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जानिए गुप्त नवरात्रि क्या है और क्यों मनाई जाती है।

शक्ति की उपासना प्राचीन काल से ही होते रही है। इसके प्रमाण हमें दक्षिण कोसल में मिलते है, यहाँ शाक्त सम्प्रदाय का भी खासा प्रभाव रहा है। सिरपुर से उत्खनन में प्राप्त चामुंडा की प्रतिमा इसका प्रमाण है। दक्षिण कोसल के अन्य स्थानों पर देवी पूजा के प्रमाण प्राचीन काल से ही प्राप्त होते हैं। जिसमें महिषासुरमर्दनी, सप्तमात्रिकाएं, भैरवी, चामुंडा, लज्जा गौरी आदि की प्रतिमाएं हमें प्राप्त होती हैं।

लज्जा गौरी, सिरपुर से प्राप्त

शक्ति के रुप में देवियों का स्वयं का भव्य प्रभामंडल है और उनकी सत्ता भी है। लोक में देवी की उपासना से इनका प्रभाव जनमानस पर दिखाई देता है। राजा से लेकर रंक तक सभी शक्ति की प्राप्ति के लिए देवी की उपासना किया करते थे और वर्तमान में भी कर रहे हैं। शक्ति की उपासना करने वालों का शाक्त सम्प्रदाय ही पृथक दिखाई देता है।

बहुधा लोग सिर्फ़ दो नवरात्रियों के विषय में ही जानते हैं आश्विन एवं चैत्र। परन्तु दो नवरात्र और माने जाते हैं, जिन्हें गुप्त नवरात्र कहे जाते हैं। माघ एवं आषाढ माह में ये गुप्त नवरात्र होते हैं। जो शक्ति की गुप्त साधना के लिए होते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि गुप्त नवरात्रि का महत्व प्रकट नवरात्रि से अधिक होता है। ये नवरात्र साधकों के लिए खास होते हैं। इस समय साधक को सिद्धियाँ मिलती हैं। इन नवरात्रों में दस महाविद्याओं की साधना करके साधक मनोवांछित फल पा सकते हैं।

इन नवरात्र के समय साधना और तंत्र की शक्तियों में वृद्धि करने हेतु भक्त इसे करता है. तंत्र एवं साधना में विश्वास रखने वाले इसे करते हैं। इन नवरात्रों में भी पूजन का स्वरूप सामान्य नवरात्रों की ही तरह होता है। जैसे चैत्र और शारदीय नवरात्रों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा नियम से की जाती है उसी प्रकार इन गुप्त नवरात्रों में भी दस महाविद्याओं की साधना का बहुत महत्व होता है।

गुप्त नवरात्र में माता की शक्ति पूजा एवं अराधना अधिक कठिन होती है और माता की पूजा गुप्तग रूप से की जाती है इसी कारण इन्हें गुप्त नवरात्र की संज्ञा दी जाती है। इस पूजन में अखंड जोत प्रज्वलित की जाती है। प्रात:कल एवं संध्या समय देवी पूजन-अर्चन करना होता है। गुप्ती नवरात्र में तंत्र साधना करने वाले दस महाविद्याओं की साधना करते हैं। नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशति का पाठ किया जाता है। अष्टतमी या नवमी के दिन कन्या पूजन कर व्रत पूर्ण होता है।

गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं के पूजन को प्रमुखता दी जाती है। भागवत के अनुसार महाकाली के उग्र और सौम्य दो रुपों में अनेक रुप धारण करने वाली दस महा-विद्याएँ हुई हैं। भगवान शिव की यह महाविद्याएँ सिद्धियाँ प्रदान करने वाली होती हैं। दस महाविद्या देवी दुर्गा के दस रूप कहे जाते हैं। प्रत्येक महाविद्या अद्वितीय रुप लिए हुए प्राणियों के समस्त संकटों का हरण करने वाली होती हैं। इन दस महाविद्याओं को तंत्र साधना में बहुत उपयोगी और महत्वपूर्ण माना जाता है।

इन चारों नवरात्रों में शक्ति के साथ-साथ इष्ट की आराधना का भी विशेष महत्व है शिवपुराण के अनुसार पूर्वकाल में दैत्य राक्षस दुर्ग ने ब्रह्मा को तप से प्रसन्न कर के चारों वेद प्राप्त कर लिए तब वह उपद्रव करने लगा वेदों के नष्ट हो जाने से देव-ब्राह्मण पथ भ्रष्ट हो गए जिससे पृथ्वी पर वर्षों तक अनावृष्टि रही देवताओं ने मां पराम्बा की शरण में जाकर दुर्ग का वध करने का निवेदन किया मां ने अपने शरीर से काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूमावती, त्रिपुरसुंदरी और मातंगी नाम वाली दस महाविद्याओं को प्रकट कर दुर्ग का वध किया।

