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शाक्त धर्म एवं महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमाएं : छत्तीसगढ़

भारतवर्ष में मातृदेवी एवं शक्ति के रूप में देवी पूजन की परम्पराएं प्रचलित रही हैं। भारतीय संस्कृति की धार्मिक पृष्ठभूमि में शाक्त धर्म का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सृष्टि के उद्भव से लेकर वर्तमान काल तक के संपूर्ण विकास में शक्ति पूजा का योगदान दिखाई देता है। नारी शक्ति को प्रकृति की संज्ञा दी गई है। जो ब्रह्म (पुरूष) के सहयोग से समस्त जीवों की उत्पत्ति एवं निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है।

सनातन युग से ही नारी शक्ति, देवों के प्रत्येक अवतार में उनकी सहचारिणी के रूप में स्थित रही है। ब्रह्मा की शक्ति ब्रह्माणी, शिव की शक्ति पार्वती या आदि शक्ति जगदम्बा, राम के साथ सीता, गणेश की शक्ति ऋद्धि-सिद्धि, इन्द्र की शक्ति इन्द्राणी एवं कृष्ण की शक्ति राधा जैसे अनेक देवताओं का उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रन्थों महाकाव्यों और पुराणों में हुआ है।

शक्ति के बिना सृष्टि की उत्पत्ति और विकास तथा सृष्टि के विनाश तक की कल्पना नहीं की जा सकती है। शाक्त धर्म से संबंधित प्रारंभिक प्रमाण हमें हड़प्पा संस्कृति की मुद्राओं एवं लघु आकार की मृण मूर्तियों में दिखाई देते हैं। ऋग्वेद मे सरस्वती की स्तुति की गई है। वेदों में रूद्राणि, भवानी आदि देवियों का वर्णन रूद्र शिव की पत्नि के रूप में किया गया है।

अथर्ववेद, देवीसुक्त और श्रीसुक्त में देवी की स्तुति की गई है। उपनिषदों में भी विभिन्न देवियों का वर्णन हुआ है। इसी तरह मार्कण्डेय पुराण में शिव, विष्णु तथा ब्रह्मा के तेज से महिषासुरमर्दिनी की उत्पत्ति बताई गई है।

प्राचीन काल में भारत में शक्ति उपासना सर्वत्र व्याप्त थी, जिसके प्रमाण हमें अनेक अभिलेखों, मुहरों, मुद्राओं, मंदिर स्थापत्य एवं मूर्तियों में दिखाई देते हैं। शैव धर्म में पार्वती या दुर्गा तथा वैष्णव धर्म में लक्ष्मी के रूप में देवी उपासना का पर्याप्त प्रचार-प्रसार हुआ।

गुप्तकाल में सप्तमातृकाओं का प्रचलन बढ़ा, अनेक मंदिरों में इनकी प्रतिमाएं उत्कीर्ण कराई गई। प्राचीन काल से शाक्त धर्म का अवनरत् विकासक्रम होता रहा, जिसके फलस्वरूप गुप्तकाल में इनके उपासकों का एक पृथक सम्प्रदाय बन गया। पूर्व मध्यकाल के मंदिरों में शाक्त धर्म से संबंधित प्रतिमाओं की प्रधानता बढ़ी। मध्यकाल में शक्ति की उपासना अपनी क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ प्रसारित होती रही तथा देवी को समर्पित कई मंदिर निर्मित किए गए। शिल्प शास्त्रों में मातृदेवियों के नाम मुख्यतः आयुधों एवं वाहन के आधार पर निर्धारित किए गए है।

महिषासुरमर्दनी देव टिकरा

इसी परिप्रेक्ष्य में जब हम देवी महिषासुरमर्दिनी की बात करते है तो हमें ज्ञात होता है कि पौराणिक ग्रंथों में महिषासुरमर्दिनी तथा अन्य प्रमुख देवताओं की शक्ति के प्रार्दुभाव की कथा उल्लेखित है। मार्कण्डेय पुराण में महिषासुरमर्दिनी की उत्पत्ति का कथानक मिलता है।

