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छत्तीसगढ़ी लोक में गणित

गणित से मानव का अत्यन्त निकट संबंध है। वह गणित के बिना एक पग भी चल नहीं सकता। पल-पल में उसे गणित का सहारा लेना पड़ता है। साँसों का चलना, हृदय का धड़कना, नाड़ी की गति, ये सब नियत हैं और इसमें गणित भी है। यदि मानव की शारीरिक क्रियाओं के गणित में थोड़ा भी अंतर होता है तो उसका जीवन रूक-सा जाता है। भाषा की तरह गणित के बिना भी मनुष्य का जीवन संभव नहीं है। भाषा और गणित को संस्कृति से भी है। यदि भाषा और गणित को संस्कृति की उपज कहा जाए तो इसमें अतिश्योक्ति नहीं होगी।

हम जानते हैं कि संस्कृति मानव जीवन के बीच के क्रियाकलापों का प्रतिफलन है। मनुष्य को अपने क्रियाकलापों के संचालन में गणना की आवश्यकता होती है, जिससे गणित का जन्म होता है। प्रारंभ में मनुष्य ने अपने जीवन के संचालन के लिए कुछ प्रतीकों का सहारा लिया होगा, वही आगे चलकर मानक गणित का रूप ले लिया होगा, आज भी गाँव में जिन लोगों ने औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की है, वे अपनी तरह से गणितीय संक्रियाएं करते हैं। संख्याओं को लिखने का उनका अपना एक तरीका होता है। कभी-कभी तो देखा जाता है कि उनकी गणितीय संक्रियाएं पढ़े-लिखे लोगों से बेहतर होती है।

गणित मानव के जन्म की प्रक्रिया में ही है। जब स्त्री एवं पुरूष के 22-22 गुणसूत्रों का योग होता है, तब मानव शिशु का निर्माण प्रारंभ होता है। माँ उसे अपने गर्भ में नौ माह तक धारण करती है। जन्म के छः दिन के बाद छठी होती है। बारह दिन में बरही होता है। मानव जीवन के विकास की प्रक्रिया में जितनी भी क्रियाएं होती हैं, उन सबमें गणित जुड़ा हुआ होता है। यदि हम बारीकी से देखें तो जन्म मृत्यु पर्यन्त प्रत्येक क्रिया में गणित-ही-गणित है,गणित से भिन्न कुछ भी नहीं। हम मानव विकास की इस प्रक्रिया को गणित का योग कह सकते हैं।

ईश्वर ने एक ब्रह्यांड बनाया। जिसमें आठ ग्रह हैं। सभी ग्रहों के उपग्रह नियत हैं। ग्रहों का संचरण व गति निर्धारित है। तारे हैं, तारा मंडल है। सभी अपने निर्धारित समय पर गति करते हैं। 12 घंटे का एक दिन और 12 घंटे की एक रात होती हैं। 12 माह का एक वर्ष और एक वर्ष 365 दिन का होता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उसे एक चक्र पूरा करने में 24 घंटे का समय लगता है और वह 365 दिनों में सूर्य का एक चक्कर लगाती है। पूरी प्रकृति इसी तरह गणितीय क्रीड़ा करती है। यदि प्रकृति की यह गणितीय क्रीड़ा विराम ले ले, तो जीवन पलभर में ही नष्ट हो जाएगा।

