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’तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा, नारा देने वाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस

(23 जनवरी, जयन्ती पर विशेष)

स्वर्गीय श्री कपिल दा कहते थे, “मेरी दृष्टि में स्वामी विवेकानन्द के सन्देश के प्राण स्वर को समझकर कार्यान्वित करनेवाले तीन व्यक्तित्व हुए। उनमें से प्रथम हैं – भगिनी निवेदिता, दूसरे हैं महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाषचंद्र बोस और तीसरे हैं कन्याकुमारी स्थित विवेकानन्द शिला स्मारक के निर्माता तथा विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक माननीय श्री एकनाथजी रानडे।”

उल्लेखनीय है कि श्री कपिल चटर्जी स्वतन्त्रता पूर्व भारत में रॉयल एयर फोर्स में पायलट थे। महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने ब्रिटिश सरकार की वह नौकरी छोड़ दी और वे रामकृष्ण मिशन की पाठशाला में इतिहास के शिक्षक बन गए। माननीय एकनाथजी से उनका गहरा सम्बन्ध था और उनके पश्चात् भी विवेकानन्द केन्द्र के साथ वे आत्मीयता से जुड़े रहे।

श्री कपिल चटर्जी के कथनानुसार, सचमुच नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने स्वामीजी के संदेशों को पूर्ण रूप से आत्मसात किया था। सुभाषचंद्र का जन्म २३ जनवरी, १८९७ में हुआ। उनके पिता जानकीनाथ बोस एक प्रसिद्ध वकील थे और माता प्रभावती देवी एक अत्यंत धर्मपरायण महिला थी। जब सुभाषचंद्र १५ वर्ष के थे, उनको स्वामी विवेकानन्द की पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला।

विशेषतः कोलम्बो से अल्मोड़ा तक दिए गए व्याख्यानों की पुस्तक जो अभी ‘भारतीय व्याख्यान’ नाम से उपलब्ध है, से वे अत्यंत प्रभावित हुए। उनके अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के समाधानकारक उत्तर भी उनको मिले। स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के बारे में भी सुभाषचंद्र बढ़ने लगे। आध्यात्मिक विकास के लिए त्याग अत्यंत आवश्यक है।

श्री रामकृष्ण परमहंस के इस वचन से उन्हें प्रेरणा मिली। योग, ध्यान का अध्ययन तथा उसके अनुसार वे साधनाएं करने लगे। साधु-संन्यासियों से भी मिलने लगे। उनके अनेक प्रयासों के पश्चात् भी उनको अपेक्षित समाधान न मिल सका, तब उन्होंने सोचा की चित्तशुद्धि के बिना यह संभव नहीं होगा। और इसलिए विश्व कल्याण के कार्य में जुट जाना चाहिए। मानवता की सेवा में स्वयं को लगा देना चाहिए।

सुभाषचंद्र का जीवन सदैव सेवा और साधना से युक्त था। एक बार जब वे सद्गुरु की खोज में घूम रहे थे तब स्वामी ब्रह्मानन्द से मिले। तब रामकृष्ण मठ के प्रथम अध्यक्ष स्वामी ब्रह्मानन्द ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए यह कहकर घर लौट जाने के लिए कहा था कि उनके लिए उनका ‘अद्भुत भविष्य’ प्रतीक्षा कर रहा है।

कटक में शालेय शिक्षा पूर्ण करके सुभाषचंद्र को कलकत्ता भेजा गया। आरंभ में प्रेसिडेन्सी कॉलेज में और बाद में स्कॉटिश चर्च कॉलेज में उनकी पढ़ाई हुई। धीरे-धीरे वहाँ सारे छात्र एकसाथ आने लगे जो रामकृष्ण-विवेकानन्द के आदर्शों पर चलने का प्रयास कर रहे थे।

नव-विवेकानन्द टोली के नाम से ये सभी पहचाने जाने लगे। वहीं सुभाषचंद्र युवा नेता के रूप में उभरने लगे। वे अपने मित्रों के साथ सेवा कार्य में व्यस्त रहते थे। शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय विचार प्रतिष्ठित करने पर उन सबने अपनी दृष्टि केन्द्रित की।

राष्ट्रीय एकता के लिए कार्य करने से ही सही रूप में धर्म का जागरण होगा और समाज में आत्मविश्वास जगेगा यह उनकी दृढ़ धारणा थी। धर्म और राष्ट्रीयता के समन्वय की दिशा में उनका कार्य अग्रसर हो रहा था। वे एक निडर और उत्साही युवक थे। महाविद्यालय में पढ़ाई और सेवा-कार्य के साथ ही उन्होंने सैन्य शिक्षा भी ग्रहण की।