महिषासुरमर्दिनी का सर्वप्रथम उल्लेख महाभारत में दुर्गा के विभिन्न नामों के साथ हुआ है। देवी महातम्य में महिषासुरमर्दिनी का विस्तार से संदर्भ प्राप्त होता है। विष्णुधर्मेत्तर पुराण में सिंहवाहिनी देवी को बीस भुजाओं वाली कहा गया है। देवी के हाथों में क्रमशः शूल, खण्ड, शंख, चक्र, बाण, शक्ति, वज्र, अभय, डमरू, छत्र, नागपाश, खेटक, परशु, धनुष, ध्वजा, गदा, दर्पण, और मुण्ड का उल्लेख प्राप्त होता है।

अपराजितपृच्छा में दसभुजी महिषासुरमर्दिनी के करों में शूल, खड्ग, वज्र, चक्र, बाण, चाप, खेटक, पाश, घंटा, और अंकुश के प्रदर्शन का निर्देश है। महिषासुरमर्दिनी के प्रतिमाओं का निर्माण कुषाणकाल में प्रारंभ हुआ जिसे गुप्तकाल में अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। महिषासुर का संहार करने के कारण ही देवी का नाम महिषासुरमर्दिनी पड़ा। गुप्तोत्तर काल में देवी के चतुर्भुजी से बीसभुजी प्रतिमाओं का विभिन्न कलाकेन्द्रों में निर्माण होने लगा।

शाक्त धर्म का प्रभाव छत्तीसगढ़ पर भी पड़ा। छत्तीसगढ़ के स्थानीय शासकों ने अपने मुद्राओं, अभिलेखों, मंदिरों तथा मूर्तियों में इस धर्म को स्थान दिया। तांत्रिक विद्या में शक्ति की अराधना महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के रूप में होने लगी। छत्तीसगढ़ के अधिकांश मंदिरों में शाक्त धर्म से संबंधित देवियों का शिल्पांकन हुआ है जिनमें महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

छत्तीसगढ़ में जांजगीर – चांपा जिले के अन्तर्गत पुरातात्विक स्थल खरोद में स्थित शबरी मंदिर के गर्भगृह में चतुर्भुजी महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है। जिसे ग्रामवासी शबरी माता के नाम से पूजा करते हैं। इस मंदिर का गर्भगृह छठवी शताब्दी ईसवी में निर्मित माना गया है।

छत्तीसगढ़ के पाण्डुवंशी कालीन मंदिरों में भी शाक्त धर्म से संबंधित प्रतिमाओं का प्रचुर मात्रा में निर्माण हुआ है। महासमुन्द जिले में स्थित पुरातात्विक स्थल सिरपुर उत्खनन (वर्ष 1999-2000) से भी लघु फलक पर अंकित महिषासुरमर्दिनी की एक प्रतिमा प्राप्त हुई है। सिरपुर में शाक्त धर्म से संबंधित अनेक प्रतिमाएं प्रकाश में आई है। सिरपुर के केन्द्रिय पुरातत्व विभाग के स्थल संग्रहालय में, महिषासुरमर्दिनी की चार प्रतिमाएं स्थित है। इन सभी प्रतिमाओं का निर्माण बलुआ पत्थर से हुआ है। ये सारी प्रतिमाएं अष्टभुजी है।

महिषासुरमर्दनी भोरमदेव

महिषासुरमर्दिनी की यह प्रतिमा महिष नामक दैत्य का वध करते हुए प्रदर्शित है। देवी के मुख पर ओज उदिप्त है। देवी रत्नजड़ित मुकुट, कुण्डल, चन्द्रहार, स्तनसूत्र, नूपूर, उत्तरीय तथा अधोवस्त्र पहने दृष्टव्य है। अष्टभूजी देवी के बाएं ऊपरी हाथ में ढ़ाल, दूसरें में घण्टा, तीसरें में त्रिशूल, तथा चौथे हाथ में वज्र है। देवी के दाएं हाथ में शंख, और एक हाथ अभय मुद्रा में है। देवी के शेष हस्त खण्डित अवस्था में है। दैत्य नागपाश से बंधा हुआ है। देवी का दाहिना पैर सिंह की पीठ पर तथा बांया पैर महिष के शरीर को छूता हुआ प्रदर्शित है। देवी के सिर के पीछे प्रभा मण्डल आलोकित है। असुर का महिष भाग कटा हुआ दिखाई दे रहा है। इन प्रतिमाओं में कुछ प्रतिमा खण्डित अवस्था में स्थित है। इन प्रतिमाओं को सातवीं – आठवीं शताब्दी ईसवीं में निर्मित माना गया है।