मानव जीवन और प्रकृति के गणित के साथ-साथ लोक का भी गणित है। ‘‘लोक मानव जीवन की अंतःक्रिया है।’’ इस अतःक्रिया से उपजा हुआ गणित का ज्ञान लोक का गणित है। यह गणित सबसे अनोखा है। उसमें उसकी मौलिकता है। उसने ही इसे सृजित किया है, इसलिए इसकी गणना की प्रक्रिया भी अलग तरह की है और इसे सीखने की प्रक्रिया भी अनोखी है। लोक अपनी आने वाली पीढ़ी को कोई कापी-पैंसिल ले कर अपना गणित नहीं सीखता फिर भी आने वाली पीढ़ी उसे सहज ही सीख लेती है। यदि सीखने की इस प्रक्रिया को देखें तो यह ज्ञात होता है कि लोग क्रिया करते हुए एक दूसरे के संपर्क में आते हैं, एक दूसरे की क्रिया को ध्यान से देखते हैं, विचारों का संप्रेषण और क्रियाओं के बीच गणित को समझते हैं और सहज ही उस गणित को सीख लेते हैं। यह ज्ञान हस्तांतरण की अनोखी प्रक्रिया है। एक लुहार के बच्चे को ज्ञात होता है कि लोहे की प्रकृति कैसी है और उसे कितना पानी दिया जाना है, ताकि वह सही आकार ले सके, न ही टूटे और न ही मुड़े। वह जानता है-‘‘कड़ा पानी देना है या सेव पानी देना है।’’ यह उसका गणितीय ज्ञान है, जिसे उसने परंपरा से सीख लिया है। इसीलिए लोक में कहावत है-’’लोहा देखकर पानी दिया जाता है।’’

लोक के गणित और प्रक्रिया को जानकर ही संस्कृति को समझा जा सकता है। अलग-अलग संस्कृति में गणित की विशेषता देखी जा सकती है। एक ही संस्कृति में अलग-अलग जाति या समुदाय का अपना अलग गणित होता है, जिसके माध्यम से वे अपने जीवन को संचालित करते हैं। घाना, पहट, तार, ताना आदि अलग-अलग समुदाय की मापन के शब्द हैं। लोक में गणित और गणित में लोक का सीधा संबंध इसी से देखा जा सकता है।

घर में गृहिणियाँ भोजन बनाती हैं। वह किसी का पेट नहीं नापती, फिर भी जानती हैं कि उन्हें कितना भोजन बनाना है। कितनी दाल, कितना चावल, कितनी सब्जियाँ बनानी हैं। भोजन बनाने में कौन-कौन-सी सामग्री कितनी मात्रा में चाहिए। कितनी आँच में कौन-सी सामग्री बनेगी। रसोई के गणित के आधार पर नमक, मिर्च एवं मसाले का एक अनुपात है, उसे वे भली भांति जानती हैं। रसोई के गणित को कोई अन्य नहीं कर सकता जिसने कभी रसोई नहीं बनाई है, भले ही वह कितनी भी पढ़ी-लिखा क्यों न हो रसोई के गणित को जानने के लिए गृहिणियां को किसी विश्वविद्यालय से उपाधि लेने की आवश्यकता नहीं होती। वे इसे परंपरा से सीख लेती हैं। परंपरागत ज्ञान लोक-तत्व की उपज है।

बहुत से किसान पढ़े-लिखे नहीं होते, फिर भी वे कृषि संबंधी कार्यों को बेहतर ढंग से संपादित करते हैं। कब क्या बोना है, कैसे बोना है, ये सब वे करते हैं। जब वे खेंतो की जुताई करते हैं तब वे यह भी जानते है कि कितनी गहराई से जुताई करनी है। उपयोग किए जा रहे बीज की प्रकृति क्या है? मिट्टी किस तरह की है, उसमें कितनी नमी है, उसी हिसाब से वे हल चलाते हैं। यदि बीज अधिक गहराई में चला जाए तो वह सड़ जाता है और ऊपर पड़े रहने पर सूख जाता है। खेत की जुताई का उनका अपना गणित होता है, जो मिट्टी और बीज की प्रकृति पर निर्भर करता है। कौन-सी फसल कब बोनी है और उसमें कितना खाद-पानी देना है, यह भी वे भली-भाँति जानते हैं, तदनुरूप वे कार्य करते हैं। यहाँ तक कि बैलों को जुए से बाँधने का भी गणित है। मिट्टी कितनी गीली है उस हिसाब से वे हल को बाँधते हैं जिसे ‘नाहना’ कहते है। यदि ‘नाहने’ की क्रिया उचित ढंग नहीं हुई तो ठीक से जुताई नहीं होगी। थोड़ी सी लापरवाही से बैल के पैर में चोट लग सकती है। इन सभी क्रियाओं में गणित निहित है, जिसे वे जानते हैं।

