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ग़ुलामी के बन्धनों में जीना याने स्वयं की ज़िन्दगी को तबाह करना: लाला लाजपत राय

लाला लाजपत राय जयंती विशेष आलेख

उन्होंने कहा था -ग़ुलामी के बन्धनों में जीना याने स्वयं की ज़िन्दगी को तबाह करना है। लेकिन यह भी सच है कि आज़ादी भले ही हमें प्यारी हो, पर उसे पाने का रास्ता हमेशा कठिन चुनौतियों से भरा होता है। – अपने इन्हीं विचारों पर अडिग रहते हुए लाला लाजपतराय ने देश की आज़ादी के लिए जन आंदोलन का नेतृत्व करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी ।

वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान और अग्रणी नेताओं में से थे । उस दौर के हमारे अधिकांश बड़े नेता सिर्फ’नेता’ नहीं, बल्कि देश के ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों के गहन अध्येता, प्रखर विचारक और लेखक भी हुआ करते थे ।

लाला लाजपतराय भी भारतीय समाज के कुशल नेतृत्व कर्ता होने के साथ -साथ गंभीर चिन्तक, लेखक, समाज सुधारक और पत्रकार भी थे। आज़ादी के आंदोलन में आर्थिक मोर्चे पर जनता को जोड़ने के लिए जहाँ उन्होंने वर्ष 1894 में पंजाब नेशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की स्थापना की।

वहीं समाज में राष्ट्रीय चेतना के विस्तार के लिए ‘पंजाब केसरी ‘ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन भी शुरू किया । उंन्होने लाला हंसराज के साथ पंजाब में दयानन्द एंग्लो वैदिक स्कूल -कॉलेजों की स्थापना की, जिन्हें आज हम संक्षेप में ‘डीएवी’ स्कूलों और कॉलेजों के नाम से जानते हैं।

भारत के ऐसे जन -नेता थे, जिन्होंने आज़ादी के आंदोलन में जनता का नेतृत्व करते हुए स्वयं ब्रिटिश पुलिस की लाठियाँ खाई और गंभीर रूप से घायल होकर शहीद हो गए। शेर-ए-पंजाब के नाम से प्रसिद्ध लाला जी का जन्म 28 जनवरी 1865 को तत्कालीन अविभाजित पंजाब प्रान्त के फ़िरोजपुर जिले के अंतर्गत ग्राम ढुधिके में हुआ था। यह गांव अब हमारे भारतीय पंजाब के मोगा जिले में है।

स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह वकील बने। उंन्होने कुछ समय तक रोहतक और हिसार में वकालत भी की। स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाजी विचारों से लालाजी काफी प्रभावित हुए और उनके साथ मिलकर पंजाब में आर्य समाज का विस्तार किया।

छुआछूत की सामाजिक बुराई को मिटाने के लिए भी लालाजी ने सामाजिक जागरण का ऐतिहासिक काम किया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ़्तार कर 21अप्रेल 1922 से 9 जनवरी 1923 तक धर्मशाला (वर्तमान हिमाचल प्रदेश) की जेल में रखा गया था।

झांसी की महारानी लक्ष्मी बाई के नेतृत्व में सन 1857 में देश की आज़ादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ प्रथम सशस्त्र संघर्ष के बाद अलग-अलग इलाकों में समय-समय पर स्थानीय क्रांतिकारी आंदोलन होते रहे, लेकिन उन दिनों हमारे ही देश के कई लोगों ने आज़ादी के योद्धाओं का साथ न देकर अंग्रेजों का सहयोग किया।

इस वज़ह से स्वाधीनता का हर सशस्त्र आंदोलन विफल होता गया ,लेकिन राष्ट्रीयता की भावना भी प्रबल होती गयी। कालांतर में महात्मा गाँधी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपत राय जैसे नेताओं ने अहिंसक तरीके से राजनीतिक आंदोलनों का विस्तार किया। उन दिनों हमारा स्वतंत्रता संग्राम वैचारिक धरातल पर दो धाराओं में विभाजित होकर चल रहा था, लेकिन देश को ग़ुलामी की जंजीरों से मुक्त करना दोनों धाराओं का लक्ष्य था।

एक धारा नरम दल की थी, जिसे गाँधीजी अपने सहयोगियों के साथ आगे ले जा रहे थे, दूसरी धारा थी गरम दल की, जिसमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपत राय जैसे दिग्गज शामिल थे। हालांकि गरम दल के इन नेताओं ने भी कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया, बल्कि वे अंग्रेजों की सरकार प्रायोजित हिंसा का शिकार बनते रहे। इन तीनों नेताओं को उन दिनों ‘बाल -पाल और लाल’ के नाम से अपार लोकप्रियता मिली।

