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मल्लालपत्तन (मल्हार) की स्थापत्य कला

मल्हार छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जिले में 21090’ उत्तरी अक्षांस तथा 82020’ पूर्वी देशांतर में स्थित है। मल्हार बिलासपुर से मस्तूरी होते हुये लगभग 32 कि.मी. दूरी पर पक्के सड़क मार्ग पर स्थित हैं कल्चुरि शासक पृथ्वीदेव द्वितीय के कल्चुरि संवत् 915 (1163 ई.) का शिलालेख जो कि मल्हार से प्राप्त हुआ था, उसमें मल्लाल का उल्लेख मिलता है। मल्हार से ही प्राप्त कल्चुरि संवत् 919 (1167 ई.) के एक अन्य शिलालेख में मल्लालपत्तन का उल्लेख प्राप्त होता है। वर्तमान मल्हार तीन तरफ से नदियों से घिरा है जिसके पश्चिम में अरपा, पूर्व में लीलागर और दक्षिण में शिवनाथ नदी प्रवाहित होती है।

मल्हार में वर्ष 1975-77 के मध्य हुये उत्खनन से ज्ञात हुआ है कि इस क्षेत्र में सातवाहन काल में नगर निर्माण का प्रारंभ हुआ तथा सातवाहन शासन की समाप्ति के पश्चात् तथा कल्चुरि शासन के पहले दो प्रमुख राजवंशों, शरभपुरीय तथा सोमवंशी शासकों का शासन था। इनका शासन काल 325 ई. से 655 ई. के बीच था जो छत्तीसगढ़ का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। इस काल में छत्तीसगढ़ में कला के क्षेत्र में कुल 5 केन्द्र स्थापित हुये – 1. मल्हार, 2. ताला, 3. खरोद, 4. सिरपुर 5. राजिम.

छत्तीसगढ़ में गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त ने ई. 360 के लगभग दक्षिण कोसल पर आक्रमण किया था उस समय यहाँ महेन्द्र का शासन था जिसकी राजधानी शरभपुर (मल्हार) थी। यहाँ से प्राप्त एक मृणमुद्रा में प्रारंभिक गुप्तकालीन ब्राम्हीलिपि में ‘‘महाराज महेन्द्रस्य’’ का उल्लेख मिलता है। यह महेन्द्र शरभपुरीय शासक महाराज नरेन्द्र का छोटा भाई अथवा पुत्र होगा। छत्तीसगढ़ से प्राप्त कुछ सिक्कों में प्रसन्नमात्र तथा महेन्द्रादित्य के सिक्के साथ-साथ प्राप्त हुये हैं जिससे ज्ञात होता है कि महेन्द्रादित्य प्रसन्नमात्र का पूर्ववर्ती शासक रहा होगा।1

बाली वध का शिल्पांकन

मल्हार में वर्तमान में मुख्य रूप से 3 मंदिरों की जानकारी है इनमें से भीमा कीचक, पातालेश्वर (देउर मंदिर) तथा डिडनेश्वरी देवी मंदिर के नाम से प्रमुख हैं। मल्हार पर सर्वप्रथम कल्चुरि वंश का शासक जाजल्लदेव प्रथम के समय में स्थापित हुआ क्योंकि उसके अभिलेख से ज्ञात होता है कि मल्हार के आसपास का क्षेत्र तथा रायपुर जिले का उत्तरी भाग, जिले ‘तलहरि मंडल’ कहा जाता था सर्वप्रथम जाजल्लदेव प्रथम के शासनकाल में कल्चुरियों के अधीन हुआ। पृथ्वीदेव के बाद उसके पुत्र जाजल्लदेव द्वितीय के समय में सोमराज नामक ब्राहमण ने मल्हार में केदारेश्वर मंदिर का निर्माण कराया जो वर्तमान में पातालेश्वर (देउर) मंदिर के नाम से जाना जाता है।

मल्हार तथा उसके आसपास के क्षेत्र में विशेषतः शैव मंदिरों के अवशेष मिले हैं जिनसे इस क्षेत्र में शैव धर्म की प्रधानता का पता चलता है। यहाँ पर 5वीं शताब्दी ई. से 7वीं शताब्दी ई. तक शिव, कार्तिकेय, गणेश स्कंदमाता, अर्द्धनारीश्वर आदि की प्रतिमाएं अधिकता से मिली है। यहां से ज्ञात स्तंभों में ‘कच्छक जातक’ तथा उलूक जातक का अंकन है। तत्पश्चात् 7वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य निर्मित मूर्तिकला में गुप्तकालीन विशेषतायें मिलती हैं। इस काल में बौद्ध स्मारकों तथा बौद्ध धर्म से संबंधित प्रतिमाओं यथा बुद्ध, बोधिसत्व, ताला, मंजुश्री हेवज्र आदि अनेक प्रतिमाएं यहां से मिली हैं। मल्हार में जैन तीर्थंकरों से संबंधित जैन प्रतिमाएं, यक्षों-यक्षियों तथा अम्बिका की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।2

मल्हार में 10वीं से 13वीं शताब्दी ई.के. मध्य शिवमंदिरों का निर्माण हुआ जिसमें से 1167 ई.में केदारेश्वर मंदिर जो कि सोमराज नामक एक ब्राहमण द्वारा निर्मित कराया गया था तथा एक अन्य मंदिर कल्चुरि नरेश पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल में उसके सामंत ब्रहमदेव द्वारा धूर्जटि महादेव का मंदिर कल्चुरि संवत 915 (1163 ई.) में बनवाया था। इन शासकों के काल में शिव, गणेश, कार्तिकेय, विष्णु, लक्ष्मी, सूर्य तथा दुर्गा की प्रतिमाओं के अलावा कल्चुरि शासकों की रानियों आचार्यों तथा गणमान्य दाताओं की प्रतिमाओं का निर्माण हुआ।3

प्रोफेसर के.डी.बाजपेयी तथा डॉ. श्याम कुमार पाण्डेय द्वारा 1977 में लिखित ‘‘मल्हार’’नामक पुस्तक से ज्ञात होता है कि कल्चुरि शासकों के काल में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ जिसके प्रमाण केदारेश्वर तथा डिडिंगदाई के मंदिर आज भी हैं। मल्हार तथा उसके आसपास में मंदिरों तथा अन्य इमारतों के अवशेष बहुलता से मिले हैं। वर्तमान में पातालेश्वर मंदिर परिसर में संग्रहित विभिन्न धर्मों से संबंधित प्राचीन प्रस्तर प्रतिमाएं अलग-अलग कालों की हैं जबकि पातालेश्वर मंदिर अभिलेख के अनुसार 11-12 वीं शताब्दी में निर्मित हुआ।

