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महानदी उद्गम एवं कर्णेश्वर महादेव मंदिर

पुरातात्विक खजाने से समृद्ध छत्तीसगढ में हम जिस स्थान पर जाते हैं, वहां कुछ न कुछ पुरातात्विक सामग्री प्राप्त होती है तथा प्राचीन विरासत के एक नए अध्याय से परिचय होता है। रायपुर से धमतरी होते हुए 140 किलो मीटर पर नगरी-सिहावा है, यहां रामायण कालीन सप्त ॠषियों के प्रसिद्ध आश्रम हैं। नगरी से आगे चल कर लगभग 10 किलोमीटर पर भीतररास नामक ग्राम है। वहीं पर श्रृंगि पर्वत से महानदी निकली है। यही स्थान महानदी का उद्गम माना गया है।

चित्रोत्पला गंगा (महानदी) भारत की प्रमुख नदियों में से एक है, महाभारत के भीष्म पर्व में चित्रोत्पला नदी को पुण्यदायिनी और पाप विनाशिनी कहकर स्तुति की गयी है – उत्पलेशं सभासाद्या यीवच्चित्रा महेश्वरी। चित्रोत्पलेति कथिता सर्वपाप प्रणाशिनी॥ चित्रोत्पला गंगा के तट पर सभ्यता का विकास हुआ, शासकों ने राजधानी बनाई और समृद्धि पाई। यहीं महेन्द्र गिरि पर्वत है, जहाँ महर्षि परशुराम का आश्रम है। नगरी और सिहावा के मध्य में देऊरपारा कर्णेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है।

बालुका एवं महानदी का संगम स्थल

नगरी से 6 किलोमीटर पर स्थित है देऊरपारा, इसे छिपली पारा भी कहते हैं। यह गाँव महानदी और बालुका नदी के संगम पर पहाड़ी की तलहटी में बसा है। नदी के एक फ़र्लांग की दूरी पर मंदिर समूह हैं, जिनमें कुछ नवीन एवं प्राचीन मंदिर दिखाई देते हैं। यहाँ कर्णेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर जिसके कारण इस स्थान को कर्णप्रयाग भी कहा जाता है।

कर्णेश्वर महादेव गर्भ गृह का द्वार अलंकृत है। दाहिने हाथ की तरफ़ एक नागरी लिपि में शिलालेख लगा हुआ है। शिलालेख देखकर इस मंदिर के एतिहासिक महत्व का दृष्टिगोचर होता है। सपाट बलुआ पत्थर पर अंकन किया गया है। कर्णेश्वर महादेव के सम्मुख नंदी भी विराजमान हैं तथा नंदी के मंडप के पीछे गणेश जी का विग्रह स्थापित है। इस स्थान पर गांव के यादव समाज, पटेल समाज, विश्वकर्मा समाज, केंवट समाज, आदि ने भी मंदिर बना रखे हैं।

कर्णेश्वर मंदिर एवं सूर्य प्रतिमा

मंदिर प्रांगण में कबीर चौरा भी दिखाई दिया। इससे लगा हुआ सतनामी समाज का जैतखांभ भी है। मंदिर की उत्तर दिशा में एक कुंड बना हुआ है। इसे किसने और कब बनाया, इसकी जानकारी तो नहीं मिली। अनुमान है कि मंदिर बनाने के लिए किए गए पत्थरों के उत्खनन से कुंड का निर्माण हुआ होगा।

मंदिर परिसर में मेरी मुलाकात पुजारी राजेन्द्र पुरी गोस्वामी से होती है। वे बताते है कि जिसे राम मंदिर कहते हैं उसमें विष्णु भगवान की दो मूर्तियाँ एवं एक मूर्ति सूर्य की है। पहले मंदिर नदी के किनारे हुआ करता था। लेकिन कालांतर में समय की मार से वह ध्वस्त हो गया और उसके भग्नावशेष अभी तक नदी में पड़े हैं।

कर्णेश्वर मंदिर समूह एवं चंपा पुष्प का प्राचीन वृक्ष

वहाँ से इन मूर्तियों को कर्णेश्वर महादेव मंदिर के समीप स्थापित किया गया। गणेश जी की मुर्ति को सिहावा के तत्कालीन थानेदार गुप्ता जी ने मंदिर के भग्नावशेष का जीर्णोद्धार करके स्थापित कराया था। हम राजेन्द्र पुरी गोस्वामी के साथ महानदी और बालुका के संगम की ओर चल पड़ते हैं।

