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गांधी को समझने के लिए गांधी दर्शन को समझना नितांत आवश्यक

गाँधी का विश्व-क्षितिज पर आना एक विलक्षण घटना थी। गांधी अपने आप मे एक पूर्ण युग थे, एक ऐसा युग जिसे देख कर विश्व पटल पर हर कोई अचम्भित रह जाता है। उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के आगे उनके शत्रु भी विवश हो उन्हें यह कहने को बाध्य हो गए कि-“गांधी इज वन मेंन आर्मी।”

इस विलक्षण व्यक्तित्व पर एक बार एल्बर्ट आइन्स्टीन ने हैरानी जताते हुए कहा था, “आने वाली पीढ़ी आश्चर्य करेगी, वे विस्मयपूर्वक पूछेंगी, क्या ऐसा कोई हाड़-मांस वाला व्यक्ति कभी इस धरती पर चलता-फिरता भी था? वे मुश्किल से यह विश्वास करेंगी कि आदमी के ऐसे शरीर में देवता, संत अथवा देवदूत का होना कभी संभव हुआ।”

अद्भुत व्यक्तित्त्व था महात्मा गांधी का, उनकी वैचारिक ऊष्मा इतनी प्रखर और सुयोग्य थी कि स्वतः ही महावीर, बुद्ध, फ्रांसिस, ईसा आदि सभी से जुड़ जाती है। एक तरफ अमेरिकी चिन्तक डॉ. जे. एच. होम्स गाँधी की तुलना ईसा से करते थे, तो दूसरी ओर डॉ. रूफ़स जोम्स उन्हें संत फ्रांसिस मानते थे।

मार्टिन लूथर ने अपने संघर्षों में वैचारिक साथी के रूप में महात्मा गांधी के नाम की घोषणा की थी। वे अपने मिशन “अश्वेतों के अधिकारों की लड़ाई” के लिए सदैव गांधी के प्रसाद के अभिलाषी रहे। मार्टिन ने अपनी एक कविता में गांधी को अपने रोल मॉडल के रूप में स्वीकारते हुए लिखा था –
“कैसी थी उनकी लड़ाई !
जिसमें विद्वेष-घृणा के लिए
कोई जगह नहीं थी।
हड्डियों के उस ढांचे में
कैसा था वह आत्मबल !
मैं सर्वदा उनके प्रसाद का
अभिलाषी रहा हूँ और रहूंगा |”

आखिर क्या था महात्मा गांधी में ऐसा?जो उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को इस कदर प्रभावित किया? वह भी समय, काल से परे की भारत की पहचान जैसे दुनियाभर में वेदों और गीता से है उतनी ही आज भी गांधी से है।

सत्य, अहिंसा, स्वदेशी आंदोलन, स्वराज्य, नारी संबल, कृषि प्रधान अर्थ तंत्र, ट्रस्टी शिप, सर्वोदय जैसे गांधीजी के विचार आज भी उतने ही समीचीन हैं जितने उस युग मे थे। गांधी के विचार कालजयी हैं। उनके बताए रास्ते पर चलने वाला कोई भी राष्ट्र आज भी सफलता का शिखर छू सकता हैं। इसलिए गांधी हर युग मे लोकप्रियता के उच्च शिखर पर है और उनके विचार सदैव प्रासंगिक है।

आज संपूर्ण विश्व बाज़ारवाद के दौड़ में शामिल हो चुका है। लालच की परिणति युद्ध की सीमा तक चली जाती है। महाशक्तियों की महत्वकांक्षी नीतियां राष्ट्रों को लीलती जा रही है। चाहे गाजा पट्टी को ले कर इस्राइल फिलिस्तीन युद्ध हो या तालिबानियों का अफगान तांडव या फिर पाकिस्तान की हमारी सीमाओं पर घुसपेठ हो या चीन द्वारा गलवान घाटी में उपद्रव हो ऐसे में गांधीमत की वैश्विक प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक हो जाती है।

तो विचारणीय यह है कि ऐसे में क्या गांधीमत को अपनाने के लिये हमें टोपी या धोती पहनने की जरूरत है या फिर ब्रह्मचर्य अपनाने या फिर घृणा करने की आवश्यकता है? नहीं, इनमें से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। वरन घृणा को दूर करने के लिये गांधीमत को अपनाने की जरूरत है। गांधी को समझने के लिए गांधी दर्शन को समझना नितांत आवश्यक है। क्या है गाँधीमत?

वस्तुतःगांधी ने कुछ नया दर्शन नही दिया वरन सदियों से जमीं धूल को साफ़ करके दुनिया के सामने वही सत्य उजागर किया था जो भारतीयों के पूज्य ग्रंथों यथा-वेदों, उपनिषदों, रामायण, गीता आदि में युगों से कैद था, बस उसी ज्ञान को गांधी ने अपने व्यवहार में उतारा था। उन्होंने “आत्मवत् सर्वभूतेषु” को जिया था। उनके लिए ईश्वर का साक्षात्कार ‘प्राणिमात्र का दर्शन’ था। यही कारण था कि सनातन मूल्य के संवाहक इस गांधी दर्शन को न केवल तत्कालीन विश्व मनीषा ने मुक्त कंठ से सराहा वरन आज भी दुनिया की महान विभूतियां उसकी तरफ आकृष्ट हुई है। सबने अनुभव किया है कि ‘गांधी-दर्शन’ ही सच्चे अर्थों में सभी युगों में ‘विश्व-दर्शन’ है।

सत्याग्रह आज भी प्रासंगिक-

महात्मा गांधी के सत्याग्रह को युद्ध के नैतिक विकल्प के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने आम जन को यह सिखाया कि सत्याग्रह का प्रयोग समस्या तथा संघर्ष के समाधान हेतु किस प्रकार किया जाता है। गांधी का सत्याग्रह राजनीतिक मुद्दों के निवारण हेतु एक प्रभावी साधन साबित हुआ है। युद्ध और शांति, आतंकवाद, मानवाधिकार, सतत विकास, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक-राजनीतिक अशांति और राजनीतिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचार से संबंधित समकालीन चुनौतियों में से कई को गांधीवादी तरीके से हल किया जा सकता है। अतः 21वीं सदी के लोगों के पास अभी भी गांधीवाद से सीखने के लिये बहुत कुछ सीखना बाकी है।

अहिंसा और साम्प्रदायिक सद्भावना-

सांप्रदायिक कट्टरता और आतंकवाद के इस दौर में गांधीवाद तब और प्रासंगिक हो जाता है जब सांप्रदायिक सद्भावना बनाये रखने के लिए गांधी जी सभी धर्मो के प्रति समान आदर भाव रखने को कहते हैं। आज भी भारत और विश्व में सांप्रदायिक तनाव के शमन के प्रभावी उपाय के रूप में सर्वधर्म प्रार्थना सभा एवं प्रभात फेरी जैसे गांधीवादी तकनीक का प्रयोग सामान्य है। गांधीवाद अहिंसा और सत्याग्रह पर टिका है जो चार उपसिद्धांतों सत्य, प्रेम,अनुशासन एवं न्याय पर आधारित है, जिनकी उपादेयता एवं प्रासंगिकता, वैश्वीकरण के वर्तमान हिंसक दौर में और बढ़ जाती है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र संघ ने गांधी जी की जन्म तिथि 2 अक्तूबर को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में स्वीकार कर मान्यता प्रदान की है। गांधीजी का यह कथन आज भी समीचीन है कि “इस संसार में हमारी जरूरत के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध है, परंतु हमारे लालच के लिए नहीं।”

गांधी का आर्थिक स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता का सिद्धांत–

गांधीदर्शन हर युग में प्रासंगिक हैं, उनके आर्थक स्वतन्त्रता व स्व आत्मनिर्भरता के विचार हर युग में हमें ही नही हर अर्थव्यवस्था को रास्ता दिखाएंगे। गांधी विचार में समकालीन तमाम आर्थिक समस्याओ का हल छिपा है। गांधी का आर्थिक दर्शन आज भी समीचीन है। उन्होंने विकास के विभिन्न पहलुओं को पूरी व्यापकता के साथ रखा है। उनके जीवन चरित्र को तीन हिस्सों में बांटकर देखा जा सकता है। इनमें वर्ष 1919 का हिंद स्वराज, 1934 का स्वदेशी आंदोलन और 1948 का ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त है। इनमें ट्रस्टीशिप बेहद महत्वपूर्ण है। यह कितनी विचित्र बात है कि भारत सबसे गरीब देशों में आता है, लेकिन यहां के लोग दुनिया के चौथे सबसे धनी लोग हैं। आज समाज में गैर समानता बढ़ती जा रही है। विकास के तमाम आधुनिक सिद्धांतों के प्रयोग और क्रियान्वयन के बाद भी यह गैप कम नहीं हो रहा। हम अपनी योजनाओं पर मंथन नहीं कर रहे। नारे-वायदों-भाषणों में विकास सिमट गया है। हम कहते हैं- सबका साथ, सबका विकास। जब अवसरो की समानता होगी, तभी समाज में संतुलित विकास होगा और जब हम आत्मनिर्भर बनेंगे तभी देश विकसित हो पाएगा। ट्रस्टीशिप एक सामाजिक-आर्थिक दर्शन है जिसे गांधी जी द्वारा प्रतिपादित किया गया। यह अमीर लोगों को एक ऐसा माध्यम प्रदान करता है जिसके द्वारा वे गरीब और असहाय लोगों की मदद कर सकें जो भारत को सही अर्थों में समाजवादी विकास की ओर प्रेरित करता है जो सही मायनों में सभी देशों में सच्चा समाजवाद ला सकता है।