इससे यह पूर्णतया सिद्ध होता है कि मल्हार तथा उसके आसपास अन्य मंदिर भी निर्मित थे जो बौद्ध तथा शैव, वैष्णव, शाक्त एवं जैन धर्म से संबंधित रहे होंगे। यही कारण है कि वे मंदिर नष्ट होने के बाद उनके अवशेष तथा प्राचीन प्रतिमाएं यहां पर लाकर एकत्रित की गई हैं जो आज भी पातालेश्वर मंदिर परिसर में विद्यमान हैं। इनमें से कुछ प्रतिमाएं तथा स्तंभ 6-7 वीं शताब्दी से लेकर 12-13 वीं शताब्दी तक की हैं। जैसा कि मल्हार नामक पुस्तक के पृष्ठ क्र-14 से ज्ञात होता है कि शरभपुरीय तथा सोमवंशी काल के खदान नं 5 के उत्खनन में शिव मंदिर के अवशेष, खदान 4 से वज्रयान सम्प्रदाय का बौद्ध मंदिर तथा खदान 6 से चैत्य के अवशेष प्राप्त हुये हैं। मल्हार ग्राम के उत्तर की ओर वर्तमान जैतपुर (प्राचीन चैत्यपुर) ग्राम के समीप पश्चिमी तरफ खदान 7 के उत्खनन से बौद्ध मंदिर के अवशेष प्राप्त हुये हैं तथा यहां से उत्खनन पूर्व एक बोधिसत्व की प्रतिमा भी प्राप्त हुई थी।4 इससे यह प्रमाणित होता है कि वर्तमान में पातालेश्वर मंदिर परिसर तथा स्थानीय संग्रहालय में संग्रहित प्रतिमाएं इसी स्थल की न होकर अन्य मंदिरों तथा स्थलों से लाकर संग्रहित की गई हैं जो विभिन्न कालों की है।

वर्तमान में मल्हार में मुख्य रूप से 3 मंदिरों के अवशेष विद्यमान हैं-1. भीमा कीचक2. पातालेश्वर (देउर मंदिर) 3. डिडनेश्वरी मंदिर। अतः इन्हीं स्मारकों एवं इनके परिसर में स्थित प्रमुख प्रतिमाओं का संक्षिप्त विवरण यहां पर दिया जा रहा है। इस प्रकार इनका विवरण अलग-अलग निम्नानुसार हैः-

(1) भीमा कीचकमंदिरः-

यह मंदिर मल्हार में मुख्य सड़क के किनारे बांये तरफ स्थित है। मंदिर पश्चिमाभिमुखी है जिसमें गर्भगृह तथा अन्तराल भाग अवशिष्ट हैं। गर्भगृह के मध्य में जलहरी स्थापित है लेकिन शिवलिंग नहीं है। जलहरी मूलतः उत्तर दिशा की तरफ प्रणालिका युक्त है। गर्भगृह की पिछली भित्ति में एक पंक्ति में प्रस्तर की उभारदार संरचना है जो पूजन सामग्री आदि रखने के कार्य में उपयोग होता रहा होगा। शेष सभी भित्तियां सादी हैं। गर्भगृह का प्रवेश द्वार सादा है तथा अन्तराल का अलंकृत है।

मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार में द्वार शाखा अलंकृत है। मंदिर की द्वार शाखा त्रिशाख है जिसमें अंदर की प्रथम शाखा में नीचे नदी देवी लघु आकार में दोनों तरफ निर्मित है जिनके साथ एक सहायिका का अंकन है। इसके ऊपरी भाग में दो पंक्ति में बेलबूटों का अलंकरण है। द्वितीय शाखा में दोनों तरफ सबसे नीचे भारवाहक का अंकन है। उसके ऊपर दांये द्वार शाखा में कच्छप वाहिनी यमुना अपने वाहन सहित प्रदर्शित हैं।

देवी के ऊपरी सिरोभाग में आम्रगुच्छ का अंकन है। देवी त्रिभंग मुद्रा में है। शेष ऊपरी भाग सादा है जो नवीन है। इसी प्रकार बाएं तरफ भारवाहक के ऊपर मकरवाहिनी गंगा त्रिभंगमुद्रा में स्थापित है जिनके ऊपरी सिरोभाग में आम्रगुच्छ का अंकन है। इसके ऊपर का भाग भी नवीन है जो सादा है। दायीं द्वारशाखा के तीसरी बाह्य शाखा में सबसे नीचे चतुर्भुजी भारवाहक, उसके ऊपर एक परत में अलंकृत पट्टी तथा उसके ऊपर द्विभुजी द्वारपाल खड़े हुये प्रदर्शित हैं जिसका दांया हाथ वक्ष पर तथा बांया हाथ खण्डित है।

द्वारपाल का सिरोभाग अलंकृत है तथा गले में हार, कमर में पट्टा, अधोवस्त्र तथा कटिमेखला आभूषण हैं। इसी प्रकार बांयी द्वारशाखा के बाह्य तीसरी शाखा में भी सबसे नीचे चतुर्भुजी भारवाहक उसके ऊपर एक परत में अलंकृत पट्टी तथा उसके ऊपर द्विभुजी द्वारपाल खड़े हुये प्रदर्शित हैं जिसका दांया हाथ वक्ष पर तथा बांया हाथ खंडित है। द्वारपाल का सिरोभाग अलंकृत है तथा गले में हार, कमर में पट्टा, अधोवस्त्र तथा कटिमेखला आभूषण हैं। इसी प्रकार बांयी द्वारशाखा के बाह्य तीसरी शाखा में भी सबसे नीचे चतुर्भुजी भारवाहक बैठे हुये प्रदर्शित हैं। इसके ऊपर एक अलंकृत पट्टी है तथा उसके ऊपर द्विभुजी द्वारपाल खड़े हुये प्रदर्शित हैं जिसका गर्दन से ऊपर का भाग खण्डित है। शेष अलंकरण बायें तरफ के द्वारपाल जैसा है।

द्वारशाखा का सिरदल भी अलंकृत है जिसे अभी विगत वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग रायपुर मंडल रायपुर द्वारा जीर्णोद्धारित किया गया है। सिरदल के निचले भाग में एक पतला जालिकावत अलंकरण है तथा उसके ऊपर सम्मुख भाग में एक परत में प्रतिमाओं का अंकन है लेकिन वर्तमान में सभी प्रतिमाएं क्षरित हैं। मध्य में संभवतः उमा महेश्वर दोनों किनारे पर युगल प्रतिमाएं, दायें तरफ तीन भारवाहक तथा दो मालाधारी विद्याधर एवं इसी प्रकार बांये तरफ भी तीन भारवाहक तथा दो मालाधारी विद्याधर एक के बाद एक क्रमशः निर्मित हैं जो क्षरित अवस्था में हैं।

मुख्य प्रवेश द्वार की द्वारशाखा के अंदर की सतह पर भी दोनों तरफ अलंकरण है जो 5-5 खंडों में है। दायें तरफ की सतह में सबसे नीचे के प्रथम खंड में शिव-पार्वती तथा एक सहायिका के साथ उत्कीर्ण हैं जिनके ऊपरी सिरोभाग में आम्रगुच्छ का अंकन है। पार्वती तथा उनके पीछे तरफ निर्मित सहायिका का मुख भाग खंडित है। शिव तथा पार्वती सम्मुख दर्शन में प्रदर्शित हैं जिनके मध्य में एक पतली बौनी मानव आकृति निर्मित है।

