Home / इतिहास / जिनकी रगों में दौड़ती थी भारतभक्ति की लहरें : भगिनी निवेदिता

जिनकी रगों में दौड़ती थी भारतभक्ति की लहरें : भगिनी निवेदिता

स्वामी विवेकानन्द ने भगिनी निवेदिता से कहा था कि ‘भविष्य की भारत-संतानों के लिए तुम एकाधार में जननी, सेविका और सखा बन जाओ।’ अपने गुरुदेव के इस निर्देश का उन्होंने अक्षरश: पालन किया था। भारत की लज्जा और गर्व निवेदिता की व्यक्तिगत लज्जा और गर्व बन गये थे।

किसी भी विदेशिनी महिला ने भारत के धर्म, संस्कृति, दु:ख और स्वप्न को निवेदिता की तरह अपना समझकर ग्रहण नहीं किया था। किसी भी विदेशिनी ने भारत के जनसाधारण के प्राणों की आशा-आकांक्षाओं, भारत की अन्तरात्मा के सत्यस्वरूप को इतनी सूक्ष्मता से समझा न था।

दरअसल, भारत के प्रति उनका आत्मनिवेदन इतना आन्तरिक, सर्वांगीण और परिपूर्ण था कि उनको विदेशिनी कहना ही मानो उनका अपमान करना था। उन्होंने कभी ‘भारत की आवश्यकता’, ‘भारतीय नारी’ जैसे शब्दों का उच्चारण नहीं किया, वे कहतीं ‘हमारी आवश्यकता’, ‘हमारी नारी’। भारतवर्ष की बात उठते ही वे भाव-विभोर हो जाया करती। जपमाला लेकर वे भावस्थ हो जप करती ‘भारतवर्ष, भारतवर्ष, भारतवर्ष ! माँ, माँ, माँ !’

भारत के प्रति भगिनी निवेदिता की सेवा का स्मरण करते ही हृदय में भारत भक्ति की विद्युत तरंग दौड़ जाती है। हमारे हृदय में भारत भक्ति की प्रेरणा जगाने वाली भगिनी निवेदिता को शत्-शत् नमन्।

‘‘वास्तव में निवेदिता जगतजननी थीं । हमने शायद ही कभी इतने मातृस्नेह के दर्शन किये होंगे जो अपने परिवार क्षेत्र के बाहर एक सम्पूर्ण देश को आत्मसात कर सकता हो, जिनके मध्य से वे काम करती थीं उनके हित के लिए वह त्याग कर सकती थी यही कारण है कि वे नर में नारायण के दर्शन कर सकीं। – रविन्द्रनाथ ठाकुर

विश्वविजयी देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने १८९७ ई. में कहा था, ‘‘आने वाले पचास वर्षों तक हमें केवल एक ही बात का ध्यान रखना चाहिए और वह है अपनी मातृभूमि। भारत माता ही एकमेव जागृत दैवत् हैं।” भगिनी निवेदिता ने स्वामीजी के इसी संदेश को अपना जीवितकार्य बनाया और जीवन के अंतिम श्वांस तक उसे निभाया।

२८ अक्टूबर १८६७ के दिन आर्यलैंड में जन्मी मार्गारेट एलिजाबेथ नोबल बचपन से ही सरल, भक्तिवान और स्वातंत्र्यप्रेमी थीं। राष्ट्रप्रेम और नि:स्वार्थ वृत्ति उसे विरासत में मिली थी। मार्गारेट के दादा-दादी आर्यलैंड के स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी थे। धर्मगुरु का कार्य करने वाले पिता सैम्युअल के सेवा-भाव और गृहस्थी का पूरा भार उठाने वाली माता मेरी की श्रध्दा का मार्गारेट पर गहरा प्रभाव था।

श्रध्दापूर्वक परिश्रम से अध्ययन करते हुये वे स्वयं शिक्षिका बनीं और शिक्षा क्षेत्र में नये-नये प्रयोग भी किये। अपने विद्यार्थियों से उनका व्यवहार अत्यंत सौहार्द्रपूर्ण था। शिक्षा के साथ-साथ वे अपने विद्यार्थियों में सेवा-भाव भी जागृत करती थीं।

पिता के अचानक देहान्त होने के पश्चात उन्होंने परिवार का दायित्व भी सँभाला। उन्हें ईसाई मत के साथ-साथ बौध्द मत का भी अच्छा ज्ञान था। भगवान बुध्द के आदर्श वचनों से वे अत्यंत प्रभावित हुई थीं। हिन्दू धर्म का अभ्यास करने की भी उनकी इच्छा थी और सत्य को पाने के लिये वे अत्यधिक उत्सुक थीं।

ई.स. १८९५ में जब स्वामी विवेकानंद लंदन गये तब मार्गारेट को उनके प्रथम दर्शन हुए। स्वामीजी के व्याख्यानों से उनकी अनेक शंकाओं का समाधान हुआ। स्वामीजी के शब्दों का जो परिणाम उपस्थितों पर हुआ उस विषय में भगिनी निवेदिता ने बताया, ‘‘पानी के लिये व्याकूल लोग जैसे नदी का प्रवाह पाकर तृप्त होते हैं वैसे ही यूरोप के लोग स्वामी जी के विचार पा कर तृप्त हो गये।”