महानदी के तट पर मोती तालाब है, इस तालाब में भी एक कुंड बना हुआ है, इसे अमृत कुंड या औषधि कुंड कहते हैं, राजेन्द्र पुरी बताते हैं कि इस कुंड में नहाने से बड़े से बड़े रोग का शमन हो जाता है, ऐसी मान्यता है। कुंड सूखा पड़ा है, नहाने की बात तो दूर अभी इसमें उतर भी नहीं सकते।

सोनई रुपई कुंड जहाँ स्नान करने से कोढ़ दूर होने की किवदंति है

कहते हैं कि एक राजा को कोढ हो गया था। वह इस स्थान पर शिकार करने आए थे, एक दिन उसके कुत्ते इस कुंड में नहाकर उसके पास पहुंचे, कुत्तों ने थरथरी लेकर पानी को झाड़ा, वह पानी राजा के शरीर में गिरा। जिससे कुछ दिनों बाद उसका कोढ ठीक गया। तब से मान्यता है कि इस औषधि कुंड में जो भी नहाएगा उसके समस्त रोग ठीक हो जाएगें।

कुंड से लगा हुआ नदी किनारे एक आम का वृक्ष है, इसके नीचे की भूमि को लीप बहार कर बैठने लायक बना दिया है। इस वृक्ष के नीचे लोग अपने मृतकों का संस्कार करते हैं, मुंडन एवं पिंड दान इत्यादि यहीं होता है। डोमार प्रसाद मिश्रा कहते हैं कि यहां पर अस्थि विसर्जन करने के ढाई दिनों के पश्चात अस्थियों के अवशेष नहीं मिलते, यह प्रमाणित है। उड़ीसा, बस्तर कांकेर आदि से लोग अस्थि विर्सजन के लिए आते हैं।

महानदी उद्गम स्थल सिहावा

डोमार प्रसाद मिश्रा मुझे मोती तालाब के उस स्थान पर ले जाते हैं जहां सोनई और रुपई नामक स्थान है। आम के पेड के एक तरफ़ रुपई एवं दुसरी तरफ़ सोनई है। मोती तालाब के गहरीकरण के समय इस स्थान को नहीं खोदा गया। कहते हैं यहां खजाना गड़ा हुआ है और दैवीय स्थान है। कई बरस पहले कुछ तांत्रिको ने यहां से खजाना (हंडा) निकालने का प्रयास किया था परन्तु वे सफ़ल नहीं हुए। उसके बाद किसी ने इस स्थान पर उत्खनन करने का प्रयास नहीं किया।

विशेष पर्व पर इन स्थानों ही होम धूप देकर पूजा की जाती है। (छत्तीसगढ में हंडा (गड़े धन) के विषय में गाँव-गाँव में चर्चाएं चलते रहती हैं, बैगा और तांत्रिक हंडे का लालच दिखा कर लोगों की जेब खाली करवाते रहते हैं, मुझे तो आज तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने कहा हो कि उसे हंडा मिला है। हाँ, हंडे के पीछे धन सम्पत्ति गंवाकर कंगाल बने लोग यदा-कदा मिल जाते हैं।

महादेव मंदिर

मोती तालाब से मुझे पहाड़ी की तलहटी में कुछ समाधियां बनी दिखाई देती हैं। हम सड़क के उस पार चल कर समाधियों पास पहुंचे। राजेन्द्र पुरी बताते हैं कि उनके पूर्वज 200 साल पहले इस गाँव में उत्तर प्रदेश से आए थे। उत्तर प्रदेश के किस गाँव से आए थे इसका उन्हे पता नहीं।

यहाँ आकर उन्होने मंदिर के भग्नावशेष में शरण ली। उन्हे यहाँ शिव जी मिल गए और उन्होने पूजा शुरु कर दी। उसके पश्चात उनका परिवार यहीं का हो कर रह गया। अब मंदिर में राजेन्द्र पुरी पूजा करते हैं। ये समाधियाँ उनके पूर्वजों की हैं। एक समाधि मौनी महाराज की है, मौनी महाराज लगभग डेढ सौ वर्ष पूर्व हुए हैं, इन्होने 16 साल मौन रह कर तपस्या की।

मंदिर के सर्वराकार गणेश महाराज हुए, उन्हे गांव के मालगुजार गोपाल सिंह ने पाँच एकड़ जमीन 1927 मे दी। यह जमीन अब भी मंदिर के नाम से ही है। इस पर गाँव वाले रेग (किराए पर) खेती करते हैं। मंदिर इस जमीन पर ही माघ के महीने में पुन्नी मेला भरता है।