इसके ऊपर दूसरे खंड में दायें किनारे पर शिव खड़े हुये प्रदर्शित हैं जो अपने दांये हाथ में कुछ पकड़े हैं जो खंडित है तथा बायें हाथ में खप्पर जैसी आकृति है। शिव के सम्मुख पांच मानव आकृतियां नृत्य मुद्रा में प्रदर्शित हैं जिनकी हड्डियां स्पष्ट दिखती हैं जो शिवगण हो सकते हैं। इनके मध्य ऊपरी भाग में दो ताड़ वृक्ष जैसे अंकन है। इसके ऊपर के तीसरे खंड भी दांये किनारे पर दो प्रतिमाएं निर्मित हैं जो शिव पार्वती हो सकते हैं लेकिन खंडित होने से अस्पष्ट हैं।

इनके सम्मुख भाग में भी 5 नृत्यरत प्रतिमाएं निर्मित हैं जो खंडित हैं। ये प्रतिमाएं भी संभवतः शिवगण हो सकते हैं। इसके ऊपर चौथे खंड में दो हाथियों का विपरीत दिशा में अंकन है तथा इस खंडमें भी 5 शिवगणों का अंकन है जिन्हें हाथी अपने पैरों से कुचलते हुये दर्शाया गया है। इनमें से दो गण हाथी का पैर पकड़े हैं, एक सूंड पकड़े हैं तथा 2 हाथियों के ऊपरी सिरोभाग में अंकित हैं लेकिन सभी गण खंडित हैं।

हाथियों के ऊपरी सिरोभाग में कमल पुष्प तथा पैरों के नीचे तरफ भी पुष्प अलंकरण है। दायें तरफ की सबसे ऊपरी अर्थात पांचवे खंडमें दांये किनारे पर शिव पार्वती नंदी पर सवार होकर प्रदर्शित हैं जो खंडित अवस्था में हैं। इनके सम्मुख भाग में तीनशिवगण तथा दो शिव-पार्वती के चारऊपरी भाग में निर्मित हैं जो खंडित अवस्था में हैं। उपरोक्त पांचों खंडों के चारों तरफ एक परत में जालिकावत् अलंकरण है।

द्वारशाखा के बांये पार्श्व में भी पांच खंडों में शिव से संबंधित अलंकरण हैं। इनमें से सबसे नीचे के प्रथम खंड में शिव-पार्वती आलिंगन मुद्रा में प्रदर्शित हैं। शिव चतुर्भुजी तथा पार्वती द्विभुजी हैं। शिव अपने दायें ऊपरी हाथ में त्रिशूल धारण किये हैं तथा निचला हाथ वक्ष पर रखा है तथा बायें तरफ के दोनों हाथ खंडित हैं। पार्वती का दांया हाथ शिव के बांयी पालथी पर तथा बांया हाथ बायें घुटने पर रखा है। शिव के दांये तरफ उनका वाहन नंदी भी विराजमान है। शिव के दांये पार्श्व में हंसारूढ़ ब्रह्मा तथा उसके नीचे कार्तिकेय की वाहन सहित खड़ी हुई प्रतिमा का अंकन है।

शिव तथा पार्वती के नीचे अनेक गण बैठे, नाचते तथा लेटे हुये दृष्टव्य हैं। ब्रह्मा जी के ऊपरी सिरोभाग में गणेश बैठे हुये प्रदर्शित हैं जिनका सुंण्ड खंडित है। इस खंड के ऊपर दूसरे खंड में शिव-पार्वती परिणय का स्पष्ट और सुंदर अंकन है लेकिन दोनों प्रतिमाओं का गर्दन से ऊपरी भाग खंडित है। शिव के गले में हार, आभूषण है। शिव चतुर्भुजी खड़े हुये प्रदर्शित हैं जिसका दायां हाथ वक्ष पर रखा है जो खंडित है तथा बांया हाथ पार्वती के हाथ को पकड़े है। शिव का दायां निचला हाथ ऊपर को मुड़ा हुआ है जिसमे हथेली में कुछ पकड़े हैं तथा बांया निचला हाथ कलाई से खंडित है।

पार्वती द्विभुजी हैं जिनके दोनों हाथ नीचे को लटके हुये हैं। शिव और पार्वती के मध्य में कलश का अंकन है। पार्वती के दांये तरफ नीचे एक सहायिका का अंकन है। पार्वती के सिरोभाग में आम्रगुच्छ का अंकन है। शिव के दांये तरफ नीचे चर्तुमुखी ब्रह्मा जी अग्नि को आहुति देते हुये प्रदर्शित हैं। ब्रह्मा जी चतुर्भुजी बैठे हुये दर्शाये गये हैं। ब्रह्मा जी के ऊपर एक द्विभुजी देवी कमलासन पर दोनों हाथ से घट पकड़े हुये प्रदर्शित हैं। इस प्रकार इस खंड में शिव पार्वतीके विवाह का सुंदर अंकन दृष्टव्य है।

इसके ऊपर तीसरे खंड में संभवतः शिव नृत्य मुद्रा में प्रदर्शित हैं जो चतुर्भुजी हैं लेकिन अत्यधिक खंडित होने से अस्पष्ट हैं। शिव के बांये कोने में नीचे बैठी हुई एक प्रतिमा अंकित है जो शायद पार्वती हो सकती हैं तथा दायें कोने में एक खंडित प्रतिमा का अंकन है जो कार्तिकेय की हो सकती है। शिव के बांये ऊपरी कोने में भी दो संयुक्त प्रतिमाएं अंकित हैं जो खंडित हैं तथा दांये ऊपरी कोने में सर्प जैसे अंकन है। इसके ऊपर चौथे खंडमें शिव नृत्यमुद्रा में प्रदर्शित हैं जो पूर्णतया खंडित अवस्था में हैं।

सबसे नीचे तरफ एक पीठ के बल लेटी हुई प्रतिमा का अंकन है। इस खंड में बायें तरफ पार्वती बैठी हुई अंकित है तथा दायें तरफ भी एक प्रतिमा निर्मित थी जो पूर्णतया खंडित है। इसके ऊपर तथा अंतिम पांचवे खंड में शिव पार्वती पहले खंड जैसी मुद्रा में विराजमान हैं लेकिन पूर्णतया खंडित अवस्था में हैं। इनके दायें तरफ नीचे कोने में नंदी का अंकन था जो खंडित अवस्था में होने से अस्पष्ट है। इन पांचों खंडों के बाहर चारों तरफ लता वल्लरी तथा जालिकावत् अलंकरण है।

