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महा मानव महात्मा गाँधी और छत्तीसगढ़ : पुण्यतिथि विशेष

महात्मा गांधी विश्व के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेंगे। उन्होंने देश के ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम को सामाजिक जागरण के अपने रचनात्मक अभियान से भी जोड़ा, जिसमें शराबबन्दी ,अस्पृश्यता निवारण, सर्व धर्म समभाव, सार्वजनिक और व्यक्तिगत स्वच्छता, खादी और ग्रामोद्योग, ग्राम स्वराज, ग्राम स्वावलम्बन, पंचायती राज और बुनियादी शिक्षा जैसे कई विषय शामिल थे। तत्कालीन भारतीय समाज के सशक्तिकरण के लिए उनकी दृष्टि में ये बहुत ज़रूरी विषय थे, जिनका जन-जीवन से गहरा नाता था और किसी न किसी रूप में आज भी है।

महात्मा गाँधी इन रचनात्मक कार्यों के जरिए देशवासियों को राष्ट्रीय एकता के मज़बूत धागों से जोड़कर आज़ादी के आंदोलन को अपनी मंज़िल तक पहुँचाना चाहते थे। उनकी प्रेरणादायक जीवनी को पढ़ें तो आश्चर्य होता है कि मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने देश में उन्हें अपने 78 वर्षीय जीवन में सिर्फ़ 32 वर्ष का ही समय मिल पाया।

गुजरात के पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 को जन्मे मोहनदास करमचंद गाँधी की जीवन यात्रा 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में उस वक्त हमेशा के लिए थम गयी, जब उनकी नियमित प्रार्थना सभा में एक व्यक्ति ने उन्हें अपनी पिस्तौल का निशाना बना दिया।

इन दिनों जब हम वर्ष 2019 -20 को महात्मा गाँधी के 150 वें जन्म-जयंती वर्ष के रूप में मना रहे हैं, तब ऐसे महत्वपूर्ण समय में उनके महान व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करना भी बहुत ज़रूरी हो जाता है। मनुष्य को उसके सद्कार्य ही महान बनाते हैं और वह ‘मानव’ से ‘महा मानव’ बन जाता है। महात्मा गाँधी को भी उनके सद्कार्यों ने ‘महात्मा’ से ‘महा मानव’ बना दिया।

यह वर्ष 2020 छत्तीसगढ़ के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। यह महात्मा गाँधी की प्रथम छत्तीसगढ़ यात्रा और कण्डेल में हुए किसानों के नहर सत्याग्रह का भी शताब्दी वर्ष है। दिसम्बर 1920 में वह दो दिन के प्रवास पर कण्डेल के किसानों को समर्थन देने यहाँ आए थे।

आज़ादी के आंदोलन में देश की जनता ने गाँधीजी को अपनी पलकों पर बैठाया। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार गाँधीजी के विचारों और कार्यों से प्रभावित होकर उन्हें ‘महात्मा’ सम्बोधन सबसे पहले वर्ष 1915 में राजवैद्य जीवनराम कालिदास ने दिया था। आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के संस्थापक, महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान रंगून (म्यांमार)से अपने रेडियो प्रसारण में उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ का सम्बोधन देकर सम्मानित किया।

आगे चलकर यह सम्बोधन महात्मा गाँधी के नाम का पर्याय बन गया। वह वर्ष वर्ष 1893 से लगभग 21 साल दक्षिण अफ्रीका में रहे। वकालत के पेशे के सिलसिले में वह वहाँ गए थे, लेकिन स्थानीय निवासियों और प्रवासी भारतीयों के प्रति अंग्रेजों अमानवीय भेदभावपूर्ण व्यवहार और उनकी रंगभेद नीति को देखकर गाँधीजी काफी आहत हुए। उन्होंने वहाँ अंग्रेज प्रशासन के विरुद्ध भारतीयों को संगठित कर सत्याग्रह आंदोलन चलाया।

वह वर्ष 1915 में वकालत छोड़कर दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट थे। इसके बाद उन्होंने देश के जन जीवन को नज़दीक से देखने और समझने के लिए लगभग दो वर्ष तक लम्बी -लम्बी यात्राएं की। किसानों तथा ग्रामीण और शहरी श्रमिकों के जीवन संघर्षों को निकट से देखा। उनके मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए अभियान चलाने की तैयारी की। बदहाली का कठिन जीवन जी रहे लगभग नंगे बदन रहने को मज़बूर ग़रीबों की पीड़ा से आहत और व्याकुल होकर उन्होंने भी आजीवन सिर्फ़ घुटनों तक एक धोती के सहारे खुले बदन रहने का संकल्प लिया और उसे अपनी अंतिम साँस तक निभाया भी।