हम चल कर नदी के संगम पर पहुंचते हैं। यहां पर रेत की बोरियों से पानी रोक कर निस्तारी के लिए उपयोग किया जा रहा है। नदी पर सकरिया गांव दिखाई दे रहा है। उसके दायीं तरफ़ से बालूका नदी आकर महानदी में मिल रही है। राजेन्द्र पुरी कहते हैं, उनके दादा बताते थे कि नदी के तट से एक सुरंग उनके घर तक जाती है। एक दिन कोई मंछन्दर नदी में मछली मारते हुए सुरंग में प्रवेश कर गया और उनके घर के पास जाकर निकला।

मंदिर में स्थापित शिलालेख

उन्हे सुरंग दिखाने कहता हूँ तो वे कहते हैं कि उन्होने सुरंग में जाने का कभी प्रयास नहीं किया और न ही किसी गाँव वाले ने डरकर उसमें जाने का प्रयास किया। हम तो बाबू आपको पूर्वजों से सुनी सुनाई बता रहे हैं। ग्रामीण अंचल में पीढी दर पीढी किंवदंत्तियाँ चलते रहती हैं, इनके मूल में कहीं न कहीं सत्य छिपा होता है। जो कालांतर मे प्रकट होता है।

मंदिर के समीप ही बने हुए एक कमरे में इस स्थान से प्राप्त 15 मूर्तियाँ रखी हैं। इन प्रतिमाओं में अधिकांश सती स्तंभ एवं योद्धा समृति स्तंभ हैं, सरस्वती तथा एक शिलापर पद्मांकन भी दिखाई देताहै। मंदिर के प्रांगण में चंपा का पेड़ है, उसके सुंदर सफ़ेद फ़ूल प्रांगण में झर रहे हैं। दर्शनार्थी उन फ़ूलों पर पैर नहीं रखते, उन्हे बचा कर चलते हैं।

यहाँ से हम सिहावा पहुंचते हैं जहां रामायण कालीन सप्त ॠषियों के नाम से पर्वत हैं। सामने श्रृंगि ॠषि पर्वत सड़क के उस पार है और महानदी का उद्गम सड़क के इस पार। इस पर्वत को श्रृंगि नामक होने की जनश्रुति मिलती हैं। श्रृंगि ऋषि का विवाह रामचन्द्र की बहन शांता से हुआ था। अतः समीप में इसी श्रृंगि पर्वत में शांता गुफा भी हैं।

मंदिर में स्थापित तीन विष्णु प्रतिमाएं

रामायणकालीन प्रसिद्ध सप्त ऋषि-मुनियों ने श्रृंगि ऋषि प्रमुख माने जाते हैं। कन्क ऋषि के नाम पर कन्क ऋषि पर्वत, शरभंग ऋषि के नाम से शरभंग पर्वत, अगस्त्य ऋषि के नाम पर अगस्त्य पर्वत, मुचकुन्द ऋषि एक प्रमुख ऋषि थे। सप्त ऋषियों में इनका भी नाम है।

इन्हीं के नाम पर सिहावा क्षेत्र में मेचका पर्वत अर्थात् मुचकुन्द पहाड़ी, गौतम ऋषि के नाम पर गौतम पर्वत, सप्त ऋषियों में से अंगिरा ऋषि का भी महत्वपूर्ण स्थान हैं। इनके नाम पर सिहावा में पर्वत है, जिसे अंगिरा पर्वत कहा जाता हैं। रामायणकाल में भगवान श्रीराम अंगिरा ऋषि से भी भेंट कर उनसे परामर्श लिये थे। यहाँ इन सप्त ॠषियों के आश्रम प्रसिद्ध हैं।

श्रृंगि ॠषि पर्वत से महानदी का उद्गम हुआ हैं। पर्वत से सड़क के नीचे से नदी बहती है। उद्गम स्थल पर दो चट्टानों के बीच सफ़ेद झंडिया लगा रखी हैं। यहाँ अपने उद्गम से महानदी विपरीत दिशा में बहती दिखाई देती है। जो वहां से चलकर देऊर पारा होते हुए सिरसिदा ग्राम तक जाती है। सिरसिदा एवं देऊर पारा को नदी विभाजित करती है और यहीं पर बालुका और महानदी का संगम है। नदी के किनारे वन में स्थित होने के कारण यह रामायणकालीन स्थान सुरम्य एवं रमणीय है।

आलेख

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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