भीमा कीचक मंदिर के बाह्य भित्ति में भी नीचे जंघा भाग में चार उभारदार संरचना निर्मित है जिसमें से सबसे नीचे का थर सादा है उसके बाद दूसरी थर गोलाकार है जिसमें 5 तह निर्मित हैं जो सादे हैं। तीसरे थर में कीर्तिमुखों का अलंकरण है और सबसे ऊपरी थर में दो पंक्ति में कमल दलों का अलंकरण है। जंघा की बाह्य भित्ति 3 रथों में निर्मित है जिसमें मात्र नीचे के 2 थर अलंकृत हैं शेष ऊपरी भाग सादा है। बाह्य भित्ति में खुर, कुम्भ, कलश तथा ऊपरी सतह परपट्टिका निर्मित है। कुंभ और कलश थर के बीच में बीच-बीच में भारवाहक प्रतिमाओं का गड्ढे में अलंकरण है।

उत्तरी बाह्य भित्ति के पिछले रथ में एक खड़ी हुई प्रतिमा, उसके बाद दो संयुक्त प्रतिमाएं उभारदार पट्टी में निर्मित हैं जो दायें हाथ में खड्ग पकड़े तथा नारी प्रतिमा बैठी हुई निर्मित है। इसके बाद गड्ढे में 3 संयुक्त प्रतिमाएं निर्मित हैं जिसमें से मध्य की पुरूष प्रतिमा बैठी हुई तथा अगल-बगल एक नारी प्रतिमाएं बैठी हुई निर्मित हैं जो पुरूष प्रतिमा की पालथी पर हाथ रखे हैं। उत्तरी बाह्य भित्ति के अगले रथ में एक कच्छपनुमा आकृति के आसन में युगल प्रतिमा सिर विहीन बैठी हुई निर्मित है।

इसी प्रकार एक उभार में 3 संयुक्त प्रतिमाएं पूर्व की भांति निर्मित हैं लेकिन इसका गर्दन से ऊपरी भाग खंडित है। मंदिर के पिछली भित्ति में भी उत्तरी भित्ति की तरह संरचना निर्मित है तथा दक्षिण पूर्वी कोने के रथ में भी उभारदार भाग में दो संयुक्त तथा गड्ढे में तीन प्रतिमाएं एक साथ निर्मित हैं दक्षिणी बाह्य भित्ति में पीछे के रथ में एक गड्ढे में गरूड़ासीन चतुर्भुजी बिष्णु की प्रतिमा निर्मित है।

बिष्णु अपने दायें ऊपरी हाथ में चक्र तथा बायें ऊपरी हाथ में शंख धारण किये हैं। दांये निचले हाथ में केवल उंगलियों के निशान दिखते हैं तथा बायां निचला हाथ कलाई से खंडित है। बिष्णु के सिरोभाग में किरीट मुकुट, कर्णकुण्डल, घुंघरालू बाल तथा प्रभामंडल निर्मित है। प्रतिमा का मुख भाग क्षरित है। गले में माला, हाथों में बाजूबंद, यज्ञोपवीत, आभूषण हैं। बिष्णु को गरूड़ अपने दोनों हाथों से पैर पकड़कर कंधे पर बिठाये हुये प्रदर्शित हैं। गरूड़ के पंख ऊपर की ओर फैले हुये स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। बिष्णु के दोनों तरफ एक-एक देवी प्रतिमा का अंकन है जो खड़ी हुई प्रदर्शित है। इस प्रतिमा के बाद एक प्रतीक्षारत नायिका दरवाजे पर खड़ी हुई प्रदर्शित है। फिर एक चैत्य गवाक्ष में द्विभुजी देवी त्रिभंग मुद्रा में खड़ी हुई प्रदर्शित है जो क्षरित स्थिति में है।

देवी के बांये तरफ एक बैठी हुई प्रतिमा अंकित है। इस प्रतिमा के बाद पश्चिम की तरफ एक देवी प्रतिमा खड़ी हुई निर्मित है जिसके सिरोभाग में आम्रगु़च्छ का अंकन है। यह देवी प्रतिमा अपने बायें हाथ की हथेली में एक चिड़िया को बिठाये हुये आम खिला रही है तथा दायां हाथ नीचे तरफ किये हुये खड़ी प्रदर्शित हैं। इस प्रतिमा के बाद एक शिवलिंग को नमस्कार करते हुये निर्मित की गई है। इसके बाद गड्ढे में सिंह की प्रतिमा का अंकन किया गया है।

स्थल पर संग्रहित प्रतिमाएं :-

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा भीमा कीचक मंदिर परिसर में दक्षिणी किनारे परएक स्थानीय भवन में प्रतिमाओं को संग्रहित कर रखा गया है। इनमें से कुछ प्रमुख प्रतिमाओं एवं पुरावशेषों का वर्णन निम्नानुसार है :-

(1) पार्वती :-यह प्रतिमा किसी मंदिर में प्रदर्शित रही होगी जो एक अलिंदनुमा संरचना में निर्मित है प्रतिमा चतुर्भुजी है जो अपने दांये ऊपरी हाथ में त्रिशूल तथा निचले हाथ में अक्षमालाएवं कलश धारण किये हैं। देवी अपने बायें निचले हाथ में वस्त्र धारण किये हैं तथा ऊपरी हाथ अस्पष्ट है। देवी के सिर में जटामुकुट गले में हार, बांये कंधे पर वस्त्र का एक पट्टा निर्मित है। देवी का वस्त्र नीचे एड़ी तक पहने हुए दृष्टव्य है। प्रतिमा का काल 6वीं शती ई. निर्धारित है।

(2) द्वार शाखा :-यह किसी मंदिर की द्वार शाखा का बायां भाग है जो खंडित है। इसमें मात्र 2 परते हैं जिसमें दायें किनारे तरफ वलयाकार आकृति के मध्य कुल पांच मानव आकृतियां निर्मित हैं जो एक हाथ सेवलय की पट्टी को पकड़े हैं तथा एक हाथ में खड्ग अथवा तलवार धारण किये हैं। इसके अलावा दूसरी पट्टी में कीर्तिमुखों का अलंकरण है। यह द्वारशाखा संभवतः भीमा कीचक मंदिर के गर्भगृह के प्रवेशद्वार की हो सकती है।

(3) संयुक्त प्रतिमा :-इस प्रतिमा खं डमें 3 संयुक्त प्रतिमाएं बेठी हुई निर्मित हैं। मध्य की पुरूष प्रतिमा तथा दोनों किनारे पर एक-एक नारी प्रतिमाएं बैठी हुई निर्मित हैं। पुरूष प्रतिमा का सिरोभाग जटा जूटयुक्त तथा प्रभा मण्डल निर्मित हैं। प्रतिमा के गले में माला, यज्ञोपवीत, आभूषण है। प्रतिमा द्विभुजी है जो अपने बायें हाथ में कलशनुमा पात्र धारण किये हैं तथा दाहिना हाथ खंडित है। पुरूष प्रतिमा के दोनों तरफ एक-एक नारी प्रतिमाएं बैठी हुई प्रदर्शित हैं जिनके सिरोभाग में प्रभामण्डल निर्मित है तथा सिरोभाग में जटामुकुट एवं जूड़ा बंधा है। प्रतिमा सफेद बलुआ पत्थर से निर्मित है जो क्षरित स्थिति में है। संभवतः यह कुबेर की प्रतिमा हो सकती है। इस प्रतिमा का काल लगभग 6वीं शती ई. है।

