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छत्तीसगढ़ी बालमन की मनोरंजक तुकबंदियाँ

बालमन बड़ा स्वतंत्र होता है। उसे बंधन जरा भी स्वीकार नहीं। बंधन में रहकर बालमन कुम्हलाने लगता है। जैसे कलियों को खिलने के लिए सूरज का प्रकाश चाहिए, उसी प्रकार बालमन को खिलने के लिए बंधन मुक्त होना चाहिए। बालकपन खेल प्रिय होता है। खेल-खेल में वह नए सृजन भी करता है। पीपल पत्ते से फिरकी बना लेता है, कागज से नाव बना लेता है। किसी बेल की पोंगलीनुमा डाली से बांसुरी बना लेता है। किसी वस्तु को देखकर वह तुकबंदी करके कविता गढ़ लेता है। बालमन श्रृजन का स्रोत है।

बालमन की अभिरूचियां आगे चलकर उसे सर्जक के रूप में, कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित करती है। नागर समाज में बालमन के मनोरंजन के लिए अनेकानेक महंगे साधन उपलब्ध होते है, परन्तु लोक में बालमन के लिए मनोरंजन का साधन प्राकृतिक वस्तुएं ही बनती है या उसके परिवेश में उसे जो भी वस्तु सुलभ होती है, उसे अपने मनोरंजन का साधन बना लेता है। लोक की यही खासियत है कि प्रकृति उसकी आत्मा में रची-बसी है। बचपन लेकर वृद्धावस्था तक वह प्रकृति से जुड़कर प्रकृति को अंगीकर करता है। इसलिए लोक, प्रकृति के बेहद करीब है। लोक का यह गुण बालमन से समाया रहता है। जो उसके सृजन का आधार बनता है।

लोक और बालमन की चर्चा करते हुए बचपन की सारी गति विधियाँ चलचित्र की भाँति आँखों के सामने उतर आती है, जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ शरारतें भी हैं। पारस्परिक प्रेम सहयोग और भाईचारा भी है। बालमन को गीत कविता प्रिय होती है। बालमन कविता सुनता भी है और गढ़ता भी है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण बचपन की तुकबंदियां है, जो आज भी स्मृतियों में है, जिन्हे गाँव की गली-चौराहो में खेलने वाले बच्चों के मुख से सुना जा सकता है। मुझे लगता है कि तुकबंदी में कही गई बाते सरस और मजेदार होती है। लोगों को सुनने में अच्छी लगती है। कविता की शुरूआत इन्हीं तुकबंदियों से हुई होगी? बालमन के प्रयासों को देखा जाय तो ऐसा ही लगता है।

आइए बालमन की उन तुकबंदियों का उल्लेख करें जो बालमन और हमारे बाल साहित्य की पूंजी है। माँ की लोरी सुनकर सोने वाला मन ‘‘सो जा बेटा सो जा रे, तोर दाई गेहे पाँच खोंधरा, उहाँ ले लाही लाई जोंधरा’’ की ममतामयी पंक्तियों के साथ सपनों में खो जाता है। यही बालमन घर की डेहरी लांघ आंगन को पार कर अपने साथियों के साथ गलियों या चबूतरों में आता है, तब तक वह बोलने में पारंगत हो जाता है। फिर अपनी माई भाखा (मातृभाषा) में तुकबंदियाँ सुनकर और कविता गढ़कर माई भाखा की सेवा के लिए तैयार होता है। बात-बात में तुकबंदियाँ बात-बात में मनोरंजन छत्तीसगढ़ी बालमन की विशेषता है। कविता का व्यवहार बच्चो के बीच ही होता है।

छत्तीसगढ़ी बालमन में कविता का प्रादुर्भाव तुकबंदी से मनोरंजन के द्वार खोलता है। किसी बच्चे का नाम है ‘उदे, तो उससे पूछते है तोर का नाव है? तब वह कहता है- ‘उदे’। तब नाम पूछने वाला कहते है- छानी ले कूदे।’ फिर तो बच्चे कठल कर हँस पड़ते हैं। छत्तीसगढ़ी में गिनती का गीत बच्चे अपनी ही तुकबंदी से रच लेते है। इसी तरह निर्दिष्ट संख्या बोलने के लिए कहते है और उसने तत्काल बाद तुकबंदी कर मनोरंजन करते है। जैसे –