किसान मौसम विज्ञानी भी है। उसे मौसम का भी पर्याप्त ज्ञान होता है, इसलिए वे मौसम के अनुसार फसलों का चयन करता है। जब लोक के इन गणितों पर हम विचार करते हैं तो हम अचंभित रह जाते हैं। इतना सारा ज्ञान एक आम व्यक्ति ने किस तरह अर्जित किया होगा। वह बादलों की प्रकृति, हवा की दिशा और गति आदि से अपने कृषि कार्य के लिए अनुमान लगा लेता है। इस अनुमान में एक तरह से गणित छिपा हुआ है।

लोक के गणित में मापन का तरीका उनका अपना है, कहीं इकाई है और कहीं नहीं, कहीं संख्या है और कहीं नहीं भी है। बस्तर के गाँवों में जाकर यदि आप पूछें कि अमुक गाँव की दूरी कितनी है तो वह कह देगा-‘‘उत्ते तो है’’ अर्थात् बहुत निकट है। बहुत दूर होने पर कह देगा पेज बेरा (दोपहर) पहुंचगे या बेल बस्ते-बस्ते (संध्या के समय)। वह कभी यह नहीं कहेगा कि एक किलोमीटर है, दो किलोमीटर है या दस किलोमीटर। इससे स्पष्ट हो जाता है कि उसका अपना गणित है। उसके गणित में दूरी का मापन भले ही न हो किंतु दूरी ज्ञान अवश्य ही है।

अनुमान लगाना भी एक तरह का गणित है। यदि इसी प्रश्न को छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाके में किसी से पूछा जाए, तो वह कह देगा-‘‘एक कोस है या दो कोस है।’’ कोस का मतलब आज की इकाई में लगभग तीन मील। लोक में मापन की यह अपनी परंपरा है। वे उसी परंपरा में मापता है। क्षेत्र के अनुसार मापन की अपनी परंपरा है। जो संस्कृति में रच-बस गया है और संस्कृति का हिस्सा बन गया है। इसे अलग करके नहीं देखा जा सकता।

यदि छत्तीसगढ़ की ही मापन संस्कृति को देखें तो यहाँ मापन के लिए अमानक इकाई में मुठा, पसर और कुरो था। जब मानक इकाई की शुरूआत हुई तो फोहाई, पैली और काठा आया। चार फोहाई बराबर एक खंडी। लोक में संख्या का गणना अपना अलग तरीका है। यहाँ अधिकतम संख्या बीस तक की ही है। बीस काठा बराबर एक खंडी, बीस खंडी बराबर एक गाड़ा।

मुद्रा गणना के लिए अमानक में कोड़ी का प्रचलन था। मानक में पैसा, आना, रूपया था। छः पैसे का एक आना, सोलह आने का एक रूपया और बीस रूपये का एक कोरी। वस्तु की गणना के लिए कोरी या दर्जन इकाई थी। समय की गणना सूरज, चाँद व शुक्रतारे से की जाती थी। जब कोई किसी चाहता है, यदि सामने वाला उसे रोकना चाहता है तब वह कहता था-‘‘चिटिक अउ बइठ ले या घड़ी भर अउ बइठ ले।’’ इस कथन का अभिप्रय किसी निर्धारित समय से नहीं होता, किंतु यह आग्रह अवश्य होता है कि कुछ समय और साथ बिताएं।