(4) सदाशिव :-यह प्रतिमा तीन मुखों वाली है जिसके सिर में जटामुकुट है। प्रतिमा के गले में हार आभूषण है। प्रतिमा द्विभुजी है जो अपने बायें हाथ में कलशनुमा पात्र धारण किये हैं तथा दायां हाथ अभयमुद्रा में है। प्रतिमा के नीचे एक नंदी का अंकन है जो बैठा हुआ प्रदर्शित है। प्रतिमा भूरे बलुआ प्रस्तर से निर्मित है जिसके क्षरित स्थिति में होने के कारण अलंकरण अस्पष्ट है। काल लगभग 6वीं शताब्दी ई. है।

(5) द्वारशाखा :-यह भी द्वारशाखा के मध्य का भाग है जो तीन तहों में निर्मित है। अंदर की सतह सादी है तथा बाहर की सतह में अलंकरण है। मध्य की चौड़ी परत में नीचे तरफ एक नारी आकृति का अंकन है। नारी के सिरोभाग में जटामुकुट, प्रभामंडल, कर्ण कुण्डल, गले में हार, हाथों में बाजूबंद, कंगन, कटि आभूषण तथा एड़ी तक वस्त्राभूषण धारण किये हैं। नारी अपने दोनों हाथों से पुष्पकलिका धारण किये हैं जिसमें से दांया हाथ नीचे की तरफ तथा बायां हाथ ऊपर की तरफ निर्मित है। काल लगभग 6वीं शती ई. है।

(6) चतुर्भुजी देवी :-यह प्रतिमा चतुर्भुजी है जो खड़ी हुई निर्मित है। देवी का दांया ऊपरी तथा निचला हाथ खंडित है। बायेंऊपरी हाथ में कुछ धारण किये हैं तथा निचले हाथ में वस्त्र धारण किये हैं। देवी का ऊपरी मुख भाग खंडित है तथा सिरोभाग के पीछे प्रभामण्डल निर्मित है। गले में हार,बांये कंधे पर अलंकृत पट्टा, हाथों में बाजूबंद, कटि आभूषण, तथा अधोवस्त्र धारण किये हैं। देवी के बायें दोनों हाथो में 3-3 कंगन आभूषण तथा मात्र बायें पैर में कड़ा धारण किये हैं। प्रतिमा भूरे बलुआ प्रस्तर से निर्मित है। काल लगभग 6वीं शती ई. है।

पातालेश्वर महादेव, मल्लार

(7) अलंकृत स्तंभ :-यह स्तंभ खण्डित अवस्था में है जो भूरे बलुआ प्रस्तर से निर्मित है। स्तंभ का निचला भाग सोड्षकोणीय है जो सादा है। इसके ऊपर का भाग अष्टकोणीय है जिसके अलग-अलग खण्डो में प्रतिमाओं का अंकन है जो खण्डित अवस्था में है। इन खण्डों के ऊपर तथा नीचे कीर्तिमुख का अलंकरण है। इस स्तंभ के प्रथम खण्ड में मध्य में एक अर्द्धपर्यंकासन मुद्रा में बैठी हुई प्रतिमा का अंकन है जिसके दांये तरफ एक पुरूष प्रतिमा अपने दोनों हाथों से ऊपर को उठाये हुये खड़ी हुई निर्मित है। बायें तरफ निर्मित प्रतिमा भी खड़ी हुई निर्मित है जो पूर्णरूपेण खंडित अवस्था में होने से अस्पष्ट है। दूसरे खण्ड में मध्य में एक चौकी पर दो प्रतिमाएं बैठी हुई निर्मित थीं जो वर्तमान में खण्डित हैं। इनके बायें किनारे पर भी दो प्रतिमाएं निर्मित थी जिसमें नीचे की प्रतिमा बैठी हुई तथा ऊपरी प्रतिमा खड़ी हुई प्रदर्शित है। यह खण्ड पूर्णरूपेण क्षरित होने से अस्पष्ट है। तीसरे खण्ड में मात्र एक प्रतिमा निर्मित है जो खड़ी हुई थी। प्रतिमा का केवल मध्य भाग ही शेष है तथा ऊपरी एवं निचला भाग खण्डित होने से स्पष्ट है। चौथे खण्ड में एक पंक्ति में कुल चार प्रतिमाएं खड़ी हुई निर्मित हैं जो सभी द्विभुजी हैं। सभी प्रतिमाओं का अलंकरण एक जैसा है जिसके सिर में जटामुकुट, गले में माला, हाथों में बाजूबंद, कड़ा, कटिआभूषण तथा अधोवस्त्र धारण किये हैं। अगली प्रथम प्रतिमा का मुख खण्डित है तथा दांये हाथ में कुछ पकड़े हैं। बायां हाथ खण्डित है। दूसरी प्रतिमा का दांया हाथ कट्यावलम्बित है तथा मुख वानर जैसे है। तीसरी प्रतिमा भी उक्त दूसरी प्रतिमा की भांति है लेकिन इसका मुख भाग खण्डित है। चौथी तथा सबसे पीछे की प्रतिमा का दांया हाथ वक्ष पर रखा है तथा इसका मुख भी वानर जैसे है लेकिन खण्डित होने से अस्पष्ट है। स्तंभ के पांचवे खण्ड में दो नारी प्रतिमाएं आगे पीछे कमलासन पर बैठी हुई प्रदर्शित हैं। इन दोनों नारी प्रतिमाओं का दांया हाथ माथे पर रखा है तथा बांया हाथ चौकी पर टेके हुये प्रदर्शित हैं। नारी के सिरोभाग में जटाजूट, मुखभाग खण्डित, गले में माला, हाथों में बाजूबंद, कड़ा, कटिआभूषण तथा वस्त्र धारण किये हुये प्रदर्शित है। स्तंभ के छठवें खण्ड में तीन प्रतिमाएं एक साथ खड़ी हुई निर्मित हैं जिनमें से दायें तरफ की प्रतिमा पूर्णरूपेण खण्डित है। मध्य की प्रतिमा का गर्दन से ऊपरी भाग खण्डित है तथा बायें किनारे की प्रतिमा का आधा भाग खंडित है। तीनों प्रतिमाएं द्विभुजी हैं जिनके गले में माला तथा अधोवस्त्र, हाथों में बाजूबंद तथा कड़ा आभूषण है। इनके सम्मुख भाग में एक मानव आकृति लेटी हुई प्रदर्शित है जिसका दांया हाथ वक्ष पर रखा है तथा बांया हाथ एवं कमर से नीचे का भाग खण्डित है। प्रतिमा का मुख वानर जैसा दिखाई पड़ता है। इस लेटी हुई प्रतिमा के सिरोभाग में एक नारी प्रतिमा बैठी हुई निर्मित है जिसका दांया हाथ लेटी हुई प्रतिमा के वक्ष पर रखा है। स्तंभ के सातवें खण्ड में मात्र दो प्रतिमाओं का अंकन है जो वीरभाव में प्रदर्शित हैं। दायें तरफ की प्रतिमा का मुख भाग गर्दन से ऊपर खण्डित है तथा दोनों प्रतिमाएं आमने-सामने लड़ाई की मुद्रा में खड़े हुये प्रदर्शित हैं। दायें तरफ की पुरूष प्रतिमा का दांया हाथ ऊपर की ओर तथा बांया हाथ वक्ष पर रखा है तथा बायें तरफ की प्रतिमा का दांया हाथ वक्ष पर तथा बांया हाथ ऊपर किये हुये प्रदर्शित है। दोनों प्रतिमाओं का एक-एक पैर घुटने से मिला हुआ एक चौकी पर रखा है तथा एक पैर नीचे रखा हुआ है दोनों प्रतिमाओं के चारों पैरों का निचला भाग खण्डित हैं । दोनों प्रतिमाओं के मध्य में एक वृक्ष तथा बायें तरफ की प्रतिमा के पीछे तरफ एक वृक्ष का अंकन है। स्तंभ के आठवें खंडमें मात्र एक प्रतिमा का अंकन है जो द्विभुजी तथा खड़ी हुई प्रदर्शित है। यह प्रतिमा बायें हाथ से धनुष को पकड़े हुये तथा दायां हाथ मुड़ा हुआ प्रदर्शित है। प्रतिमा के आगे तरफ एक वृक्ष का अंकन है। प्रतिमा का बांया पैर ऊपर को उठा हुआ है जिसका निचला भाग खण्डित है।

