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दक्षिण कोसल के यायावर व्याध : सरगुजा एक अध्ययन

छत्तीसगढ़ प्रदेश प्राकृतिक सुषमा से आच्छादित प्रदेश है, यहाँ के कुल क्षेत्रफ़ल का 43.85% वन हैं, जो सरगुजा से बस्तर तक फ़ैला हुआ है एवं इन वनों भिन्न-भिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियों में माड़िया, मुरिया, दोरला, उरांव, कंवर, बिंझवार, बैगा, भतरा, कमार, हल्बा, सवरा, नागेशिया, मंझवार, पारधी, खरिया और धनवार जनजाति बड़ी संख्या में है। छत्तीसगढ़ राज्य में 5 विशेष पिछड़ी जनजातियां बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर तथा अबूझमाड़ियां हैं तथा पंडो एवं भुंजिया को विशेष पिछड़ी जनजाति माना जाता है।

छत्तीसगढ़ को प्राचीन दक्षिण कोसल माना जाता है, जो कि कभी कोसल जनपद का एक हिस्सा था, उसके पश्चात जनपद विभक्त होने पर कोसल से पृथक होकर एक भू भाग दक्षिण कोसल कहलाया। यहाँ जनजाति समाज बस्तर से लेकर सरगुजा तक 54% के लगभग होगा। इस जनजातीय समाज में कई जातियाँ एवं उपजातियाँ है। जिनके भिन्न संस्कार, भिन्न बोली भाषा, भिन्न संस्कृति है। इनमें से लगभग जनजातीयों के अपने गांव और टोले हैं परन्तु कुछ जनजाति ऐसी भी है जो घुमंतू ही रही है।

हम सरगुजा के विषय में जानते हैं तो यह संभाग झारखंड, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश की सीमा के सम्पर्क में है। इसलिए यहाँ हमें विविध संस्कृति के दर्शन होते हैं। यहाँ कोरवा, पंडो, गोंड़, कंवर, नागेशिया, मझवार, बिंझवार, बरगाह, कोड़कू, रजवार सहित कुछ स्थानों पर शिकारी जाति के लोग भी निवास करते हैं जिन्हें यहाँ ब्याधा कहा जाता है। पहले ये लोग घुमंतू थे परन्तु अब गांव में टोला बसा कर रहने लगे। मेरी जिज्ञासा इस शिकारी जाति की संस्कृति एवं खान पान को लेकर है।

घुमंतू होने के कारण मेरा कई स्थानों पर शिकारी (व्याध/पारधी) आदि जाति के लोगों से सम्पर्क हुआ, परन्तु मैं विशेषकर सरगुजा जिले के लखनपुर जनपद के ग्राम बेलदगी के शिकारियों का जिक्र करना चाहूंगा। क्योंकि मैंने इनके साथ कई दिन बिताए और इनके विषय में जानने का प्रयास किया। इसका एक विशेष कारण यह भी था कि मैं पक्षियों एवं उनके स्वभाव तथा रहवास के विषय में जानना चाहता था, जिसकी जानकारी इनके पास पीढ़ी दर पीढी से है।

सरगुजा आगमन – मुझसे बातचीत के दौरान धमना बाई कहती है कि “बड़े बूढे बताते हैं कि हमारे पुरखे उज्जैन से यहाँ आए थे। उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर कोरगल शिकारी द्वारा निर्मित पैदामी शिकारी देवी नौकोड़ का मंदिर है, मैने उस मंदिर के दर्शन किए हैं। हमारा आगमन उधर से ही हुआ है। वहां कहां से पहुंचे इसका पता नहीं है।

इनके टोले का मुखिया रामप्रताप कहता है कि वह बचपन से अपने कबीले के साथ घुमंतू ही रहा, कहीं भी हम लोग डेरा डाल लेते थे और वहां कुछ दिन रहकर आगे बढ़ जाते थे। तीस बरस पहले हम लोगों का डेरा सरगुजा राजा की लुचकी बाड़ी में था, उसके बाद हमें यहाँ पर जगह मिल गयी तो बस गये, अब इस टोले में 60 घर हैं।

सामाजिक ढांचा – इनके कबीले का एक मुखिया होता है और सब उसकी बात मानते हैं। कबीला लगभग एक ही गोत्र का होता है। इनकी जाति में चौरासिया, सोलंकी, सिसोदिया, पंवार, रखड़ौड़, गंवारे, मालिया आदि सात गोत्र हैं। सभी को कबीले के मुखिया का आदेश मानना  होता है।

