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कहै कबीर मैं पूरा पाया भय राम परसाद : संत कबीर

संत परम्परा के अद्भुत संत सद्गुरू कबीर के जन्म के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं, परन्तु एक चर्चा सर्वमान्य कही जाती है कि काशी में लहरतारा- तालाब पर नीरू तथा नीमा नामक जुलाहा दम्पति को एक नवजात शिशु अनाथ रूप में प्राप्त हो गया। इन दोनों ने ही इस बालक का पालन पोषण किया और यही बालक श्रेष्ठ संत कबीरदास के नाम से जग विख्यात हो गया। वे कभी विद्यालय नहीं गए तथा उन्होंने एक सौ बीस वर्ष की कर्मशील एवं यशवन्त आयु पायी। कबीरदास के समय भारत में इस्लाम के आक्रमणकारी सिकन्दर लोदी का आतंक मचा हुआ था।

उत्तर भारत की संत मालिका के अनोखे संत हैं कबीर। संत कबीर अपने आप में अकेले हैं। अब तक हुए संतों में कबीरदास अक्खड़ हैं, किन्तु विनम्र और करुणामय भी हैं। वे अपने विश्वास पर दृढ़ हैं और सच को (जो देखा वैसा) कहने की हिम्मत भी रखते हैं। संत कबीर जातिगत भेदभाव, ढोंग-पाखण्ड, बाह्याचार तथा निरर्थक रूढ़ियों आदि का निर्भयता पूर्वक खण्डन करते हैं, किन्तु ईश्वर की सत्ता पर उन्हें पूरा भरोसा है। वैष्णवजनों के लिए वे वैष्णव-भक्त हैं, सिख पन्थ के लोग उन्हें भगत मानते हैं, अपने अनुयायियों के लिए वे भगवान् स्वरूप हैं। प्रगतिशील लोगों की दृष्टि में वे समाज सुधारक दिखते हैं। वर्ण तथा जातिगत-अहंकार के वे घोर विरोधी हैं। किसी भी प्रकार से प्रताड़ित,शोषित, पीड़ित और उपेक्षित वर्ग की संवेदनाओं के साथ वे अनन्यपक्ष धर के रूप में सदा खड़े दिखते हैं। न्याय-समता-बन्धुत्व भावना के प्रतीक के रूप में संत कबीरदास एक प्रतिष्ठित स्थान पर सर्वमान्य हो गए हैं। भारतीय संत-जगत के साथ ही, आध्यात्मिक तथा समाज-जीवन में भी उन्होंने अपना विशिष्ट और सम्मानजनक स्थान बनाया है। यहाँ से उन्हें कोई हिला या नहीं सकता। ईश्वर प्रदत्त समता के व्यावहारिक पक्ष के लिए वे निरन्तर संघर्षरत संत हैं। उपेक्षा और आलोचनाओं से वे हार नहीं मानते। किन्तु उनके इस सम्पूर्ण सामाजिक संघर्ष का आधार ‘ईश्वर-भक्ति’ ही है।

श्री केदारनाथ द्विवेदी ने कबीर साहेब के सम्पूर्ण जीवन को कुछ पंक्तियों में कहने का प्रयास किया है; वे लिखते हैं “भारतीय इतिहास के मध्ययुग में संत कबीर साहब एक अभूतपूर्व प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व लेकर अवतरित हुए थे। वे युग के सजग प्रहरी थे। अन्धविश्वास, परमुखापेक्षिता एवं संकीर्ण मनोवृत्तियों की पंकिल भूमि से समाज को ऊपर उठाने का प्रयास उन्होंने आजीवन किया था।… उन्होंने जाति व्यवस्था के पाशविक उत्पीड़न के प्रति समाज को सजग बनाया और नाना तर्कजालों से ऊपर उठकर स्वानुभूति पर आधारित एक सहज धर्म की प्रतिष्ठा की। धार्मिक भूलों के परिष्कार के लिए उन्होंने सभी धर्मों (सम्प्रदायों) में व्याप्त जड़ता का विरोध किया। कबीर साहब का यह विरोध भावनात्मक न होकर तर्कमूलक था। धार्मिक आडम्बरों के उन्मूलन के प्रयास में अनेक तर्क-बाण उनके तरकश से निकल पड़े थे। संभवतः आडम्बर प्रधान धर्म के विरोध में ही उन्होंने सहजधर्म को बहुमान दिया था। संत कबीर का सहज धर्म पूजापाठ की अपेक्षा नहीं रखता, वहाँ स्वर्ग का न तो कोई आकर्षण है, न ही नरक का भय। वह आन्तरिक शुचिता पर आधारित है|