(8) अलंकृतस्तंभः-भीमा कीचक मंदिर प्रांगण में निर्मित मूर्तिकला में एक अन्य अष्टकोणीय स्तंभ रखा है जिसकी संरचना भी उक्त स्तम्भ के समान है। इस स्तंभ में भी आठ खण्ड हैं जिनमें प्रतिमाओं का अंकन है। प्रत्येक खण्ड के ऊपर तथा नीचे कीर्तिमुख का अलंकरण है। स्तंभ के एक खण्ड में दो प्रतिमाएं खड़ी हुई निर्मित हैं। दोनों प्रतिमाओं के दायें हाथों में एक मुगदर जैसी वस्तु धारण किये हुये हैं तथा लड़ाई की मुद्रा में प्रदर्शित हैं। इसी स्तंभ के दूसरे खण्ड में एक बैठी हुई द्विभुजी प्रतिमा स्थापित है जो ललितासन में विराजमान है। प्रतिमा का दांया हाथ दायीं पालथी पर रखा है जो खण्डित है तथा बायें हाथ में कोई वस्तु धारण किये हैं जो खण्डित है। इसके अलावा अन्य 6 खण्डों की प्रतिमाओं का अध्ययन नहीं हो सका है।

(9) नृसिंह प्रतिमा :-यह प्रतिमा भी भूरे बलुआ प्रस्तर से निर्मित है जो एक चैत्यगवाक्ष में निर्मित है। प्रतिमा चतुर्भुजी है जिसके बाल बिखरे हुये निर्मित हैं। नृसिंह की बैठी हुई इस प्रतिमा के दायें ऊपरी हाथ में गदा तथा निचले हाथ में चक्र धारण किये हैं। बायें ऊपरी हाथ में शंख तथा निचला हाथ बायीं पालथी पर रखा है। प्रतिमा के गले में लटका हुआ पत्तों जैसा हार, यज्ञोपवीत तथा आधी भुजाओं तक वस्त्रधारण किये हुये हैं । काल लगभग 5-6वीं शती ईस्वी है।

(10) अर्द्धनारीश्वर :-भीमा कीचक मंदिर परिसर में निर्मित स्थानीय मूर्तिशाला के सम्मुख एक अर्द्धनारीश्वर की प्रतिमा स्थापित है जो भूरे बलुआ प्रस्तर से निर्मित है। प्रतिमा का दांया कान पतला तथा बांया कान मोटा है। शिरोभाग तथा मुखभाग क्षरित अवस्था में है। इस प्रतिमा का मात्र गर्दन से ऊपरी भाग ही शेष है। प्रतिमा का काल लगभग 3री शती ई.है।

(11) शिव :-यह प्रतिमा भूरे तथा बलुआ प्रस्तर से निर्मित है जिसमें प्रतिमा का कमर से ऊपरी भाग ही शेष है। प्रतिमा द्विभुजी है जिसके दोनों हाथ भुजाओं से खण्डित हैं। प्रतिमा के सिरोभाग में जटामुकुट तथा माथे के मध्य में तीसरे नेत्र का अंकन है। प्रतिमा विविध आभूषण धारण किये हुये हैं। गले में एक लड़ी तथा एक चौड़ा हार धारण किये हैं इसके अलावा यज्ञोपवीत भी दृष्टव्य है। प्रतिमा का मुख भाग क्षरित स्थिति में है तथा चारों तरफ से कोरकर बनायी गई है। प्रतिमा का काल चौथी शती ईस्वी संभावित हैं

(2)पातालेश्वर मंदिर :-ग्राम मल्हार में यह मंदिर मल्हार गढ़ के दक्षिणी किनारे पर तथा मुख्य सड़क के किनारे स्थित है।जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि अभिलेखों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मल्हार ग्राम में कल्चुरि संवत् 919 (1167 ई.) का प्राप्त शिलालेख में केदारेश्वर मंदिर (पातालेश्वर) नाम के मंदिर निर्माण की जानकारी मिलती है। इस मंदिर का निर्माण सोमराज नामक एक ब्राह्मण के द्वारा कराया गया था।

