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जहाँ विराजी है मलयारिन माई : नवरात्रि विशेष

रायपुर से जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 30 पर विकास खंड मुख्यालय फरसगांव स्थित है। यहां से लगभग 16 कि. मी. दूर पश्चिम दिशा में पहाड़ियों से घिरा बड़ेडोंगर नामक गांव है, जहां पहले बस्तर की राजधानी हुआ करती थी। ग्राम बड़ेडोंगर के भैंसा दोंद डोंगरी ( महिषा द्वंद्व ) नामक पहाड़ी में बस्तर की आराध्य देवी मांई दन्तेश्वरी विराजमान हैं।

मांई दन्तेश्वरी को चालुक्य ( काकतीय ) वंश के राजाओं की कुल देवी मानी जाती है । मां दन्तेश्वरी बस्तर राज्य की सुरक्षा के लिए सदैव चिंतित व सजग रहती आई है। जनश्रुति के अनुसार एक बार रात्रि में माँई दन्तेश्वरी भैंसादोंद पहाड़ी के शिखर पर चढ़ कर राज्य की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा ले रही थी। चौबीस कोस दूर उन्हें सैनिकों का जमावड़ा दिखा।

सैनिकों का शिविर देखकर माता जी को समझने में देर न लगी कि बस्तर पर आक्रमण करने के उद्देश्य से शत्रु की कोई सेना बड़ेडोंगर की ओर बढ़ रही है तथा धमतरी के आस-पास उसने अपना शिविर लगा रखा है। मां दन्तेश्वरी दुश्मन को दूर भगा कर बस्तर की सुरक्षा का उपाय सोचने लगीं।

दूसरे दिन सुबह माताजी ने मालिन का वेश धारण किया और टोकरी में सब्जी लेकर निकल पड़ी। माली जाति के लोग फूल एवं सब्जी ऊगाकर बेचने का व्यवसाय करते हैं। इस जाति की महिलायें टोकरी में शाक-भाजी रख कर गली मोहल्ले घूम-घूम कर बेचती हैं । मां दन्तेश्वरी सब्जी की टोकरी लेकर जा पहुँचीं शत्रु-पक्ष के शिविर में और पूरे शिविर में घूम-घूम कर सारी सब्जी सस्ती दाम में बेच डाली।

मलयारिन माता एवं मलयार बाबा

जितने लोगों ने मालिन से खरीदकर सब्जी खायी वे सब महामारी के शिकार हो गये । कुछ बीमार हो गये, कुछ लोग बेहोश हो गये और कुछ की मृत्यु ही हो गई। एक साथ इतने लोगों को महामारी और मृत्यु का शिकार होते देख शिविर में हड़कंप मच गया। भय का वातावरण व्याप्त हो गया। भावी अनिष्ट की आशंका से दुश्मन की फौज वापस चली गयी। इस तरह माताजी ने युद्ध की विभीषिका से राज्य की रक्षा की।

कथित शिविर स्थल धमतरी के पास कंवर नामक गांव को बताया जाता है। कंवर गांव का पठार निर्जन है यहां कोई घर या बसाहट नही है। माताजी जब बड़ेडोंगर वापस आयीं तो वे मालिन के वेश में ही थीं। कोई सब्जी वाली साधारण महिला समझ कर नगरवासी उनके पास शाक-भाजी खरीदने गये । तब उन्होंने नगर वासियों को बताया कि मैं देवी दन्तेश्वरी हूं, किसी दुश्मन की फौज मेरे राज्य में आक्रमण करने आ रही थी उन्हें भगाने के लिए मुझे यह वेश धारण करना पड़ा है।

मेरा राज्य सुरक्षित है अब मैं अपने मूल स्वरुप में जा रही हूं किन्तु तुम इस घटना के बाद मुझे मालिन के रूप में याद कर सकते हो । इतना कह कर वह अर्न्तध्यान हो गयीं । तब से इस जगह पर माँई दन्तेश्वरी की पूजा मालिन के रूप में की जाती है, मालिन से देवी का नाम मलयारिन हो गया ।

मलयारिन माता मंदिर

माली जाति के लोग जिन्हें बस्तर में पनारा या मरार भी कहते हैं, मलयारिन माता को अपनी ईष्ट देवी मानते हैं, तथा प्रत्येक चार वर्षों में जातरा का आयोजन करते हैं। जातरा में मुण्डन संस्कार आदि धार्मिक कार्य भी कराये जाते हैं । मुण्डन संस्कार की खास बात यह है कि मुण्डन के लिए लाये गये बच्चों में से सर्वप्रथम किसी महिला की प्रथम पुत्री का मुण्डन किया जाता है, उसके बाद ही अन्य बच्चों का मुण्डन किया जाता है अर्थात बेटी को प्राथमिकता देने की परम्परा यहां पहले से विद्यमान है ।

मलयारिन माता का एक प्राचीन मंदिर है, जो भूमि की सतह से नीचे है। गर्भ गृह में प्रवेश के लिए एक छोटा सा दरवाजा है जहाँ झुक-कर प्रवेश किया जाता है। गर्भगृह में मलयारिन माता की प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा है। बड़ी-बड़ी आंखें, क्रोध से रौद्र रूप धारण कर तमतमाया हुआ मुख मंडल, आठ भुजाओं वाली देवी महिषासुर मर्दिनी के रूप में प्रतिष्ठित है। हाथों में त्रिशूल, खड्ग, ढाल, तलवार आदि विविध आयुधों से सुसज्जित हैं। अद्भुत केश विन्यास, कानों में कुण्डल, कटि मेखला, कलाइयों में चूड़ियां, पांवों में पयजनियां आदि विविध आभूषणों से अलंकृत हैं । मां का एक पैर शेर के पीठ पर तथा दूसरा पैर महिषासुर राक्षस के कमर पर है । महिषासुर राक्षस के छाती पर त्रिशूल से प्रहार करते हुए शिल्पांकित किया गया है ।

महिषासुर मर्दिनी मां दुर्गा को अंचल में प्रचलित मिथ कथा एवं लोक विश्वास के कारण मालिन या मलयारिन माता के नाम से सम्बोधित करते हैं । मलयारिन माता के दाहिने ओर मलयार बाबा विराजमान हैं, एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे हाथ में डमरु धारण किए हुए ये भगवान शिव की प्रतिमा है । लोक मान्यता के अनुसार ये मलयारिन माता के पति मलयार बाबा हैं । मंदिर के बाहर पत्थर पर दोनो के चरण चिन्ह अंकित हैं । यहां क्वांर एवं चैत्र दोनो नवरात्रि में श्रद्धालुओं द्वारा मनोकामना ज्योत जलाये जाते हैं।

आलेख

घनश्याम सिंह नाग ग्राम पोस्ट-बहीगाँव जिला कोण्डागाँव छ.ग.

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