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लोक वाद्य नगाड़ा और होली

छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति में वाद्य यंत्रों का विशेष महत्व है. इन्ही में से नगाड़ा एक ऐसा वाद्ययंत्र जो आज भी छत्तीसगढ़ के विभिन्न आयोजनों में दिखाई देता है. भले ही इसका चलन कम हुआ है, लेकिन आज भी इसकी जगह अन्य वाद्ययंत्र नहीं ले पाया है. जब इसकी आवाज लोगों के कानों में पहुंचती है तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं और कई घंटों तक लोग इसे सुनकर मंत्र मुग्ध हो जाते हैं.

छत्तीसगढ़ में खैरागढ़ जिले से मोची जाति के लोग शनिचरी बाजार के आसपास बड़ी संख्या में नागाढ़े की दुकान लगकर बेचने के लिए पहुंचे हैं. मेरी मुलाकात संगीता मोची से हुई, उन्होंने बताया कि इस साल महंगाई की मार और वर्षा होने के कारण उन्हें बहुत नुकसान सहना पड़ा.

छत्तीसगढ़ राज्य अपने पारम्परिक और संस्कृति के नाम से अलग पहचान रखती चाहे रहनसहन, पहनावा, संगीत, वाद्य यंत्र, लोक गीत, छत्तीसगढ़ के पारम्परिक वाद्य यंत्र का प्रयोग अलग अलग समुदाय एवं अलग अलग भजन गायन, बैगा, बैरागी, घुमन्तु प्रजाति के लोग द्वारा में प्रयोग किया जाता है.
होली का खास आकर्षण है नगाड़ा: मैं नगाड़ा खरीदने के लिए शनिचरी बाजार पुल के पास के दुकान पर पहुंची, नगाड़ा बेच रही एक और महिला राधिका जो अपने पूरे परिवार बेटी दामाद सहित नगाड़ा बेचने के लिए खैरागढ़ से बिलासपुर पहुंची है, उन्होंने कहा कि नगाड़े के बिना होली का त्यौहार अधूरा ही रहता है.

जब तक नगाड़े की थाप पर लोग मस्ती ना करें, तब तक होली का आनंद नहीं आता. बिलासपुर में बहुत से लोग टोली में निकलते हैं. जितने लोग भी जमा हो जाएं, एक टोली बनती है. इसके बाद घूम-घूम कर फाग गीत गाते हैं. बिना नगाड़े के फाग गीत की कल्पना ही नहीं हो सकती. इसलिए नगाड़ा होली का खास आकर्षण रहा है.

होली के पर्व में रंग गुलाल के अलावा लोक वाद्य नगाड़ा का विशेष महत्व होता है नगाड़े की धुन पर फाग गीत के साथ होली का खुमार बढ़ता है नगाड़े की धुन पर लोग फाग गीत गाते हुए होली का आनंद लेते हैं नगाड़े के साथ उत्सव में चार चांद लगता है यही वजह है कि बाजार में गड़े की दुकान सजने लगी है.

नगाड़ा

नगाड़ा एक वाद्ययंत्र है.यह एक प्रकार का ड्रम है जिसका पीछे का भाग गोलाकार होता है. बजाने के लिए वादक लकड़ी के दो डंडे का प्रयोग करते हैं. नगाड़े को लोकनाट्यों, विवाह और मांगलिक उत्सव, देवालयों में शहनाई के साथ बजाया जाता है. इसके अलावा उसका उपयोग युद्धों में भी किया जाता था.