संत कबीरदास को समझने के पहले उस समय की ऐतिहासिक जानकारी तथा उनके परिवार तथा जाति की पृष्ठभूमि को समझ लेना अधिक आवश्यक है। नाथमत का अध्ययन करते समय यह बात हमारी जानकारी में आ गई होगी कि जातिच्युत तथा आश्रमभ्रष्ट लोगों की अलग-अलग जातियाँ बनती जा रही थीं। जोगी नामक आश्रमभ्रष्ट लोगों की एक जाति उत्तर से लेकर पूर्वी भारत में व्यापक रूप से फैली हुई थी। ये लोग कपड़ा बुनते थे, सूत कातते थे या गोरखनाथ और भरथरी (भर्तृहरि) के नाम पर भीख मांगकर अपनी आजीविका चलाते थे। ये निराकार के उपासक थे और जातिभेद तथा ब्राह्मण-श्रेष्ठता के प्रति इन्हें कोई सहानुभूति नहीं थी और न अवतारवाद में ही उनकी कोई आस्था थी। आसपास के बृहत्तर हिन्दू समाज के लिए ये निम्न और पिछड़े ही माने जाते थे। मुसलमान लोग इन्हें सभी प्रकार से इस्लाम कबूल कराने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील थे। संत कबीरदास इन्हीं नव मुस्लिम मतान्तरित लोगों में पले और बड़े हुए थे। ऐसा लगता है कि कबीरदास के जन्म के थोड़ा समय पूर्व ही भारत में निम्न कही जाने वाली आश्रमभ्रष्ट जाति में से कुछ लोग दवाब और आकर्षण के चलते इस्लाम में चले गए थे। जुलाहा जाति के लोग भी हिन्दू बुनकर (कोरी) जाति से मुसलमान बने लोग ही थे। लेकिन यह बात स्मरण में रखनी चाहिए कि कबीरदास का पालन-पोषण यद्यपि मुसलमान परिवार में हुआ था, किन्तु उन परिवारों के संस्कार अभी बड़ी मात्रा में हिन्दू ही थे। इसी कारण कबीरदास अपने आपको कोरी (हिन्द) नाम से पुकारते हैं।

हरि को नाँव-अभै-पद दाता कहै कबीरा कोरी

किन्तु सर्वाधिक ध्यान में रखने वाली बात तो यह है कि संत कबीरदास ने अपने आपको जुलाहा कहा, कोरी कहा, राम का भक्त कहा, वैष्णव कहा, लेकिन मुसलमान एक बार भी नहीं कहा। यह बात तो निर्विवाद सत्य है कि कबीरदास का जिस परिवार में पालन हुआ था उसमें गोरखनाथ के योगमत की व्यापक पैठ थी। कबीरदास स्वयं भी इस योगमत के निष्णात विद्वान साधक थे। इसी कारण, वे अवधूत, योग-साधना, कुण्डलिनी जागरण, सहजसमाधि आदि की व्यापक चर्चा अपने साहित्य में करते हैं, किन्तु कबीरदास का सारा ध्यान प्रभु की भक्ति में ही है। एक ओर कबीरदास ने वंचित कह जाने वाले वर्ग को साथ लेकर भेदभाव के विरुद्ध गंभीर गर्जना की, वहीं दूसरा ओर वे भगवद्भक्ति तथा प्रेम की वाणी से अपने लाखों सहजाति बंधुओं का इस्लाम से बचाकर हिन्दुत्व की ओर ले आए। कबीरदास की अपने निगुण ‘राम’ के प्रति अविचल भक्ति तथा उनके ‘ढाई आखर के प्रेम’ ने ऐसी सीडी का निर्माण किया जिसके कारण, लाखों लोग, जो इस्लाम की ओर बढ़ जा रहे थे, हिन्दुत्व की ओर वापस आ गए। कबीरदास ने हिन्दू समाज के अन्दर घर कर गई बुराइयों के विरुद्ध बोलने में कोई संकोच नहीं किया, किन्तु किसी भी प्रकार से हिन्दुत्व को छोड़कर मुसलमान बनने की अनुमति तो कभी किसी को नहीं दी|

संत कबीरदास ने काशी के श्रेष्ठ विद्वान् स्वामी रामानन्द को गुरु रूप में स्वीकार किया था। संत कबीर स्वयं कहते हैं- काशी में हम प्रगट भये हैं रामानन्द चेताये। सद्गुरु के बारे में उन्होंने सैकड़ों साखियाँ तथा पद लिखकर अपने ज्वलन्त श्रद्धाभाव को निःसंकोच भाव से प्रकट किया है। इस बात में भी कोई सन्देह नहीं कि संत कबीरदास को ‘राम-नाम’ का मन्त्र स्वामी रामानन्द से ही मिला था।

कबीर चौरा अमरकंटक

कहते हैं कि मगहर में कबीर साहब के शव को लेकर उनके हिन्दू तथा मुसलमान शिष्यों में झगड़ा खड़ा हो गया। किन्तु जब कपड़ा उठाकर देखा तो वहाँ कुछ पुष्प पड़े थे। हिन्दू तथा मुसलमानों ने इन पुष्पों को आपस में बाँट लिया। भक्तवर हरिराम व्यास (रचनाकाल संवत्- 1620) ने अपने एक पद में कबीर साहब की महानता का सुन्दर वर्णन कर उनकी अलौकिकता को स्पष्ट किया है: कलियुग में कबीर सच्चा भक्त है। कबीर की देह पंचतत्व की नहीं थी और न काल उसके शरीर को समाप्त कर सकता है।’

