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बस्तर की मुरिया जनजाति का प्राचीन विश्वविद्यालय घोटुल

इसे बस्तर का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिये कि इसे जाने-समझे बिना इसकी संस्कृति, विशेषत: इसकी वनवासी संस्कृति, के विषय में जिसके मन में जो आये कह दिया जाता रहा है। गोंड जनजाति, विशेषत: इस जनजाति की मुरिया शाखा, में प्रचलित रहे आये “घोटुल” संस्था के विषय में मानव विज्ञानी वेरियर एल्विन से ले कर आज तक विभिन्न लोगों ने अपने अल्पज्ञान अथवा कहें कि अज्ञान के चलते अनाप-शनाप कह डाला है और यह अनाप-शनाप इसीलिये कहा जाता रहा है क्योंकि आदिवासी संस्कृति के तथाकथित जानकारों ने इस संस्था के मर्म को जाना ही नहीं। न तो वे इसके इतिहास से भिज्ञ रहे हैं और न ही इसकी कार्य-प्रणाली से।

अधिकांश ऐसे लोग हैं जिन्होंने वेरियर एल्विन और ग्रियर्सन के लिखे को ही अन्तिम सत्य मान लिया और उन्हीं की दुहाई दे-दे कर घोटुल जैसी पवित्र संस्था पर कीचड़ उछालने में लगे रहे। उन्होंने इसकी सत्यता जानने का कोई प्रयास ही नहीं किया। करते तो जान पाते कि घोटुल वह नहीं जो वे अब तक समझते रहे हैं।

घोटुल तो गोंड जनजाति का विश्वविद्यालय है। समाज-शिक्षा का मन्दिर है। लिंगो पेन यानी लिंगो देवता की आराधना का पवित्र स्थल है। “लिंगो” पेन घोटुल के संस्थापक और नियामक रहे हैं। गोंड समाज के प्रमुखों के अनुसार लिंगो देव को ही हल्बी परिवेश में बूढ़ा देव तथा छत्तीसगढ़ी परिवेश में बड़ा देव सम्बोधित किया जाता है और ये बूढ़ा देव, बड़ा देव या लिंगो पेन भगवान शिव (नटराज) के ही अवतार या अंश माने जाते हैं।

किन्तु गोंड जनजाति से ही सम्बद्ध जयमती कश्यप (ग्राम : नेलवाड़, जिला : नारायणपुर। सम्प्रति : पर्यवेक्षक, महिला एवं बाल विकास विभाग, कोंडागाँव) के अनुसार लिंगो पेन को इन्द्र का रूप माना जाता है, जिनके दरबार में अप्सराएँ सामूहिक नृत्य प्रस्तुत करती रहती हैं। इसी तरह पुरुष नर्तकों-गायकों को गन्धर्व का रूप माना जाता है। वे आगे कहती हैं कि लिंगो पेन यानी इन्द्र स्वयं नृत्य नहीं करते बल्कि गन्धर्व एवं अप्सरायें यानी चेलिक और मोटियारिनें “लिंगो खुटा” बीच में गाड़ कर उसके चारों ओर घूम-घूम कर नृत्य करती हैं। वहीं कुछ लोगों के अनुसार लिंगो पेन को श्रीकृष्ण का भी रूप माना गया है जो गोप-गोपियों के साथ नृत्य-संगीत में तल्लीन रहते हैं। दरअसल लिंगो के विषय में मतैक्य नहीं दिखता। गोंड समुदाय के ही भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न धारणाएँ रखते हैं।

गोंड समुदाय से सम्बद्ध पालकी (नारायणपुर) निवासी रमेश चन्द्र दुग्गा (सम्प्रति : सहायक वन संरक्षक, वन विभाग, छत्तीसगढ़) कहते हैं, “हमारे समाज में यह विश्वास है कि घोटुल की परम्परा का सूत्रपात तथा सभी वाद्य-यन्त्रों की रचना भी लिंगो के द्वारा ही की गयी है। सारे नियम व रीति-रिवाज लिंगो द्वारा ही बनाये गये हैं। आज भी घोटुल की परम्परा तथा नियम व रीति-रिवाजों का पालन किया जा रहा है।