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के साथ -साथ राष्ट्रहित और समाज हित में कई भूमिकाओं का निर्वहन किया । वकील होने के साथ ही वह पत्रकार ,लेखक और प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ भी थे। स्वतंत्रता संग्राम के लिए जन जागरण के उद्देश्य से उन्होंने कई वर्षों तक ‘यंग इंडिया’, ‘इंडियन ओपिनियन’ और ‘हरिजन’ नामक समाचार पत्रों का प्रकाशन और सम्पादन किया।

उनके नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका में इंडियन ओपिनियन’ का प्रकाशन 4 जून 1903 को शुरू हुआ था। इस समाचार पत्र के हर अंक में प्रकाशन सामग्री चार भाषाओं – हिन्दी, गुजराती, तमिल और अंग्रेजी में एक साथ छह कॉलमों में छपती थी। महात्मा गाँधी द्वारा शुरू किए गए इस अखबार के मनसुखलाल नज़र इसके प्रथम सम्पादक थे।

गांधीजी के नेतृत्व और कुशल सम्पादन में ‘नवजीवन ‘ नामक मासिक पत्रिका भी निकली । गाँधीजी ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में वर्ष 1923 -24 में यरवदा जेल में रहते हुए गुजराती भाषा में ‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास ” भी लिखा । उंन्होने छोटी -सी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज ‘गुजराती भाषा में वर्ष 1909 में लिखी ,जिसका हिन्दी अनुवाद भी काफी लोकप्रिय हुआ। उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग ‘ भी बहुचर्चित और व्यापक रूप से प्रशंसित है।

स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा पर आधारित ‘सत्याग्रह ‘ और ‘असहयोग अथवा सविनय अवज्ञा आंदोलन ‘ महात्मा गांधी की दो ऐतिहासिक देन है । ये दो ऐसे शांतिपूर्ण हथियार हैं ,जिनका उपयोग आज के दौर में भी कई जन आंदोलनों में होता रहता है। नमक प्रत्येक मनुष्य के भोजन की एक सामान्य लेकिन रोज की ज़रूरत है।अंग्रेजों ने भारतीयों के इस मानवीय अधिकार पर भी अपना एकाधिकार जमा रखा था।

महात्मा गाँधी ने इस जन विरोधी कानून के ख़िलाफ़ 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से आम जनता के साथ 240 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए 24 दिनों में समुद्र के किनारे ग्राम दांडी पहुँचे ,जहाँ अंग्रेजों के एकाधिकार वाले नमक कानून को चुनौती देकर उंन्होने नमक बनाया। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनकी यह यात्रा ‘दांडी मार्च ‘ के नाम से स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।

दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद वर्ष 1915 से 1947 के बीच सिर्फ़ 32 वर्ष में ही गाँधीजी ने जनता को संगठित कर ‘सत्याग्रह ‘ और ‘सविनय अवज्ञा ‘ के अपने अहिंसक औजारों से लगभग एक शताब्दी की उस अंग्रेजी हुकूमत को डांवाडोल कर उसे भारत छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया,जिसके बारे में दुनिया भर में यह धारणा फैली हुई थी कि ब्रिटिश राज का सूरज कभी नहीं डूबता ।

वह आधुनिक युग में बीसवीं शताब्दी की इस दुनिया के सबसे महान नेता थे, जिनके करिश्माई व्यक्तित्व से महान वैज्ञानिक आइंस्टीन भी काफी प्रभावित थे। उंन्होने गाँधीजी के बारे मे एक बार लिखा था -‘आने वाली पीढियां शायद ही बड़ी मुश्किल से यह विश्वास कर पाएंगी कि हाड़-मांस का बना कोई ऐसा मनुष्य भी कभी इस धरती पर मौज़ूद था।’

दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ के आधुनिक इतिहास में भी महात्मा गाँधी से जुड़े कई प्रसंग अमिट अक्षरों में दर्ज हैं। उंन्होने आज़ादी के आंदोलन के दौरान लगभग तेरह वर्षो के अंतराल में दो बार छत्तीसगढ़ का दौरा किया था। वो कुल 9 दिनों तक यहाँ के अलग -अलग इलाकों में गए। किसानों ,मज़दूरों और आम नागरिकों से मिले ।