कलि में साँचौ भक्त कबीर।
पाँच तत्त ते देह न पाई,गस्यौ न काल सरीर।।

जातिगत भेदभाव पर प्रहार: संत कबीरदास ने जन्म से ऊँच-नीच माने जाने वाली परम्परा पर प्रहार किया और इसका उपहास भी उड़ाया। सभी मनुष्यों के जन्म की विधि एक ही है, चाहे वे किसी भी वर्ण के क्यों न हों। मानव शरीर में त्वचा, अस्थि, माँस-मज्जा, मल-मूत्र आदि एक सदृश हैं। एक ही रक्त एवं शरीर के अंग सब एक ही समान हैं। एक ही बूंद से समस्त मानव की सृष्टि की गई है, फिर ब्राह्मण और शूद्र का अन्तर कैसा?

एकै त्वचा हाड़ मल मूत्रा, एक रिधुर एक गूदा।
एक बूंद सों स्रिस्टि रची है, को बाम्हन को सूदा।। (संत कबीरदास और उनका दर्शन पृ 30)

संत कबीरदास का कहना है कि ऊँची जाति वाले अपनी जाति के अहंकार में नष्ट हो गए, क्योंकि उनके रोम-रोम में अहंकार भरा पड़ा था। आत्मज्ञान के बिना, शरीर को ही आत्मा मानने वाले, चारों ही वर्ण चमार हैं :

बड़े गए बड़ा पने रोम रोम हंकार।
सतगुरु को परचै बिना चारिउ बरन चमार॥

संत कबीरदास कहते हैं कि परमात्मा के एक ही प्रकाश से सारी सृष्टि हुई है, इसलिए कौन भला, कौन बुरा है? सभी मानव एक ही हैं.

अला एकै नूर उपनाया, ताकी कैसी निंदा।
ता नूर थै सब जग कीया, कौन भला कौन मंदा॥ (कबीर ग्रंथावली, पद 51, पृ. 81)
अला एकै नूर उपनाया, ताकी कैसी निंदा।
ता नूर थै सब जग कीया, कौन भला कौन मंदा॥ (कबीर ग्रंथावली, पद 51, पृ. 81)
संत कबीर कहते हैं कि सभी प्राणियों का निर्माता एक प्रभु ही है :
ऊँच नीच है मध्ध की बानी। एकै पवन एक है पानी।
एकै मटिया एक कुम्हारा। एक सभन का सिरजनहारा॥
एक चाक सब चित्र बनाई। नाद-बिंद की मध्ध समाई॥
व्यापिक एक सकल की ज्योति । नाम धरे का कहिये भोति ।।
हंस देह तज न्यारा होई। ताकर जाति कहैं धौं कोई
स्याह सफेद कि राता पियरा। अबरन बरन कि ताता सियरा।।
कहिये काहि कहा नहिं माना। दास कबीर सोई पै जाना॥ (संत कबीरदास और उनका दर्शन पृ. 230)
अर्थात् ‘ऊँच-नीच का कथन ही नीचता है क्योंकि संपूर्ण संसार पंचमहाभूतों अर्थात् पवन, जल, मिट्टी इत्यादि से बनता है, उनका स्रष्टा ब्रह्म है। कुंभकार रूपी ब्रह्म ने एक ही चाक पर संपूर्ण संसार का निर्माण किया है। प्राणी, नाद-बिन्दु (रज-वीर्य) के द्वारा शरीर धारण करता है। सभी में एक ही ज्योति समान रूप से व्याप्त है। उनके अलग- अलग नाम रखकर भेद किए है । जब आत्मा इस शरीर से अलग हो जाता है. तब उसकी कौन-सी जाति रह जाती है? आत्मा श्याम है या श्वेत है, लाल है या पीली है. उसका कोई वर्ण क्या ? वह गर्म है या ठण्डा? संत कबीरदास कहते हैं कि किससे कहें कोई मानता नहीं। जो परमात्मा का सेवक है. वही वास्तविक तत्व को जानता है |’

तुम जन्म से बड़े और हम छोटे कैसे हो गए?- अभी तक तो सभी संत तथा भगवद्भक्त कहते थे कि ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं, किन्तु कबीरदास पहले संत हैं जो उच्च कही जानेवाली जातियों से हिम्मत से पूछते हैं- क्यों भाई! तुम जन्म से ही बड़े किस आधार पर हो गए, यह बात हमको तो बताओ! हम छोटे कैसे हो गए? क्यों पाण्डे! यह छूत (अस्पृश्यता)कहाँ से आई? हमको समझाओ तो सही!’ संत कबीर कहते हैं :

ॐकार आदि है मूला ,राजा परजा एकहि सूला।।
हम तुम माँ है एकै लोहू , एकै प्रान जीवन है मोहू॥
एक ही बास रहै दस मासा, सूतग पातग एकै आसा।।
एक ही जननी जन्याँ संसारा। कौन ग्यान थें भये निनारा?