लोक वाद्य नगाड़े का ऐतिहासिक महत्व

नगाड़ा संदेश प्रणाली से जुड़ा हुआ शब्द है। दरअसल शासन की महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ आम जनता तक पहुँचाने के लिए नगारची होता था, जो सरे बाज़ार नगाड़ा पीटते हुए किसी सरकारी फरमान की घोषणा करता था। इसी तरह सेनाएँ जब कूच करती थीं तो भी नगाड़े बजाए जाते थे, ताकि सबको खबर हो जाये। मुग़लों के दरबार में एक नक्कारखाना होता था, जिसमें अहम सरकारी फैसले सुनाए जाते थे। फैसलों की तरफ़ ध्यान आकर्षित करने के लिए ज़ोर-ज़ोर से नक्कारे बजाए जाते थे, जिससे सबका ध्यान उस ओर लग जाए। ऐसी मुनादियों में लोगों को सजाएँ देने से लेकर घर की कुर्की कराने जैसी बातें भी होती थीं।

पहले बसंत पंचमी से ही नगाड़ा बजना शुरू हो जाया करता था. बड़ी संख्या में लोग फाग गीत गाने जुटा करते थे. चारों ओर फाग गवैयों का मस्ती भरा शोर पारंपरिक लोकगीत के माध्यम से त्योहार के उत्साह को दोगुना कर देता था. अब समय के साथ फाग गीतों की परंपरा ही विलुप्त होती जा रही है.

अश्लील होली गीतों के आगे अब होली की उमंग भी गायब होने लगी है। अब ये पुराने दिनों की तरह सिर्फ यादें बनकर रह गई है। फागुन महीने की शुरुआत होते ही गांवों में नागाढ़े की धुन पर फाग गीत गाने वालों की लंबी टोलियां दिखाई पड़ती थी। होली के उमंग में डूबे लोग टोलियां बनाकर घर-घर जाकर लोक वाद्य नगाड़ा बजाते हुए फाग गीत गाते देखे जाते थे।

भारतीय संस्कृति से सराबोर होकर लोग सारे द्वेष कटुता को भूल अपने आप को एक टोली में समाहित कर आपसी भाईचारा का संदेश देते थे। मिलजुलकर गाया जाने वाला फाग गीत गांव की मिट्टी की खुशबू प्रदान करती थी। एक महीना पहले से हीं होली के आने की खुशी से लोग झूमने लगते थे।

इन गीतों में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, धार्मिक तथा पारंपरिक रीति -रिवाजों की झलक देखने को मिलता था। ये गीत हमारी लोक संस्कृति की पहचान होती थी। समय के साथ सब कुछ बदलने लगा। रिश्ते औपचारिक होते गए और होली की पुरानी परंपरा बदलने लगी। होली के रस्म अदायगी के तौर पर यह गीत कहीं कहीं सुनने को मिलते हैं।

पहले लोगों का समूह गांव के चौपाल पर या मंदिर में देर रात्रि तक नगाड़ा बजाते हुए फाग गीत गाते थे। रात भर सुनाई देने वाले ये नगाड़े की ध्वनि और फाग गीत अब पुराने दिनों की बात हो गई हैं। अब गांवों में पुरानी होली कहां देखने को मिलती है। अब पुराने होली गीत की जगह अश्लील छत्तीसगढ़ी गीत हावी हो गई है।

अब न हीं गांव का चौपाल दिख रहा, बूढ़े-बुजुर्गों का जमघट गायब है, न हीं नगाड़े की थाप सुनाई देती और न हीं फाग गीत गाने वाले लोग दिख रहे हैं। फागुनी मिठास गायब हो चुकी है। परिणामस्वरूप अब तो लोग गुलाल लेकर दरवाजे पर भी नहीं बैठते।

गांवों की मिट्टी से छत्तीसगढ़ की संस्कृति पर आधारित फाग गीतों की धुन अब सुनाई नहीं देती। छत्तीसगढ़ी लोक परंपरा को समाहित किए हुए ये फाग गीत अब विलुप्त होते जा रहे है। लोक त्योहार, लोक वाद्य और गीत को खत्म होने से बचाने के लिए सरकार को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए.

आलेख

डॉ अलका यतींद्र यादव बिलासपुर छत्तीसगढ़

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