक जा सकते है। इसलिए सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। ऋग्वेद के प्रसिद्ध पितृ सूक्त के (10.15) अनेक प्रार्थनाएं हैं जो हमारे भीतर प्रकाश की ऊर्जा भरती है।

वेदों में पितरों का आह्वान देव आह्वान की भांति ही किया गया है और बताया गया है कि वे प्रभात की अरुण रश्मियों पर बैठकर आते हैं और हमारे भयमुक्त जीवन का आधार बनकर मानसिक शांति के प्रहरी बन सदैव हमार इर्द गिर्द ही उपस्थित रहते हैं। इसीलिए वेदों में हमारे जीवन को पितरों पर ही निर्भर बताया गया है।

वस्तुतः ‘पितृ’ अर्थात हमारे पुरखे। वे ,जिनकी वजह से हम है, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का पर्व है श्राद्ध पक्ष। सनातन संस्कृति में पितृ भी चौरासी लाख योनियों में से एक योनि है जो देवताओं की भांति ही पूज्य है। देव योनि के साथ साथ पितृ योनि को भी पूज्य माना गया है और श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से किया गया कर्म जो पितृ पक्ष में किया जाता है।

भारत मे पितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि से होती है और अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर इसका समापन होता है। पितृपक्ष 16 दिनों का होता है. पितृपक्ष पूरी तरह से पितरों को समर्पित है। पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करके उनका श्राद्ध कर्म किया जाता है।

पितृपक्ष में पितरों को कुश, डाभ, तिल, तंदुल और पवित्री ले कर हाथों से विनम्रता पूर्वक जलदान दे कर तर्पण किया जाता है। श्राद्ध कर्म करने से उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्य की लालसाएं इतनी होती है कि मरणोपरांत भी मर नहीं पाती इसलिए पितृपक्ष में श्रद्धा पूर्वक अपने पूर्वजों को जल दे कर तर्पण करने का विधान है।

पितृपक्ष को पितृ दोष मुक्ति का ‘महापर्व’ और श्राद्धपक्ष भी कहा जाता है। पितृपूजा का एक गहन अर्थ है आत्मा की अमरता में गहरी आस्था होना। वैदिक मान्यता के अनुसार हमारे सामाजिक संस्कार, विचार, मर्यादाएं भौतिक व आध्यात्मिक उत्तराधिकार पितरों पर ही निर्भर करता हैं अतः वे सब भांति पूज्य है।

पुराणों के अनुसार मुख्यत: पितरों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है- दिव्य पितृ और मनुष्य पितृ। दिव्यपितृ वे होते है जो जीवधारियों के कर्मों को देखकर मृत्यु के बाद उनकी गति मुक्ति का निर्णय करते है। इस कोटि के प्रधान देव यमराज है। यमराज की गणना भी पितरों के प्रमुख देव के रूप में होती है। काव्यवाडनल, सोम, अर्यमा और यम- ये चार इस कोटि के मुख्य गण प्रधान हैं। अर्यमा को पितरों का प्रधान गण देव माना गया है और यमराज को उनका न्यायाधीश। भगवान चि‍त्रगुप्त सभी के कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले कानूनगों हैं।

इन पांचों के अलावा प्रत्येक वर्ग की ओर से सुनवाई करने वाले हैं, यथा- अग्निष्व, देवताओं के प्रतिनिधि, सोमसद या सोमपा-साध्यों के प्रतिनिधि तथा बहिर्पद-गंधर्व, राक्षस, किन्नर सुपर्ण, सर्प तथा यक्षों के प्रतिनिधि हैं। अग्रिष्वात्त, बहिर्पद आज्यप, सोमेप, रश्मिप, उपदूत, आयन्तुन, श्राद्धभुक व नान्दीमुख ये नौ दिव्य पितर बताए गए हैं। आदित्य, वसु, रुद्र तथा दोनों अश्विनी कुमार भी केवल नांदीमुख पितरों को छोड़कर शेष सभी को तृप्त करते हैं।

इन सबसे गठित जो श्रेणी है, वही पितर हैं। यही श्रेणी मृत्यु के बाद न्याय करती है।आर्ष ग्रंथो से ज्ञात होता है कि नचिकेता ने सशरीर पितृलोक की यात्रा की थी। वह वहां तीन दिन रहकर आया था और उसने मानव-पितरों में प्रथम माने जाने वाले यम से भी वार्तालाप किया था जिससे वह मृत्यु का रहस्य जान सके।

भगवत गीता के 10 वें अध्याय के 29 वे श्लोक में कृष्ण श्री पार्थ से कहते है -“अनंतश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् |पितृनामर्यमा चास्मि यम: संयमतामहम् ||” अर्थात भगवान श्री कृष्ण कहते है कि सर्पों में मैं अनंत हूं; जलचरों में मैं वरुण हूं। दिवंगत पितरों में मैं अर्यमा हूं; न्याय करने वालों में मैं मृत्यु का स्वामी यमराज हूं।” पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है, अर्यमा पितरों के देव हैं। एक प्रार्थना में कहा गया है-“ॐ अर्यमा न त्रिप्य्ताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।…ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय।।”अर्थात ‘अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारंबार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।’

सनातन आर्ष ग्रंथो के अनुसार अयर्मा एक वैदिक देवता हैं जो सौरमण्डल के स्वामी सूर्य के प्रधान विश्वदेवों में से एक हैं। वे ऋषि कश्यप तथा माता अदिति के तीसरे पुत्र है और पितृगण में प्रमुख हैं। द्वादश आदित्यों में से एक जो वैशाख मास में उदय होते हैं और जिनकी किरणों की संख्या 300 मानी जाती है।

तैत्तिरीय उपनिषद के शांति मंत्र के देव भी अर्यमा हैं। सूर्य की सहस्त्रों किरणों में जो सबसे प्रमुख है उसका नाम ‘अमा’ है। उस अमा नामक प्रधान किरण के तेज से सूर्य त्रैलोक्य को प्रकाशमान करते हैं। उसी अमा में तिथि विशेष को चंद्र (वस्य) का भ्रमण होता है, तब उक्त अमा किरण के माध्यम से चंद्रमा के उर्ध्वभाग से पितर धरती पर उतर आते हैं इसीलिए श्राद्ध पक्ष की अमावस्या तिथि का सर्वाधिक महत्व भी है। अमावस्या के साथ मन्वादि तिथि, संक्रांति काल व्यतिपात, गजच्दाया, चंद्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण इन समस्त तिथि-वारों में भी पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जा सकता है।

यजुर्वेद में कहा गया है कि ‘ हे अग्नि! हमारे श्रेष्ठ सनातन यज्ञ को संपन्न करने वाले पितरों ने जैसे देहांत होने पर श्रेष्ठ ऐश्वर्य वाले स्वर्ग को प्राप्त किया है, वैसे ही यज्ञों में इन ऋचाओं का पाठ करते हुए और समस्त साधनों से यज्ञ करते हुए हम भी उसी ऐश्वर्यवान स्वर्ग को प्राप्त करें।”

अयर्मा द्युलोक में हम सब लोगों के प्रकाशवान पूर्वज प्रतिनिधि हैं। अर्यमा मनुष्य की प्रकाश-यात्रा के अग्रणी नेता की भांति दिखाई देते हैं। वे द्युलोक में स्थित हैं, तो स्वाभाविक रूप से मित्र, वरुण, भग, पूषा, सविता और विष्णु जैसे व्यापक प्रभुत्व वाले देवताओं के साथ उनका होना हमें देवत्व के लिए जगाता है और इस बात के लिए भी आश्वस्त करता है कि मनुष्य की यात्रा पृथ्वीलोक से द्युलोक तक की है और वही अंतिम गंतव्य भी है।

आकाश में आकाशगंगा उन्हीं अर्यमा के मार्ग का सूचक है। सूर्य से संबंधित इन देवता का अधिकार प्रात: और रात्रि के चक्र पर हो, तबहै। चंद्रमंडल में स्थित पितृलोक में अर्यमा सभी पितरों के अधिपति नियुक्त हैं। वे जानते हैं कि कौन-सा पितृ किस कुल और परिवार से है।

पुराण अनुसार उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र इनका निवास लोक है। हिन्दू विवाहों में वर-वधु उन्हें भी साक्षी मानकर विवाह-प्रण लेते हैं। सूर्य से सम्बन्धित इस देवता का अधिकार प्रात-रात्रि के चक्र पर माना जाता है। एक अन्य अर्थ में आदित्य का छठा रूप अर्यमा नाम से जाना जाता है। यह वायु रूप में प्राणशक्ति का संचार करते हैं। चराचर जगत की जीवन शक्ति हैं। प्रकृति की आत्मा रूप में निवास करते हैं।

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या अर्यमा अर्थात ऊपर की किरण और किरण के साथ पितृ प्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। सूर्य हमारे प्राणाधार है अतः अर्यमा की गणना नित्य पितरों में की जाती है जड़-चेतन मयी सृष्टि में, शरीर का निर्माण नित्य पितृ ही करते हैं। इनके प्रसन्न होने पर पितरों की तृप्ति होती है।

श्राद्ध के समय इनके नाम से जलदान दिया जाता है। यज्ञ में मित्र (सूर्य) तथा वरुण (जल) देवता के साथ स्वाहा का ‘हव्य’ और श्राद्ध में स्वधा का ‘कव्य’ दोनों स्वीकार करते हैं। स्वधा के साथ दी गई यज्ञ की आहुति भी अग्नि के माध्यम से पितरों तक पहुचती है जिससे वे तृप्त होते है।