अर्थात् ‘मनुष्य जन्म से ब्राह्मण या शूद्र नहीं हो सकता । चाहे राजा हो या प्रजा, सभी को उत्पन्न करने वाला ॐ अर्थात् ईश्वर है । एक ही रक्त तथा एक ही प्राण सभी में हैं । एक ही स्थान पर दस मास तक जन्म के पूर्व हम सभी रहे थे, एक ही प्रकार से माँ ने हम सभी को जन्म दिया है। इसमें तुमको कौनसा ज्ञान और अधिक प्राप्त हो गया जिससे तुम हमसे अलग हो गए?’ संत कबीरदास कहते हैं कि निर्गुण-संतों की जाति पूछना व्यर्थ हैः

संतन जात न पूछो निरगुनियाँ।
साध ब्राहमन साध छत्तरी, साथै जाती बनियाँ।
साधनमाँ छत्तीस कौम हैं, टेढ़ी तोर पुछनियाँ।
साधै नाऊ साधै धोबी, साथै जाति है बरियाँ।
साधन माँ रैदास संत हैं, सुपच ऋषि सो भंगियाँ।
हिन्दू-तुर्क दुई दीन बने हैं, कछू नहीं पहचनियाँ। (कबीर, पृ. 179)

अर्थात् ‘संत कबीर कहते हैं कि निर्गुण की साधना करने वाले लोगों की जाति-पाँति नहीं पूछते । साधुओं में सभी छत्तीस जातियों के लोग हैं। साधुओं में नाऊ, धोबी आदि जातियों के लोग भी हैं। साधुओं में रैदास संत हैं तथा ‘सुपच’ ऋषि भी साधु ही हैं । साधुओं में हिन्दू भी हैं और तुर्क (मुसलमान) भी हैं कुछ अलग पहचान किसी की वहाँ नहीं है। अर्थात् सभी साधु बराबर हैं। भक्त रैदास तथा सुपच ऋषि की चर्चा कबीरदास करते हैं। ये सुपच ऋषि कौन हैं? ‘यज्ञसागर’, ‘उग्रगीता’ आदि कबीर के ग्रन्थों में बताया गया है कि कलियुग के आरम्भ में जब कबीर साहब इस पृथ्वी पर प्रकट हुए थे तो काशी के सुदर्शन नामक महात्मा ने उनसे दीक्षा ली थी। युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध जीतने के पश्चात् भ्रात-हत्या के पाप से उद्धार पाने के लिए एक बड़ा यज्ञ किया था। योगेश्वर श्री कृष्ण चन्द्र ने इस यज्ञ में एक आकाशीय घंटा बांध दिया था। जब घंटा स्वतः ही सात बार बजेगा तभी पाप छूटेगा, ऐसा संकेत भी कर दिया था। हजारों ब्राह्मण और साधु भोजन कर चुके पर घंटा नहीं बजा, कारण पूछने पर गिरिधर श्रीकृष्ण ने बताया ‘हे राजन! आपने एक महान् आत्मज्ञानी संत सुपच सुदर्शन को एक ओछी जाति का जानकर उनकी उपेक्षा की है। उनको निमन्त्रण तक नहीं दिया । अब तो बिना उनके पधारे यज्ञ की सिद्धि सम्भव नहीं।’ युधिष्ठिर ने महाबलशाली भीम को उन्हें लिवालाने को भेजा । भीम के अहंकार के कारण संत सुदर्शन ने जाना अस्वीकार कर दिया । तब स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर जाकर उन्हें आदरपूर्वक ले आए और भोजन कराया। उनके भोजन करने पर आकाशीय घंटा बजा और तभी यज्ञ पूर्ण माना गया । संत सुपच सुदर्शन महाराज की जय-जयकार से दशों-दिशाएं गूंज उठीं। भगवान् श्री कृष्ण ने गद्गद् स्वर से इन्हीं सुदर्शन ऋषि का यशोगान कियाः

शिवलिंगसहस्राणि शालिग्रामशतानि च।
द्वादश कोटि विप्राणाम् एकः सुदर्शन वैष्णवः॥
इन्हीं सुपच सुदर्शन (सुपच ऋषि) का वर्णन श्रेष्ठ साधु के रूप में कबीर ने किया है।’

पाँड़े बूझि पियहु तुम पानी।
जेहि मटिया के घर मँह बैठे, तामह सिस्टि समानी।
छप्पन कोटि जादौ जहँ भींजे, मुनिजन सहस अठासी।
पैग पैग पैगम्बर गाड़े, सो सब सरि भौ माँटी।
तेहि मिटिया के भाँडे पाँडे, बूझि पियहु तुम पानी॥
मच्छ कच्छ घरियार बियाने, रुधिर-नीर जल भरिया।
नदिया नीर नरक बहि आवै, पसु-मानस सब सरिया।।
हाड़ झरी झरि गूद गरी गरि, दूध कहाँ ते आया।
सो लें पाँड़े जेंवन बैठे, मटियहिं छूत लगाया।
वेद-कितेब छाँड़ि देउ पाँड़े, ई सब मन के भरमा।
कहहिं कबीर सुनहु हो पाँड़े, ई तुम्हरे हैं करमा॥

कबीर चौरा अमरकंटक

अर्थात् ‘क्यों पाण्डेय, तुम जाति पूछकर पानी पीते हो, परन्तु तत्वों के स्वरूपों का विचार क्यों नहीं करते? जिस मिट्टी के घर में तुम बैठे हो, इस मिट्टी में सारी सृष्टि समा गयी है। इसी मिट्टी में करोड़ों यदुवंशी, अठासी हजार मुनिजन मिल गए। कदम-कदम पर पैगम्बर गढ़े हुए हैं। सभी सड़गलकर मिट्टी बन गए, उसी मिट्टी के बर्तन बने हैं । नदियों के जल में, मछली कछुए-घडियाल प्रसव करते हैं तथा उनके रक्त से जल भरा रहता है । गाय का दूध तो अस्थि-मज्जा को स्पर्श करता हुआ आता है फिर भी तुम उसको पीते हो और मिट्टी को अस्पृश्य कहते हो? यह सब बातें छोड़ दो पाण्डे, यह सब तुम्हारे द्वारा फैलाया गया भ्रम है और यह तुम्हारी ही करतूत है।’ संत कबीरदास ने हिन्दू तथा मुसलमान दोनों के कर्मकाण्डीय ढोंग तथा जड़ता का विरोध किया। पंडित तथा मुल्ला-मौलवी दोनों को एक साथ कबीर लताड़ते हैं :

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहार।
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥
काँकर पाथर जोरिकै, मसजिद लई चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय॥ (कबीर समग्र)

सबका सृजनहार एक परमात्मा है – संत कबीर मानते हैं कि एक ही परमात्मा का अंश सब प्राणियों में विराजमान है :

एकै पवन एक ही पानी, एक जोति संसारा।
एक ही खाक घड़े सब भाँडे, एक ही सिरजनहारा॥ (कबीर ग्रंथावली)

दूसरे के दुःख का स्वयं अनुभव करो-कबीर का मानना है कि : धर्मगुरु या पीर तो वह है जो दूसरों के दुःख को अनुभव करता है किन्तु जो दूसरे का दुःख अनुभव नहीं कर सकता वह साधु या पीर कैसे हो सकता है :

कबिरा सोई पीर है जो जाने पर पीर।
जो पर पीर न जानई सो काफिर बेपीर॥ (सन कबीरदास और उनका दर्शन)

भक्तिभाव से सराबोर कबीर- कबीरदास राम के परम भक्त हैं, किन्तु उनके आराध्य दशरथ पुत्र राम नहीं हैं । वे तो घट-घट वासी राम रोम में बसते हैं, वे रोम-रोम में बसते हैं | राम नाम के बिना सब संसार बेकार है । अपनी पत्नी लोई को संकेत करके वे कहते हैं:
कहत कबीर सुनहु रे लोई, रांम नांम बिन और न कोई॥

राम नाम के स्मरण से परमपद (ब्रह्मज्ञान) की प्राप्ति होती है तथा समस्त विघ्न विकार मिट जाते हैं :

राम के नाँव परम पद पाया, छूटै बिघन बिकारा॥
राम का नाम ही संसार में सार है और यही भवसागर से तरने का साधन है :
मुझ को राम नाम के अतिरिक्त और कुछ भी पढ़ने की आवश्यकता नहीं है :
नहिं छाडौं बाबा राम नाम, मोहि और पढ़न सूं कौन काम।

भक्ति विरोधी धार्मिक आचार अधर्म हैं – कबीरदास कहते हैं कि सभी कार्यों का आधार भक्ति होनी चाहिए। भक्ति रहित योग, यज्ञ, व्रत, दान । आदि निरर्थक हैं । सद्गुरु कबीर साहेब के शरीरान्त के लगभग 60-70 वर्ष पश्चात् ही प्रखर वैष्णव भक्तप्रवर नाभादास जी ने अपने भक्तमाल में कबीरदास जी के जीवन के सार स्वरूप केवल छह पंक्तियाँ कहीं और उसी में सब कुछ कह डाला । उन्होंने कहा :

भक्ति विमुख जो धर्म सो ताहि अधरम करि गायो।
जाग जज्ञ व्रत दान भजन बिनु तुच्छ दिखायो।
हिन्दू तुरुक प्रमान रमैनी शब्दी साखी।
पच्छपात नहिं बचन सबहिं के हित की भाखी॥
आरूढ़ दशादै जगत पर मुख देखी नाहिन भनी।
कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट दरसनी॥
अर्थात् ‘जो धर्म, भक्ति-विमुख था उसे उन्होंने अधर्म का रूप कहा।

