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इतिहास का साक्षी बाम्हनसरा का वट वृक्ष एवं बस्तरहीन देवी

छत्तीसगढ़ स्थित महासमुन्द जिले के अंतिम छोर उड़ीसा सीमा पर राष्ट्रीय राज मार्ग 353 से लगा जनजातीय बाहुल्य ग्राम बाम्हनसरा विकास खण्ड बागबाहरा है। इसके प्राचीन वट वृक्ष ने सैकड़ो वर्षो के इतिहास को संजो रखा है। यह विशाल वट वृक्ष उत्तरी अक्षांश 20°58’21” पूर्वी देशांश 82°29′ 54”पर राष्ट्रीय राजमार्ग 353 से एक किमी दूर मनिहार नाले के उच्च सम भूमि पर स्थित है। इस वट वृक्ष के विस्तार से अनुमान लगता है कि यह इस क्षेत्र की राजनैतिक, सामरिक, व्यापारिक, सामाजिक स्थिति का मूक साक्षी है।

बाम्हनसरा ग्राम जैसा की नाम से ही विदित है कि यह ब्राह्मणों से सम्बंधित है, साथ ही सरा शब्द, अंश या बांटा को ध्वनित करता है। गुप्त कालीन व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मणों को भूमिदान दिया जाता था। जो उनके सेवाओ या सामाजिक योगदान के लिए राज्य की ओर से दिया गया भू-भाग होता था किन्तु यहाँ सरा का तात्पर्य ब्राह्मण दक्षिणा के बाद भुयशी दक्षिणा से प्राप्त ग्राम ब्राह्मणसरा नामकरण ज्यादा उचित प्रतीत होता है। वर्तमान में यहाँ जनजातियों के अलावा ब्राह्मणों का एक कुनबा निवासित है।

इस वट वृक्ष के समीपस्थ प्रवाहित मनिहार नाले के तट पर उपजाऊ मिट्टी में फलदार वृक्ष, कन्द मूल प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होने थे, लाल कांदा की खेती चिगरिया, बाम्हनसरा, मनकी, देवरी, ख़ुर्शीपार, कुसमी में होती थी। नाला में डभर्रा डबरा, चील दहरा व भगवानडेरा मिलते हैं। इस वट वृक्ष की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए हमें कुछ तथ्यों पर ध्यान देना आवश्यक है।

बागबाहरा के चार बड़े आबादी वाले ग्रामो में देवरी को कांदा देवरी के नाम से जाना जाता है। इसके तट पर गौण खनिज का भंडार है यहां प्राप्त साफ़्ट स्टोन से पर्याप्त रॉयल्टी मिलती है। यहां का जलस्तर ऊपर ही है इसलिए घर-घर में जल की पर्याप्त आपूर्ति हो जाती है। वर्तमान में नल–जल व्यवस्था से प्राचीन जल स्रोत एवं दोहन के तरीके बदल गए हैं।

जल संरक्षण के लिए यहां की भौगोलिक बनावट महत्वपूर्ण है। सम्भवतः इन्ही विशेषताओं के कारण इस ग्राम को राजकीय ग्राम घोषित किया गया होगा। वट वृक्ष के उत्तर पूर्व में टेराकोटा के अवशेष प्राप्त होते हैं, जो प्राचीन बसाहट के संकेत है। इस वट वृक्ष पर बस्तरहिन माता की स्थापना है।

बस्तरहिन माता की स्थापना के सम्बंध में ग्राम बैगा की जानकारी अनुसार इस देवी की पूजा करते हुए वर्तमान में उनकी सातवीं पीढ़ी है, परम्परा अनुसार यहां के पूर्व शासक सुअरमार जमीदार के वंशज दशहरा पूजा के एक दिन पूर्व आकर यहाँ प्रथम पूजा करते हैं ततपश्चात सुअरमार राज के शेष देवी देवताओं की पूजा प्रारम्भ होती है। अर्थात इस रजवाड़े के लिए प्रथम पूजनीय बस्तरहीन देवी हैं।

रजवाड़ा खत्म होने के बाद भी राज परिवार के सदस्य लगभग एक एकड़ के क्षेत्र में फैले वट वृक्ष के नीचे स्थापित बस्तरहिन दाई के साथ एक लोहे की जंजीर की भी पूजा करते है। राज परिवार के सदस्य ठाकुर थियेन्द्र प्रताप सिंह ने जानकारी दी कि उनके पूर्वज डूंडी कोहंगी शाह 1660 के समय से यह पूजा परम्परा चली आ रही है।

ठाकुर थियेन्द्र प्रताप सिंह 10 वीं पीढ़ी में इस परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। बाम्हनसरा हमेशा से कर मुक्त गांव (माफ़ी गाँव) रहा है। परम्परानुसार इस स्थान पर स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है। यहाँ के प्रसाद को वहीं पर खाया जाता है, यह नियम पालन नही करने वाले को दैवीय दुख, कष्ट आदि उठाना पड़ता है, ऐसी मान्यता है।

ऐतिहासिक तथ्यों से पता चलता है कि डूंडी कोहंगी शाह लगभग 1660 के आस-पास सुअरमारगढ़ के शासक बने। वर्तमान शासकों की यह शाखा चंद्रपुर होते हुए कवर्धा, पंडरिया, फुलझर से सुअरमार आई । इनका राजनैतिक, पारिवारिक या वैवाहिक सम्बन्ध बस्तर से नही हुआ। इससे ज्ञात होता है कि बस्तरहीन दाई सूर्यवंशी सुअरमार जमीदार के आने से पूर्व में ही यहाँ स्थापित एवं पूजित थी। इन्होंने बस्तरहिन की स्थापना नही की किन्तु पूजा सतत जारी है।

इस परिवार द्वारा सदियों से पूजा की परम्परा बनाए रखने के पीछे, सामाजिक, धार्मिक एवं लोक मान्यता तथा परम्परा को आगे बढ़ाने की मंशा रही होगी। जो शासक की शक्ति को प्रभावित करती रही होगी। लोहे की जंजीर की पूजा और स्त्रियों का प्रवेश वर्जित होने के पीछे तर्क यह है कि पुरुष प्रधान समाज के वर्चस्व के साथ लोहे की जंजीर की पूजा किसी प्राचीन मान्यता या दैवीय शक्ति से जुड़ी होगी।

आज भी गांव से 200 मीटर की दूरी पर होने के बावजूद लोग वटवृक्ष की सघनता देखते हुए आने से भय खाते हैं। इनके पूर्व शासक शरभपुरीय एवं पांडुवंशीय शासकों की शासन व्यवस्था में बस्तर के सम्बंध में ज्यादा जानकारी नही मिलती है। किंतु नल शासकों का जोंक नदी घाटी से गहरा सम्बन्ध रहा है। चूंकि वराहराज के एड़ेंगा से मिले सिक्के, बारसुर स्थित गणेश जी की पाषण प्रतिमा जैसे हूबहू आदमकद प्रतिमा का जोंक नदी के तट पर खेमड़ा स्थित गांव में पाया जाना इस तथ्य को पुष्ट करता है कि बस्तर के शासको का इस क्षेत्र से गहरा सम्बन्ध था।

नल वंश के अंतिम शासक विलासतुंग के 712 ई राजिमलोचन शिलालेख का होना भी इस बात की पुष्टि करता है। किन्तु नल कालीन शासन में बस्तरहीन देवी का स्पष्ट उल्लेख नही मिलता। फिर भी इन तथ्यों से विदित होता है कि अंधकार युग व परवर्ती शासकों के काल मे स्थानीय जनजातियों का प्रभुत्व व्यापक रूप से रहा होगा जिसके चलते बस्तरहीन को कुल देवी के रूप में स्थापित किया गया होगा। संभावना यह भी है कि इस क्षेत्र के शासकों का वैवाहिक संबंध बस्तर के शासकों से रहा होगा, जिसके कारण बस्तरहीन देवी किसी रानी के साथ यहाँ तक पहुंची होंगी।

