Home / पर्यावरण / बरषा काल मेघ नभ छाए, बीर बहूटी परम सुहाए

बरषा काल मेघ नभ छाए, बीर बहूटी परम सुहाए

मानस में भगवान श्री राम, लक्ष्मण जी से कहते हैं – बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए। ग्रीष्म ॠतु की भयंकर तपन के पश्चात बरसात देवताओं से लेकर मनुष्य एवं चराचर जगत को सुहानी लगती है। वर्षा की पहली फ़ुहार के साथ प्रकृति अंगड़ाई लेती है और धरती के जीवों की आंखें खुल जाती है कि अब धरती से बाहर निकल कर खुले वातावरण में रमण करने का मौसम आ गया।

धास फ़ूस के बीजों में चेतनता आ जाती है, उनमें प्राण समाने लगता है और किसान भी कांधे पर अपना हल लेकर खेतों की ओर निकल पड़ता है। किसान को भी वर्षाकाल आने की आगामी सूचना पहली बारिश के साथ बतरकीरा (एक प्रकार की पंखवाली दीमक) देता है। प्रकृति का यह एक सूचना तंत्र है जो विभिन्न ॠतुओं की जानकारी देता है। इसको समझने एवं इनसे जुड़े लाभ जानने में इस मानव को अनगिन पीढियों का सफ़र तय करना पड़ा।

वर्षाकाल में बहुत सारे कीड़े-मकोड़े धरती के गर्भ से बाहर आते हैं और अपना ॠतु चक्र पूरा करते हैं, पर इनमें एक खास कीड़ा भी है, जब प्रकृति धानी चूनर ओढ़ लेती है और चारों तरफ़ हरियाली दिखाई देने लगती है तब वह धरती से बाहर निकलता है, जैसे प्रकृति के द्वारा स्वागत की प्रतीक्षा हो।

यह विशिष्ट कीड़ा है रानी कीड़ा। छत्तीसगढ़ अंचल में इस मखमली मकड़ी को रानी कीड़ा के नाम से ही जानते हैं। नाजुक सा यह मखमली लाल रंग का कीड़ा अनायास ही हर व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है। मोबाईल युग आने से पहले शायद ही ऐसा कोई अभागा बच्चा होगा जिसने इसे अपनी हथेली पर रखकर सहलाया नहीं होगा।

यह इतना शर्मीला होता है कि हाथ में लेते ही छुई मुई की तरह अपने पैर सिकोड़ लेता है। इसे राजस्थान, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश में तीज कहते हैं तो राजस्थान के मारवाड़ अंचल में सावण की डोकरी भी कहते हैं अर्थात इसके दिखाई देने के बाद माना जाता है कि सावन की तीज आ गई और झूले डालकर पींगे मारने का मौसम आ गया। इसे प्रकृति ने इतना खूबसूरत बनाया है कि सहज ही आकर्षण का केन्द्र बन जाता है।

कई प्रदेशों में इसे बीर बहूटी कहा जाता है, बीर बहूटी कहलाने के पीछे के कथा की खोज में हूँ। इसे इन्द्रवधू, बीरबहूटी, इन्द्रगोप, अग्निक, शक्रगोप, त्रिदशगोप, चंद्रवधू, धूम्राक्ष, वर्षाभू, वज्रगोप, रक्त-वर्ण, ताम्रकिलि, ताम्रकृमि, गोकल गाय आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका बोटैनिकल नाम ट्राँम्बिडियम है।

हिन्दी साहित्यकारों के अलावा यह अन्य भाषाओं के साहित्यकारों के लिए आकर्षण का केन्द्र भी रही है यह मकड़ी, धर्मवीर भारती अपने काव्य बोआई के गीत में कहते हैं –

गोरी-गोरी सौंधी धरती-कारे-कारे बीज
बदरा पानी दे!

क्यारी-क्यारी गूंज उठा संगीत 
बोने वालो! नई फसल में बोओगे क्या चीज ?
बदरा पानी दे!