सदाचार के बिना योग, यज्ञ, व्रत, दानादि सब को निरर्थक बताया। उन्होंने आ और मुसलमानों के लिए सत्य बातें बतायीं तथा रमैनी, सबद और साखियों में अपने सत्योपदेश दिये। उन्होंने किसी का पक्षपात नहीं किया। सबके कल्याण की बातें बतायीं । वे संसार में सदैव तटस्थ और निरपेक्ष रहे। उन्हेंने किसी की मुखदेखी बात एवं चाटुकारिता नहीं की। कबीर ने सत्य कहने में वर्ण, आश्रम एवं पड्दर्शनियों- योगी, जंगम, सेवड़ा, संन्यासी, दरवेश तथा ब्राह्मणों आदि के सम्बन्ध में संकोच नहीं किया।’

कबीर चौरा अमरकंटक मध्यप्रदेश

ईश्वर के सहारे कबीरदास तो वीर साधक हैं । वे भक्ति की साधना में लीन रहते हैं । उन्हें अपनी भक्ति पर भरपूर विश्वास जो है । वीरता तो अखण्ड आत्मविश्वास का सहारा पाकर फलती-फूलती और अपना तेवर दिखलाती है । इस दुर्दम्य आत्मविश्वास के कारण ही तो वे मस्त हैं, फक्कड़ हैं और अक्खड़ भी हैं। कबीरदास की भक्ति उथली नहीं है । भगवद्विश्वास पर आधारित भक्ति ने उनको साहसी बना दिया है। तभी तो वे भक्ति के निमित्त सब कुछ देने को तैयार रहते हैं और कहते भी हैं : ‘भक्ति करना कायरों का काम नहीं है। जो अपना सिर अपने हाथ पर लेकर चलता है वही हरि का नाम लेने की हिम्मत करे।

भगति देहुली राम की, नहिं कायर का काम।
सीस उतारै हाथि करि, सो लेसी हरि नाम॥

अपने इष्टदेव के प्रति अविचलित-आत्मविश्वास से उपजी वीरता ने उनकी वाणी में कैसी असाधारण शक्ति भर दी है? कबीरदास के पास ‘परमाद्भुत-रत्न’ भक्ति ही है। इसमें पूर्ण समर्पण है उनका । कुछ भी तो बचाकर नहीं रखा कबीर ने अपने लिए ! इसी कारण विनत भाव से वे कहाँ तक पहुंच गए ! अपने राम के प्रति उनके आत्मसमर्पण की हद तो देखिए ! कबीरदास राम के कुत्ते के रूप में अपना परिचय देते जरा भी लजाते नहीं । वे कहते हैं :

कबिरा कूता राम का, मुतिया मेरा नाउँ।
गले राम की जेवड़ी, जित बँचै तित जाउँ॥
तातो कर तौ बाहुडौं, दुरि दुरि करै तो जाउँ।
ज्यू हरि राखै त्यूं रहौं, जो देवै सो खायुं

अर्थात् ‘कबीर तो राम का कुत्ता है, मुतिया उसका नाम है । राम ने ही मुतिया के गले में एक रस्सी बाँध दी है । सो वह जिधर खींचता है, मुतिया उधर ही जाता है । जब वह तो-तो करके पुकारता है तो मुतिया भी उसके पास चला जाता है और जब दूर -दूर करता है तब बेचारे मुतिया को भागने के सिवा और चारा ही क्या है? कबीरदास कहते हैं कि भगवान् जैसे रखे वैसे ही रहना श्रेयस्कर है, वह जो दे दे वही खा लेना कर्तव्य है। निरीह सारल्य का यह चरम दृष्टान्त है।’ कबीरदास के रोम-रोम में भक्ति बसी हुई है। संत कबीर ने उसी भक्ति का व्यापक प्रचार किया । भक्ति को सर्वश्रेष्ठ तथा सभी सद्गुणों का आधार माना । कहा जा सकता है कि द्रविड़ देश में उपजी हुई जिस भक्ति को स्वामी रामानन्द उत्तराखण्ड में ले आये थे, उसे संत कबीर ने सप्तद्वीप तथा नवखण्डों में दूर-दूर तक व्याप्त कर दिया :

भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानन्द।
परगट किया कबीर ने, सप्तद्वीप-नवखण्ड।

संत कबीर वेद विरोधी नहीं हैं – वस्तुतः कबीरदास पुस्तकीय ज्ञान के विरोधी नहीं हैं, उनका विरोध तो ऐसे लोगों से है जो वेद आदि पढ़ते हैं, किन्तु | उनको मर्म को नहीं जानते । वेद आदि झूठे नहीं हैं, झूठे तो वे लोग हैं जो धर्मग्रन्थों का नाम लेकर स्वार्थ-सिद्धि में लगे हैं :