पंचायत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था :

इस मुद्दे पर गांधी के विचार बहुत स्पष्ट थे। उनका कहना था कि यदि हिंदुस्तान के प्रत्येक गाँव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्वीर की सच्चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे, अर्थात् न कोई पहला होगा और न आखिरी। इस बारे में उनका मानना था कि जब पंचायती राज स्थापित हो जाएगा तब लोकतंत्र ऐसे भी अनेक काम कर दिखाएगा, जो हिंसा कभी नहीं कर सकती। गांधी भलीभाँति जानते थे कि भारत की वास्तविक आत्मा देश के गाँवों में बसती है। अत: जब तक गाँव विकसित नहीं होंगे, तब तक देश के वास्तविक विकास की कल्पना करना बेमानी है। गांधी के दर्शन में देश के आर्थिक आधार के लिये गाँवों को ही तैयार करने की कल्पना की गई है। गांधी का विचार था कि भारी कारखाने स्थापित करने के साथ-साथ दूसरा स्तर भी बचाए रखना ज़रूरी है, जो कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था है। ग्रामीण भारत को राजनैतिक व आर्थिक दृष्टि से सशक्त बनाना हर युग की आवश्यकता है और यही हर विकासशील देश की प्राथमिक आवश्यकता है।

सर्व धर्म समभाव:

गांधी को समझने के लिये यह स्पष्टतः समझ लेना होगा कि गांधीवाद के नीचे धर्म की एक ठोस बुनियाद है, जिसके बारे में उनका मानना था कि इसके संस्कार उन्हें अपनी माता से मिले। गांधी ने अपने अखबार ‘यंग इंडिया’ में लिखा था कि सार्वजनिक जीवन के आरंभ से ही उन्होंने जो कुछ कहा और किया है, उसके पीछे एक धार्मिक चेतना और धार्मिक उद्देश्य रहा है। राजनीतिक जीवन में भी उनके धार्मिक विचार उनके राजनीतिक आचरण के लिये पथ-प्रदर्शक बने रहे। वे स्वधर्म के साथ अन्य सभी धर्मों का समान आदर करते थे। उनका कहना था कि मेरा धर्म तो वह है जो मनुष्य के स्वभाव को ही बदल देता है, जो मनुष्य को उसके आंतरिक सत्य के अटूट संबंध में बाँध देता है और जो सदैव पाक-साफ करता है। गांधी के अनुसार धर्म सबसे प्रेम करना सिखाता है। न्याय तथा शांति की स्थापना के लिये खुद के बलिदान की प्रेरणा देता है। उनकी निगाह में धर्म निर्बल का बल तथा सबल का मार्गदर्शक है यही आधुनिक विश्व को समझने की सबसे अधिक जरूरत है।

स्वच्छता का संदेश व अश्पृश्यता का अंत :

स्वच्छता का संदेश एवं अस्पृश्यता व छुआछूत का अंत गांधी दर्शन के केंद्र में हैं और इन पर उनके विचार स्पष्ट एवं पूर्ण रूप से केंद्रित थे। जनसरोकारों से जुड़े अपने लगभग हर संबोधन में गांधी स्वच्छता के मामले को उठाते थे। उनका मानना था कि नगरपालिका का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य सफाई रखना है। जो कोई भी उनके आश्रम में रहने आता था, तो गांधी जी की पहली शर्त यह होती थी कि उसे आश्रम की सफाई का काम करना होगा, जिसमें शौच का वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण करना भी शामिल था। गांधी का मानना था कि स्वच्छता ईश्वर भक्ति के बराबर है, इसलिये वे लोगों से स्वच्छता बनाए रखने को कहते थे और इसिलए जो समाज को स्वच्छ बनाते है उन्हें वे हरि के प्रिय हरिजन कह कर सम्मान देते थे। वे चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एक साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिये कार्य करें। आज भी “स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत ” के केंद्र में गांधी के विचार ही कार्य कर रहे है।