एक
खड़े खड़े देख

दो
गोहार पार के रो

तीन
गिरे पइसा ल बीन

चार
चल बेटा बाजार

पाँच
कनिहा मटका के नाच

छै
हमर घर आबे तैं

सात
खा दूध-भात

आठ
पढ़ अपन पाठ

नौं
पाछू डहर भौ

दस
टूरा परगे लस

अंको को लेकर और भी बड़ी मनोरंजक तुकबंदियाँ है, जो बालमन की उपज है।

बावन
तोर दाई ल लेगे रावन

अस्सी-अस्सी? तीन सौ साठ
मरगे तोर बुढ़िया सास

बीस-बीस चालीस?
कर मोर मालिस

अंको पर ही एक और मजेदार तुकबंदी का आनंद ले

अजला-बजला
बाम्हन बजला
तीन तेरा
चार करेला
पाँच भाई पांडो
छै के गंडा
सात के सीताफल
आठ के गंगाजल
नौ के नागिन
दस के बाघिन
ग्यारा बेटा राम के
कौड़ी न काम के।

नामों को लेकर अनेक तुकबंदियाँ है। बच्चे आपस में एक-दूसरे के नाम को लेकर चिढ़ाते है और मजा लेते हैं। किसी बच्चे को उसका नाम पूछते हैं। जब वह अपना नाम लेता है तब उसे इस तरह चिढ़ाते है-

अपना नाँव ले दिस
दतैयां पानी ल पी दिस
साजा के बाजार म
ढोल-ढोल ले पोक दिस।

किसी वस्तु को देखकर भी बच्चे तुकबंदियॉं कर लेते है। उदाहरण-
ले तो बोल सून
सूपा
बिलवा डोकरा तोर फूफा

चल जाबो?
केती?
कौंवा चिरके तोर चेथी।

उपरोक्त तुकबंदियों में उत्तर देने वाले बच्चे को यह कहकर चिढ़ाया गया है कि काला कलूटा बूड्ढा तुम्हारा फूफा है। तुम्हारी चेथी (गर्दन का पिछला भाग) में कौंए ने बीट कर दी है। जो बच्चा हंसी का पात्र बनता है, वह नाराज नही होता बल्कि वह इन तुकबंदियों का प्रयोग कर अन्य अनजान दूसरे बच्चों को हँसी का पात्र बनाता है। बालमन गंगाजल की तरह पवित्र होता हैं। उसमें किसी तरह का दोष नहीं होता। खेलते-खेलते झगड़ना और थोड़ी देर बाद फिर मिल जाना बालमन का स्वभाव है। बालमन की यही पवित्रता उसे भगवान की श्रेणी में ला खड़ा करता है। छत्तीसगढ़ी में एक हाना (कहावत) है। लइका अउ भगवान एक बरोबर।

किसी चबूतरे पर बैठे हुए तीन बच्चे खेल-खेल में तुकबंदी कर मनमोहित कविता गढ़ते है। बीच में बैठा हुआ बच्चा अपने को श्रेष्ठ बताते हुए कहता है-
तीर-तीर में धान
बीच में भगवान।

अर्थात जो मेरे किनारे बैठे हुए है धान है और मैं उनसे श्रेष्ठ भगवान हूँ। तब किनारे वाला कोई बच्चा कहाँ पीछे रहने वाला? वह भी तुकबंदी कर बीच वाले बच्चे की हँसी उड़ाकर उसे हीन सिद्ध कर देता है –
तीर-तीर में दही के लोटा,
बीच में बिलई के पोटा।

कहने का आशय यह कि जो किनारे बच्चे हम बैठे हैं वो दही का लोटा है और बीच में बैठने वाला तो मरी हुई बिल्ली का पोटा (अंतड़ी) है। फिर तो हँसी का फव्वारा फूट पड़ता है। हँसी-मजाक का यह क्रम देर तक चलते रहता है। कोई बुरा नही मानता। किसी का मन मलिन नहीं होता।

बचपन की कुछ घटनाएं याद आ रही है जिनमें दोस्तो के ओ नाम शामिल है जिसमें लेकर एक दूसरे को कुड़काते (चिढ़ाते) थे। जैसे-
जगदीस – चड्डी म हगदीस
पूरन – तोर ददा बेंचे चूरन
कमला – गोसइयाँ कहिबे हमला
रामा – चिरहा पैजामा
बुधारू – तोर मुह उतारू

मुझे याद है मेरे साथी मुझे ‘पीसी-पीसी, फुटहा सीसी’ कहकर चिढ़ाते थे। तब न मैं बुरा मानता था और न ही मेरे संगी-साथी जातियों को लेकर कोई बुरा नहीं मानता था। सब हँसी- मजाक में टाल देते थे। पर अब तो यह अपराध हो जायेगा। मुझे याद है मेरे साथी लोक गायक गौतम चंद जैन के चाचाजी ‘‘चना जोर गरम बाबू मै लाया मजेदार, चना जोर गरम के तर्ज पर स्थानीय जातियों का उल्लेख कर मंच में गीत गाते जैसे- चना खाय रे बनिया ओ तो बेचे जीरा धनिया….। ‘‘अपनी जाति का गीत सुनकर कोई खुश होता, तो कोई कुपित होता। तब यह कोई गाली नहीं थी केवल चुहलबाजी थी। तुकबंदी का कमाल था।