इसी तरह गरियाबन्द जिला में अवस्थित पुरातात्विक स्थल राजिम में राजीवलोचन मंदिर के मंडप के दाएं तरफ की भित्ति स्तंभों पर अष्टभुजी दुर्गा का अंकन हुआ है। इस मंदिर का निर्माण काल सातवी शताब्दी ईसवी के लगभग माना गया है।

बिलासपुर जिले के अन्तर्गत पुरातात्विक स्थल मल्हार के, जिला पुरातत्व विभाग के स्थल संग्रहालय में सातवीं – आठवीं शताब्दी ईसवी में निर्मित एक षष्ठभूजी महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थित है। यह प्रतिमा महिष को मारते हुए प्रदर्शित है। देवी के हाथों में क्रमशः तलवार, ढ़ाल, खड्ग, धनुषबाण स्थित है तथा देवी शेष दो अन्य हाथों से महिष को मारते हुए प्रदर्शित है।

इसी तरह आठवीं – नवमीं शताब्दी ईसवी की महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा आदिनाथ टिला, महेशपुर, जिला – सरगुजा में स्थित है। यह प्रतिमा अष्टभुजी तथा खण्डित अवस्था में स्थित है। इसी काल की, कुरिया – झुरकी महेशपुर में आठवीं – नवमीं शताब्दी की महिषासुरमर्दिनी की चतुर्भुजी प्रतिमा आलिंद में स्थित है।

\इस प्रतिमा में महिषासुर पूर्णतः पशुरूप में अंकित है। सामतसरना समूह, डीपाडीह, जिला – बलरामपुर में भी दशभुजी महिषासुरमर्दिनी की दो प्रतिमाएं स्थित है। महिषासुरमर्दिनी की एक प्रतिमा स्तंभ पर अंकित है तो दूसरी प्रतिमा शिवमंदिर परिसर में रखी हुई दिखाई देती है। इन प्रतिमाओं का निर्माण काल विद्वानों ने नवमीं – दसवीं शताब्दी ईसवी माना है।

छत्तीसगढ़ के शाक्त धर्म से संबंधित अभिलेखों में कलचुरि कालीन सामंत गोपालदेव का पुजारीपाली अभिलेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इस अभिलेख के द्वितीय पंक्ति से लेकर छत्तीसवें श्लोक तक देवी के विभिन्न रूपों, उनके वाहन एवं आयुधों तथा गोपालदेव द्वारा देवी के लिए किए जाने वाली भक्ति का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है।

इस अभिलेख में गोपाल देव को वाराही देवी का पुत्र कहा गया है तथा देवी के वैष्णवी, त्रयी, महाकाली, नरसिंही, वाराही, ऐन्द्री, चामुण्डा, त्वरिता, त्रिपुरा, मारिची, महामाया, तोतला और चर्चिका, कामाक्षी, महालक्ष्मी, जया, विजया, तारा, क्षमा, दया, सिद्धि, सरस्वती, गौरी, कीर्ति, प्रज्ञा, पराजिता, अम्बिका-महिषासुर मर्दिनी और चण्डिका जैसे नामों का वर्णन किया गया है।

अभिलेख में एक स्थान पर कंस वध के समय श्री कृष्ण द्वारा देवी के स्तुति किए जाने का उल्लेख है। संभवतः यह देवी मॉं दुर्गा रही होगी। इस अभिलेख से तत्कालीन रूप से प्रचलित तंत्र परंपरा का ज्ञान होता है। इन देवियों में सप्तमातृका और दस महाविद्या के देवियों का नाम उल्लेखित हुआ है।