वेद कतेब कहौ क्यूँ झूठा, झूठा जोनि बिचारै।

कुछ लोग कबीरदास को निर्गुणी मानते हैं, किन्तु संत कबीर तो निर्गुणसगुण के भी ऊपर हैं, वे कहते हैं :

सर्गुण की सेवा करौ निर्गुण का करु ज्ञान।
निगुर्ण सर्गुण के परे तहैं हमारा ध्यान ||
कबीरदास का ब्रह्म, निराकार और साकार की शब्द व्याख्या से भी ऊपर है :
कोई ध्यावे निराकार को, कोई ध्यावै साकारा।
वह तो इन दोऊ ते न्यारा, जानै जाननहारा।
कबीरदास का मन एक निरंजन परब्रह्म में लग गया और सभी भ्रम दूर हो गए
कहै कबीर भरम सब भागा। एक निरंजन सूँ मन लागा।

संत कबीर आत्मज्ञानी की स्थिति में- धीरे-धीरे कबीरदास अन्तर्मुखी होते चले गए, वही आत्मज्ञानी की स्थिति है, वही व्यक्ति पूर्णब्रह्म का साक्षात्कार करता है :

पूरे की पूरी द्रिष्टि, पूरा करि देखै।

कबीरदास स्वयं अपने अनुभव को कहते हैं कि मुझ को यह परमानन्द की अनुभूति, प्रभु-कृपा अर्थात् राम प्रसाद के रूप में मिली है :

कहै कबीर मैं पूरा पाया भय राम परसादं॥

कबीरदास पूर्णब्रह्म में समा गए अर्थात् ब्रह्म के साथ एकाकार हो गए। इसीलिए संत रैदास कहते हैं कि हम पर भी कृपा हो :

तुमरु तो पूरन ब्रह्म समाये, हम पर होइ दयाला।

संत कबीरदास तो ब्रह्म को ही परमतत्व, परमार्थिक सत्य मानते हैं। उनको संसार में ब्रह्म के अलावा कुछ नहीं दिखता । सभी उसी में से निकले हैं और उसी पूर्ण ब्रह्म में विलीन होंगे । सभी पूर्ण हैं और सभी उस पूर्ण ब्रह्म में विलीन हैं । कबीरदास ने इसी परमसत्य की अनुभूति की, इसका साक्षात्कार किया, उस परब्रह्म में अपने को अनुभव किया। जिसके बाद कोई दुःख नहीं, कोई सुख नहीं। फिर कोई अपूर्णता नहीं, सदैव पूर्णता ही पूर्णता । उसी को ‘बृहदारण्यकोपनिषद्’ में गाया है

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

अपनी मृत्यु के पूर्व मगहर चले गए – कबीरदास, जीवन भर काशी में रहे, किन्तु उन्होंने तीर्थ सम्बन्धी जड़ता का विरोध किया । बाह्याडम्बरों का खण्डन करने वाले कबीरदास को अपने राम पर विश्वास था । लोग कहते हैं कि काशी में मरने से मोक्ष मिलता है और मगहर में मरने वालों को नरक मिलता है, किन्तु कबीरदास को तो अपने राम पर पूरा भरोसा है। कबीरदास कहते हैं कि यदि हम भी काशी में ही मरेंगे तो हमारे राम के सुमिरन का क्या अर्थ रहा? फिर राम को कौन याद करेगा? संत कबीर मृत्यु के पूर्व मगहर जाकर रहने लगे और वहीं प्राण छोड़े । मृत्यु के पूर्व कबीरदास कहते हैं कि मेरे लिए तो जैसी काशी, वैसा ही मगहर है, क्योंकि मेरे हृदय में तो मेरे स्वामी राम सदैव विराजमान हैं:

लोकामति के भोरा रे।
जौ कासी तन तजै कबीरा, तौ रामहिं कहा निहोरा रे॥
कहै कबीर सुनहु रे संतो, भरमि परै जिनि कोई।
जस कासी तस मगहर ऊसर, हिरदै राम सति होई॥ (संत सुधा)

संत कबीर की निर्मल भक्ति को देखकर, हिन्दुओं की तथाकथित सवर्ण जातियों के हजारों लोग, कबीरदास की गालियाँ खाकर भी उन्हीं की शरण में आ गए । कबीरदास के दोहे, सबद तथा साखियाँ आदि इतनी भावपूर्ण थीं कि जनमानस के हृदय में गहराई तक बैठ गयीं। कबीरदास ने सभी वर्गों में अपनी व्यापक पैठ बनाई। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब’ में कबीर के पाँच सौ इकतालीस दोहों को सम्मान प्राप्त हुआ है । अन्याय, अत्याचार, ढोंग, पाखण्ड तथा जातिगत भेदभाव आदि के विरुद्ध संत कबीर लाठी लेकर संघर्ष करते हुए आज भी खड़े दिखते हैं।