घोटुल को गोंड जनजाति का विश्वविद्यालय कहा जाना चाहिये। इन्हें आगे चल कर लिंगो पेन यानी लिंगो देवता के रूप में जाना और माना गया। बेठिया प्रथा का बस्तर में चलन में है। इस प्रथा के अन्तर्गत गाँव के लोग जरुरतमंद व्यक्ति के घर का बड़ा-से-बड़ा कार्य बिना किसी मेहनताना के करते हैं। सहकार की भावना है इसके पीछे। घोटुल में यही भावना निहित होती है।””

गढ़बेंगाल (नारायणपुर) निवासी सुप्रसिद्ध काष्ठ शिल्पी पण्डीराम मण्डावी कहते हैं, “घोटुल में हम लोग आपसी भाई-चारे की शिक्षा ग्रहण करते हैं। हम तो आदिवासी हैं। बड़ी-बड़ी बातें नहीं जानते किन्तु हमें हमारी अपनी परम्पराओं से लगाव है। हो सकता है कि हमारी परम्पराएँ दूसरों को ठीक न लगती हों। मैं तथाकथित ऊँचे लोगों की तुलना में अपने समाज को अच्छा समझता हूँ। कारण, हमारे समाज में बलात्कार नहीं होता।

दूसरी बात, घोटुल से हमारे समाज को जो फायदा होता है वह यह कि जब कभी किसी प्रकार का कोई काम होता है, घोटुल के सारे सदस्य मिल-जुल कर उसे पूरा करते हैं। चाहे वह सुख हो या दु:ख की घड़ी। मसलन, आज हमारे लड़के का विवाह करना है तब हम घोटुल के सदस्यों को कुछ भेंट दे कर उन्हें बताते हैं कि आठ-दस या पन्द्रह दिनों बाद मेरे घर में विवाह है। यह सूचना पा कर घोटुल की सारी लड़कियाँ पत्ते तोड़ेंगी, लड़के लकड़ी लायेंगे, नाचेंगे, गायेंगे, खाना-वाना सब बनायेंगे।

इसी तरह, यदि किसी के घर में किसी की मृत्यु हो गयी या विपत्ति आ गयी तो भी घोटुल के सदस्य हमारे काम आते हैं। एक गाँव से दूसरे गाँव तक सूचना भेजने का साधन हमारे पास नहीं है। हमारे पास तो फोन नहीं है। हमारे कुटुम्बी दूर-दराज के गाँवों में रहते हैं। तब ऐसे समय में घोटुल के सब लड़के सायकिल ले कर या पैदल खबर देने जाते हैं। यह भी अच्छा लगता है। तो मेरे हिसाब से तो घोटुल का बना रहना समाज के हित में है। कारण, यहाँ सहकार की भावना काम करती है।”

नयी पीढ़ी द्वारा घोटुल प्रथा पर उठायी जा रही आपत्ति के विषय में पण्डीराम कहते हैं, “कई लोग घोटुल प्रथा पर आपत्ति कर रहे हैं। नयी पीढ़ी के लोग कह रहे हैं कि घोटुल प्रथा से हमें लज्जा आने लगी है। इसीलिये इसे बन्द कर दिया जाना चाहिये। किन्तु मेरा कहना है कि इसमें शर्म किस बात की? बड़े-बड़े शहरों में कितनी नंगाई होती है। उन्हें कोई नहीं देखता। रात में नाचते हैं, गाते हैं। हमारा आदिवासी भाई एक पौधे के आड़ में जा कर मूत्र विसर्जन करता है किन्तु शहर में तो लोग कहीं भी मूत्र विसर्जन कर देते हैं। वहाँ लोगों की भीड़ रहती है किसी मेले की तरह। किन्तु वहाँ लोगों को एक-दूसरे का ख्याल नहीं होता।””

क्या है यह घोटुल?