अभिलेख में वर्णित है कि गोपालदेव की महाशक्ति ने गोपालदेव द्वारा किए गए करोड़ो मंत्रों के प्रभाव से प्रसन्न होकर उसे महावीर तथा अपने सत्पुत्र होने का वरदान दिया था। जिसके परिणाम स्वरूप गोपालदेव के अद्भुत पराक्रम से तथा उसके द्वारा छोड़े गये बाणों से वातावरण अंधकारमय हो गया था। इस अभिलेख में देवी के महिमा का वर्णन किया गया है।

महेशपुर निशान पखना समूह, से महिषासुरमर्दिनी की एक प्रतिमा प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा मंदिर के आलिंद में अवस्थित है। विद्वानों ने इस प्रतिमा का काल दसवीं – ग्यारहवीं शताब्दी ईसवी माना है।

महिषासुरमर्दनी डीपाडीह सरगुजा

दसवीं – ग्यारहवीं शताब्दी ईसवी की महिषासुरमर्दिनी की एक प्रतिमा छेरिका देऊर, देवटिकरा से प्राप्त हुई है। इस प्रतिमा में देवी का अधोभाग ही अवस्थित है। जिला पुरातत्व संघ – संग्रहालय, राजनांदगांव में अष्टभुजी महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थित है। इस प्रतिमा की प्राप्ति घटियारी, गण्डई से हुई है।

प्रतिमा के दाहिने हाथ में तलवार, कटार, बाण, और चौथे हाथ से त्रिशूल से महिष पर वार करते हुए देवी तथा बाएं हाथ में धनुष, ढ़ाल, एक हाथ से त्रिशूल पकड़े हुए और चौथे हाथ में महिषासुर का मुण्ड पकड़े हुए देवी प्रदर्शित है।

देवी के सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में लड़ियों की माला, हाथ में बाजूबंध तथा कंकण और पैरों में पादवलय पहने देवी का दाहिना पैर महिष के ऊपर स्थित है। साथ ही महिष के सिर से निकलता हुआ महिषासुर हाथ जोड़े प्रदर्शित है। यह प्रतिमा ग्यारहवीं शताब्दी ईसवी की ज्ञात होती है।

कबीरधाम जिले में स्थित भोरमदेव मंदिर के उत्तर दिशा की मध्यरथ में शाक्त धर्म से संबंधित देवियों में सोडषभुजी शवारूढ़ चामुण्डा की प्रतिमा उत्कीर्ण है। अंतराल के बाह्य भित्ति में महिषासुर मर्दिनी तथा जंघा भाग में ब्रह्माणी, चामुण्डा, वैष्णवी और महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा उत्कीर्ण है यह प्रतिमा षट्भुजी है।

देवी के दाहिने हाथों में खेटक, त्रिशूल, तथा घण्टा है देवी के बाएं हाथों में क्रमशः बाण और त्रिशूल दण्ड को आधार बनाएं प्रदर्शित है। देवी का दाहिना पैर सिंह के ऊपर तथा बांया पैर महिष के शरीर को स्पर्श करते हुए प्रदर्शित है। चूंकि यह मंदिर शिव को समर्पित है तो ऐसा प्रतीत होता है कि शिव एवं शक्ति के सम्मिलित रूप को इस मंदिर में इन दैवीय प्रतिमाओं के द्वारा दर्शाया गया है।

इस मंदिर का निर्माण फणीनागवंशी शासक गोपालदेव द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी ईसवीं के लगभग कराया गया था। जांजगीर – चांपा जिले में शिवरीनारायण नामक पुरास्थल में एक चन्द्रचुड़ मंदिर स्थित है। इस मंदिर में गर्भगृह के दक्षिणी भित्ति के सहारे महिषासुर मर्दिनी की एक प्रतिमा जड़ी है। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह मंदिर ग्यारहवी शताब्दी में निर्मित हुआ प्रतीत होता है।