यह मंदिर पश्चिमाभिमुखी है जिसमें गर्भगृह, मण्डप एवं अर्द्धमण्डप निर्मित थे। वर्तमान में मंदिर का अधोभाग ही शेष है तथा जंघा से ऊपर का भाग नष्ट हो चुका है। मंदिर का मण्डप जो भूमि से लगभग 4 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसमें पहुंचने के लिए तीन तरफ से सोपान निर्मित हैं। मंदिर का गर्भगृह मण्डप से काफी गहराई पर निर्मित है जिसके मध्य में शिवलिंग जलहरी सहित स्थापित हैं। अभिलेखों में इस मंदिर का नाम मूलतः केदारेश्वर उल्लेख किया गया है लेकिन गर्भगृह के गहराई में होने के कारण ही इसे पातालेश्वर मंदिर की संज्ञा बाद में दी गई होगी। गर्भगृह के प्रवेशद्वार में दोनों तरफ द्वारशाखा की केवल दोनों पार्श्व शाखायें ही शेष हैं जबकि मंदिर के सिरदल वाला भाग स्थापित नहीं है। द्वार शाखा में दोनों तरफ तीन-तीन शाखाएं निर्मित हैं जिसमें से दायें पार्श्व शाखा का अंदर की शाखा में भारवाहक के ऊपर कच्छप वाहिनी यमुना द्विभंग मुद्रा में खड़ी हुई स्थापित हैं जो द्विभुजी है। देवी के दायें हाथ में सनाल पद्म, एवं बांये हाथ में चक्र धारण किये हैं। देवी के सिर में मुकुट, उसके ऊपर छत्र, कर्णकुण्डल, ग्रेवेयक, गले में हार कटि आभूषण, पैरों में पायजेब आभूषण हैं। वाहन मकर का स्पष्ट अंकन है। नदी देवी के दायें पार्श्व में अर्थात मध्य शाखा में द्विभुजी द्वारपाल खड़े हुये निर्मित हैं। उनके दायें हाथ में दण्ड तथा बायें हाथ में खप्पर है। द्वारपाल को एक भारवाहक उठाये हुये प्रदर्शित हैं द्वारपाल के सिर में मुकुट, गले में हार, हाथों में कंगन तथा पैरों में कड़ा आभूषण है। इसके बाद बाहर की शाखा में भी द्विभुजी द्वारपाल खड़े हुये निर्मित हैं जिनके दांये हाथ में गदा तथा बायें हाथ में नारियल धारण किये हुये हैं। इस द्वारपाल के नीचे भी भारवाहक का अंकन है। द्वारपालों के निचली पंक्ति में वृषभ, गज तथा मानव आकृतियां निर्मित है। नदी देवी तथा द्वारपालों के सिरोभाग के ऊपर जालिकावत अलंकरण है। इसी प्रकार बायीं द्वारशाखा में भी मकर वाहिनी गंगा अंदर की शाखा में तथा बाहर की दोनों शाखाओं में द्वारपाल प्रदर्शित हैं तथा इनका आभूषण आयुध दायीं द्वारशाखा के समान है। दोनों द्वारशाखाओं के अंदर की सतह में शिव-पार्वती द्वार चोपड़ खेलने का दृश्य, नंदीश्वर, गणेश तथा वैनायिकी आदि शैव सम्प्रदाय से संबंधित दृश्यों का अंकन किया गया है।5 यह मंदिर ऊंचे प्लेटफार्म पर निर्मित है जिसकी जगती की बाह्य सतह पर मोल्डिंग्स हैं। इनमें एक पट्टिका में चौसर बोर्ड का अलंकरण, दूसरी में अलंकृत कमलपुष्प, तीसरी पट्टि में हीरकाकार आकृतियां, इसके ऊपर कर्णिका, पद्मलता, गजथर और चौथी पट्टिका में सिंह पंक्ति तथा अलिंद में बैठे हुये बिष्णु, तथा नृत्यरत गणेश का स्पष्ट अंकन है। मंदिर का अधिष्ठान भाग खण्डित है। गर्भगृह पंचरथ शैली में निर्मित है। मण्डप का मात्र अधिष्ठान भाग ही शेष है। उसके ऊपर का जंघा भाग नष्टप्राय है। मण्डप में सम्मुख भाग तथा दांये बायें दोनों तरफ से प्रवेश द्वार था जिसके लिए सोपान निर्मित हैं। इन सोपानों के दोनों तरफ भित्ति से सटकर एक-एक प्रस्तर स्तम्भ अभी भी स्थापित है जिससे सिद्ध होता है कि इसके ऊपर अर्द्ध मण्डप भी निर्मित रहा होगा जैसा कि भोरमदेव मंदिर में अभी भी विद्यमान है।

मंदिर का गर्भगृह गहराई में स्थित है जिसके मध्य में काले प्रस्तर से निर्मित जलहरी स्थापित है जिसमें मूलतः शिवलिंग स्थापित नहीं हैं। गर्भगृह का वितान भाग खुला है जिसके ऊपर वर्तमान में नवीन छत का निर्माण तथा उसके ऊपर टीन शेड का निर्माण किया गया है। गर्भगृह के चारों कोनों में भित्ति स्तंभ निर्मित हैं। गर्भगृह मूल रूप में स्थापित है जो वर्गाकार हैं इसका माप 2.48ग2.48 वर्गमीटर है। गर्भगृह की द्वारशाखा 2.12 मीटर ऊंची तथा 1.10 मीटर चौड़ी है। गर्भगृह में नीचे उतरने के लिए सोपन निर्मित है। गर्भगृह के बाहर अन्तराल भाग है जो 3.12 मीटर चौड़ा तथा 74 स.ेमी. लम्बा है। मण्डप वर्गाकार है जिसका माप 5.80ग5.80 मीटर है तथा अर्द्धमण्डप भी वर्गाकार है जिसका माप 2.40ग2.40 मीटर है। मंदिर का काल जैसा कि प्रारंभ में दर्शाया गया है 12वीं शताब्दी ई. का उत्तरार्ध है।

उपरोक्त केदारेश्वर मंदिर के अलावा इस मंदिर परिसर में कुछ प्राचीन तथा कुछ इस मंदिर के समकालीन स्थापत्य खण्ड रखे हुए हैं तथा कुछ प्रतिमाएं विभिन्न धर्मों से संबंधित परिसर में निर्मित मूर्ति शेड में रखी हुई हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि मल्हार में इस मंदिर के अलावा अन्य मंदिर भी निर्मित रहे होंगे जो अलग-अलग कालों के थे। इनमें से कुछ सोमवंशी काल के तथा कुछ कल्चुरी काल के रहे होंगे। उन मंदिरों के नष्ट हो जाने के बाद परवर्ती काल में स्थानीय लोगों तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के द्वारा समय-समय पर एकत्रित कर इन्हें सुरक्षा की दृष्टि से संग्रहित कर रखा गया है। जैसा कि एक कल्चुरि शासक पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल में उसके सामंत ब्रह्मदेव द्वारा कल्चुरि संवत 915 (1163 ईस्वी) में धूर्जटि मंदिर के निर्मित होने की जानकारी मिलती है जो कि वर्तमान में मल्हार में विद्यमान होने की स्पस्ट जानकारी नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि उक्त मंदिर नष्ट हो जाने के बाद उसकी प्रतिमाएं यहां पर संग्रहित हैं जिनमें शिव, गणेश, कार्तिकेय, बिष्णु, लक्ष्मी, सूर्य तथा शाक्त प्रतिमाएं कल्चुरि शासकों की रानियॉं, आचार्यों तथा गणमान्य दाताओं की प्रतिमाएं प्रमुख है।