गाँधी जी पहली बार वर्ष दिसम्बर 1920 में बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव और पण्डित सुन्दरलाल शर्मा के आमंत्रण पर छत्तीसगढ़ आए थे। वह 20 और 21 दिसम्बर तक यहाँ रहे। उनकी इस पहली यात्रा का मुख्य उद्देश्य था -कण्डेल (धमतरी ) में हुए नहर सत्याग्रह में शामिल किसानों का हौसला बढाना और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करना।

अगस्त 1920 में भरपूर वर्षा और खेतों में पर्याप्त पानी होने के बावज़ूद अंग्रेज सरकार ने कण्डेल के किसानों पर पानी चोरी का झूठा इल्ज़ाम लगाकर सिचाई टैक्स की जबरन वसूली का भी आदेश जारी कर दिया था। प्रशासन ने किसानों पर 4050 रुपए का सामूहिक जुर्माना लगा दिया। इसकी वसूली नहीं हुई तो किसानों को उनके पशुधन की कुर्की करने की नोटिस जारी कर दी गयी।

किसानों के मवेशियों को ज़ब्त भी किया गया और साप्ताहिक हाट-बाजारों में उनकी नीलामी के भी प्रयास किए गए ,लेकिन ग्रामीणों की एकता के आगे प्रशासन की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं।

सिंचाई टैक्स और जुर्माने के आदेश के ख़िलाफ़ किसानों ने बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में ‘नहर सत्याग्रह” शुरू कर दिया। अंचल के नेताओं ने इस आंदोलन में जोश भरने के लिए महात्मा गाँधी को बुलाने का निर्णय लिया । छोटेलाल जी के आग्रह पर उन्हें 20 दिसम्बर 1920 को पण्डित सुन्दरलाल शर्मा अपने साथ लेकर रायपुर आए ।

गाँधीजी कोलकाता से रेलगाड़ी में यहाँ पहुँचे । यह गाँधीजी के प्रभावी व्यक्तित्व का ही जादू था कि उनके आगमन की ख़बर मिलते ही अंग्रेज प्रशासन बैकफुट पर आ गया और उसे सिंचाई टैक्स की जबरिया वसूली का हुक्म वापस लेना पड़ा । गाँधीजी ने 20 दिसम्बर की शाम रायपुर में एक विशाल आम सभा को भी सम्बोधित किया । जहाँ पर उनकी आम सभा हुई ,वह स्थान आज गाँधी मैदान के नाम से जाना जाता है।

वह रायपुर से 21 दिसम्बर को रायपुर से मोटरगाड़ी में धमतरी गए थे, जहाँ आम जनता और किसानों की ओर से पण्डित सुन्दरलाल शर्मा और छोटेलाल श्रीवास्तव सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने उनका स्वागत किया । गाँधीजी ने धमतरी में आम सभा को भी सम्बोधित किया और रायपुर आकर नागपुर के लिए रवाना हो गए ।

दूसरी बार वह वर्ष 1933 में छत्तीसगढ़ आए थे । इस बार उंन्होने 22 नवम्बर से 28 नवम्बर तक याने कुल 7 दिनों तक इस अंचल का सघन दौरा किया। इस बीच वह दुर्ग, रायपुर, धमतरी और बिलासपुर सहित मार्ग में कई गाँवों और शहरों के लोगों से मिलते रहे।

उनकी यह दूसरी छत्तीसगढ़ यात्रा इस मायने में भी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है कि इसी दरम्यान उंन्होने भारतीय समाज में व्याप्त ऊँच -नीच के भेदभाव के ख़िलाफ़ जन-जागरण के विशेष अभियान की शुरुआत भी यहाँ की धरती से की। छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह भी दर्ज है कि इस अंचल में अस्पृश्यता निवारण का कार्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पण्डित सुन्दरलाल शर्मा पहले ही शुरू कर चुके थे । उन्होंने वर्ष 1918 में दलितों को जनेऊ पहना कर सवर्णों की बराबरी में लाने का ऐतिहासिक कार्य करते हुए सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में सामाजिक जागरण का शंखनाद कर दिया था।

वर्ष 1918 में ही उन्होंने राजिम स्थित भगवान राजीवलोचन के प्राचीन मन्दिर में अछूत समझे जाने वाले कहार (भोई )समुदाय को प्रवेश दिलाने का अभियान चलाया था। साहित्यकार स्वर्गीय हरि ठाकुर के अनुसार वर्ष 1924 में पण्डित सुन्दरलाल शर्मा ने ठाकुर प्यारेलाल सिंह और घनश्याम सिंह गुप्त के साथ रायपुर में ‘सतनामी आश्रम’ की स्थापना की थी।

