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गांधी ने पहचानी थी भारत की पुरानी पूँजी

भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की शक्ति को समाप्त किए बिना अंग्रेज पूरे देश को चिरकाल तक अपना गुलाम नहीं बना सकते थे, यही आशय भारत में एक सर्वेक्षण के बाद लॉर्ड मैकॉले के ब्रिटिश संसद में दिए गए भाषण में था। भारत अपने प्राचीन ज्ञान परंपरा और विरासत पर गर्व किए बिना स्वराज्य स्थापित नहीं कर सकता, ऐसा महात्मा गांधी मानते थे।

ऐसी बात नहीं है कि भारतीय इतिहास की श्रेष्ठता पर आज के बुद्धिजीवी सवाल खड़े करते हैं, दरअसल पश्चिमी शिक्षा और आधूनिक विज्ञान पर भरोसा करने वाले परतंत्र भारत में भी मौजूद थे। 1920 में प्रकाशित क्रॉनिकल समाचार पत्र के एक लेख का अंश है, जिसमें भारत के बारे में वर्णन किया गया था,

‘दशमलव’ पद्धतिका आविष्कार भारतीयोंने किया था, भूमिति और बीज गणित की भी पहले पहल भारतमे खोज हुई थी और त्रिकोणमिति की भी । संसार में सर्व प्रथम पाँच अस्पताल भारत में खोले गए थे। यूरोप के प्राचीन चिकित्सकों ने भारत की औषधियों का उपयोग किया था। ईसवी पूर्व छठी शताब्दी में भारतीयों ने मानव शरीर – शास्त्र का अध्ययन किया और उसी समय शल्य – चिकित्सा की विद्या भी हस्तगत की।

आज लोहे के जैसे स्तम्भ बनाये जा सकते है वैसे स्तम्भ बनाने की कला भारत प्राचीन काल में जानता था। गुफाएँ खोदने का कौशल तो हिन्दुस्तान के ही पास था। जब सिकन्दर भारत आया तब उसे पंजाव और सिन्ध में प्रजातन्त्र राज्य मिले।

प्राचीन हिन्दुस्तान में हमारी स्त्रियो को वे सब अधिकार प्राप्त थे जिन अधिकारों के लिए आज यूरोप की स्त्रियां लड़ रही है। चन्द्रगुप्त के राज्यकालमें नगरपालिकाएँ थी। व्याकरण-विद्या को तो हिन्दुस्तान ने ही सम्पूर्णता तक पहुँचाया था। आज तक ‘रामायण’, ‘महाभारत’ की होड़ कर सकने वाले ग्रन्थोंकी रचना नहीं हो सकी है ”

महात्मा गाँधी को केवल भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता की चिंता नहीं थी वे पश्चिमी सभ्यता के प्रति भारतीयों के आकर्षण से भी देश का पिंड छुड़ाना चाहते थे। गांधी जी का मानना था कि हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा बिना परखे अगर स्वीकार करने में हिचक है तो इसे रखने तक अपनी विरासत के खिलाफ हमें कुछ कहने से बचना चाहिए।

नवजीवन में व्यक्त उनके विचार से यही भाव प्रकट हो रहा है, “प्रत्येक वस्तु हम यूरोप से उधार ले रहे है। मुझे तो लगता है कि जब तक हम अपने गौरवमय अतीत का वर्तमान काल में पुनरुद्धार नही कर सकते तब तक पुरानी पूंजी के सम्बन्ध में चुप रहना ही बुद्धिमानी है। जिस पूंजी का हम कुछ लाभ नहीं उठा सकते, जिसको हम संसार के आगे नही रख सकते कि वह उसे परखकर देख ले तब तक वह हमें गौरवान्वित नही लज्जित करती है और केवल बोझ स्वरूप काल है।

प्राचीन काल में उपर्युक्त विभूतियाँ हम लोगों में मौजूद थी, यदि हम ऐसा मानते हों तो उन्ही विभूतियों को फिर से प्रगट कर बताने की हममें शक्ति होनी चाहिए। हम [निस्सन्देह] वीर लोगों की सन्तानें है लेकिन यदि इस विरासत को शोभान्वित करने की हममें ताकत नहीं है तो इससे हमारा कुछ भी लाभ नहीं होगा।”