मैं बोऊंगा बीर बहूटी, इन्द्रधनुष सतरंग 
नये सितारे, नयी पीढियाँ, नये धान का रंग
बदरा पानी दे!  

कवि जायसी अपने बारहमासी काव्य के श्रावण मास नागमती विरह में बीर बहूटी का जिक्र करना नहीं भूलते –

सावन बरस मेह अति पानी। भरनि परी ,हौं विरह झुरानी।।

लाग पुनरबसु पीउ न देखा। भइ बाउरि ,कहँ कंत सरेखा।।

रक्त कै आँसु परहिं भुइँ टूटी। रेंगि चली जस बीरबहूटी।।

सखिन्ह रचा पिउ संग हिंडोला। हरियर भूमि कुसुम्भी चोला।।

कवि अयोध्या सिंह “हरिऔध” वैदेही वनवास एकादश सर्ग में ॠतु वर्णन करते हुए बीर बहूटी का जिक्र करते हैं –

पाकर पयोद से जीवन।
तप के तापों से छूटी॥
अनुराग-मूर्ति ‘बन’, महि में।
विलसित थी बीर बहूटी॥

पाकिस्तानी शायर एवं नज्मकार जीशान साहिल अपने रेख्ता में कहते हैं –

अगर कभी बे-ध्यानी के आलम में

हम नीचे शहर में गिरे भी

तो हमारी जेबों से

छोटे छोटे सितारों बेर बहूटियों

और बारिश के क़तरों के सिवा

कुछ बरामद न होगा

नेताजी का तुलादान नामक काव्य में गोपाल व्यास बंगवासिनो को बीर बहूटी की संज्ञा देते हैं –

वे बंगवासिनी, वीर-बहूटी, फूली नहीं समाती थीं।

आंचल गर्दन में डाल, इष्ट के सम्मुख शीश झुकाती थी॥

बीर बहूटी अमीर खुसरों की पहेलियों का विषय भी बन जाती है –

एक नार करतार बनाई

ना वह क्वांरी न वह ब्याही

सूहा रंग ही वाको रहेभावी,

भाबी हर कोई कहे…

बीर बहूटी का प्रयोग युनानी औषधियों में बाजीकरण ( शक्ति वर्धक) के रुप में होता है। आषाढ़ सावन में इसे पकड़ कर सूखा लिया जाता है फ़िर गुलकंद बनाकर या तेल में पकाकर औषधि के रुप में प्रयोग होगा। कहते हैं लकवे में इसका बहुतायत में उपयोग होता है। लकवे से प्रभावित अंगों पर इसके तेल की मालिश में लकवे का काफ़ी कुछ असर कम हो जाता है।

इस खूबसूरत मकड़ी ने अपने रंग रुप से मानव को हर काल में प्रभावित किया है। बचपन में हर बच्चा इससे खेलता है और सहेजकर माचिस की डिबिया में भर लेते है। परन्तु वर्तमान में इसका शहरी क्षेत्र से लोप ही हो गया है तथा ग्रामीण क्षेत्र में भी वहीं दिखाई देती है जहाँ कीटनाशक का प्रयोग कम हुआ है। इसका अस्तित्व ही खतरे में दिखाई देता है। फ़िर भी बरसात में नदी-नालों के किनारे रेत पर बीर बहूटी दिखाई दे ही जाती हैं।

आलेख

ललित शर्मा इंडोलॉजिस्ट

About hukum

Check Also

शक्ति का उपासना स्थल खल्लारी माता

छत्तीसगढ़ अंचल की शाक्त परम्परा में शक्ति के कई रुप हैं, रजवाड़ों एवं गाँवों में …

3 comments

  1. बहुत सुन्दर जानकारी

  2. बीर बहूटी का कोई रंग न अनछुआ रहा आपके लेख में. बरसों बीते इसे देखे। आपके लेख ने यादों का पिटारा खोल दिया।

  3. Gyanendra Pandey

    वाह! रानी कीड़ा या बीर बहूटी के संबंध में इतने विस्तार से पहली बार पढ़ा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *