Home / इतिहास / अद्भुत मेधाशक्ति सम्पन्न पुराविद : पद्मश्री श्री विष्णु श्रीधर वाकणकर

अद्भुत मेधाशक्ति सम्पन्न पुराविद : पद्मश्री श्री विष्णु श्रीधर वाकणकर

जन्म शताब्दी विशेष लेख

आज हम पद्मश्री श्री विष्णु श्रीधर वाकणकर जी जिसे हम हरिभाऊ के नाम से भी जानते हैं, की जन्मशताब्दी मना रहें हैं। इस महामना का जन्म आज ही के दिन ४ मई १९१९ को मध्यप्रदेश के नीमच नामक स्थान पर हुआ था। आपके माता जी श्रीमती सीता श्रीधर वाकणकर और पिता श्रीधर सिद्धनाथ वाकणकर जी हैं।

आप बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे और कुशाग्रबुद्धि रखते थे। आपका प्रारंभिक शिक्षा नीमच के में ही हुई और आपने एम ए, पी एच डी, के साथ ही साथ जी डी आर्ट की भी शिक्षा ली। आपके चाचा श्री अनन्त वामन श्रीधर वाकणकर जी का प्रभाव भी बचपन में पड़ा और आप बौद्धिक कार्यों से जुड़ गए। आपने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन, मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए वहीं निदेशक संग्रहालय पद पर कार्य भी करने लगे।

कला की साधना के साथ ही साथ देशप्रेम की जज्बा आपमें बचपन से ही थी। इसलिए आपने स्वतंत्रता संग्राम में सत्याग्रह से लेकर बम बनाने की कला भी सीख लिए और आपने महू जानेवाली मोरटक्का पूल को को उड़ाने की योजना के मुख्य सूत्रधार की भूमिका अच्छे से निभाई।

आप अद्भुत मेधाशक्ति सम्पन्न थे, यह इसी बात से पता चल जाता है कि आप निरंतर गतिशील रहे, ठहरना तो जैसे आपने सीखा ही नहीं। आप पुरातत्व उत्खनन विभाग तथा संचालक, संग्रहालय, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन, अखिल भारतीय कालिदास चित्र एवं मूर्तिकला प्रदर्शनी उज्जैन रॉक आर्ट इंस्टीट्यूट के संस्थापक रहे।

बात 23 मार्च 1957 की है, वाकणकर जी पैसेंजर ट्रेन में किसी काम से नागपुर जा रहे थे। ट्रेन ओबेदुल्लागंज में रुकी। शाम का समय था, वह बोगी के गेट पर आए और देखा की सामने बड़ी चट्‌टानें नजर आ रही हैं। उत्सुकतावश वाकणकर जी वहीं उतर गए और उस रात बरखेड़ा गांव में रुक गए।

दूसरे दिन सुबह वो बड़ी चट्‌टानों के डायरेक्शन देखते हुए भीमबैठका पहुंच गए। उस समय वहाँ जंगली जानवरों का भय था। पर अपने काम के प्रति समर्पित इस योद्धा को भला कौन रोक सकते थे। वे वहाँ पहुँच गए और चट्टानों में लाल, सफेद और काले रंगों से बने चित्रों को देखकर उस जगह पर शोधपत्र वाचन कर भीमबेटका को विश्व भर में प्रसिद्ध कर दिया। इसके बाद 1972 में उनको भारत सरकार के पुरात्तव विभाग ने वहां खुदाई की परमिशन दी।

जब 1981 में चित्रकार बाबा योगेन्द्र जी पद्मश्री -2017 ने संस्कार भारती की स्थापना की तब आप संस्थापक महामंत्री रहे। आप राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मध्यप्रदेश के बौद्धिक प्रमुख रहते हुए सदैव प्रचारक भी रहे। आप भारतीय कला भवन, उज्जैन, मध्यप्रदेश संस्थापक संचालक रहे।

आप ललित कला संस्थान और शैलचित्र शोध संस्थान के भी संचालक रहे। आपने वाकणकर भारतीय संस्कृति अन्वेषण न्यास, उज्जैन, मध्यप्रदेश और थियोसॉफिकल सोसायटी एवं शोध परिषद संग्रह, उज्जैन के अध्यक्ष भी रहे। बाबा साहेब आप्टे इतिहास संकलन समिति मध्यप्रदेश और गुजरात के भी प्रमुख रहे।

जब वेदों की रचना और सरस्वती नदी पर प्रश्न चिन्ह उठने लगे तब आपने सरस्वती नदी की लुप्त धारा की खोज की और वैदिक सरस्वती, शोध अभियान दल के भी प्रमुख रहे। आप कला भारती एवं कला पत्रिका ‘आकार” उज्जैन, मध्यप्रदेश ‘के मार्गदर्शक रहे।

आपने “सरस्वती नदी भारतवर्ष में बहती थी”, इसकी अपने अन्वेषण में पुष्टि करने के साथ-साथ इस अदृश्य हो गई नदी के बहने का मार्ग भी बताया। इनके शोध के परिणाम सम्पूर्ण विश्व को आश्चर्यचकित कर देने बाले हैं। आर्य-द्रविड़ आक्रमण सिद्धान्त को झुठलाने बाली सच्चाई से सबको अवगत कराने का महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित किया।

आपने सरस्वती नदी तट के अलावा भी चंबल तथा नर्मदा नदी क्षेत्र, असम तथा दक्षिण भारत में अनेक जगहों पर पदयात्रा कर सर्वेक्षण कार्य भी किये। आपने विभिन्न विषयों पर लगभग ७०००से अधिक रेखाचित्रों की रचना की।

