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महामाया देवी रतनपुर : छत्तीसगढ़

रतनपुर पूरे भारत वर्ष में न केवल ऐतिहासिक नगरी के रुप में प्रसिद्ध है, अपितु धार्मिक नगरी के रुप में भी प्रसिद्ध है। कलचुरि राजवंश के शासकों ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश पर एक लम्बे समय लगभग 700 वर्षों तक शासन किया। जो भारतीय इतिहास में अब तक किसी क्षेत्र विशेष में किसी राजवंश द्वारा की गई दीर्घ शासनावधि है। यद्यपि कलचुरि शासक शैव उपासक थे, जिसका प्रमाण यहाँ विद्यमान कई शैव मंदिरों से ज्ञात होता है। तथापि कलचुरि शासकों की कुल देवी आदि शक्ति महामाया देवी रही है।

माँ महामाया देवी की प्रतिमा लगभग 13 वीं शताब्दी में कलचुरि राजवंश द्वारा कलचुरि शैली में निर्मित महामाया मंदिर में अधिष्ठित है। महामाया देवी का यह मंदिर भारत में स्थित जितने भी शक्तिपीठ हैं उनमें से एक है। शास्त्रों के अनुसार जिस स्थान पर शक्तिपीठ स्थापित है वहाँ पर भैरव प्रतिमा या भैरव मंदिर स्थित होना वर्णित है। उसी के अनुरुप महामाया देवी मंदिर प्रांगण में एक बड़े आले में भैरव की प्रतिमा अधिष्ठित है। साथ ही नगर के बाहरी छोर पर भैरव मंदिर भी निर्मित है। जिसके गर्भगृह में अधिष्ठित भैरव की प्रतिमा छत्तीसगढ़ से प्राप्त सभी भैरव प्रतिमा में अब तक की सबसे बड़ी प्रतिमा है।

महामाया देवी – महालक्ष्मी, महासरस्वती देवी रतनपुर

महामाया देवी का मंदिर एक विशाल परकोटे से घिरा हुआ है। जिसका निर्माण मराठाकाल में हुआ था। महामाया देवी का मंदिर उत्तराभिमुख है। मंदिर की संरचना में गर्भगृह, अंतराल तथा मुखमंडप का विधान है। मुखमंडप स्तंभों पर आधारित है। जिसमें प्रवेश के लिए तीनो ओर से प्रवेश द्वार निर्मित है। मंदिर के दक्षिणी दिशा के जंघा भाग के आले में माँ काली की लघु प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में शिवलिंग, कार्तिकेय, हनुमान, सूर्य, विष्णु आदि की प्राचीन प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।

मंदिर का शिखर त्रिरथ प्रकार का शंकु आकार नागर शैली में निर्मित है, शिखर के भद्ररथिका के शीर्ष भाग पर सर्पों का अंकन है। शिखर के अधोभाग पर भद्ररथिका में अंगशिखर (उरुश्रृंग) का शिल्पांकन है। कर्णरथिका नौ-नौ भूमि एवं आमलक निर्मित है। जिसके शीर्ष पर योगी मूर्ति का अंकन है। भद्र एवं अनुकर्ण रथिका में जालीनुमा अभिकल्पों का अंकन है। शिखर के शीर्ष भाग पर क्रमश: आमला, खपुरी, घंट कलश तथा आपूद है।

मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार बहुलंकृत एवं त्रिशालायुक्त है। प्रवेश द्वार के सिरदल में पद्मानस्थ ध्यान मुद्रा में तीन प्रतिमाओं का शिल्पांकन है। जिनके मध्य में क्रमश: नवग्रहों का अंकन है। प्रवेश द्वार के उभय पार्श्वों के अधोभाग पर नदी देवियों एवं शैव द्वारपालों का कलात्मक अंकन है।

मंदिर की पार्श्व भित्ति के आले में महाकाली देवी

प्रवेश द्वार के दाईं ओर नदी देवी मकरवाहिनी गंगा त्रिभंग मुद्रा में खड़ी हुई प्रदर्शित है। जिसके बांए हाथ में कलश एवं दाहिने हाथ में सनाल कमल है। नदी देवी गंगा के सिर के उपर छत्रावलि का अंकन है। गंगा कीरिट मुकुट, हार, कटि मेखला, नुपुर आदि से सुसज्जित है। गंगा के दाहिने पार्श्व में द्वार पाल के रुप में भैरव द्विभंग मुद्रा में खड़े हुए प्रदर्शित हैं जो अपने दोनों हाथों में खट्वांग धारण किए हुए हैं।

प्रवेश द्वार के बांई ओर नदी देवी कुर्मवाहिनी यमुना त्रिभंग मुद्रा में खड़ी हुई प्रदर्शित हैं। जिनके दाहिने हाथ में कलश एवं बांए हाथ में सनाल कमल है। यमुना के सिर पर छत्रावलि प्रदर्शित है। देवी यमुना सभी आभूषणों से सुसज्जित हैं। यमुना के बांए पार्श्व में द्वारपाल के रुप में शिव द्विभंग मुद्रा में खड़े हुए प्रदर्शित हैं। जो अपने दोनो हाथों में क्रमश: त्रिशूल और मातुलिंग धारण किए हुए हैं। शैव द्वारपाल करकुमुकुट, हार, मेखला तथा घुटने तक लम्बी वनमाला धारण किए हुए प्रदर्शित हैं।

महामाया मंदिर परिसर में सती मंदिर

मंदिर के गर्भगृह में दो प्रतिमाएं दिखाई देती हैं, जिनमे से एक महालक्ष्मी एवं दूसरी महासरस्वती हैं, महाकाली की प्रतिमा मंदिर की पार्श्व भित्ति में आले में स्थापित है। गर्भगृह में दो देविंयों का सिर होने के पीछे किंवदन्ति हैं कि रतनपुर में महामाया देवी का सिर है और उसका धड़ अम्बिकापुर में है। प्रतिवर्ष अम्बिकापुर में देवी का शीश कुम्हार द्वारा मिट्‌टी का बनाया जाता है।

भारतीय इतिहास में कलचुरि वंश का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वे शैववंशी क्षत्रीय थे, इनके आदि पुरुष पुराणों एवं महाकाव्यों (रामायण तथा महाभारत) में वर्णित कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन थे। इसका उल्लेख रतनदेव तृतीय के खरौद अभिलेख तथा जाजल्यदेव के रतनपुर अभिलेख में मिलता है। इस वंश के शासकों ने माहिष्मति को अपनी राजधानी बनाकर राज करना आरंभ किया। कालांतर में कलचुरि जबलपुर के निकट त्रिपुरी में आकर बस गये और राज करने लगे।

रतनपुर किले का मुख्य द्वार

त्रिपुरी के कलचुरियों की एक शाखा ने दक्षिण कोसल में अपना राज्य स्थाप्ति किया। कलचुरियों की वास्तविक सत्ता सन् 1000 ईसा में कलिंगराज द्वारा राजधानी बनाकर स्थापित की गई। उसका उत्तराधिकारी रत्नदेव प्रथम हुआ। उन्होंने रतनपुर नामक नगर की स्थापना की और अपनी राजधानी वहीं स्थानांतरित की।

आलेख

डॉ जितेन्द्र कुमार साहू
रतनपुर, जिला बिलासपुर (छग)

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