बी.ए. तक पढ़ाई होने के पश्चात् १९१९ में उनको आय.सी.एस. करने के लिए केम्ब्रिज भेजा गया। इस परीक्षा में उन्होंने चौथा स्थान प्राप्त किया था। परन्तु उनका जन्म अंग्रेज सरकार की नौकरी करने के लिए नहीं अपितु मातृभूमि की सेवा के लिए हुआ है, ऐसी उनकी दृढ़ धारणा थी। उनका देशबंधु चित्तरंजन दास से पत्र-व्यवहार होता था।

१९२१ में भारत में आने के बाद उन्होंने देशबंधु के विद्यालय में शिक्षक का कार्य शुरू किया। साथ ही पत्रकारिता भी आरंभ की। उसी समय भारत में प्रिन्स ऑफ वेल्स आए थे। कांग्रेस ने इसका विरोध करना तय कर लिया था। देशबंधु और सुभाष दोनों ने विरोध प्रदर्शन किया और इसी कारण से दोनों को बंदी बना लिया गया। दोनों को कारावास भुगतना पड़ा। कारागृह से छुटने के पश्चात् वे फिर से अपने कार्य में जुट गए।

१९२३ में उन्होंने कलकत्ता महापालिका का चुनाव लड़ा और मुख्य प्रशासनिक अधिकारी बनें। उनके परिश्रम, देशप्रेम और समर्पण भाव से उन्होंने अपने कार्य में सफलता प्राप्त की और साथ-साथ लोकप्रियता भी। ब्रिटिश सरकार यह सहन न कर सकी और बिना किसी आरोप के ही उनको पुनः बंदी बना लिया गया। ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी उनका स्वामी विवेकानन्द के संदेशों पर निरंतर चिंतन चलता रहा।

कारागृह से भी वे पत्रों के माध्यम से लोगों में प्रेरणा जगा रहे थे। शारीरिक अस्वस्थता के कारण १९२७ में उन्हें रिहा किया गया। कारागृह से बाहर आते ही वे तुरंत अपने कार्य में लग जाते। सामाजिक एवं राजकीय जीवन में सक्रिय हो जाते। अपने व्याख्यानों से लोगों में स्वतंत्रता की आस जगाते।

स्वामी विवेकानन्द ने जो मनुष्य-निर्माण और राष्ट्र-पुनरुत्थान का सन्देश दिया उससे वे अत्यंत प्रभावित थे। मनुष्य-निर्माण और स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा ने ही उनको जीवनभर अपने अंगीकृत कार्य में अग्रेसर रखा। विश्वभर के अनेक सच्चे देशभक्तों से उनके अत्यंत आत्मीय सम्बन्ध थे।

सुभाषचंद्र बोस अब कांग्रेस के प्रभावी नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे। साइमन कमिशन के विरोध में हुए आन्दोलन में फिर से अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया। कुछ समय पश्चात् उसी अवस्था में उन्हें देश से निर्वासित किया गया। तब उन्होंने अनेक यूरोपीय देशों (जैसे ऑस्ट्रिया, जर्मनी आदि) का दौरा किया।

भारत लौटने के पश्चात् वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनें। उनके विचार स्पष्ट थे। वे कहते थे कि भारतीयों को अपने अधिकार स्वाभिमान से प्राप्त कर लेने चाहिए। कोई भी देश, किसी गुलाम देश को अपनेआप ही स्वतंत्रता नहीं देगा।

हमारा स्वातंत्र्य हमने अपने पराक्रम से प्राप्त करना चाहिए। केवल अंग्रेजों को आवेदन पत्र देकर और उनसे अनुरोध करने से स्वतंत्रता की प्राप्ति नहीं होगी। इसी बीच अनेक मतभेदों के रहते उन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके लिए भारतमाता की स्वतंत्रता अधिक महत्वपूर्ण थी न कि स्वयं का पद अथवा अधिकार।

सुभाष बाबू वीर विनायक दामोदर सावरकर से भी मिले। उनकी भारतीय स्वातंत्र्य के सन्दर्भ में अनेक विषयों पर चर्चा हुई। वीर सावरकर ने भी उन्हें आग्रह किया कि वे देश के बाहर जाकर ब्रिटिशों का युद्ध में सामना करें। सुभाष बाबू के मन में भी यही इच्छा थी, यही इच्छा भविष्य में आजाद हिन्द सेना के रूप में प्रगटित हुई।

द्वितीय विश्व युद्ध के चलते सुभाष बाबू ने युद्ध विरोधी आन्दोलन किया। उसके फलस्वरूप उन्हें फिर से कारावास हुआ। इस अन्याय के विरोध में उन्होंने कारागृह में अनशन शुरू कर दिया। ब्रिटिश सरकार के लिए यह एक बड़ी कठिनाई बन गई।

सरकार ने उन्हें कारागृह से छोड़ दिया और उनके अपने ही घर में नजरबन्द रखा। पुलिस और गुप्तचरों का पहरा लगा दिया। धीरे-धीरे उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना भी बंद कर दिया। ब्रिटिशों की कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था के बावजूद, पुलिस और गुप्तचरों के बावजूद वे २६ जनवरी, १९४१ में ‘प्रो. जियाउद्दीन’ बनकर भारत से काबुल, बर्लिन होते हुए जापान जा पहुँचे।

वहाँ वे क्रन्तिकारी रासबिहारी बोस से मिले और आजाद हिन्द सेना के संगठन कार्य को सम्भाला। तब से वे नेताजी के नाम से परिचित हुए। ब्रिटिश भारत की सेना इंग्लैण्ड की ओर से विश्व युद्ध में उतरी थी। जापान और जर्मनी ने ब्रिटिश भारत के जिन्हें युद्ध बंदी बनाये थे उन सभी को आजाद हिन्द सेना में सम्मिलित कर लिया गया।

नेताजी ने उनके मन में मातृभूमि को स्वतन्त्र करने की इच्छा जाग्रत की। उनके आह्वान से सबके मन में त्याग, बलिदान और आत्मविश्वास की भावना का निर्माण होती थी। ‘जय हिन्द’, ‘वन्दे मातरम्’ के नारे गूँजने लगे और आजाद हिन्द सेना ब्रिटिश भारत पर आक्रमण करने के लिए तैयार हो गई।

नेताजी कहते थे, “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा।” भारतीय स्वतंत्रता के लिए मर मिटने के लिए तैयार आजाद हिन्द सेना ने अंदमान जीत लिया। ब्रिटिशों को वह छोड़ना पड़ा। उन द्वीपों के नाम ‘शहीद’ एवं ‘स्वराज’ रखे गए। आगे चलकर सेना ने ब्रह्मदेश की ओर से भारत की सीमा में प्रवेश किया और ईशान्य भारत में इम्फाल तक आ पहुँची। परन्तु दुर्दैववश उसी समय विश्व युद्ध में जापान और जर्मनी की हार होने के कारण आजाद हिन्द सेना को भी पीछे हटना पड़ा।

नेताजी को जापान के लिए निकलना पड़ा। उसी प्रवास के दौरान एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी अनुपस्थिति में आजाद हिन्द सेना भारत से ब्रिटिशों का राज उखाड़ने के अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाई। परन्तु आजाद हिन्द सेना का यह प्रचण्ड पराक्रम विद्युत् तरंगों जैसा ब्रिटिश भारत की जल, थल और वायु सेना में फैल गया।

ब्रिटिश भारत की सेना में विद्रोह होने लगे। जब ब्रिटिश भारतीय सेना में ब्रिटिशों के प्रति असंतोष का वातावरण हुआ तब यह पूरी तरह से निश्चित हो गया कि अंग्रेज अब भारत पर राज नहीं कर पाएंगे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने यह स्पष्ट रूप से बता दिया, “ …ब्रिटिश भारत की सेना विद्रोह के लिए तैयार है। भारत में स्वतंत्रता का ज्वालामुखी कभी भी फट सकता है और ब्रिटिश साम्राज्य को राख बना सकता है।” अंग्रेजों के पास भारत छोड़ने के अलावा और कुछ मार्ग नहीं बचा था।

स्वतन्त्र भारत के नागरिकों ने यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि भले ही आजाद हिन्द सेना ने प्रत्यक्ष रूप से अंतिम विजय प्राप्त न की हो अपितु उनके अतुलनीय देशभक्ति और साहस के कारण भारतीय लोगों में और ब्रिटिश भारत की सेना में स्वतंत्रता की स्पृहा जागृत हुई। नेताजी और आजाद हिन्द सेना का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अमूल्य योगदान है। 

लेखिका :

प्रियंवदा पांडे,
जीवनव्रती कार्यकर्ता,
विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी

                                                                              

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