एक और मजेदार घटना तब हम चौथी-पाँचवीं में पढ़ते थे। हमारा घर देवाँगन (कोष्टा) मुहल्ले में है। मेरा गाँव देवाँगनों की बस्ती है। तब यहाँ कपड़ा बुनने का कार्य प्रत्येक देवाँगन के घर में होता था। मेरे सभी साथी देवाँगन थे। जिस गली से हम स्कूल जाते थे, वहाँ एक तिलोचन नाम के देवाँगन रहते थे। मंगठा (हाथ करघा) चलाकर कपड़ा बुनने का कार्य करते थे। यह भी उल्लेखनीय है कि श्री तिलोचन कका नाटक मंडली के उत्कृष्ट कलाकार थे।

नाटको में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाते थे। उनके मंगठा घर में उजाले के लिए एक खिड़की गली की ओर खुलती थी। आते-जाते हम बच्चो उनका नाम लेकर चिढ़हाते ‘‘तिली के लड्डू, तिलोचन भड्डू’’ वे कपड़ा बुनना छोड़कर हमें दौड़ाते, हम बच्चे तेजी से दौड़कर भाग जाते। रोज का यही उपक्रम। हम बच्चों को बड़ा मजा आता। एक दिन तिलोचन कका ने गली के मोड़ में अपने एक साथी को तैनात कर दिया, हम बच्चो का पकड़ने के लिए। जब उन्हें चिढ़ाया तो वे रोज की तरह हमारे पीछे दौड़े, हम भागे। तिलोचन कका अपने साथी को चिल्लाकर बोले “पकड़-पकड़ साले मन ल।” हम में से एक पकड़ा गया उसकी खूब मरम्मरत हुई। बाकी सब भाग गए। उस दिन से हमने स्कूल का रास्ता बदल लिया। उन्हें जहाँ कहीं भी आते-जाते देखते, चुपके से सरक जाते।

आज भी गाँव के बच्चे बंदरों को देखकर यह कहते हुए उछल पड़ते है कि “खिस बेंदरा खिस, हरदी -मिरचा पिस।” आकाश में उड़ते हुए बगुलों की पंक्तियों को देखकर कहते है ‘‘दूध दे दूध दे भरे कटोरा मूत दे।’’ ये बच्चे ऐसा सोचते है कि ऐसा कहने से पीछे रहने वाला बगुला आगे हो जाता है। संयोग से ऐसा हो जाता है तो बच्चे उत्साहित हो जाते हैं। बच्चो का मनोरंजन होता है।

बचपन खेल प्रिय होता है। छत्तीसगढ़ में बाल खेलो की लंबी श्रृखला है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये खेल यहाँ गीतों के साथ खेले जाते है। ये गीत बालमन की उपज हैं। इन खेल गीतो में कोई भाव भरा है या नहीं यह बच्चों के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। महत्वपूर्ण है तो बाल मन का मनोरंजन। इन खेल गीतों की प्रत्येक पंक्तियाँ बड़ी मजेदार और मनोरंजक है।

जैसे कबड्डी में ले तो – खुडुवा के आन-तान खा ले बेटा बीरो पान। हनुमान डेका, जीत पार लंका। अटकन मटकन खेल में – अटकन- मटकन दही चटाकन, लहुआ लाटा बन के काँटा । घोर-घोर रानी में – घोर -घोर रानी, इता-इता पानी, फुगड़ी में – गोबर दे बछरू, चारो खूंट ल लीपन दे। घानी-मुनी घोर दे में – घानी- मुनी घोर दे, पानी दमोर दे, नागंर बइला जोर दे। अत्ती-पत्ती खेल में – अत्ती-पत्ती मार गदत्ती, तुम लाओ पीपर के पत्ती आदि-आदि। जहाँ तक हम देखते है छत्तीसगढ़ी खेल गीतों में भी बालमन की मनोरंजक तुकबंदियों का साम्राज्य है और तो और बालमन कसम उतारने के लिए भी तुकबंदियों के माध्यम से कविता का ही सहारा लेता है।
एक आमा के गोही
तोर केहे ले का होही।
नदिया के तीर-तीर पान सुपारी
तोर किरिया ल भगवान उतारी।

बालमन सामान्य क्रिया व्यवहार में भी तुकबंदियों का सहारा ले कर अपना मनोरंजन करता है। मुंडन होने होने पर बच्चे मुंडा बच्चे को यह कहकर चिढ़ाते है-
मुंडा मुड़ म खूँटा गड़े
चल मुंडा मोर बुता करे
ढेकला मुंडा चना के दार
मारेंव जूता उड़ गय बाल