इसी तरह जिला पुरातत्व संघ – संग्रहालय, रायगढ़ में महिषासुरमर्दिनी की दो प्रतिमाएं स्थित है। जिसमें से एक प्रतिमा मदनपुरगढ़ से प्राप्त बारहवीं शताब्दी ईसवी की है। यह प्रतिमा अष्टभुजी है तथा दूसरी प्रतिमा मुकडेंगा से प्राप्त चौदहवीं शताब्दी ईसवी की है। यह प्रतिमा चतुर्भुजी है। ये दोनों प्रतिमाएं विभिन्न आयुधों एवं आभूषणों से सुसज्जित महिषासुर का वध करते हुए प्रदर्शित है।

इंदिराकला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ स्थित संग्रहालय में आंकोछुरिया, जिला – राजनांदगांव से प्राप्त महिषासुरमर्दिनी की दसभुजी प्रतिमा स्थित है। इस प्रतिमा में देवी का दाहिना पैर महिष की पीठ पर और बांया पैर भूमि पर टिका हुआ है। देवी बाएं हाथ के त्रिशूल से महिष का भेदन करते हुए प्रदर्शित है।

महिषासुरमर्दनी गंडई

दाहिने तरफ के हाथों में क्रमशः शूल, खड्ग, बाण, चक्र, त्रिशूल, एवं बाएं हाथों में क्रमशः नागपाश, खेटक, परशु, ढाल, एवं गदा धारण किए हुए प्रदर्शित है। देवी विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित है। यह प्रतिमा बारहवीं शताब्दी ईसवीं की मानी गई है।

बेमेतरा जिले में देऊरबीजा नामक सीता देवी का एक मंदिर है। इस मंदिर के उत्तरी-पश्चिमी कर्णरथ के आले में महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा उत्कीर्ण है। जिसका निर्माण काल बारहवी-तेरहवी शताब्दी ईसवी माना गया है।

इसी तरह बिलासपुर जिले में सरगांव नामक स्थान पर स्थित धूमनाथ मंदिर के जंघाभाग के उर्ध्व पंक्ति में चतुर्भुजी महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा अंकित है जो कि त्रिशूल खड्क आदि धारण किए हुए है। यह मंदिर तेरहवीं शताब्दी ईसवी के पूर्वाद्ध में संभवतः कलचुरि शासकों के द्वारा निर्मित कराया गया था।

महिषासुरमर्दिनी की एक प्रतिमा पखना कोठी से भी प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा अष्टभुजी है जिसमें महिषासुरमर्दिनी को संहारक रूप में प्रदर्शित किया गया है। इस प्रतिमा का निर्माण काल बारहवीं – तेरहवीं शताब्दी ईसवी माना गया है। महेशपुर के कुरिया झुरकी समूह से तेरहवीं – चौदहवीं शताब्दी ईसवी की महिषासुरमर्दिनी की एक षट्भुजी प्रतिमा प्राप्त हुई है।

इस प्रकार छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त होने वाली शाक्त धर्म की प्रतिमाओं के अंतर्गत महिषासुरमर्दिनी के प्रतिमाओं के क्रमिक विकास क्रम से यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतवर्ष के अन्य क्षेत्रों की तरह ही छत्तीसगढ़ क्षेत्र में भी शक्ति पूजा का प्रचूर विकास हुआ था।

छठवीं शताब्दी ईसवी से चौदहवीं शताब्दी ईसवी तक अनवनत् क्रम में प्राप्त होने वाली महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमाएं तात्कालीन शाक्त धर्म की लोकप्रियता एवं तंत्रोपासना परंपरा के प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इस क्षेत्र से प्राप्त महिषासुरमर्दिनी की सभी प्रतिमाओं का निर्माण, प्रतिमा शास्त्र के अनुसार ही किया गया हैं। वर्तमान समय में भी छत्तीसगढ़ के प्रत्येक ग्रामों और नगरों में देवी स्वरूपा महामाया, शीतला, दुर्गा, महिषासुरमर्दिनी, काली आदि देवियों के मंदिर या फिर स्वतंत्र रूप से इनकी प्रतिमाएं अवश्य पायी जाती है।

आलेख

कु0 शुभ्रा रजक (शोध छात्रा)
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

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