बस्तर की गोंड जनजाति की एक शाखा मुरिया के बीच प्रचलित घोटुल युवा वर्ग के लिये गृहस्थ और सामाजिक जीवन की प्राथमिक पाठशाला से ले कर विश्वविद्यालय तक की भूमिका निभाता है। गाँव के दूसरे छोर पर, और किसी-किसी गाँव में गाँव के बीचों-बीच किन्तु आबादी से अलग-थलग बने इस युवा-गृह में चेलिक और मोटियारिनों का प्रवेश नितान्त आवश्यक होता रहा है। चेलिक का अर्थ है अविवाहित युवक और मोटियारिन का अर्थ है अविवाहित युवती।

इनके अतिरिक्त अन्य किसी भी व्यक्ति को इस युवा-गृह में प्रवेश की पात्रता नहीं होती। यहाँ ये युवक-युवती देर रात तक जागते हुए नृत्य-गीत एवं कथा-कहानी सुनने-सुनाने में लीन रहते हैं। आपसी सौहाद्र्र, भाई-चारा, आपसी सहयोग आदि की शिक्षा इन्हें इसी युवा-गृह से मिलती है। इस संस्था में युवक-युवतियों को सामाजिक दायित्वों के निर्वहन की शिक्षा दी जाती है और कर्मकाण्ड से परिचित कराया जाता है।

यहाँ का प्रशासन-तन्त्र बहुत ही चुस्त-दुरुस्त होता है। संविधान अलिखित किन्तु कठोर! अनुशासन में बँधे रहना इस संस्था की अनिवार्यता है। इसके सदस्यों के मूल नाम यहाँ परिवर्तित हो जाते हैं। छद्म नामों से एक-दूसरे को जाना जाता है किन्तु घोटुल के बाहर का कोई भी व्यक्ति प्राय: इनके छद्म नामों से परिचित नहीं होता। ये छद्म नाम होते हैं बेलोसा, दुलोसा आदि।

क्या होता है घोटुल में?

घोटुल को आरम्भ से ही एक प्रभावी और सर्वमान्य सामाजिक संस्था के रूप में मान्यता मिलती रही है। इसे एक ऐसी संस्था के रूप में देखा जाता रहा है, जिसकी भूमिका गोंड जनजाति की मुरिया शाखा को संगठित करने में प्रभावी और प्रमुख रही है। यों तो मोटे तौर पर घोटुल मनोरंजन का केन्द्र रहा है, जिसमें प्रत्येक रात्रि नृत्य, गीत-गायन, कथा-वाचन एवं विभिन्न तरह के खेल खेले जाते हैं। किन्तु मनोरंजन प्रमुख नहीं अपितु गौण होता है और प्रमुखत: यह संस्था सामाजिक सरोकारों से पूरी तरह जुड़ी होती है। वे सामाजिक सरोकार क्या हैं, इन्हें निम्नानुसार देखा जा सकता है :

  1. संगठन की भावना को बल दिया जाता है
  2. गाँव के किसी भी किस्म के सामाजिक कार्य (विवाह, मृत्यु, निर्माण-कार्य आदि) में श्रमदान किया जाता है
  3. युवक-युवतियों को सामाजिक दायित्वों के निर्वहन की शिक्षा दी जाती है
  4. भावी वर-वधू को विवाह-पूर्व सीख दी जाती है
  5. हस्त-कलाओं का ज्ञान कराया जाता है
  6. गाँव में आयी किसी विपत्ति का सामना एकजुट हो कर किया जाता है
  7. वाचिक परम्परा का नित्य प्रसार किया जाता है
  8. अनुशासित जीवन जीने की सीख दी जाती है, आदि आदि।

क्या होते हैं घोटुल के नियम?

घोटुल के नियम अलिखित किन्तु बहुत ही कठोर और सर्वमान्य होते हैं। विवाहितों को घोटुल के आन्तरिक क्रिया-कलाप में भागीदारी की अनुमति, विशेष अवसरों को छोड़ कर, प्राय: नहीं होती। इन नियमों को संक्षेप में इस तरह देखा जा सकता है :

  1. प्रत्येक चेलिक को प्रति दिन लकड़ी लाना आवश्यक है
  2. मोटियारिन के लिये पनेया (एक तरह का कंघा) बना कर देना आवश्यक है
  3. अपने वरिष्ठों का सम्मान करना तथा कनिष्ठों के प्रति सदय होना आवश्यक है
  4. संस्था के पदाधिकारियों द्वारा दिये गये कार्य को सम्पन्न करना आवश्यक है
  5. मोटियारिनों के लिये आवश्यक है कि वे घोटुल के भीतर तथा बाहर साफ-सफाई रखें
  6. गाँव के किसी भी काम में घोटुल की सहमति से सहायक होना आवश्यक है
  7. घोटुल तथा गाँव में शान्ति बनाये रखने में सहयोगी होना आवश्यक है, आदि आदि।

नियमों के उल्लंघन पर दण्ड का प्रावधान?