मुंडा बच्चा उक्त पंक्तियों को सुनकर हँस कर टाल देता है। क्योंकि उसको भी किसी बच्चे के मुंडन होने पर उसे चिढ़ाने का अवसर मिलेगा। लोक में इस तरह की तुकबंदियाँ और कविताएं समय-समय पर अक्सर सुनने को मिलती है। बंसी से गाँव के नदी-तालाब में गरी खेलने वाले (मछली मारने वाले) बड़े-बूढ़े को भी देखकर बच्चे तुकबंदियां करते है-
गरी के मछली, गेंगरूआ के चारा
गरी खेलइया, मोर सारा।।

रिस्तेदारी में सारा-भाँटो (साला-जीजा) व नाती-बूढ़ा का संबंध बड़ा मजाकिया होता है। जहाँ साला-जीजा मिले, नाती बूढ़ा मिले कि चुहल बाजी शुरू हो जाती है। मेरे बड़े भईया पहले गवन में भौजी को लाने गए। मैं भी बैलगाड़ी चढ़ने के शौक से जाने के लिए रोया। मुझे भी साथ ले गए। वहाँ भईया के गाँव रिस्तेदारी वाले सालों ने मेरा मजाक उड़ाया नाम पूछा, गाँव पूछा और तुकबंदी की-
डारा-डारा, लीम के डारा
तोर बहिनी, मोर पारा।

मैं समझ नहीं पाया, चुपचाप सुन लिया। बाद में समझ आया कि उक्त पंक्तियाँ मेरे कहने के लिए ज्यादा सटीक है। जब वो दुबारा मुझे चिढ़ाने लगे तो मैंने उल्टा उन्हें कहा-
डारा-डारा, लीम के डारा,
तुंहर बहिनी, हमर पारा।

सभी खिल-खिलाकर हाँस पड़े। एक बार बुआ को तीजा लाने ददा के साथ पैदल नवागाँव साजा गया था। वहाँ एक ग्रामीण बुजुर्ग ने मुझ से पूछा ‘क्या पढ़ते हो? मैने कहा -पाँचवी। ‘अच्छा जो मैं बोलूंगा उसे बोलकर बताना, तब समझूंगा कि तुम होशियार हो। मैंने हाँ में सिर हिला दिया। उन्होंने कहा-
तुम ताम लकड़ी, तुम्हारा सारा तुम
तुम हमारा सारा हमारा सारा तुम ।

बिनासमझे बालमन में मैने इन पंक्तियों के भेद को जाने, उन पंक्तियों को दोहराने का प्रयास किया और ठोठक गया। कह डाला-तुम्हारा सारा हम । फिर तो बैठे लागो में हँसी फूट पड़ी। मैं भी शरमा गया। दरअसल वह ग्रामीण जो रिस्ते में दादा लगते थे मुझे मेरे मुंह से अपना साला कहलवाना चाहते थे वह सफल हो गया। ऐसा है नाती -बूढ़ा का मजाकिया संबंध और तुकबंदी का कमाल। ये पंक्तियाँ मुझे आज भी कंठस्थ है। मैं भी अपने नातियों से इन पंक्तियों को लेकर हास- परिहास करने से नहीं चुकता। तो यह है लोक का बालमन।

यही बालमन हास-परिहास और अपने मनोरंजन के लिए तुकबंदियों के सहारे कविता सृजन के पथ पर अग्रसर होता है। फिर कृति और परिवेश से जुड़ कर अपनी काव्य प्रतिभा को मांजता है। दरअसल बालमन की भूमि बड़ी उर्वरा होती है, छत्तीसगढ़ की माटी की तरह। छत्तीसगढ़ की इसी माटी में कविता की प्रथम पंक्ति फूटी थी, बाल्मिकी के श्रीमुख से। वह स्थान है तुरतुरतिया की धरती जहाँ बाल्मिकी का आश्रम था। यहीं सीता माता को आश्रय मिला था। इसी तुरतुरिया में लव-कुश ने जन्म लेकर धनुर्विधा और संगीत की शिक्षा पाई। यहीं बाल्मिकी ने रामायण की रचना की अतः यह कविता की भूमि है। काव्य सृजन की यही विरासत छत्तीसगढ़ बाल मन में संरक्षित होकर संवर्धित हो रही है। बालमन की यही सहज अभिव्यक्तियाँ जो देखने में केवल तुकबंदिया लगती है। आगे चलकर दान लीला जैसी अनेकानेक अमरकृतियों से छत्तीसगढ़ साहित्य का भंडार भरती है।

सबके लाठी रिंगी – चिंगी
मोर लाठी कुसवा
दू पईसा के बाई लानेंव
उहू ल लेगे मुसवा।
जैसी प्रसिद्ध और मनोरंजन पंक्तियां बालमन की ही उपज हैं।

शोध आलेख

डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.)
मो. नं. 9424113122 ईमल:- pisilalyadav55@gmail.com

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