स्वामीजी के लंदन के निवास में उन्होंने उनके सारे व्याख्यान सुने। उनके विचारों पर चिंतन मनन के पश्चात उनसे अपने प्रश्न भी पूछे। उनके साथ वाद-विवाद भी हुये। धीरे-धीरे साधना मार्ग उनके सामने स्पष्ट होने लगा। स्वामी जी के असामान्य नेतृत्व गुण, समाज के प्रति अत्यधिक प्रेम, नि:स्वार्थ और तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर मार्गारेट ने स्वामी जी का शिष्यत्व स्वीकार लिया।

२८ जनवरी १८९८ के दिन मार्गारेट एलिजाबेथ नोबल भारत आयीं। थोड़े ही समय में उन्होंने अपने स्नेह और भक्ति से सब को अपना बना लिया। २५ मार्च के शुभ दिन उनकी ब्रह्मचर्य दीक्षा हुयी। उनके गुरु स्वामी विवेकानंद से उन्हें निवेदिता यह नाम प्राप्त हुआ। भगिनी निवेदिता ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत माता के प्रति समर्पित कर यह नाम सार्थक किया।

भारत भूमि के प्रति उनका अपनत्व इतना आंतरिक था कि सम्भाषण में भारत का उल्लेख वे ‘यह देश’ और इंग्लैड का उल्लेख ‘वह देश’ इस प्रकार से करतीं। ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस की सहधर्मचारिणी शारदा देवी के शुभाशीर्वाद से भगिनी निवेदिता ने बालिका विद्यालय का आरंभ किया। उन दिनों बालिकाओं को विद्यालय में आने के लिये प्रेरित करने हेतु भगिनी घर-घर जाकर अभिभावकों से सम्पर्क करतीं। उनको शिक्षा का महत्व समझातीं।

भारत की संस्कृति, संस्कार तथा मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा का महत्व विशद करतीं। विद्यालय में भगिनी लेखन-पठन के साथ-साथ चित्रकला, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, मिट्टी की वस्तुयें बनाना तथा अन्यान्य हस्त-व्यवसाय भी सिखातीं। बालिकाओं के मन में राष्ट्रभक्ति जागृत करतीं। ‘वन्देमातरम’ गाने पर बंदी होने पर भी विद्यालय में ‘वन्देमातरम’ गाने की परम्परा उन्होंने कायम रखी।

एक बार उन्होंने विद्यालय की बालिकाओं से पूछा, ‘‘आपके आदर्श कौन हैं ?” तो जवाब मिला -‘रानी विक्टोरिया।’ इस उत्तर से वे अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने बालिकाओं को समझाया कि सीता और सावित्री ही भारतीय नारी की आदर्श होनी चाहिए। भारत में आधुनिक काल से स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में भगिनी निवेदिता का महत्वपूर्ण योगदान है।

जब कलकत्ता में प्लेग का संकट आया तब वे प्लेग पीड़ित लोगों की सेवा में जुट गईं। युवकों को भी सेवा करने के लिये प्रेरित किया। जब भगिनी निवेदिता झाड़ू लेकर रास्ते साफ करतीं तो कलकत्ता के युवक भी उनके साथ काम में जुट जाते। जहाँ डॉक्टर भी जाने के लिये डरते वहाँ भगिनी जाकर रोगियों की शुश्रुषा करतीं। मृत्युग्रस्त परिवारों को सांत्वना देतीं।

कार्य की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु उन्होंने अपने केवल दूध व फल के अत्यंत अल्पाहार से दूध कम कर दिया और सेवाकार्य करती रहीं। भगिनी निवेदिता काली माता की भक्त बन गयीं। वे उत्कृष्ट वक्ता थीं।

काली- दि मदर, माय मास्टर एज आय सॉ हिम, दि वेब ऑफ इंडियन लाइफ, स्टडीज फ्रॉम एन ईस्टर्न होम इत्यादि अनेक पुस्तकें भी उन्होंने लिखीं। लोगों में आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति जगाई। कला के क्षेत्र में भी उनका अभ्यास था। रवींद्रनाथ ठाकुर, अवनींद्रनाथ ठाकुर, नंदलाल बोस जैसे व्यक्तित्व उनके विचारों से प्रभावित थे।

दक्षिण के महाकवि सुब्रमण्यम् भारती के काव्य में उन्होंने स्त्री सम्मान और राष्ट्रभक्ति भर दी। डॉ. जगदीशचंद्र बसु ने विज्ञान के क्षेत्र में जो कार्य किया उसमें भी भ.निवेदिता का योगदान है। केवल भारत जैसे गुलाम देश के नागरिक होने के कारण डॉ. बसु का जो विरोध इंग्लैड के बुध्दिवादी कहलाने वाले विज्ञान-जगत में हो रहा था उससे भगिनी निवेदिता क्रोधित और दु:खी थीं।

डॉ. बसु को विश्व के विज्ञान के क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने में भी उनका सहभाग रहा है। उनकी वाणी में, लेखनी में, चिंतन में भारत भक्ति छा गई थी। वे पूर्णत: भारतीय हो गयी थीं। वे अपना नाम ‘रामकृष्ण -विवेकानंद की निवेदिता’ इस प्रकार से लिखती थीं। इससे उनकी गुरुभक्ति का प्रमाण मिलता है।

दार्जिलिंग में स्थित उनकी समाधि पर लिखा है – “जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत को अर्पण किया।”

आलेख

प्रियंवदा मधुकर पांडे
जीवनव्रती कार्यकर्ता, विवेकानन्द केंद्र

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