घोटुल के नियमों का उल्लंघन होने पर दोषी को दण्ड का भागी होना पड़ता है। घोटुल के नियमों का पालन नहीं करने वाले को उसकी त्रुटि के अनुरूप लघु या दीर्घ शास्तियाँ दिये जाने का प्रावधान होता है। दी जाने वाली छोटी और बड़ी सजा के कुछ उदाहरण ये हैं :

  1. छोटी सजा : घोटुल के तयशुदा कत्र्तव्यों का पालन नहीं करना दोषी को प्राय: छोटी सजा का हकदार बनाता है। उदाहरण के तौर पर, लकड़ी ले कर न आना। सभी सदस्य युवकों के लिये आवश्यक होता है कि वे घोटुल में प्रति दिन कम से कम एक जलाऊ लकड़ी ले कर आयें। यदि कोई सदस्य इसमें चूक कर जाता है तब उसे छोटी सजा दी जाती है। छोटी सजा के कुछ उदाहरण ये हैं :
    01.अ. आर्थिक दण्ड : छोटी सजा के रूप में प्राय: पाँच से दस रुपये तक के आर्थिक दण्ड से दण्डित किये जाने का प्रावधान किया जाता है। किन्तु यदि दोषी चेलिक आर्थिक दण्ड भुगतने की स्थिति में न हो तो उसे शारीरिक दण्ड भोगना पड़ता है। किन्तु चूक यदि कुछ अधिक ही हो गयी हो तो उसे आर्थिक और शारीरिक दोनों ही तरह के दण्ड भुगतने पड़ सकते हैं।
    01.ब. शारीरिक दण्ड : शारीरिक दण्ड के अन्तर्गत बेंट सजा दिये जाने का प्रावधान होता है। बेंट सजा के अन्तर्गत दोषी चेलिक को उकड़ूँ बिठा कर उसके दोनों घुटनों और कोहनियों के बीच रुलरनुमा एक मोटी सी गोल लकड़ी डाल दी जाती है। इसके बाद उस पर कपड़े को ऐंठ कर बनायी गयी बेंट से उसकी देह पर प्रहार किया जाता है। इसके अतिरिक्त दूसरे प्रकार के शारीरिक दण्डों का भी प्रावधान होता है। मोटियारिनों के लिये अलग किस्म के दण्ड का प्रावधान होता है। उदाहरण के लिये यदि किसी मोटियारिन ने साफ-सफाई के काम में अपनी साथिन का सही ढंग से साथ नहीं दिया तो उसे साफ-सफाई का काम अकेले ही निपटाना पड़ता है।
    01.स. प्रतिबन्धात्मक दण्ड : त्रुटियों की पुनरावृत्ति अथवा पदाधिकारियों के आदेश की अवहेलना अथवा लापरवाही की परिणति प्रतिबन्धात्मक शास्ति के रूप में होती है। इस दण्ड के अन्तर्गत दोषी पर कुछ दिनों के लिये घोटुल प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है।
  2. बड़ी सजा : बड़ी चूक हो तो दोषी को घोटुल से निष्कासित कर उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। ऐसे चेलिक/मोटियारी के घर-परिवार में होने वाले किसी भी कार्य में घोटुल के सदस्य सहयोग नहीं करते।