एक तथ्य यह भी है कि सुअरमार के जमीदार डूंडी कोहंगी शाह ने स्थानीय भयना राजा को परास्त किया। लोक गाथा एवं परगनिया द्वारा मौखिक काव्य रचना में भयना राजा को लोकप्रिय, अतुलित बलशाली बताया गया है। यहां भयना राजा की समाधि भी है जिसकी पूजा होती है। जिससे बस्तर से बलांगीर तक के सम्बन्धो का पता चलता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वटवृक्ष के नीचे स्थापित देवी की स्थापना 13 -14 वीं सदी के आसपास हुई होगी।

वट वृक्ष की तीसरी पीढ़ी होने का संकेत उसके मुख्य तना से ज्ञात होता है जिसे दीमक खा चुकी है। दूसरी पीढ़ी की वायवीय जड़ भी जीर्ण है, जो नाम मात्र के सहारा से खड़ी है, तीसरी पीढ़ी की वायवीय जड़ वटवृक्ष को जीवन व आधार दे रही है, मुख्य वायवीय अनेक जड़े जो अपने शाखा के अपेक्षाकृत बहुत छोटी है, जिसे वर्षो से सम्हालते आ रही है। यह वट वृक्ष लगभग 20 वर्ष पूर्व तकरीबन एक एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था । किंतु उम्र एवं अपने ही बोझ के चलते गिर कर आधा एकड़ में सिमट कर रह गया है।

बाम्हनसरा का वट वृक्ष इतिहास का साक्षी ही नही अपितु जैव पादप विविधता का अनुपम उदाहरण है। यह मिथक है कि वट वृक्ष के नीचे पादप नही पनपते बल्कि इसकी छाया में तकरीबन 100 से अधिक प्रजाति की वनस्पति एवं 100 से अधिक जीव जन्तु आश्रित हैं। घनी झाड़ियों के बीच मुख्य पेड़ तक अकेले पहुंचना सम्भव नही है। यह वट वृक्ष इतना सघन है कि दिन में अंधेरा होता है, इसमें जंगली भालू डेरा डालते है, साथ ही 100 से अधिक मधुमक्खी के छत्तों से भरे पड़ें हैं।

उपरोक्त तथ्यों से स्थापित होता है कि वटवृक्ष लगभग सात सौ वर्ष प्राचीन है, जिसका प्रमाण इसकी जटाओं से निकली शाखाएं देती हैं। मूल तना कबका खत्म हो चुका है और जटाएं ही इसका अस्तित्व बनाए रखी हैं। यह वट वृक्ष उस शासन काल भी मूक साक्षी है, जब बस्तरहीन देवी की स्थापना इसकी छाया में हुई होगी। अगर यह बोलता तो इतिहास की समस्त परतें खोल देता। आज भी यह पुरखों की तरह अपना स्नेह सब लुटा रहा है क्योंकि वटवृक्ष पुरखा ही होता है।

सन्दर्भ सूत्र
1-राजिम डॉ विष्णु ठाकुर
2-दक्षिण कोसल का ऐतिहासिक भूगोल, डॉ एल एस निगम
3-दक्षिण कोसल का सांस्कृतिक इतिहास, जीत मित्र सिंहदेव
4-सुअरमार गढ़ का इतिहास, विजय शर्मा
5-ग्रीन केयर सोसायटी का पत्र
6-समिति में सुरक्षित स्टाप पेपर
7-दैनिक भास्कर 30 अक्टूबर 2012
8-संवाद साधना 22 अगस्त 2011
9-हरिभूमि, पत्रिका, दबंग दुनिया, नवभारत दैनिक समाचार पत्र 8 अगस्त 2017
10-स्थानीय लोगो का साक्षात्कार

विजय कुमार शर्मा (शोधार्थी) कलिंगा विश्वविद्यालय कोटनी, रायपुर (छ ग)

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