कबीरदास ने स्वाभिमान से कपड़ा बुना और उसे बेचकर अपनी गृहस्थी चलाई, किन्तु साथ-साथ भजन भी किया और साधु-संगत भी चलती रही। इस प्रकार श्रम और श्रमजीवी जातियों को, जिन्हें हेय समझा जाता था, कबीर ने उन्हें एक अनोखा सम्मान प्रदान कर दिया । वर्तमान युग में महात्मा गांधी जब चरखा चलाते हुए दिखते हैं तथा श्रम की महत्ता को प्रस्थापित करते है तब सहज ही यह बात ध्यान में आती है कि इस क्रान्ति का सूत्रपात तो छह सौ वर्ष पूर्व कबीर कर चुके थे।

कबीर का विश्वास है कि हिन्दू- मुसलमान में ऐक्य स्थापित करने का आधार भगवद्भक्ति ही हो सकती है । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते “जो लोग हिन्दू-मुस्लिम एकता के व्रत में दीक्षित हैं, वे भी कबीरदास भाना मार्गदर्शक मानते हैं । कबीरदास से अधिक जोरदार शब्दों में इस का प्रतिपादन किसी ने नहीं किया … उन्होंने रोग का ठीक निदान नहीं, इसमें दो मत हो सकते है, पर औषधि निर्वाचन में और अपथ्य- वर्जन के निर्देश में उन्होंने बिल्कुल गलती नहीं की। यह औषधि है भगवदविश्वास। दोनों धर्म समान रूप से भगवान् में विश्वास करते हैं और यदि सचमुच ही आदमी धार्मिक है तो, इस अमोघ औषधि का प्रभाव उस पर पड़ेगा ही।’

कबीरदास विलक्षण हैं, निराले हैं – समाज में उपेक्षित और वंचित लोगों को सद्गुरु कबीरदास एक दबंग वाणी देते हैं । जो सच है और मानवीय है उसे कहने में कोई संकोच नहीं करते । वे स्वभावतः निरपेक्ष समीक्षक हैं तथा जाति, वर्ण, धर्म आदि के आधार पर होने वाले सभी भेदभावों का खण्डन करते हैं। उनमें सत्यवादिता, विनयशीलता और अक्खड़पन का अद्भुत संयोग है। वे वैष्णवभक्त हैं, किन्तु वैष्णवों के पाखण्ड की निन्दा से चूकते नहीं । नाथ परम्परा के अनुसार कुण्डलिनी जागरण से शरीर की परमज्योति के साक्षात्कार का उपदेश तो देते हैं, किन्तु ढोंगी नाथयोगी अवधूतों को फटकारते और लताड़ते भी खूब हैं। भक्ति के नाम पर फैले पाखण्ड का पुरजोर विरोध करते हैं, किन्तु स्वयं को राम का कुत्ता या राम की बहुरिया कहने में जरा भी संकोच नहीं करते । वे मुसलमान के घर में पले और बढ़े हैं। किन्तु, मुसलमानों की मस्जिद, अजान, नमाज और हज-यात्रा का विरोध अवश्य करते हैं और साथ ही मुल्ला मौलवियों को जी भर कर कोसते भी हैं ।

वे परम वैष्णवाचार्य स्वामी रामानन्द के शिष्य हैं, किन्तु हिन्दुओं के सभी ढोंगों का विरोध हिम्मत के साथ करते हैं। वे अपने आप में अनोखे हैं। साधु होते हुए भी वे साधु अर्थात् वैरागी नहीं, बल्कि गृहस्थ हैं। वैष्णव संत के शिष्य होकर भी कर्मकाण्डी वैष्णव नहीं हैं । वे योग पर सुन्दर चर्चा करते हैं, किन्तु योगी नहीं कहाते। भगवान् ने उनको सबसे अलग बनाकर भेजा है, वे निराले हैं, विचित्र हैं, अतुलनीय हैं। व्यर्थाडम्बर, ढोंग, पाखण्ड आदि से त्रस्त समस्त मानव जाति के लिए निर्भीक, मुखरित अधिकारपूर्ण वाणी का नाम कबीर है । वे भक्त हैं, संत हैं, ब्रह्ममय हैं और साथ ही सच्चे समाज सुधारक और उपदेशक भी तो हैं । पिछड़ी कही जाने वाली जातियों के हृदय में उन्होंने स्वाभिमान का भाव भरा, उन्हें भक्ति का मार्ग दिखाया, सम्मानजनक स्थान के साथ ही उन लोगों को साहसभरी वाणी दी, एक सशक्त मंच दिया और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह कि उन्हें इस्लाम में जाने से रोक लिया । आज भी वे उतने ही प्रासंगिक और जीवंत है, जितने छह सौ वर्ष पूर्व थे।

(संदर्भ पुस्तक –भारत की संत परम्परा और सामाजिक समरसता ; लेखक –डॉ कृष्ण गोपाल)

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