इस तरह के कठोर नियमों के कारण घोटुल के नियमों की अनदेखी करने की हिम्मत प्राय: कोई नहीं करता। हँसी-ठिठोली उसी तरह के रिश्ते में आने वाले लड़के और लड़की के बीच ही सम्भव है, जिनके बीच हँसी-ठिठोली को सामाजिक मान्यता मिली हुई है। किन्तु हँसी-मजाक के आगे सीमा का उल्लंघन करने की अनुमति उन्हें भी नहीं होती। यदि घोटुल के किसी युवक-युवती के बीच घोटुल में या घोटुल के बाहर गलती से भी अनैतिक सम्बन्ध होने की पुष्टि हो जाती है तो उन्हें घोटुल एवं समाज के नियमों के मुताबिक दण्ड का भागी होना पड़ता है। सबसे पहला दण्ड होता है उनका घोटुल से निष्कासन। इसके बाद समाज की बैठक में उन पर निर्णय लिया जाता है। सामाजिक नियमों के अन्तर्गत विवाह-बन्धन के योग्य माने जाने पर उनका विवाह करा दिया जाता है। उल्लेखनीय है कि घोटुल के नियमों के तहत दिये गये दण्ड के विरूद्ध प्राय: कोई सुनवाई नहीं होती।

कैसे होता है संस्था का संचालन?

इस संस्था के संचालन के लिये विभिन्न अधिकारी होते हैं, जिनके अधिकार एवं कत्र्तव्य निश्चित और भिन्न-भिन्न होते हैं। ये अधिकारी अलग-अलग विभागों के प्रमुख होते हैं। इन अधिकारियों के सहायक भी हुआ करते हैं। ये अधिकारी हैं कोटवार, तसिलदार (तहसीलदार), दफेदार, मुकवान, पटेल, देवान (दीवान), हवलदार, कानिसबिल (कॉन्स्टेबल), दुलोसा, बेलोसा, अतकरी, बुदकरी आदि।

प्राय: दीवान ही संस्था का सांवैधानिक प्रमुख हुआ करता है। इन अधिकारियों के अधिकारों को घोटुल के बाहर चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके साथ ही यदि किसी अधिकारी द्वारा अपने कत्र्तव्य-पालन में किसी भी तरह की चूक हुई तो उसे भी घोटुल-प्रशासन दण्डित करने से नहीं चूकता। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि यहाँ घोटुल-प्रशासन की तानाशाही चलती हो। पूरे प्रजातान्त्रिक ढंग से यहाँ का प्रशासन चलता है और बहुत ही कायदे से चलता है।

कौन थे घोटुल के प्रणेता लिंगो पेन?

“घोटुल” नामक इस संस्था के प्रणेता के रूप में जाने जाने वाले लिंगो पेन के विषय में गोंड समुदाय से सम्बद्ध पालकी (नारायणपुर) निवासी रमेश चन्द्र दुग्गा (सम्प्रति : सहायक वन संरक्षक, वन विभाग, छत्तीसगढ़) यह लोककथा बताते हैं :

बहुत पहले की बात है। वर्तमान नारायणपुर जिले में रावघाट की पहाड़ियों की जो श्रृंखला है, उसी किसी क्षेत्र में कभी सात भाई रहा करते थे। वह क्षेत्र “दुगान हूर” के नाम से जाना जाता था। उन सात भाइयों में सबसे छोटे भाई का नाम था “लिंगो”। लिंगो शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक आदि सभी दृष्टि से बड़ा ही शक्तिवान था। अपने छहों भाइयों की तुलना में वह काफी शक्तिशाली और गुणी था। कहा जाता है कि वह एक साथ बारह प्रकार के वाद्य-यन्त्र समान रूप से बजाता था।

खेती-खलिहान या अन्य किसी काम के समय बाकी सभी छह भाई सवेरे से अपने काम में चले जाते थे। उसके बाकी छहों भाइयों का विवाह हो चुका था और लिंगो अविवाहित था। उसका विवाह आगे चल कर हुआ। लिंगो उन सभी भाइयों का बड़ा ही लाड़ला था। न केवल भाइयों का बल्कि वह अपनी सभी छहों भाभियों का भी प्यारा था। वह संगीत-कला में निष्णात तथा उसका विशेषज्ञ था।

बड़ा ही कुशल संगीतकार था वह। जैसे ही वह सुबह उठता, दैनिक कर्म से निवृत्त हो कर वह संगीत-साधना में जुट जाता। उसकी भाभियाँ उसके संगीत से इतना मन्त्र-मुग्ध हो जाया करती थीं कि वे अपने सारा काम भूल जाया करतीं और उसका संगीत सुना करती थीं। इस कारण प्राय: उसके भाइयों और भाभियों के बीच तकरार हो जाया करती थी।