नवम्बर 1933 में छत्तीसगढ़ के दूसरे प्रवास में भी गाँधीजी ने रायपुर में आम सभा को सम्बोधित किया, जहाँ उंन्होने छुआछूत मिटाने के लिए पण्डित सुन्दरलाल शर्मा द्वारा किए गए कार्यों की तारीफ़ करते हुए उन्हें अपना गुरु कहकर सम्मानित किया। इस दौरान धमतरी की आम सभा में गाँधीजी ने कण्डेल के किसानों के नहर सत्याग्रह आंदोलन को भी याद किया और यह दूसरा ‘बारादोली’ है। उंन्होने इसके लिए बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव, पण्डित सुन्दरलाल शर्मा, नारायणराव मेघावाले और नत्थूजी जगताप जैसे किसान नेताओं की भी जमकर तारीफ़ की।

महात्मा गाँधी स्वतंत्रता संग्राम की सफलता के लिए देश में सामाजिक समरसता और समानता की भावना पर बहुत बल देते थे। उंन्होने दूसरी बार के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान 24 नवम्बर 1933 को रायपुर स्थित राजाओं के कॉलेज याने राजकुमार कॉलेज में विद्यार्थियों को सम्बोधित किया । ये सभी विद्यार्थी छत्तीसगढ़ और देश की विभिन्न रियासतों के राजवंशों से ताल्लुक रखते थे।

गाँधीजी ने उनसे कहा था – “आप विश्वास कीजिए कि आप में और साधारण लोगों में कोई अंतर नहीं है। अंतर केवल इतना है कि आपको जो मौका मिला है, वह उन्हें नहीं दिया जाता।” उंन्होने आगे कहा था –“अगर आप भारत के ग़रीबों की पीड़ा समझना नहीं सीखेंगे तो आपकी शिक्षा व्यर्थ है। हिन्दू धर्म में जब प्राणी मात्र को एक मानने की शिक्षा दी गयी है, तब मनुष्यों को जन्म से ऊँचा या नीचा मानना उसके अनुकूल हो ही नहीं सकता ।”

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ वासियों के योगदान का अपना एक गौरवशाली इतिहास है। वर्ष 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हमारे यहाँ सोनाखान के अमर शहीद वीर नारायण सिंह के सशस्त्र संघर्ष की अपनी गौरव गाथा है, वहीं बाद के वर्षों में महात्मा गाँधी के अहिंसक आंदोलनों के प्रेरणादायक प्रभाव से भी यह इलाका अछूता न रहा ।

जनवरी 1922 में आदिवासी बहुल सिहावा क्षेत्र में श्यामलाल सोम के नेतृत्व में हुआ ‘जंगल सत्याग्रह’ इसका एक बड़ा उदाहरण है, जिसमें सोम सहित 33 लोग गिरफ़्तार हुए थे और जिन्हें तीन महीने से छह महीने तक की सजा हुई थी । इस आंदोलन में भी पण्डित सुन्दरलाल शर्मा, नारायणराव मेघा वाले और बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जैसे नेताओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई ।

मई 1922 में सिहावा में सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए गिरफ़्तार होने पर पण्डित शर्मा को एक वर्ष और मेघावाले को आठ महीने का कारावास हुआ । वर्ष 1930 में गाँधीजी के आव्हान पर स्वतंत्रता सेनानियों ने धमतरी तहसील में जंगल सत्याग्रह फिर शुरू करने का निर्णय लिया। इसके लिए धमतरी में नत्थूजी जगताप के बाड़े में सत्याग्रह आश्रम स्थापित किया गया। गिरफ्तारियां भी हुईं। रुद्री में हुए जंगल सत्याग्रह के दौरान पुलिस की गोली से एक सत्याग्रही मिंटू कुम्हार शहीद हो गए।

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की ऐसी अनेक यादगार घटनाओं का उल्लेख छत्तीसगढ़ के इतिहास में मिलता है । पण्डित रविशंकर शुक्ल, पण्डित वामन बलिराम लाखे, पण्डित भगवती प्रसाद मिश्र, बैरिस्टर छेदीलाल, अनन्त राम बर्छिहा, क्रान्तिकुमार भारतीय, यति यतन लाल, डॉ.खूबचन्द बघेल, डॉ.ई.राघवेन्द्र राव, मौलाना रऊफ़ खान, महंत लक्ष्मीनारायण दास जैसे कई दिग्गज स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत से अंग्रेजी हुकूमत को समाप्त करने के लिए महात्मा गाँधी के मार्ग पर चलकर राष्ट्रीय चेतना की अलख जगायी।

आलेख

स्वराज करुण, रायपुर
वरिष्ठ लेखक एवं चिंतक

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