ब्रिटिश हुकूमत ने ‘फूट डालो और राज करो ‘वाली अपनी कुटिल नीति के जरिए वर्ष 1905 में बंगाल को पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के रूप में दो हिस्सों में विभाजित कर दिया था। आज़ादी के दीवानों ने इसके विरोध में ‘बाल -पाल और लाल’ के नेतृत्व में उग्र आंदोलन किया । हालांकि गोरों की हुकूमत ने अपने इस जनविरोधी फ़ैसले को वापस नहीं लिया। इसके फलस्वरूप अंग्रेजों के ख़िलाफ़ भारतीयों का गुस्सा दिनोंदिन बढ़ता रहा।

इंग्लैंड की सरकार ने उन्हीं दिनों साइमन कमीशन का गठन किया था ,जिसके सभी सात सदस्य ब्रिटिश पार्लियामेंट के अंग्रेज सांसद थे। भारत में कानूनी सुधारों के लिए अध्ययन करके सरकार को रिपोर्ट देने के लिए यह आयोग बनाया गया था। आयोग को यह ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई थी कि वह सरकार को बताए कि क्या भारत इस लायक हो गया है कि भारतीयों को संवैधानिक अधिकार दिए जा सकें?

इस प्रकार भारत के बारे में रिपोर्ट बनाने वाले इस आयोग का उद्देश्य भी भारतीयों के लिए अपमान जनक था। जनता इस बात से भी नाराज़ थी कि आयोग में किसी भारतीय को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। साइमन कमीशन के भारत आने पर स्वतंत्रता आंदोलन और उग्र हो गया। इस आयोग के ख़िलाफ़ कोलकाता ,लखनऊ, लाहौर सहित देश भर में जमकर प्रदर्शन किए गए।

आयोग के अंग्रेज सांसदों को काले झण्डे दिखाकर ‘वापस जाओ’ के नारे लगाए गए। लखनऊ के प्रदर्शन में लाठीचार्ज होने पर जवाहरलाल नेहरू और गोविन्दवल्लभ पन्त भी घायल हुए। लाला लाजपत राय लाहौर में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व संभाले हुए थे ,जहाँ ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक स्कॉट के आदेश पर उप पुलिस अधीक्षक सांडर्स ने सिपाहियों के साथ प्रदर्शनकारियों पर बुरी तरह लाठीचार्ज किया, जिसमें लाला लाजपतराय गंभीर रूप से घायल हो गए। वह 30 अक्टूबर 1928 का दिन था।

लालाजी को लाहौर के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहाँ आज़ादी के इस महान योद्धा ने मौत से 18 दिनों के ‘महाभारत’ जैसा संघर्ष करते हुए स्वतंत्रता की बलिवेदी पर 17 नवम्बर 1928 को अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। लाला जी की इस महान शहादत ने आम जनता के साथ -साथ क्रांतिकारियों को भी उद्वेलित कर दिया। भगतसिंह ,सुखदेव ,राजगुरु और चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपने साथियों के साथ मिलकर अपनी हिंदुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के जरिए अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने का फ़ैसला किया। उनका निशाना था।

लाठीचार्ज का आदेश देने और करने वाला अंग्रेज पुलिस अधीक्षक स्कॉट । वह 17 दिसम्बर 1928 का दिन था ,जब लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर से डीएसपी सांडर्स कहीं जाने के लिए निकला ,लेकिन भगतसिंह और राजगुरु ने उसे पुलिस अधीक्षक स्कॉट समझ कर उस पर गोलियाँ चला दी। सांडर्स मारा गया।

बाद में अंग्रेज प्रशासन ने जन सुरक्षा विधेयक और औद्योगिक सम्बन्ध विधेयक के विरुद्ध हुए असेम्बली बम कांड में भी भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को दोषी माना। इन दोनों प्रकरणों में उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 मार्च 1931 की तारीख इन तीनों युवा क्रांतिकारियों के शहीदी दिवस के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।

लाला लाजपत राय की शहादत ने हमारे युवाओं को आज़ादी के लिए शहादत का रास्ता दिखाया। लाला जी ने लाठीचार्ज में ज़ख्मी होकर हुंकार भरी थी-मेरे शरीर पर लगी एक -एक लाठी ब्रिटिश हुकूमत की ताबूत पर एक-एक कील साबित होगी। … और हुआ भी यही । लाला लाजपत राय की शहादत के लगभग 19 साल बाद 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हो गया और अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा।

स्वराज करुण,
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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