कारण, वे उसका संगीत सुनने में इतनी मगन हो जाया करती थीं कि न तो वे समय पर भोजन तैयार कर पातीं न अपने पतियों को समय पर खेत-खलिहान में भोजन पहुँचा पातीं। वे खेतों में अपनी पत्नियों के द्वारा लाये जाने वाले भोजन की बाट देखते रहते थे किन्तु वे मग्न रहती थीं लिंगो का संगीत सुनने में। इस कारण छहों भाई लिंगो से भी नाराज रहा करते। वे थक-हार कर जब घर लौटते तो पाते कि उनका अनुमान सही था।

लिंगो संगीत-साधना में जुटा रहता और उनकी पत्नियाँ मन्त्र-मुग्ध हो कर उसका संगीत सुनती रहतीं। तब छहों भाइयों ने विचार किया कि यह तो संगीत से अलग हो नहीं सकता और इसके रहते हमारी पत्नियाँ इसके संगीत के व्यामोह से मुक्त नहीं हो सकतीं। तो उन लोगों ने पहले तो लिंगो को समझाया कि वह अपनी संगीत-साधना बन्द कर दे। लेकिन लिंगो चाह कर भी ऐसा न कर सका।

तब छहों भाइयों ने तय किया कि क्यों न इसे मार दिया जाये। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। तो एक दिन उन लोगों ने एक योजना बनायी और शिकार करने चले। साथ में लिंगो को भी ले लिया। चलते-चलते वे जंगल में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने योजनानुसार एक पेड़ की खोह में छुपे “बरचे” नामक जन्तु को मारने के लिये लिंगो को पेड़ पर चढ़ा दिया और स्वयं उस पेड़ के नीचे तीर-कमान साध कर खड़े हो गये।

बरचे नामक यह जन्तु गिलहरी प्रजाति का और गिलहरी से थोड़ा बड़ा होता है। रंग भूरा और पूँछ लम्बी होती है। आज भी इस जन्तु का शिकार बस्तर के वनवासी करते हैं और भोजन के रूप में बड़े ही चाव के साथ खाते हैं। बहरहाल, लिंगो पेड़ पर चढ़ गया और बरचे को तलाशने लगा। इसी समय इन छहों भाइयों में से एक ने मौका अच्छा जान कर नीचे से तीर चला दिया। तीर लिंगो की बजाय पेड़ की शाख पर जा लगा। पेड़ था बीजा का।

तीर लगते ही शाख से बीजा का रस जो लाल रंग का होता है, नीचे टपकने लगा। इससे छहों भाइयों ने सोचा कि तीर लिंगो को ही लगा है और यह खून उसी का है। उन्होंने सोचा कि जब तीर उसे लग ही गया है तो उसका अब जीवित रहना मुश्किल है। ऐसा सोच कर वे वहाँ से तितर-बितर हो कर घर भाग आये। घर आ कर सब ने चैन की साँस ली, कि चलो लिंगो से छुटकारा तो मिल गया।

उधर लिंगो ने देखा कि उसके भाई पता नहीं क्यों वहाँ उसे अकेला छोड़ कर भाग गये हैं। उसे सन्देह हुआ। वह धीरे-धीरे पेड़ पर से नीचे उतरा और घर की ओर चल पड़ा। उसने कुछ सोच कर पिछले दरवाजे से घर में प्रवेश किया। वहाँ उसने अपने भाई और भाभियों की बातें सुनीं तो उसके रोंगटे खड़े हो गये। लेकिन उसने यह तथ्य किसी को नहीं बताया और चुपके से भीतर आ गया जैसे कि उसने उनकी बातचीत न सुनी हो।

उसे जीवित देख कर उसके भाई और भाभियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। खैर! बात आयी-गयी हो गयी। फिर से दिन पहले की ही तरह गुजरने लगे। इस घटना के कुछ ही दिनों में उसका भी विवाह करा दिया गया। उसका विवाह एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसके लोग जादू-टोना जानते थे। उसकी पत्नी भी यह विद्या जानती थी। समय बीतता रहा।