आप एक उत्कृष्ट कोटि के कलाकार भी थे, आपने अनेक जगहों पर वैयक्तीकृत चित्र प्रदर्शनी भी लगाए, जिसमें जयपुर, उज्जैन, इंदौर, खैरागढ़, मुम्बाई, और दिल्ली प्रमुख है, इसके अलावा विदेशों में भी आपने अपनी कलाकृति की धूम मचाई जिसमें रोम,आस्ट्रिया ,पेरिस, फ्रैंकफर्ट आदि जगहों में १९८४ ईस्वी में न्यूयॉर्क में ‘विश्व की सोच पर भारत का योगदान’ विषय पर प्रदर्शित चित्र ने सर्वाधिक ख्याति प्राप्त की।

एक बार 1987 ईस्वी में जब उज्जैन में पुरातत्त्व विषय पर शोध संगोष्ठी का आयोजन किया गया था उस समय छत्तीसगढ़ राज्य अविभाजित मध्यप्रदेश का ही हिस्सा था, आप उस शोध संगोष्ठी में आमंत्रित थे, उसी शोध संगोष्ठी में बिलासपुर जिले के मल्हार गाँव में निवास करने वाले स्वर्गीय श्री गुलाब सिंह ठाकुर जी और स्वर्गीय श्री रघुनन्दन प्रसाद पाण्डेय जी भी गये हुए थे। वहाँ आपकी मुलाकात इन दोनों से हुई।

मल्हार के पुरावैभव को जानने की आपकी इच्छा को जानकर स्वर्गीय श्री गुलाब सिंह ठाकुर जी और पाण्डेय जी ने आपसे मल्हार आने की आग्रह किया, आपने उनके निमंत्रण को पाकर मल्हार आना स्वीकार किया। आप रेलमार्ग से 1987 के नवम्बर के दूसरे सप्ताह में पहले बिलासपुर पहुँचे, फिर बिलासपुर निवासी अपने मित्र संतोष भवन के मालिक नारायण आहुजा के निजी वाहन एम्बेस्डर से मल्हार पहूँचे। बिलासपुर से आपके साथ स्वर्गीय श्री श्याम लाल चतुर्वेदी जी, अधिवक्ता श्री साधुलाल गुप्ता जी और श्री नंदलाल शुक्ल जी भी साथ आये थे।

आपने सर्वप्रथम देऊर मंदिर का अवलोकन किया, वहाँ की विशालकाय प्रतिमाओं से आप बहुत प्रभावित हुए थे। वहाँ खुले में स्थापित भीम और कीचक की प्रतिमाओं को देखकर कीचक की प्रतिमा को कीचक न कहकर अर्धनारीश्वर की प्रतिमा बताए। गंगा-यमुना की प्रतिमाओं और संग्रहालय की प्रतिमाओं को अवलोकन करते हुए उनके शिल्प में डूब गये थे।

आप वहाँ से पातालेश्वर मंदिर पहुँच कर मंदिर में महादेव की पूजा करने के बाद टीन के शेड में रखी प्रतिमाओं को गहराई से देखते रहे और प्रतिमाओं के बारे में स्वर्गीय श्री गुलाब सिंह ठाकुर जी और स्वर्गीय श्री रघुनन्दन प्रसाद पाण्डेय जी से प्रश्न पूछते रहे। जानकारी का आदान-प्रदान करते रहे। वाकणकर जी के प्रश्नों को सुनकर पुरातत्व के प्रति उनकी जिज्ञासा देखते बनती थी। समय निकलता जा रहा था। आपके पास समय कम था आपने वहीं से गढ़ का अवलोकन किया तत्पश्चात मल्हार प्राथमिक शाला में आपका सम्मान किया गया।

आपने 1954 में महेश्वर में उत्खनन कार्य प्रारंभ किया फिर 1955 में नवादाटोली, 1959 में इंद्रगढ़, 1960 में मनोती, और आवरा में, 1966 में कायथा, 1971-1978 तक भीमबेटका, 1974 में मंदसौर, आजादनगर इंदौर में, 1974-75 में दंगबाड़ा, 1980 में रूनिजा में उत्खनन कार्य करके संतुष्ट नहीं हुए।

आप एक अच्छे लेखक भी थे, आपने लघुकथा संग्रह आर्य समस्या पर, हिन्दी और अँग्रेज़ी भाषा में आर० ब्रुक्स के साथ भारतीय शैल चित्रकला, रंगीन चित्रों के साथ मेरा पुरातत्वीय उत्खनन, हिन्दी में भारतीय चित्रकला, मुद्राशास्त्र आदि विषयों पर लेख लिखते रहे।

आपने भारतीय पुरातत्त्व विज्ञान की लोहा 1961में इंग्लैण्ड के बर्कोनियम रोमन साईट और 1962 में फ्रांस में उत्खनन कर भी मनवाया। आपके इस अमूल्य योगदान के लिए भारत सरकार ने 1975 में माननीय राष्ट्रपति महोदय ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया।

आलेख

हरिसिंह क्षत्री
मार्गदर्शक – जिला पुरातत्व संग्रहालय
कोरबा, छत्तीसगढ़
मो. नं.-9407920525, 9827189845

About hukum

Check Also

झांसी मेरी है, मैं उसे कदापि नहीं दूंगी : वीरांगना लक्ष्मी बाई

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम हिन्दुस्तान की अद्वितीय वीरांगना के रूप में लिया जाता …

One comment

  1. विवेक तिवारी

    अब्बड़ सुग्घर ज्ञान वर्धक आलेख बधाई

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *