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पकड़ लो हाथ रघुनन्दन

पकड़ लो हाथ रघुनन्दन, ये दिल फिर टूट ना जाए।
प्रभु अब दे दो तुम दर्शन, कही सब छूट ना जाए।।

समझ आती नही दुनिया, कठिन जीवन का ये आकार।
यहां पल पल में है धोखा, कठिन तेरा है ये संसार।
दिला दो ,शीश में आशीष, चरण रज छूट ना जाये।
पकड़ लो हाथ रघुनन्दन, ये दिल फिर टूट ना जाए।
प्रभु अब दे दो तुम दर्शन, कही सब छूट ना जाए।

यहां पल पल में है बस छल, जिधर देखो उधर दलदल।
जहां देखो वही है गरल, वही फिर आज फिर वो कल।
दिखा दो अपना प्यारा रूप, ये मन कही रूठ ना जाये।
पकड़ लो हाथ रघुनन्दन, ये दिल फिर टूट ना जाए।
प्रभु अब दे दो तुम दर्शन, कही सब छूट ना जाए।

हमेशा तारा है तुमने, अजामिल ,शबरी ,नर नारी।
हमेशा मारा है तुमने, कंश रावण अहंकारी।।
करो संहार दुष्टों का, जगत फिर तेरे गुण गाये।
पकड़ लो हाथ रघुनन्दन, ये दिल फिर टूट ना जाए।
प्रभु अब दे दो तुम दर्शन, कही सब छूट ना जाए।

न हो तुम गर्व से गर्वित, ना खुद के मद में हो मदमस्त।
नही तुम मात्र नर के रुप, जपो बस नारायण स्वरूप।
धरो बस ध्यान तुम मेरा, तुम्ही में खुद नजर आए।
पकड़ लो हाथ रघुनन्दन, ये दिल फिर टूट ना जाए।
प्रभु अब दे दो तुम दर्शन, कही सब छूट ना जाए।

पकड़ लो हाथ रघुनन्दन, ये दिल फिर टूट ना जाए।
प्रभु अब दे दो तुम दर्शन, कहि सब छूट ना जाए।

सप्ताह के कवि

डॉ अशोक चतुर्वेदी
रायपुर, छत्तीसगढ़

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