उनके परिवार में कभी बच्चों को तो कभी उसकी भाभियों को या फिर कभी छह भाइयों को कई प्रकार की शारीरिक परेशानी होती थी। ऐसे में, जैसा कि बस्तर में रिवाज रहा है, वे सिरहा-गुनिया के पास जाते थे निदान के लिये। तब हर बार छोटी बहू पर ही शक की सुई जा ठहरती थी। वे लोग उससे काफी त्रस्त हो गये। तब छह भाइयों ने उस छोटे भाई और बहू को घर से बाहर निकालने की सोची।

एक दिन लिंगो के भाइयों ने स्पष्ट शब्दों में लिंगो से कह दिया, “तुम्हारी और तुम्हारी पत्नी की वजह से हम सभी लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अत: तुम लोग न केवल घर छोड़ कर बल्कि यह परगना छोड़ कर ही कहीं अन्यत्र चले जाओ। चूँकि तुम्हारे कारण हम लोगों को काफी परेशानियाँ हुईं अत: हम तुम्हें अपनी सम्पत्ति में से कुछ भी हिस्सा नहीं देंगे लेकिन यादगार के तौर पर तुम्हें यह “मोह्ट” (अँग्रेजी के “यू” आकार की एक चौड़ी कील जिससे हल की फाल हल से फँसी रहती है। इसे हल्बी परिवेश में “गोली” कहा जाता है) देते हैं” ऐसा कह उन्होंने उसे वह “मोह्ट” दिया।

लिंगो उसे ले कर अपनी पत्नी के साथ वहाँ से चल पड़ा। रास्ते में कन्द-मूल खाते, चलते वह वहाँ से काफी दूर, उस परगने से बाहर जा पहुँचा। चलते-चलते वह एक गाँव के पास जा पहुँचा। यह फागुन-चैत्र महीना था। उसने देखा कि वहाँ धान की मिंजाई करने के बाद निकला ढेर सारा पैरा (पुआल) रखा हुआ था कोठार (खलिहान) में।

घर से निकलने के बाद से उन्हें भोजन के रूप में अन्न नसीब नहीं हुआ था। उसे देख कर उसके मन में आशा की किरण जागी और उसने विचार किया कि क्यों न इसी पैरा को दुबारा मींज कर धान के कुछ दाने इकट्ठे किये जायें। यह सोच कर उसने उस कोठार वाले किसान से अपना दुखड़ा सुनाया और उस पैरा को मींजने की अनुमति माँगी। उस किसान ने उसकी व्यथा सुन कर उसे मिंजाई करने की अनुमति दे दी।

तब उसने गाँव के ही अन्य लोगों से निवेदन कर बैल माँगे और उस “मोह्ट” को उसी स्थान पर स्थापित कर उससे विनती की, कि तुम्हें मेरे भाइयों ने मुझे दिया है। मैं उनका और तुम्हारा सम्मान करते हुए तुम्हारी ईश्वर के समान पूजा करता हूँ। यदि तुममें कोई शक्ति है, तुम मेरी भक्ति की लाज रख सकते हो तो इस पैरा से भी मुझे धान मिले अन्यथा मैं तुम्हारे ऊपर मल-मूत्र कर तुम्हें फेंक दूँगा। ऐसा कह उसने मिंजाई शुरु की।

मिंजाई करता चला गया। मिंजाई समाप्त होने पर न केवल उसने बल्कि गाँव वालों ने भी देखा कि उस पैरा से ढेर सारा धान निकला। सब लोग आश्चर्य चकित हो गये और लिंगो को चमत्कारी पुरुष के रूप में देखने लगे। उसका यथेष्ट सम्मान भी किया। तब लिंगो ने उस “मोह्ट” की बड़ी ही श्रद्धा-भक्ति पूर्वक पूजा की। उसे कुल देवता मान लिया और पास ही के जंगल में एक झोपड़ी बना कर बस गया।

लिंगो और उसकी पत्नी ने मिल कर काफी मेहनत की। उनकी मेहनत का फल भी उन्हें मिला। यह स्थान कालान्तर में एक गाँव के रूप में परिवर्तित हो गया। समय के साथ लिंगो उस गाँव का ही नहीं बल्कि उस परगने का भी सम्मानित व्यक्ति बन गया। उस गाँव का नाम हुआ “वलेक् नार”। “वलेक्” यानी सेमल और “नार” यानी गाँव।

हल्बी में सेमल को सेमर कहा जाता है। इसी से आज इस गाँव को सेमरगाँव के नाम से जानते हैं। इस तरह जब उसकी कीर्ति गाँव के बाहर दूसरे गाँवों तक फैली तब उसके भाइयों के कानों में भी यह बात पहुँची। उसकी प्रगति सुन कर उसके भाइयों को बड़ी पीड़ा हुई। वे द्वेष से भर उठे। उन लोगों ने पुन: लिंगो को मार डालने की योजना बनायी और वे सब सेमरगाँव आ पहुँचे।

उस समय लिंगो घर पर नहीं था। उन्होंने उसकी पत्नी से पूछा। उसने बताया कि लिंगो किसी काम से किसी दूसरे गाँव गया हुआ है। तब उसके भाई वहाँ से वापस हो गये और अपनी योजना पर अमल करने लगे। उन्होंने 12 बैल गाड़ियों में लकड़ी इकट्ठा की और उसमें आग लगी दी। उनकी योजना थी लिंगो को पकड़ लाने और उस आग में झोंक देने की।

अभी वे आग लगा कर लिंगो को पकड़ लाने के लिये उसके घर जाने ही वाले थे कि सबने देखा कि लिंगो उसी आग के ऊपर अपने 18 वाद्य-यन्त्र (1. माँदर, 2. ढुडरा (कोटोड़, ठुड़का, कोटोड़का), 3. बावँसी (बाँसुरी), 4. माँदरी 5. पराँग, 6. अकुम (तोड़ी), 7. चिटकोली, 8. गुजरी बड़गा (तिरडुड्डी या झुमका बड़गी या झुमका बड़गा), 9. हुलकी, 10. टुंडोड़ी (टुड़बुड़ी), 11. ढोल, 12. बिरिया ढोल, 13. किरकिचा, 14. कच टेहेंडोर, 15. पक टेहेंडोर, 16. ढुसिर (चिकारा), 17. कीकिड़, 18. सुलुड़) बजाते हुए नाच रहा है। यह देख कर उन सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे थक-हार कर वहाँ से वापस चले गये। वे समझ गये कि लिंगो को मारना सम्भव नहीं।

लिंगो और उनके उन छह भाइयों के नाम का उल्लेख डॉ. के. आर. मण्डावी अपने “पूस कोलांग परब” शीर्षक लेख (बस्तर की जनजातियों के पेन-परब, 2007 : 79) में कांकेर अंचल के मुरडोंगरी ग्राम के पटेल एवं खण्डा मुदिया (आँगा देव) के पुजारी श्री धीरे सिंह मण्डावी के हवाले से इस तरह करते हैं : 1. उसप मुदिया, 2. पटवन डोकरा, 3. खण्डा डोकरा, 4. हिड़गिरी डोकरा, 5. कुपार पाट डोकरा, 6. मड़ डोकरा, 7. लिंगो डोकरा। उनके अनुसार लिंगो पेन तथा उनके छह भाई गोंड जनजाति के सात देव गुरु कहे गये हैं।

स्रोत-संदर्भ :

  1. सुश्री जयमती कश्यप, पर्यवेक्षक, महिला एवं बाल विकास विभाग, कोंडागाँव, छत्तीसगढ़
  2. श्री रमेश चन्द्र दुग्गा, सहायक वन संरक्षक, वन विभाग, रायपुर, छत्तीसगढ़
  3. श्री पण्डीराम मण्डावी, काष्ठ शिल्पी, गढ़बेंगाल, नारायणपुर, छत्तीसगढ़
  4. डॉ. के . आर. मण्डावी (“पूस कोलांग परब”, बस्तर की जनजातियों के पेन-परब, 2007 : 79)

आलेख

श्री हरिहर वैष्णव
सरगीपाल पारा,  कोंडागाँव 494226 (बस्तर-छत्तीसगढ़) मोबाईल : 7697174308

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