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स्वास्थ्य के लिए महाऔषधि है योग : विश्व योग दिवस

मानव जीवन का प्रमुख लक्ष्य समस्त दुखों, क्लेशों, वासनाओं और अतृप्ति से मुक्त होकर सच्चे सुख-शांति और आनंद को प्राप्त करना है। वैसे तो इस उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए समस्त विवेकवान मनुष्य अपनी रुचि, बुद्धि व क्षमता के अनुसार विभिन्न साधनों का सहारा लेते हैं। ऋषि-मुनियों ने नियमित विभिन्न प्रकार की उपासनाओं जप, तप, भक्ति तथा अनेक कर्मकांडों का विधान पात्र भेद अनुसार किया है। तथापि यह सभी विधान आत्मोत्कर्ष हेतु निचले सोपान माने गए हैं।

इन साधनों से व्यक्ति लौकिक जीवन में सुख और सफलताएं अर्जित कर सकता है और मरणोपरांत स्वर्गीय भोग भी प्राप्त कर सकता है। किंतु प्रज्ञा की प्राप्ति करके आत्मा के अंतिम लक्ष्य कैवल्य के दिव्य आनंद के निमित्त उपर्युक्त साधनों के उपेक्षा कहीं उच्च साधनों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे ही अनेक साधनों में योग अति महत्वपूर्ण साधन है । हालांकि इसके लिए अनेक साधन हैं। परंतु इनमें योग दर्शन पूर्णरूपेण व्यावहारिक एवं क्रियात्मक है।

प्रत्येक अभ्यासी साधक इसकी सत्यता और प्रमाणिकता का परीक्षण स्वयं कर सकता है । कुछ व्यक्ति योग का प्रमुख स्वरूप उद्योग अर्थात् अभ्यास मानते हैं ।कुछ लोग वियोग अर्थात् वैराग्य समझते हैं, तथा कुछ लोग संयोग समझते हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि सभी का सम्मिलित स्वरूप ही योग है इनमें से किसी एक को भी छोड़ने से उद्देश्य की पूर्ति हो सकना संभव नहीं है।

योग की व्युत्पत्ति ‘युजिर् योगे’ तथा ‘युज समाधौ’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय लगकर हुई है जिसका तात्पर्य ‘समाधि अवस्था की प्राप्ति’ के लिए प्रक्रिया प्रस्तुत करना है. जब हम योग की व्युत्पत्तिपरक अर्थ पर गहनता पूर्वक विचार करते हैं तो इसके मुख्यतः दो अर्थ निकलते हैं। प्रथम जीव और ईश्वर अथवा आत्मा और परमात्मा का मिलन अर्थात् अद्वैत की अनुभूति तथा द्वितीय अभ्यास एवं वैराग्य द्वारा चित्त वृत्तियों को एकाग्र करना जिसका लक्ष्य समाधि की स्थिति में पहुँचना अर्थात् स्व-रूप (अपने वास्तविक रूप ) में प्रतिष्ठित होना है। महर्षि व्यास जी ने योग का अर्थ समाधि ही बताया है। कारण यह है कि इसी अवस्था में पहुँचकर चित्त वृत्तियों का निरोध संभव है और तभी परमात्मा से तादात्म्य की स्थिति बन सकती है। पतंजलि ने भी इसी को बताया है -योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।

सांख्य और योग दोनों ही दर्शन मनुष्य के दुखों के मूल कारणों को खोज कर उनके समाधान देते हैं। सांख्य और योग दर्शन में इन्हीं विषयों पर विचार किया गया है। सांख्य दर्शन की दृष्टि में मनुष्य के दुखों का कारण मनुष्य का प्रकृति से अत्यधिक संलिष्ट रहना है। वह उससे छूटने या अनासक्त भाव से रहने का प्रयत्न ही नहीं करता तथा योग दर्शन की दृष्टि में मनुष्य के दुखों का कारण है कि वह परमात्मा जो पास में ही हृदय में विराजमान हैं, उसे देखने उससे सहयोग करने का प्रयत्न ही नहीं करता। सांख्य और योग में मूलभूत पार्थक्य यही है।

जिन दुखों से व्यक्ति दुखी रहता है, योग दर्शन में उन्हें पंच प्लेस के नाम से जाना जाता है । ये हैं- अवस्था, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। इन्हीं क्लेशों से छूटने के व्यावहारिक उपाय योग दर्शन में वर्णित है। इसलिए योग दर्शन को हम व्यवहारिक दर्शन भी कह सकते हैं क्योंकि इनमें जो तथ्य प्रतिपादित किए गए हैं ,उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति कैसे हो यह भी बतलाया गया है। इसी विशेषता के कारण योग दर्शन को सर्वोत्कृष्ट माना गया है ।

योग की उपर्युक्त विशेषताओं पर ध्यान देते हुए हम कह सकते हैं कि योग एक विज्ञान है। यह हिंदू संस्कृति की सर्वश्रेष्ठ निधि है। सभी दर्शनों का यह अभिमत है कि योग की प्रक्रिया मोक्ष का मुख्य साधन है। हमारे ऋषि-मुनियों के प्रातिभ ज्ञान के उदय में योग ही सर्वाधिक उपयोगी हेतु माना जाता है ।भारतवर्ष में सिद्धांत और व्यवहार की उभय दृष्टियों के द्वारा योग का जो वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है, वह अत्यंत दुर्लभ है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय 5 के पांचवे श्लोक में इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि- एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।

योग समस्त संप्रदायों और मत-मतांतरों के पक्षपात एवं वाद-विवाद से रहित सार्वभौम धर्म है; जो स्वयं अनुभव के द्वारा तत्व का ज्ञान प्राप्त करना सीखलाता है और मनुष्य को उसके अंतिम लक्ष्य तक पहुँचता है। इसीलिए तो जब मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में योग के लिए 1 दिन निर्धारित करने के लिए कहा तो सभी राष्ट्रों ने इस पर अपनी सहमति प्रदान कर दी।

योग शब्द का अर्थ हम सही अर्थों में कहे तो जीवात्मा और परमात्मा के सम्मिलन के उपयुक्त और उत्कृष्ट मार्ग को हम योग कह सकते हैं अथवा यह कहे कि चित्त वृत्तियों को नियंत्रित करके एकाग्र करने के अभ्यास का नाम योग है। ईश्वर जीव के संयोग की विभिन्न पद्धतियां भारतीय शास्त्रों में मिलती हैं। इन्हीं के आधार पर विभिन्न क्रियाओं के नाम के साथ योग शब्द जुड़ गया है। इस प्रकार योग की अनेक अनेक शाखाएँ और पद्धतियाँ बन गई।

ऐसे तो योग की अनेक प्रणालियाँ है। किंतु इनमें से दो ही अधिक प्रसिद्ध हुए हैं। पहला हठयोग और दूसरा राजयोग। यद्यपि अल्प ज्ञानी, योग के विषय में आसन और प्राणायाम जैसे हठयोग के क्रियाओं को ही योग समझते हैं। परंतु योग के अनेक प्रकार हैं इनमें से कुछ नाम बता रहा हूँ। राजयोग, हठयोग, जपयोग, मंत्रयोग, शब्दयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, प्राणयोग, हंसयोग, तंत्रयोग, स्वरयोग, शिवयोग, भृगुयोग ,ध्यानयोग, पाशुपत योग ,समाधियोग, प्रेमयोग, ब्रह्मयोग, अनासक्तियोग, पुरुषोत्तमयोग, तारकयोग, नामकीर्तनयोग, पुरुषयोग, स्पर्शयोग, अस्पर्श योग, भाव योग, अभाव योग, क्रिया योग, बुद्धि योग ,विज्ञान योग, पतिव्रत योग, गृहस्थ योग, स्वप्न योग, सुषुप्ति योग, सांख्य योग, कुंडलिनी योग, इच्छा योग, ज्ञानेंद्रिय योग, कर्मेंद्रिय योग, मानस योग, अहंकार योग, पूर्ण योग, कबीरपंथीयोग, स्वामीनारायण योग, पारसीमत योग, ईसाईमत योग, जैनमत योग, बौद्धमत योग, समर्पण योग इत्यादि । इसके पीछे तर्क यही है कि समस्त संप्रदायों ने अपनी विशिष्ट साधना पद्धतियों को योग नाम से अलंकृत किया है। परंतु गहनता से इन सभी पद्धतियों के तह में जाएं तो विदित होगा कि इन सभी का उद्गम महर्षि पतंजलि का योगसूत्र अर्थात राज योग ही है।

वैसे तो योग शास्त्र के आचार्य और उनके ग्रंथ पृथक-पृथक हैं। परंतु इनमें से कुछ नाम विशेष हैं:- जिनमें पतंजलि ऋषि प्रमुख है उनकी रचना का नाम योगसूत्र हैं। महर्षि व्यास जी ने योगसूत्र को टीकाकर भाष्य लिखा, तो वाचस्पति मिश्र जी ने तत्व वैशारदी नाम से व्यास मुनि जी की भाष्य नामक ग्रंथ की भाषा टीका कर सरलीकृत किया। तो विज्ञानभिक्षु ने व्यास भाष्य पर टीकाकर वार्तिकग्रंथ लिखे। इसके अलावा उन्होंने योगसार संग्रह ग्रंथ भी लिखा।

महर्षि रामानंद जी ने मणिप्रभा नाम की ग्रंथ की रचना की सदा शिवेंद्र सरस्वती का योग सुधाकर भी एक सुंदर ग्रंथ है। जिनकी अध्ययन कर हम लोग को समझ सकते हैं। श्रीमद भगवत गीता में भी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को राजयोग ज्ञान योग कर्मयोग भक्तियोग सांख्य योग ज्ञान कर्म योग सन्यास योग आदि का विस्तार से समझाने का प्रयास किया है परंतु महर्षि पतंजलि की अष्टांग योग ही ज्यादा प्रचलित है।

उन्होंने योग दर्शन के दूसरे अध्याय में ही जो सूत्र लिखा है- “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः”। अर्थात् चित्त वृत्तियों को नियंत्रित कर लेना अथवा रोक लेना ही योग है । यह सूत्र संपूर्ण योग दर्शन का मूल आधार है। यदि चित्त की वृत्तियां एकाग्र न होगी तो मन संसार में चतुर्दिक भटकता ही रहेगा और ईश्वर का दर्शन साक्षात्कार सम्मिलन कुछ न हो सकेगा।

महर्षि पतंजलि के योग का प्रमुख उपदेश है मनुष्य स्थूल भाव से ऊँचा उठ कर सूक्ष्मता की ओर बढ़े अथवा यूं कहें कि वह भौतिकता को कम करके आत्म-तत्व को ग्रहण करने का प्रयत्न करें। मानव के चित्त वृत्तियाँ ही भौतिक जगत के पदार्थों को ग्रहण करने वाली अर्थात् उन्हें लिप्त होने वाली हैं।

यौगिक क्रियाओं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ,धारणा, ध्यान और समाधि इन पर योग के माध्यम से ही नियंत्रण प्राप्त कर सकते हैं। जैसे-जैसे मनुष्य योग के माध्यम से बाहर से अंदर की ओर प्रवेश करता है वह अंतर्मुखी होकर आत्म तत्व को जानता चला जाता है और अंततः समाधि एवं कैवल्य की अवस्था तक पहुँच जाता है।

वर्तमान के कोरोना काल में योग का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है ।योग के माध्यम से ही हम कोरोनावायरस जैसे महामारी पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। जिन साधकों को आठों अंग कठिन प्रतीत होते हैं, वह इन में से किसी एक को लेकर ही लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयत्न कर सकते हैं। इसी के परिणाम स्वरूप लय योग, मंत्र योग, जप योग, ज्ञान योग, हठयोग आदि यौगिक शाखाओं का भी जन्म हुआ और मनुष्यों ने इसके माध्यम से अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की।

योग दर्शन में जिन यम-नियम आदि का वर्णन किया गया है उनकी उपयोगिता मात्र योगियों और साधकों के लिए ही नहीं वरन संपूर्ण मानव समाज के लिए है। सभी अवस्थाओं में उनका पालन मानव मानव में प्रेम भाव -भाईचारा बढ़ाकर विश्व बंधुत्व का भाव विकसित करना है। योग दर्शन के साधन पाद के 21वें सूत्र में सूत्रकार ने इन साधनों का उपयोग देश काल, जाति की सीमा से परे व सभी के लिए कल्याणकारी बताया है।

जातिदेशकालसमयावच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्। इसीलिए तो देश के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में योग के लिए एक दिन निर्धारित करने की इच्छा प्रकट की थी। जिसमें उन्होंने कहा कि हमें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की पहल करनी चाहिए। योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह दिमाग और प्रकृति के बीच सामंजस्य है।

विचार संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह बयान के बारे में नहीं है लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवनशैली में यह चेतना बनकर हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आइए एक अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को गोद देने की दिशा में काम करते हैं ।

जिसके बाद 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया और पृथ्वी पर पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है यह दिन वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है और योग भी तो मनुष्य को दीर्घ जीवन ही प्रदान करता है। जिसके बाद 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया। जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।

संसार में दो प्रकार के तत्व हैं एक बाह्य और दूसरा आभ्यंतर, एक जड़ और दूसरा चेतन। आभ्यंतर तत्व चित्त है। चित्त अर्थात बुद्धि, इसी की विविध स्वरूपों का योग शास्त्र में विचार है। चित्त की पांच अवस्थाएँ होती हैं। जिन्हें चित्त की भूमि कहा जाता है। क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र तथा निरुद्ध। योग के माध्यम से हम रजोगुण, तमोगुण और सद्गुणों को नियंत्रित कर पाते हैं। योग के प्रभाव से मन शुद्ध और पवित्र बनता है। हम योग के माध्यम से वसुधैव कुटुंबकम की भावना को बलवान बना सकते हैं। योग से जहाँ शरीर शुद्ध होता है ,ताकतवर होता है वही योग के प्रभाव से हम सकारात्मक प्रभाव की ओर बढ़ते जाते हैं।

योग दर्शन प्रायः 4 भागों में विभक्त है। इन भागों को पाद की संज्ञा दी गई है। यह हैं क्रमशः समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद। प्रथम पाद में 51, द्वितीय में 55, तृतीय में 55, और चतुर्थ में चौतीस सूत्र हैं। इस प्रकार चारों पादों में कुल 195 सूत्र हैं। तो आइए विश्व योग दिवस के उपलक्ष में हम अपने तन- मन को स्वस्थ बनाएं। योग करें और जीवन को निरोग रखने के लिए योग अपनाएं।

आलेख

हरिसिंह क्षत्री
मार्गदर्शक – जिला पुरातत्व संग्रहालय कोरबा, छत्तीसगढ़ मो. नं.-9407920525, 9827189845

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