जन्म संस्कार– शिकारी जाति की महिला को प्रसव होने पर पांच दिनों तक घर से बाहर आंगन में झाला (कुटिया) बनाकर अलग रखा जाता है। उस महिला का घर में प्रवेश वर्जित होता है। समय-समय पर महिला को पत्तल में भोजन दिया जाता है। छठवें दिन छठी को नाऊ मुडन करता है, घोबी कपड़ा धोता है, अगर वो महिला भूल से भी बरतन भांड़ा या कपड़ा स्पर्श कर दी तो उसे सुइन दाई को दे देते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि ये अन्य जातियों तरह जन्म का सूतक मानते हैं। सोहर गीत नहीं गाते। बारहवें दिन प्रसूति महिला को शुद्धि के पश्चात घर में प्रवेश दिया जाता है।

विवाह संस्कार – किसी भी जाति या जनजाति में विवाह संस्कार प्रमुख होता है। इनमें पृथक गोत्रों ही में विवाह होता है, एक ही गोत्र में विवाह वर्जित है। मामा-बुआ के लड़की-लड़का में विवाह होता है। ब्याहता महिला, मामा ससुर और भसूर (जेठ) के छाया तक पर पैर नहीं धरती, उनसे ससम्मान दूरी बनाकर रखी जाती है। यदि सगोत्र लड़का-लड़की प्रेम विवाह कर ले तो ब्याधा जाति के लोग दंडित करते हैं, उनके सिर के बाल मुंड़वाकर, उन्हें गोबर पानी पिलाया जाता है और समाज से निष्कासित कर दिया जाता है।

वेशभूषा– इनका पहनावा साधारण ही है, पहले सिर पर पंछा की पगड़ी और धोती पहनते थे और महिलाएं सिर्फ़ एक धोती धारण करती थी, पोलखा (ब्लाऊज) नहीं पहनती थी।। वर्तमान में इनके पहनावे में चलन के अनुसार बदलाव आया है और बाजार में उपलब्ध वस्त्रों को धारण करते हैं। इससे पहले ये कोष्टा या गांड़ा के द्वारा निर्मित मोटे कपड़े ही पहनते थे। 

आभुषण – पुरुष व्याधा लोग सोने-चांदी के आभुषण नहीं पहनते थे। ताड़ के पत्ते या छिंद पेड़े के पत्ते (ठोठा) से निर्मित कर, बाजरा के डंठल के मोजी के आभुषण के शक्ल में पहनते थे। महिलाएं चांदी के आभुषण पहनती हैं पर उसे पवित्र मानकर कमर के नीचे धारण नहीं करती। इनकी देवी भी चांदी से निर्मित होती है जिसे रतनपुर के सुनार ही बनाते हैं। ये वहीं से लेकर आते हैं।

देवीदेवता – ब्याधा जाति के लोग भगवान शंकर, माँ दूर्गा, दूल्हा देव, गांव के डील टिहारिन, पितरों के पूजा अनुष्ठान करते हैं। पित्र पूजा में महुआ की शराब अर्पित की जाती है। दूल्हा देव नामक राजा का जिक्र कवर्धा के मड़वा महल के शिलालेख में फ़णीनागवंशियों की वंशावली में मिलता है। कुछ जातियां दूल्हादेव को कुल देवता के रुप में भी मानती हैं।

इनके एक प्रमुख देवता है जिनको बघोरी देवता कहा जाता है, इनकी पूजा तीन साल में अवश्य करते हैं, यह एक बड़ी पूजा होती है, यदि तीन साल में पूजा के लायक धन एकत्रित नहीं हुआ तो आगे बढ़ा दी जाती है पर तीन साल में अनिवार्य रुप से यह पूजा की जाती है। इसमें सफ़ेद बकरे की बलि देवता को चढ़ती है।

बघोरी देवता की पूजा सार्वजनिक रुप से सभी मिलकर करते हैं तथा ये लोग दुर्गा देवी के नवरुपों में से सात रुप को मानते हैं, इसी मान्यता के अनुसार उस दिन सात सफ़ेद बकरों की बलि दी जाती है। इसके साथ ही अनुष्ठान के समय जिस पर सवारी आती है उसे बरुआ कहते हैं, यह लाल चुनरी धारण करता है तथा धार्मिक अनुष्ठान को सम्पन्न करता कराता है।

अनुष्ठान के लिए एक भट्टी बनाई जाती है, उसमें बड़ी कड़ाही चढ़ाई जाती है तथा इसे घी से भरा जाता है इसके बाद घी गर्म होने पर बरुआ इस कड़ाही से बिना किसी चम्मच या झारा के पूरियां तलकर निकालता है। सवारी आने पर कड़ाही का खौलता हुआ घी अपने सिर पर डाल लेता है, इस पर शरीर में कहीं फ़फ़ोले नहीं पड़ते।

बकरे का मांस भी घी में ही पकाया जाता है, इस पूरी और मांस को ही सभी प्रसाद के रुप में ग्रहण करते हैं। मुखिया राम प्रताप कहता है कि वे तीन साल में सिर्फ़ एक ही दिन चिकना खाते हैं घी के रुप में। उसके बाद अगले तीन साल में ही पूजा के दौरान खाते हैं। उनके यहां घर में फ़िर कभी घी या तेल का प्रयोग भोजन में नहीं किया जाता। सब्जी भी पानी में छौंक दी जाती है।

जीविकोपार्जन के लिए व्यवसाय – जीविकोपार्जन के लिए ब्याधा जनजाति के लोग शिकार करते हैं। वर्तमान में शिकार पर प्रतिबंध होने के बाद भी ये तीतर, बटेर, घाघर, खरगोश, सियार, लोमड़ी आदि का चोरी छुपे शिकार कर लेते हैं। पुरुष लोग सुबह से फ़ंदे लेकर शिकार खेलने निकल जाते हैं और स्त्रियाँ माला-मुंदरी के साथ जड़ी बूटी बेचने का काम करती हैं। भंवरी फ़ल एवं रीठा की दो तरह की माला बेचते है। भंवरी फ़ल की माला पहनने से चक्कर आने की बीमारी खत्म हो जाती है तथा रीठा की माला बच्चों को टोना-टोटका एवं नजर से बचाने के लिए पहनाते हैं। इसके साथ ही बूढी महिलाएं भीख मांगने का काम भी करती हैं। इसके साथ ही ये छिंद वृक्ष के पत्तों की झाड़ू एवं चटाई बनाने का काम भी करते हैं।

शिकार करने के लिए ये दो तरह के फ़ंदों का प्रयोग करते हैं, शिवकुमार कहता है “हमारा खानदानी काम फ़ांदा खेलकर शिकार करना एवं जड़ी बूटी बेचना है। पुरुष जड़ी-बूटी बेचने  एवं फ़ांदा खेलने जाते हैं तथा महिलाएँ भीख मांगने के लिए।” इस तरह इनकी गृहस्थी चलती है। प्रत्येक घर में चिड़िया आदि पकड़ने के लिए फ़ांदे हैं।

कहने पर शिवकुमार फ़ांदे मंगवाता है “फ़ांदा दो तरह का होता है। पहला मंगरी एवं दूसरा खंदेरु। मंगरी फ़ांदा बांस की खपच्चियों को अंडाकार शक्ल देकर उसमें जाल एवं दरवाजा लगा कर बनाया जाता है तथा खंदेरु फ़ांदा भी बांस का ही बनता है, यह जिग-जैग शक्ल आयताकार होता है, इसे लम्बाई में फ़ैला कर चिड़िया फ़ंसाई जाती है।अब चिड़िया पकड़ना भी जुर्म हो गया है। इसलिए हमारा यह परम्परागत धंधा भी ख़त्म हो गया. खाने के लाले पड़े रहते हैं।

बोलीभाषा – ये राजस्थानी और गुजराती की मिली जुली आगरी नायक भाषा का प्रयोग करते हैं। नायक शब्द का जिक्र आने से मुझे लगता है कि ये लोग नायक बंजारों के कबीले के भी हो सकते हैं। दक्षिण कोसल में नायक बंजारे व्यापार करने के लिए अपने लश्कर के साथ आते थे। इनके द्वारा खुदवाए हुए तालाब यहाँ कई स्थानों पर मिलते हैं। विशेषकर नायक बंजारे अपने व्यापार के साथ यहाँ अपने कारवां के लिए जल की व्यवस्था के लिए भी जाने जाते हैं। कई स्थानों पर नायक बांधा, नायकगाँव आदि गांवों का जिक्र मिलता है।

शिक्षा– शिक्षा स्तर इनमें निम्नतर है, पूरे कबीले के सिर्फ़ चार बच्चे ही स्कूल में पढ़ने के लिए जाते हैं। सरकार के द्वारा सारी सुविधा मिलने पर भी शिक्षा इनके द्वार नहीं पहुंच पाई है। इसका सबसे बड़ा कारण इनका घुमंतू होना है। घुमंतु होने के कारण इनके कबीले में कोई भी पढ़ा लिखा नहीं है, परन्तु ये अपने परम्परागत कार्य माहिर हैं, इन्हें पक्षियों एवं जानवरों की अच्छी जानकारी है।

त्यौहार – इनका विशेष त्यौहार तीन साल में मनने वाले बघोरी देवता की पूजा ही है। इसके बाद ये अन्य समाजों की तरह प्रचलित त्यौहार मनाते हैं, जो कि दीवाली, होली, करमा, छेरता आदि होता है। त्यौहारों पर ये अपनी शक्ति के अनुसार खर्च करते हैं। अन्य कोई विशेष त्यौहार मनाने की जानकारी यहां से प्राप्त नहीं होती।

मृतक संस्कार – कबीले के किसी भी व्यक्ति मृत्यु होने पर ये उसे दफ़नाते हैं, दाह संस्कार नहीं करते। कबीले एवं रिश्तेदारों का खानपान करते हैं, जिसे यहां चंदनपान कहा जाता है, पगड़ी रस्म भी होती है और चंदनपान दसवें दिन शुद्धि (दशगात्र) करने के बाद किया जाता है, जिसमें इनका समाज एवं रिश्तेदार सम्मिलित होते हैं।

ब्रितानी हुकूमत के दौरान बहुत सारी ऐसी लड़ाकू जनजातियाँ थीं जिन्हें क्रिमिनल ट्राइब्स यानी आपराधिक जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया था. अंग्रेजी हुकूमत ने वर्ष 1871 में एक नए कानून ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ को लागू किया. इस कानून के दायरे में लगभग 500 जनजातियों को लाया गया.

भारत आजाद हुआ और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की पहल पर 1952 में इन जनजातियों को विमुक्त कर दिया गया. मगर इसके बावजूद आज भी इन जनजातियों को अपने माथे का कलंक ढोना पढ़ रहा है। आज यह आपराधिक जनजाति तो नहीं कहलातीं है मगर आज इन्हें विमुक्त जनजाति के नाम से जाना जाता है।

छत्तीसगढ़ के कई जिलों में इन्हें जनजाति का दर्जा मिला है तथा कई जिलों में इनकी गिनती सामान्य में होती है। इसके कारण एक ही जाति के होने के बाद भी इन्हें समान रुप से आरक्षण एवं योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जनजाति की सूची में अनुमांक 36 पर शामिल पारधी, बहेलिया, बहेल्लिया, चिता पारधी, लंगोली पारधी, शिकारी, टाकनकार, टाकिया जाति के साथ अंकित क्षेत्रीय बंधन को समाप्त करते हुए इस जाति को सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति को मान्य करने का प्रस्ताव है।

आलेख एवं छायाचित्र

ललित शर्मा इंडोलॉजिस्ट

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4 comments

  1. ज्ञानेद्र पाडेय

    दक्षिण कोसल के यायावर व्याध: एक पठनीय एवं संग्रहणीय लेख। विशेषकर शोध छात्रों के लिए। छतीसगढ़ में इनके विस्तार के क्रम पर भी
    सामग्री उबलब्ध कराएं।

  2. ज्ञानेद्र पाडेय

    दक्षिण कोसल के यायावर व्याध: एक पठनीय एवं संग्रहणीय लेख। विशेषकर शोध छात्रों के लिए। छतीसगढ़ में इनके विस्तार के क्रम पर भी
    सामग्री उबलब्ध कराएं।
    आभार एवं प्रणाम

  3. ज्ञानेद्र पाडेय

    पठनीय एवं संग्रहणीय लेख। विशेषकर शोध छात्रों के लिए। छतीसगढ़ में इनके विस्तार के क्रम पर भी
    सामग्री उबलब्ध कराएं।
    आभार एवं प्रणाम

  4. गजब! जानदार पोस्ट. मेरे लिए जानकारी से सराबोर. घूमने टहलने का घुटनों में जोर कम है नहीं तो आपके साथ समय व्यतीत करता!

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