श्राद्ध के समय इनके नाम से जलदान दिया जाता है। यज्ञ में मित्र (सूर्य) तथा वरुण (जल) देवता के साथ स्वाहा का ‘हव्य’ और श्राद्ध में स्वधा का ‘कव्य’ दोनों स्वीकार करते हैं। अग्नि को दान किए गए अन्न से सूक्ष्म शरीर और मन दोनो तृप्त होता है। इसी अग्निहोत्र से आकाश मंडल के समस्त पक्षी भी तृप्त होते हैं। पक्षियों के लोक को भी पितृलोक कहा जाता है।

पुराणों में कहा गया है कि हमारे पितृ पशु पक्षियों के माध्यम से हमारे निकट आते हैं। गाय, कुत्ता, कौवा और चींटी के माध्यम से पितृ आहार ग्रहण करते हैं. श्राद्ध के समय पितरों के लिए भी आहार का एक अंश निकाला जाता है, तभी श्राद्ध कर्म पूरा होता है। श्राद्ध करते समय पितरों को अर्पित करने वाले भोजन के पांच अंश निकाले जाते हैं।

गाय, कुत्ता, चींटी, कौवा और देवताओं के लिए निकाला गया भोजन इन जीवों के माध्यम से पंच तत्वों में विलीन होता है और पंच तत्वों में विलीन हुए प्राणियों को तृप्ति देता है क्योंकि कुत्ता जल तत्त्व का प्रतीक है, चींटी अग्नि तत्व का प्रतीक है। कौवा वायु तत्व का प्रतीक है। गाय पृथ्वी तत्व और देवता आकाश तत्व का प्रतीक होते हैं। इस प्रकार इन पांचों को आहार देकर हम पंच तत्वों के प्रति आभार प्रकट करते है।केवल गाय में ही एक साथ पांच तत्व पाए जाते हैंअतः गौ ग्रास को भी हमारे यहां प्रमुख स्थान दिया गया है।

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार हमारे पितर किस तिथि को प्रसन्न होंगे इसके लिए उनके मृत्यु की तिथि जाननी जरूरी है क्योंकि पितृपक्ष में उस तिथि पर ही उस पितर के लिए श्राद्ध, तर्पण आदि किया जाता है। पितृपक्ष की निश्चित तिथि पर अपने पितरों के लिए भोजन, दान, पंचबलि कर्म, तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध आदि करते हैं।

पितृपक्ष में पितर धरती पर आते हैं और अपने वंश से तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध से तृप्त होने की उम्मीद रखते है। जो लोग पितृ पक्ष में अपने पितरों को तृप्त नहीं करते हैं, वे उनके श्राप और नाराजगी के भागी बनते हैं। वे दुखी होकर श्राप देते हैं, जिससे व्यक्ति पूरे जीवन परेशान रहता है। यहां तक कि संतान सुख से भी वंचित होना पड़ता है।

पितृपक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है। तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवड़ा नाम से जानते हैं। आवश्यक है कि आधुनिक समय मे जो लोग श्राद्ध को मात्र कर्मकांड समझ कर आलोचना करते है वे उसके पीछे के विज्ञान को समझे।

हमारी संस्कृति में सारी वसुधा को एक कुटुंब माना गया है और सर्वहित की कामना की गई है। श्राद्ध इसी परंपरा को पोषित करता है। अबोले जीवों के प्रति हमें संवेदनशील बनाता है। हमारी ऋषि परम्परा समवेत स्वर में उद्घोषित करती है कि प्रकृति को हम जो देते है वह वही हमें लौटाती है और यही विज्ञान का भी नियम है कि जो उछालोगे वही आप पर गिरेगा।

श्राद्ध इन दोनों की पुष्टि करता है। हमारी देह भी पंचतत्वों से बनी है और अंत मे उसी में विलीन होती है। पंचतत्वों को दिया गया श्राद्ध तर्पण और हवन उसे पुष्ट करता है और हमारी प्राण ऊर्जा के कारक ग्रह सूर्य के तेज को अयर्मा के माध्यम से मानसिक सुख और शारीरिक दृष्टि से सक्षम बनाता है। श्राद्ध के माध्यम से सकारात्मक ऊर्जा को स्वयं में समाहित कर उच्चतम चेतना तक पहुचने का मार्ग सुगम होता है। यही श्राद्ध की प्रमुख आध्यात्मिक वैज्ञानिक महत्ता भी है और रहस्य भी है।

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2 comments

  1. रीझे यादव

    बहुत बढ़िया

  2. उत्कृष्ट पोस्ट हेतु बहुत बहुत आभार आपका

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