सर्वोदय एव स्वराज-

सर्वोदय शब्द का अर्थ है ‘यूनिवर्सल उत्थान’ या ‘सभी की प्रगति’। यह शब्द पहली बार गांधी जी ने राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर जॉन रस्किन की पुस्तक ” अन टू दिस लास्ट” पर पढ़ा था। सर्वोदय के इसी विचार में सभी का हित व वसुधैव कुटुम्बकम की भावना सम्पोषित होती है। सबका साथ, सबका विश्वास और सबका सम्मिलित प्रयास की आज की हमारी मूल नीति इसी सर्वोदय पर आधारित है क्योंकि यही हर युग की मांग है। गांधी जी के लिये स्वराज का मतलब व्यक्तियों के स्वराज (स्व-शासन) से था और इसलिये उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके लिये स्वराज का मतलब अपने देशवासियों हेतु स्वतंत्रता है और अपने संपूर्ण अर्थों में स्वराज स्वतंत्रता से कहीं अधिक है, यह स्व-शासन है, आत्म-संयम है और इसे मोक्ष के बराबर माना जा सकता है। हालाँकि स्वराज शब्द का अर्थ स्व-शासन है, लेकिन गांधी जी ने इसे एक ऐसी अभिन्न क्रांति की संज्ञा दी जो कि जीवन के सभी क्षेत्रों को समाहित करती है। गांधी के ‘स्वराज’ का स्वरूप विराट था, उसमें मात्र अंग्रेजों की दासता से मुक्ति ही शामिल नहीं थी, बल्कि मुक्ति के बाद का ‘ब्लू प्रिंट’ भी था। वे नहीं चाहते थे कि ‘अंग्रेजी शासन बिना अंग्रेजों के चलता रहे’। परिवर्तन जरूरी था। अतःउन्होंने ‘स्वराज’ के नए आयाम खोले। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता, उद्योगों का विकेंद्रीकरण, सांस्कृतिक स्वतंत्रता, इंडिया की जगह ‘हिन्द’ का प्रयोग और आत्मानुशासन पर बल दिया। बिना इसके इच्छाएँ रक्तबीज की तरह जन्म लेती हैं और राष्ट्र में गृहयुद्ध जैसे हालात बन जाते हैं। कुल मिलाकर इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उपजी अनेकानेक समस्यायों का निदान है गांधी के स्वराज में। भारत पर सांस्कृतिक हमले बदस्तूर जारी हैं, अंग्रेजों के बाद यह बीड़ा पश्चिम ने उठाया है। उनके पोषित बुद्धिजीवी अमेरिकी वर्चस्व को पूरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं। दूसरे देशों में राजनीतिक, सैनिक और आर्थिक हस्तक्षेप को ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ बताया जा रहा है। आज जब पश्चिम के अहंकारी और दम्भी वैचारिक परंपरा ने सोशल मीडिया व अन्य प्लेटफार्म के वाहक रूप में अपने पैर पसार कर पश्चिमी विचारो द्वारा भारत की अस्मिता पर प्रहार किया जा रहा है तो इस दुष्प्रचार के दौर में गाँधी का स्वराज-दर्शन वरेण्य है।विश्व के कई देशों की अनेकों समस्याओ का हल इन्ही दो मजबूत विचारो में छिपा है।

गांधी और महिला सशक्तिकरण:

दो सदी पहले ही गांधी जी ने यह समझ लिया था कि दुनियां की आधी आबादी को पीछे छोड़ कर कोई भी समाज- राष्ट्र विकास नही कर सकता है। गांधीजी महिलाओं को सशक्तीकरण के विषय के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि उनका मानना था कि महिलाएं स्वयं इतनी सबल हैं कि खुद की ही नहीं वरन संपूर्ण मानव जाति के कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उनका कहना था कि कि अगर महिलाओं को आजाद होना है तो उन्हें निडर बनना होगा। परिवार और समाज के बंधनों को तोड़ते हुए उन पर थोपे गए अन्याय का विरोध करना ही उन्हें जुल्मों से मुक्ति दिला सकता है। यह उनकी भविष्यवेत्ता-अंतरदृष्टि ही थी कि उन्होंने ऐसे सर्जनात्मक कार्यक्रम बनाए की केवल शिक्षा ही नहीं वरन उनकी स्थिति में सुधार कर उन्हें आर्थिक दृष्टि से भी सक्षम बना सके। यही कारण था कि आत्मविश्वास से लबरेज कई महिलाओं ने स्वतन्त्रता संग्राम में हिस्सा लिया, वह विदेशी वस्तुओं की दुकानों में पिकेटिंग करती थी उनका बहिष्कार करने के लिए लोगों को समझाती थी। उन्होंने उस समय नारी सशक्तीकरण के लिए जो प्रयास किए थे, उनका कभी महत्व कम नहीं हो सकता। उन्होंने भारत में स्त्रियों को एक नई दिशा दिखाई। वर्तमान में तथाकथित भटके हुए महिला आंदोलनों को गांधी जी की दिशा में चलते हुए उनके विचारों के आलोक में नवीन प्रेरणा ले कर समाधान खोजने चाहिए, वह आज के युग मे पूरे वैश्विक परिदृश्य में नारी सन्दर्भ में उपर्युक्त है। वर्तमान वैश्विक नारी सन्दर्भों में भी यही समीचीन है।