(3) डिडनेश्वरी मंदिर, मल्हार :-मल्हार ग्राम के पूर्वी किनारे पर बस्ती के बाहर एक अन्य मंदिर के अवशेष विद्यमान हैं जिसे स्थानीय लोग डिडनेश्वरी देवी के नाम से पूजते हैं। यह मंदिर भी मूलतः पश्चिमाभिमुखी निर्मित था जिसमें गर्भगृह तथा अन्तराल एवं मण्डप रहे होंगे। वर्तमान में मंदिर का जीर्णोद्धार हो जाने के कारण मात्र गर्भगृह ही शेष है तथा मण्डप नवीन है। गर्भगृह का अधिष्ठान भाग अलंकृत है जिसकी मात्र लगभग 3 फीट ऊंचाई तक की भित्ति ही मूलतः दृष्टव्य है। इसमें हसपंक्ति, गजपंक्ति तथा छिद्रित चौकोर आकृतियों का अलंकरण है। इसके ऊपर का भाग संगमरमर से ढंका हुआ है। मंदिर के बाह्य जंघा भाग में कुछ अलिंद निर्मित हैं जिनमें चामुण्डा, उमामहेश्वर उपासक, गजव्याल, द्वारशाखा तथा कुछ अन्य प्रतिमाएं जड़ी हैं जो प्राचीन हैं। मंदिर का शेष ऊपरी भाग जीर्णोद्धारित है।

मंदिर के गर्भगृह में काले ग्रेनाईट प्रस्तर से निर्मित डिडिनदाई की प्रतिमा स्थापित है जो नियमित पूजन के अधीन है। प्रतिमा द्विभुजी है जो हाथ जोड़कर बैठी हुई पद्मासन में स्थापित है। जनश्रुति के अनुसार यह देवी मल्हार के कल्चुरि शासकों की कुलदेवी थी। देवी के अंजलिबद्ध हाथों में कमल है जिसे वे अपने आराध्य शिव को अर्पित करने हेतु धारण किये हैं। देवी के सिरोभाग में प्रभा मण्डल निर्मित है तथा गले में हार, हाथों में कंगन, तथा अन्य आभूषण धारण किये हैं।6 उनके प्रत्येक ओर एक पार्श्व चारिका निर्मित हैं। प्रतिमा के चरण चौकी में 3 आराधिकाएं निर्मित हैं तथा प्रतिमा के ऊपरी भाग में दोनों कोनों में मालाधारी विद्याधर युगल अंकित है। वर्तमान में यह मंदिर स्थानीय ट्रस्ट के द्वारा संचालित है। मंदिर परिसर में पीछे की तरफ एक भित्ति के सहारे कुछ प्राचीन प्रतिमा खण्ड, स्थापत्य खण्ड तथा देवी देवताओं की प्रतिमा, गज, अश्व तथा मिथुन प्रतिमाएं जड़ी हैं जो लगभग कल्चुरि शासकों के काल 11-12 वीं शताब्दी की हैं।

उपर्युक्त मंदिरों के अलावा मल्हार में पातालेश्वर मंदिर के पीछे एक गहरी खाईनुमा परकोटा है जो लगभग गोलाकार है तथा इसकी लम्बाई लगभग 4-5 कि.मी. है। इस संरचना को प्राचीन काल में दुर्ग के नाम से जाना जाता था। इस परकोटा के बाहर और भीतर सुरक्षा हेतु परिखा का निर्माण हुआ जिसे गढ़ के नाम से जाना जाता है। इस गढ़ के अंदर तथा बाहर वर्ष 1974 से 1977 तक उत्खनन का कार्य सम्पादित किया गया था, जिसमें से मिट्टी के बर्तन, ईंट निर्मित सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। इनकी फर्श कड़ी मिट्टी तथा बजरी के मिश्रण से निर्मित है। मल्हार में उत्खनन से मौर्य काल की ईटों की भित्तियां, जुड़वा चूल्हे तथा मिट्टी के घड़े भी प्राप्त हुए हैं। खदान नं. 5 के उत्खनन में शिव मंदिर जो कि 6-7 वीं शताब्दी ई का तथा अनगढ़ तराशे पत्थरों के बने मकान भी प्राप्त हुये हैं। खदान नं. 4 से वज्रयान सम्प्रदाय का बौद्ध मंदिर तथा खदान नं. 6 से चैत्य के अवशेष प्राप्त हुये हैं। मल्हार ग्राम के समीप जैतपुर ग्राम के समीप खदान नं. 7 से बौद्ध मंदिर के अवशेष प्राप्त हुये हैं तथा इसी मंदिर से लगे हुये लघु स्तूपों के अवशेष भी प्राप्त हुये हैं।3 इससे सिद्ध होता है कि जैतपुर ग्राम में बौद्ध धर्म की महायान शाखा का बड़ा केन्द्र था जो धीरे-धीरे वज्रयान धर्म का प्रभाव हुआ। यही कारण है कि वर्तमान में मल्हार स्थित स्थानीय पातालेश्वर मंदिर प्रांगण में तथा संग्रहालय में बौद्ध सम्प्रदाय के देवी देवताओं से संबंधित प्रतिमाएं आज भी संग्रहित हैं जो इन्हीं स्थलों से ले जाकर रखी गई होगी। परवर्ती काल में कल्चुरी शासकों का प्रभाव होने के कारण मल्हार में विशाल मंदिरों का निर्माण किया गया जिनके अवशेष आज भी विद्यमान हैं।

इस प्रकार अन्त में यह कहा जा सकता है कि मल्हार तथा इसके आसपास का क्षेत्र ईसा पूर्व लगभग 2-3रीं शताब्दी से लेकर अंतिम काल कल्चुरि शासकों का जो कि 900 ई. से 13वीं शताब्दी ई. तक था। इन कालों के क्रमशः प्रमाणों के रूप में सामग्रियॉं, पुरावशेष, स्थापत्य कला, शैव, वैष्णव, बौद्ध एवं जैन सम्प्रदाय से संबंधित प्रतिमाएं निर्मित होती रहीं जो विभिन्न धर्म सम्प्रदायों के अनुसार अलग-अलग मंदिरावशेषों, बौद्ध संरचनाओं एवं चैत्यों में स्थापित की गई जिनके नष्ट होने के बाद परवर्ती काल में तथा आधुनिक काल में संग्रहालय के रूप में एकत्रित कर रखी गई है जो आज भी विद्यमान हैं।
स्रोत संदर्भ :

  1. मल्हार, 1975-77, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति तथा पुरात्व विभाग सागर विश्वविद्यालय, 1977, प्रो.के.डी.बाजपेयी, डॉ.एस.के.पाण्डेय, पृष्ठ 7 ।
  2. उपरिवत्, पृष्ठ 10-11.
  3. उपरिवत्, पृष्ठ 11.
  4. उपरिवत्, पृष्ठ 15-17.
  5. कामता प्रसाद वर्मा, छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला, (मध्य छत्तीसगढ़ के विशेष संदर्भ में,) भाग-1, प्रकाशक-संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व छत्तीसगढ़ 2014, पृष्ठ 170.
  6. मल्हार, 1975-77, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति तथा पुरात्व विभाग सागर विश्वविद्यालय, 1977, प्रो.के.डी.बाजपेयी, डॉ.एस.के.पाण्डेय, फलक-23.
डॉ. कामता प्रसाद वर्मा संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व, रायपुर (छ0ग0)

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