महात्मा गाँधी की पहचान भारत को स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राजनेता की रही है लेकिन वे सामाजिक-आर्थिक चिंतक भी थे। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में जब स्वदेशी को जोड़ा तो केवल भौतिक वस्तुओं के उपयोग से नहीं था बल्कि वे भारतीय प्राचीन परिवार व्यवस्था, सनातन धर्म और अध्यात्म की शक्ति को देश की जनता से परिचित कराने से था।

उनकी स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं थी बल्कि सांस्कृतिक भी थी। भारतीय चिकित्या पद्धति जिसमें प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद को अपनाने पर जोर देते थे। वे एलोपैथी पद्धति के विरोधी थे, गांधी मानते थे कि रसायनिक दवाईयों से किसी रोग का उपचार कर लेने का दावा मानों शरीर के साथ खिलवाड़ करने की छूट के सामान है। जबकि गांधी जी का मानना था कि आत्मसंयम और अनुशासन से शरीर को निरोगी रखा जा सकता है और अस्वस्थ हो जाने पर प्राकृतिक पद्धति से इलाज करना चाहिए।

महात्मा गाँधी भारतीय शिक्षा पद्धति को अपनाने पर जोर देते थे जिसमें मुक्त शिक्षा हो, जिसमें चरित्र निर्माण और कौशल विकास पर जोर हो। ऐसी शिक्षा जो पीढ़ी को स्वावलंबी बनाए। स्वतंत्रता के बाद गांधी के उन दिशा निर्देशों को विस्मृत कर दिया गया जिससे भारत में स्वराज के साथ सुराज की कल्पना की गई थी ।

गांधी जी के विचार नि:संदेह भारत को पुनः विश्व की ज्ञानशक्ति बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं लेकिन स्वतंत्रता के बाद उनके विचार मार्ग का त्याग कर जितना नुकसान देश और दुनिया का किया गया, उसकी मौद्रिक गणना तो नहीं हो सकती। अभी भी समय है कि हम दुनिया को आर्थिक व मानवीय विकास की नई धारा का दर्शन करवा सकें इसके लिए हमें अपनी ज्ञान परंपरा को विज्ञान और तर्क की कसौटी पर कसना होगा। इस ज्ञान पर पहले विश्वास करना होगा, इसे अपनाना होगा और पालन करना होगा।

महात्मा गांधी के सपनों से देश के भटकाव से अनेक समस्याए पनपी है। भारत में शोध, अनुसंधान और तकनीक नवोन्मेषी को प्रोत्साहित करने के बजाय विदेशी प्रोद्योगिकी को अपनाते रहे। परिणाम यह हुआ कि उद्योग, व्यापार आज विदेशी कंपनियों के भरोसे है। जबकि गांधी हमेशा भरतीय प्राचीन ज्ञान पद्धति पर विश्वास करते थे।

उनकी टिप्पणी है, “कोई राष्ट्र अपने स्वर्णिम अतीत को याद करके आगे नहीं बढ़ सकता । यदि उसे याद किया हो जाए तो सिर्फ आगे बढ़ने की वातको ध्यानमें रखकर ही किया जाना चाहिए। आज ‘रामायण’ को लिखने वाले व्यक्ति कहाँ है? प्राचीन काल की नीति आज कहाँ है? उस समय की कार्यदक्षता और कर्तव्य परायणता कहां है? जिन औपषियों की सहस्रों वर्ष पूर्व खोज की गई थी, क्या उनमें हम कोई वृद्धि कर सके है? प्राचीन ग्रन्थोंमें जिन औषधियों का वर्णन है, उनकी हमें पूरी जानकारी भी नहीं है।”

हमने हजार साल की परतंत्रता में अपने ज्ञान के गौरवशाली अतीत को भूला दिए, गांधी ने उन भूली बातों को फिर हमारे सामने प्रस्तुत किया फिर भी हमने उन पर गौर नहीं किया। हम समय रहते अगर अपने ज्ञान, स्वदेशी पद्धतियों पर अनुसंधान किए होते, आत्मसात करते तो भारत की प्रगति की गति और भी अधिक होती।

आलेख

शशांक शर्मा, रायपुर
वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक

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