वास्तव में,महात्मा गांधी का कथन उचित ही है-‘मैं यह नहीं चाहता कि मेर घर को ऊंची चारदीवारों से घेर दिया जाये और खिड़कियों को मजबूती से बंद कर दिया जाये, मैं चाहता हूं कि सभी संस्कृतियों का प्रवाह मुक्त रूप से मेर घर में हो परंतु मैं उस प्रवाह में उखड़ने से इनकार करता हूं’।”गांधीवादी दर्शन जीवन के विभिन्न पहलुओं के लिए शक्ति एवं प्रेरणा का निरंतर बहने वाला एक ऐसा स्रोत है, जो शताब्दियों तक प्रकाश स्तंभ के रूप में बना रहेगा। बल्कि वैश्विक गांव एवं बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के इस दौर में गांधीवाद की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है। वैश्वीकरण की उपज होने के कारण गांधी जी स्वयं इसके नफे-नुकसान से भली भांति परिचित थे। वैश्वीकरण को प्राचीन घटना मानते हुए वे आश्वस्त थे कि विभिन्न संस्कृतियों के संश्लेषण से भारतीय संस्कृति को कोई खतरा नहीं है। वे पहले ही भांप चुके थे कि वैश्विक समाज के निर्माण के साथ ही संप्रभु राष्ट्रों को न सिर्फ राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उपनिवेशवाद से बल्कि औद्योगिकीकरण के साथ ही वर्ग संघर्ष एवं पर्यावरणीय समस्या से भी रूबरू होना पड़ेगा, जो समय के साथ सत्य सिद्ध हुआ। आज जब सारा विश्व बारूद के ढेर पर बैठा है, रासायनिक हथियारों परमाणु बमो की कतारें सजी पड़ी है,विस्तारवादी आतंकवादी नीतियां पैर पसारे खड़ी है,बाजारवाद अपने चरम पर है और पर्यावरण संकट की चुनोतियाँ से हम सभी लड़ रहे है ऐसे में गाँधीमत का ग्लोबलाइजेशन अत्यंत आवश्यक है। भविष्य की ऐसी ही भयावह स्थिति को भांपकर जापान के संत कवि तोशियो साका ने गांधीजी के बारे में एकदम सटीक लिखा था –
“जब तक इस धरती का
एक भी व्यक्ति उदास है, दुखी है
गांधी उसकी उदासी, उसके दुःख में
हिस्सा बंटाने के लिए
बराबर आते रहेंगे
वे आवागमन से न कभी मुक्त होंगे।”

गांधी की अंध आलोचना करने वाले कम नही होंगे किन्तु समयरेखा के साथ उनका अनुसरण कर विजेता बनने वाले मार्टिन लूथर, नेल्सन मंडेला, स्टीव बिकोऔर औंग सू कई, रोमेन रोल्लांड ,लांजा देलवस्तो, जॉन लेनन, अल्बर्ट आर्नल्ड ‘अल’ गोर, शेख मुजीबुर्रहमान, बराक ओबामा जैसे वैश्विक नेताओ की भी कमी नही है जो शांतिदूत गांधी को आदर्श मानते हैं और गांधी के देश भारत की यात्रा को ‘तीर्थयात्रा’ कहते है। गाँधीमत हर युग मे कारगर रहा है, रहेगा क्योंकि वही भारतीय आर्ष ग्रँथों का व्यवहारिक प्रामाणिक रूप है, चाहे हम कितनी ही आलोचना कर ले किन्तु गांधी हर युग मे प्रासंगिक रहेंगे क्योंकि वह ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ और ‘विश्व बंधुधत्व’ की भारतीय संस्कृति का प्राणवंत रूप है।

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