सप्त मातृकाएं दिल्ली म्यूजियम

देवी काली– दस महाविद्याओं मे से एक मानी जाती हैं। तंत्र साधना में तांत्रिक देवी काली के रूप की उपासना किया करते हैं।

देवी तारा– दस महाविद्याओं में से माँ तारा की उपासना तंत्र साधकों के लिए सर्वसिद्धिकारक मानी जाती है। माँ तारा परारूपा हैं एवं महासुन्दरी कला-स्वरूपा हैं तथा देवी तारा सबकी मुक्ति का विधान रचती हैं।

माँ ललिता– माँ ललिता की पूजा से समृद्धि की प्राप्त होती है। दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को चण्डी का स्थान प्राप्त है।

माँ भुवनेश्वरी – माता भुवनेश्वरी सृष्टि के ऐश्वयर की स्वामिनी हैं। भुवनेश्वरी माता सर्वोच्च सत्ता की प्रतीक हैं. इनके मंत्र को समस्त देवी देवताओं की आराधना में विशेष शक्ति दायक माना जाता है।

त्रिपुर भैरवी – माँ त्रिपुर भैरवी तमोगुण एवं रजोगुण से परिपूर्ण हैं।

माता छिन्नमस्तिका-माँ छिन्नमस्तिका को मां चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है। माँ भक्तों के सभी कष्टों को मुक्त कर देने वाली है।

माँ धूमावती – मां धूमावती के दर्शन पूजन से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। माँ धूमावती जी का रूप अत्यंत भयंकर हैं इन्होंने ऐसा रूप शत्रुओं के संहार के लिए ही धारण किया है।

माँ बगलामुखी – माँ बगलामुखी स्तंभन की अधिष्ठात्री हैं। इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है।

देवी मातंगी – यह वाणी और संगीत की अधिष्ठात्री देवी कही जाती हैं. इनमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं.भगवती मातंगी अपने भक्तों को अभय का फल प्रदान करती हैं।

माता कमला – मां कमला सुख संपदा की प्रतीक हैं। धन संपदा की आधिष्ठात्री देवी है, भौतिक सुख की इच्छा रखने वालों के लिए इनकी अराधना सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं।

महिषासुरमर्दनी सिरपुर से प्राप्त

इस गुप्त नवरात्रि में वामाचार पद्धति से उपासना की जाती है यह समय शाक्त एवं शैव धर्मावलंबियों के लिए पैशाचिक, वामाचारी क्रियाओं के लिए अधिक शुभ एवं उपयुक्त होता है इसमें प्रलय एवं संहार के देवता महाकाल एवं महाकाली की पूजा की जाती है साथ ही संहारकर्ता देवी-देवताओं के गणों एवं गणिकाओं अर्थात भूत-प्रेत, पिशाच, बैताल, डाकिनी, शाकिनी, खण्डगी, शूलनी, शववाहनी, शवरूढ़ा आदि की साधना भी की जाती है।

यह साधनाएं बहुत ही गुप्त स्थान पर या किसी सिद्ध श्मशान में की जाती हैं दुनियां में सिर्फ चार श्मशान घाट ही ऐसे हैं जहां तंत्र क्रियाओं का परिणाम बहुत जल्दी मिलता है ये हैं तारापीठ का श्मशान (पश्चिम बंगाल), कामाख्या पीठ (असम) का श्मशान, त्रयंबकेश्वर (नासिक) और उज्जैन स्थित चक्रतीर्थ श्मशान।

ग्रंथों के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष का विशेष महत्व है शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं इन्हीं कारणों से माघ मास की नवरात्रि में सनातन, वैदिक रीति के अनुसार देवी साधना करने का विधान निश्चित किया गया है गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि (माघ तथा आषाढ़) में विशेष साधना करते हैं तथा आध्यात्मिक एवं मानसिक शक्तियां प्राप्त करते हैं।

आलेख

श्रीमती रेखा पाण्डेय
व्याख्याता हिन्दी, अम्बिकापुर

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3 comments

  1. बहुत महत्वपूर्ण जानकारी, साधुवाद

  2. बहुत सुंदर जानकारी
    जय माता दी

  3. Awesome post! Keep up the great work! 🙂

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