लोक में गणित का सरोकार उतना ही है जिससे जीवन का संचालन हो सके। लोक के गणित में बड़ी अपेक्षाएं नहीं दिखती हैं, किंतु इतना अवश्य है कि वह ठहरता नहीं। वह निरंतर प्रवहमान रहता है, अपना स्वरूप बदलता रहता है और धीरे-धीरे संस्कृति का हिस्सा बन जाता है। यदि हम आदि परंपराओं का विश्लेषण करें तो संस्कृति से ही हम गणित की व्युत्पत्ति देख सकते हैं।

किताबी गणित का अपना अलग स्वरूप है। वह अपने नियमों से बॅंधा हुआ है। उसे सिखाने की अपनी अलग प्रक्रिया है, जिसके आधार पर उसकी प्रक्रति बन गई है। किताबी गणित सिखाने की इस प्रक्रिया में रूढ़ता दिखाती है। शायद यही कारण है कि किताबी गणित धीरे-धीरे उबाऊ होने लगा है। उसकी भाषा का सरोकार लोक से नहीं होने के कारण वह जटिल हो गया है। यही कारण है कि बच्चे गणित से भागते हैं। किताबी गणित को लोक के गणित से तादात्म्य स्थापित करते हुए आगे बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि वह रोचक और आनंददायी स्वरूप ले सके।

लोक का गणित लोक के साथ भिन्न-भिन्न रूपों में दिखता है। छत्तीसगढ़ी ‘हाना’ में लोक-गणित के कुछ इस प्रकार दिखते हैं-

  1. रात भर गाड़ी हांके कुकदा के कुकदा
  2. सौ सोनार के तब एक लोहार के
  3. कुला दुवारी
  4. बीता भर लइका अउ गज भर काम
  5. एक हाथ खीरा के पाँच हाथ बीजा
  6. तेली घर तेल रइही ता पाहर ल नइ पोत ड़ारे
  7. दहरा के भोहरा म बाढ़ी नइ खाए
  8. दुहानू कस दुहत हे
  9. नंगरा के नौ नांगर
  10. अंधरा ल मारे पंद्रह घाव
  11. मोटरा कस मोटरावत हस
  12. जउन म बूड़े टांडी, तउन म हो खांडी
  13. घर के मुरगी दार बरोबर
  14. जेकर पसरा चाकर ओकरे पसरा पातर
  15. जेकर नौ सौ गाय समे परे म मही मांगन जाय।
    पहेलियों में गणित
  16. आठा एनी,बारा बेनी, चार चुरूका, दू भूरूका।
  17. दू गोड़ के टेटका, मुंड़ी खुंदे त जाने नहीं, पूछी खुंदे अटियाय।
  18. गवही नइ ये न साखी, तीन बोड़री छै आँखी।
  19. अड़हर बड़र बँधना छोर, तीन मुड़ दस गोड़।
  20. सुन ले मुड़ी देख ले कान डैकी डौका के बाईस कान।
  21. ऊपर देश ले उतरे भेंड़ा, ओखे मोखे म सींग।
    चार महीना चारा चरे, आठ महीना भांजे नींद।।
  22. ऊपर में लोहा के ढकना,
    भीतर में चार ठन पखना
  23. एक गोड़ के घोड़ा बने, दुई झन बने सवार।
    आगू बढ़े न पाछू हटे, बेड़ा म बहुत भगाय।
  24. एक चिराई बारा अंडा, चार कच्चा, चार पक्का, अउ चार ठन ठंडा।
  25. एक रूख म बारा खांधी, फरे तीन सौ साठं
  26. एक पेंड़ गसपति, तेकर बारा पांव।
    तीस-तीस के झोंत्था, अलग-अलग हे नाव।
  27. कांचा म एक सेर, मरे म सौ सेर। जरे म राख, उड़े चिरई बीन पॉंख।
  28. कांचा रहे सोन करेजी, गादर म मीठाय।
    बइंया लागंव बिरथा भाई, पाका म करूवाय।

आलेख

डॉ बलदाऊ राम साहू
दुर्ग, छत्तीसगढ़ मो. 09407650458

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